उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को यूं ही नहीं ‘धाकड़ धामी’ कहा जाता है। इसके पीछे है उनकी ब्रांड वैल्यू जो कुछ ही समय में लोकप्रियता के पैमाने का शिखर छूने में सफल रही है। फिर चाहे वह समान नागरिक संहिता हो, अवैध भू-अतिक्रमण पर कठोर कार्यवाही हो जो उनके शब्दों में लैंड जेहाद है या फिर धर्मांतरण का मुद्दा, धामी भाजपा के उग्र हिंदुत्व की अवधारणा पर खरे उतरे हैं। लेकिन इस ‘ब्रांड वैल्यू’ ने घर भीतर ही अब उनके विरोधियों की फौज तैयार करने का काम भी कर दिखाया है। धामी के धाकड़पन और बढ़ती लोकप्रियता से खिन्न प्रदेश के कुछ भाजपा नेता कभी कुमाऊं-गढ़वाल प्रसंग तो कभी हाईकोर्ट स्थानांतरण मुद्दा उठाकर उकसाने का काम करते रहे हैं। अब ऐसे असंतुष्टों के हाथ उपचुनाव में भाजपा की हार और दिल्ली में केदारनाथ मंदिर के निर्माण का मुद्दा आ लगा है जिसकी बिना पर चक्रव्यूह रचना कर धामी को घेरा जा रहा है। लेकिन धामी अभिमन्यु नहीं हैं। वह अर्जुन की तरह मछली की आंख भेदना जानते हैं। दिल्ली के जिस प्रतीकात्मक केदारनाथ पर ‘धाम’ शब्द से आपत्ति थी उसे अब ‘मंदिर’ घोषित करा धामी सियासी धर्म संकट से बाहर निकलते नजर आ रहे हैं
10 जुलाई 2024
दिल्ली के बुराड़ी में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने किया केदारनाथ मंदिर का भूमि पूजन और शिलान्यास।
13 जुलाई 2024
मंगलौर और बदरीनाथ उपचुनाव के आए परिणाम जिसमें दोनों सीटें कांग्रेस ने जीती।
14 जुलाई 2024
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने दिल्ली में बन रहे केदारनाथ मंदिर का किया विरोध। केदारनाथ धाम से जुड़े पंडित-पुरोहितों में भी है गुस्सा। उन्होंने कहा ‘केदारनाथ धाम से करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है, ऐसे में बाबा केदारनाथ का मंदिर कहीं और बनाना तीर्थ की मर्यादा के खिलाफ है।’
15 जुलाई 2024
देहरादून का ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय। कार्यक्रम भाजपा प्रदेश कार्य समिति की बैठक। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा ‘सरकार ने चार धाम यात्रा को सुगम और सुरक्षित बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इसके चलते पिछले कई रिकॉर्ड टूट गए लेकिन कुछ लोग कभी यात्रा रजिस्ट्रेशन तो कभी प्रवेश मार्ग को लेकर अफवाह फैला रहे हैं। अब केदारनाथ धाम पर भ्रम फैलाया जा रहा है। केदारनाथ ज्योर्तिलिंग का स्थान एक ही है दुनिया में दूसरे स्थान पर कोई धाम नहीं हो सकता।’ साथ ही मुख्यमंत्री ने मंच से ऐसे लोगों को चेतावनी देते हुए कहा ‘जो शेर की खाल में छुपे हुए भेड़िए हैं, उनको मैं बताना चाहता हूं कि उनकी यह साजिश हमारे रहते कभी सफल नहीं होगी।’

उक्त प्रसंगों को देखकर प्रतीत हो रहा है कि उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सियासी चक्रव्यूह में फंस रहे हैं। गत 4 जुलाई को धामी सरकार ने तीन साल पूरे किए हैं। इन तीन सालों के कार्यकाल में 14 हजार 800 युवाओं को सरकारी नियुक्ति देना और 3 हजार 500 हेक्टेयर सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना धामी की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शुमार है। राजनीतिक पंडितों की मानें तो ऐसी कई उपलब्धियां धामी सरकार के खाते में दर्ज हो चुकी है। जिनके चलते सियासत के अलम्बरदारों को धामी कहीं न कहीं खटकते दिखाई देने लगे हैं। इन धामी विरोधियों द्वारा ही दो विधानसभा उपचुनाव में हार और दिल्ली में केदारनाथ मंदिर का विवाद खड़ा कर मुख्यमंत्री को घेरने का काम किया जा रहा है।
गौरतलब है कि केदारनाथ अकेला ऐसा मंदिर नहीं है जो दिल्ली में बन रहा है बल्कि इससे पहले 8 नवंबर 2011 को सिक्किम के नामची में बदरीनाथ मंदिर बनाया जा चुका है। इसके अलावा वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मुंबई में बदरीनाथ मंदिर का उद्घाटन किया था। उत्तर प्रदेश के सैफई में भी केदारनाथ मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव इसका निर्माण करवा रहे हैं। 20 जनवरी, 2024 को अखिलेश ने एक्स पर वीडियो शेयर कर इसकी जानकारी दी थी। इसी के साथ मध्य प्रदेश के इंदौर में भी बदरीनाथ धाम की तर्ज पर मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। ऐसे में सवाल खड़े हो रहे हैं कि मुख्यमंत्री धामी को निशाना बनाते हुए केदारनाथ मंदिर के बहाने कुमाऊंवाद और गढ़वालवाद का वाद-विवाद क्यों पैदा किया जा रहा है?
हालांकि केदारनाथ मंदिर पर हो रहे विवाद की हवा खुद श्री बदरीनाथ -केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष अजेंद्र अजय ने निकाल दी है। अजेंद्र अजय ने कहा कि दिल्ली में किसी संस्था द्वारा श्री केदारनाथ मंदिर की प्रतिकृति बनाए जाने के मामले को कांग्रेस नेता अनावश्यक रूप से तूल दे रहे हैं। कांग्रेस के कार्यकाल में वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मुम्बई में बदरीनाथ मंदिर का उद्घाटन किया था, तब कांग्रेस नेताओं ने ना ही इसका विरोध किया और ना ही तब तत्कालीन बीकेटीसी अध्यक्ष गणेश गोदियाल धरने पर बैठे थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि दिल्ली में बन रहे मंदिर से राज्य सरकार का कोई लेना देना नहीं है और ना ही राज्य सरकार अथवा मुख्यमंत्री द्वारा इसके लिए किसी प्रकार का सहयोग दिया गया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री धामी दिल्ली में प्रस्तावित मंदिर के शिलान्यास कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कुछ विधायकों, जन प्रतिनिधियों तथा साधु-संतों के अनुरोध पर गए थे। यह रूटीन प्रक्रिया का हिस्सा था। मुख्यमंत्री जी ने धार्मिक कार्यक्रम के नाते कार्यक्रम में शामिल होने की सहमति दी थी। इसके पीछे यह मंतव्य कहीं भी नहीं था कि प्रस्तावित मंदिर को बाबा केदार के धाम के रूप में विकसित किया जाएगा।
दिल्ली में निर्माणाधीन मंदिर के प्रति उपजे विवाद के बीच श्री केदारनाथ धाम ट्रस्ट बुराड़ी (दिल्ली) के अध्यक्ष सुरेंद्र रौतेला ने इस मामले में स्पष्टीकरण देते हुए कहा ‘दिल्ली में केदारनाथ ‘मंदिर’ बन रहा है, न कि ‘धाम’। हमारा ट्रस्ट इसका निर्माण करा रहा है। उत्तराखण्ड सरकार का इससे कोई संबंध नहीं है।’ उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड के सीएम पुष्कर सिंह धामी ट्रस्ट के निजी अनुरोध पर मंदिर के भूमि पूजन कार्यक्रम में शामिल होने दिल्ली आए थे। हमारा ट्रस्ट सदस्यों के सहयोग से चल रहा है, जिनमें अधिकांश लोग उत्तराखण्ड के रहने वाले हैं। रौतेला ने कहा कि देश के कई शहरों में प्रसिद्ध धामों के नाम पर कई मंदिर बन चुके हैं। चाहे इंदौर में केदारनाथ मंदिर हो या मुंबई में बदरीनाथ मंदिर। इन मंदिरों का उद्घाटन भी उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने किया था। रौतेला ने यह भी कहा कि यह पूरा विवाद सिर्फ राजनीति से प्रेरित है। उन्होंने इसे एक पॉलिटिकल स्टंट बताते हुए कहा कि कुछ नेता केवल अपनी राजनीतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए यह विवाद फैला रहे हैं। उत्तराखण्ड का केदारनाथ धाम 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। हम दिल्ली में सिर्फ एक मंदिर का निर्माण करवा रहे हैं।
4 जुलाई 2021 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बतौर युवा मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की कमान संभाली थी। तब उन्होंने राज्य की कमान सम्भालते ही सबसे पहले जीरो टॉलरेंस की शुरुआत करते हुए तत्कालीन मुख्य सचिव ओम प्रकाश को हटा केंद्र से आईएएस अधिकारी एसएस संधू को राज्य में वापसी करा उन्हें मुख्य सचिव की जिम्मेदारी दी। 4 जुलाई 2021 से मार्च 2022 तक सीएम धामी ने कई ऐसे बड़े फैसले लिए जिनकी बदौलत वे चर्चा के केंद्र में रहे। इसमें सबसे अहम फैसला पूर्व की त्रिवेंद्र सरकार के चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड फैसले को भंग करने और सख्त धर्मांतरण कानून लागू करना रहा। इसके बाद मार्च 2022 में विधानसभा चुनाव हुए और सीएम धामी कठिन परीक्षा में पास होने के बाद फिर से मुख्यमंत्री बने। उस समय उत्तराखण्ड में अनेक समस्याएं सामने थीं। राज्य की अर्थव्यवस्था कोविड महामारी के कारण बेहाल थी तो चार धाम के पुजारी एक नए नियामक बोर्ड के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। यही नहीं बल्कि एक बड़ा कोविड जांच घोटाला भी सुर्खियों में था। धामी ने खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण के साथ काम करने वाले नेता के रूप में प्रस्तुत किया। पिछले तीन साल का कार्यकाल देखें तो उनके मुख्यमंत्री काल में प्रदेश में कई मिथक टूटने के रिकॉर्ड कायम हुए हैं। जिसमंे उनके नेतृत्व में प्रदेश में लगातार दूसरी बार भाजपा सरकार का सत्ता में आना और पांचों लोकसभा सीट जीतकर हैट्रिक बनाना मुख्य रूप से शामिल है।
यह जगजाहिर है कि समान नागरिक संहिता, लव-जिहाद और लैंड- जिहाद जैसे मुद्दों पर प्रोएक्टिव एप्रोच और सरकारी जमीनों का अतिक्रमण कर बनाई गई मजारों का ध्वस्तीकरण कर मुख्यमंत्री धामी ने अपनी नई छवि को तराशने का काम किया है। वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद हिंदुत्व का सबसे बड़ा चेहरा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, योगी लेकिन न तो खांटी भाजपाई हैं और न ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से वे आते हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से उनके मतभेद हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। ऐसे में पार्टी आलाकमान नई पीढ़ी के जिन खांटी भाजपाई नेताओं को हिंदुत्व का चेहरा पुष्कर सिह धामी बनाने का प्रयास कर रहा है, धामी उनमें सबसे आगे हैं। राजनीतिक दृष्टि से यह बेहद महत्वपूर्ण है कि पहले जहां प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की प्रधानमंत्री मोदी से बामुश्किल कई महीनों बाद मुलाकात होती थी वहीं अब शायद ही कोई महीना ऐसा होगा जब दिल्ली में मोदी से धामी ना मिलते हों। प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुख्यमंत्री धामी के सौहार्दपूर्ण रिश्ते सियासत में उनकी धमक और सूबे में लिए जाने वाले महत्वपूर्ण फैसलों को मजबूत करते दिखाई देते हैं। यही वजह है कि धामी पहले जहां अपनी कार्यशैली को लेकर ‘सॉफ्ट’ नजर आते थे वहीं अब वे कठोर प्रशासक बतौर भी अपने को स्थापित कर रहे हैं और यही बात प्रदेश के कुछ भाजपाइयों को खटक रही है।
गत् दिनों हुए लोकसभा चुनाव में जब धामी सार्वजनिक मंच से बोलना शुरू करते थे तो उनका सम्बोधन स्थानीय देवी-देवताओं के जयकारे से शुरू होता था। साथ ही इसके प्रति उत्तर में उपस्थित जनता भी जयकारे लगाकर उनकी हिंदुत्व की छवि को मजबूत करती दिखी। धर्म को पर्यटन के साथ जोड़ने की बड़ी कवायद शुरू करते हुए उन्होंने सूबे में मानसखंड मंदिर माला योजना को शुरू किया। जी-20 समूह की दो बैठकों और चारधाम यात्रा का सफल आयोजन भी मुख्यमंत्री की छवि चमकाने में सहायक रहा है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक पदाधिकारी की मानें तो पुष्कर सिंह धामी को हिंदुत्व के युवा चेहरा बतौर आगे बढ़ाने की रणनीति पर इन दिनों काम किया जा रहा है। यह रणनीति यदि कामयाब रही तो आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बरअक्स एक खांटी भाजपा चेहरा पुष्कर सिंह धामी हिंदुत्व का नया ब्रांड एम्बेसडर बनने की और अग्रसर है।
अल्मोड़ा के वरिष्ठ पत्रकार नवीन बिष्ट कहते हैं कि ‘प्रधानमंत्री मोदी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की छवि सिर्फ उत्तराखण्ड तक ही सीमित करने के पक्ष में नहीं है, वे चाहते हैं कि उत्तराखण्ड से बाहर भी धामी की धूम सुनाई दे। यही वजह है कि प्रदेश के मुख्यमंत्रियों में पहली बार किसी मुख्यमंत्री को पूरे देश में लोकसभा चुनाव में न केवल स्टार प्रचारक बनाया गया, बल्कि प्रदेश की पांच सीटों समेत अलग-अलग राज्यों में 43 लोकसभा सीटों पर चुनाव प्रचार के लिए भेजा गया। जिनमें उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, तेलंगाना में लोकसभा की 26 सीटों पर भाजपा को जीत मिली। जो 26 सीट जीती गई उनमें 11 सीटों से निर्वाचित सांसदों को मोदी सरकार में मंत्रिमंडल में स्थान मिला है। धामी के नेतृत्व में प्रदेश की पांचों सीटों पर भाजपा ने लगातार तीसरी बार जीत का परचम लहराया।’ साथ ही बिष्ट सीएम धामी के लिए दो चुनौतियां भी बताते हैं। वे कहते हैं ‘कि आगामी निकाय चुनाव और केदारनाथ का उपचुनाव उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगा। जिसपर अब सबकी नजरें हैं।’
देहरादून की कवियत्री कविता बिष्ट के अनुसार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखण्ड देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जिसने यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) को लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इसे आगामी नवम्बर माह से पहले ही राज्य में लागू कर दिया जाएगा। जिसकी घोषणा सीएम धामी ने 15 जुलाई को राज्य की कार्यसमिति बैठक में की है। कविता कहती हैं कि उत्तराखण्ड एकमात्र ऐसा राज्य बना जिसके यूसीसी को भाजपा ने न केवल अपने लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में स्थान दिया था, बल्कि इसकी और मुख्यमंत्री धामी की तारीफ अपने चुनावी भाषणों में भी की थी।
इसी के साथ कविता बिष्ट मुख्यमंत्री धामी के कार्यकाल की चर्चा करते हुए कहती हैं कि राज्य की कमान संभालने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने तीन सालों के दौरान कई बड़े निर्णय के लिए जाने जा रहे हैं। उन्होंने यूसीसी के अलावा कई ऐसे कानूनों को धरातल पर उतारा है जो एक नजीर बन गए हैं। इन बड़े कानूनों में नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण कानून, दंगारोधी कानून, लैंड जिहाद के खिलाफ कार्रवाई, भ्रष्टाचार रोकने के लिए 1064 बनाना, हाउस ऑफ हिमालयन ब्रांड तैयार करने के साथ ही प्रदेश की महिलाओं को 30 फीसदी क्षैतिज आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान किया जाना महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही सीएम धामी ने तमाम ऐसी योजनाएं बनाई जिनकी चौतरफा प्रशंसा हो रही है। इनमें वात्सल्य योजना, लखपति दीदी योजना, नई खेल नीति, घर-घर प्रमाण पत्र पहुंचने की व्यवस्था, सरकारी अस्पतालों में 207 जांच निशुल्क के साथ ही कई अन्य महत्वपूर्ण कार्य शामिल हैं। इसके साथ ही राज्य आंदोलनकारियों को 10 फीसदी क्षैतिज आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान भी किया गया। ऐसी अनगिनत योजनाए हैं जिन पर मुख्यमंत्री धामी ने जमीनी कार्य किए हैं।
ऊधमसिंह नगर के करतार सिंह बाजवा मानते हैं कि प्रदेश की धामी सरकार ने पिछले तीन साल में कई अभूतपूर्व कार्य किए हैं। नकल रोकने के लिए सख्त नकल विरोधी कानून भी राज्य सरकार की विशेष उपलब्धि कही जा सकती है। सरकार देवभूमि के सौंदर्य बिगाड़ने वालों के खिलाफ भी सख्त कानून लाने की तैयारी कर रही है। अंत्योदय योजना के अंतर्गत तीन निःशुल्क गैस सिलेंडर दिए जा रहे हैं। भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखण्ड के लिए 1064 जारी किया गया है। सतर्कता विभाग इसको और मजबूत करने का काम कर रहा है। ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट में 2.50 लाख करोड़ का लक्ष्य रखा था, लेकिन 3.54 लाख करोड़ रुपए के एमओयू करार हुए। साथ ही 81 हजार करोड़ की ग्राउंडिंग की गई जो आने वाले समय में मील का पत्थर साबित होगा। धामी सरकार ने प्रदेश को 2025 तक न केवल नशा मुक्त बल्कि सर्वक्षेष्ठ राज्य बनाने के साथ ही 2026 तक गंगा कॉरिडोर बनाने का लक्ष्य रखा है। हल्द्वानी और तराई के लिए बहुत ही अहम माने जाने वाली जमरानी बांध परियोजना को स्वीकृति मिल चुकी है।
इसके साथ ही देहरादून महानगर में जलापूर्ति के लिए आने वाले 50 वर्षों तक जल आपूर्ति के लिए सौंग डैम परियोजना को स्वीकृति मिल चुकी है। बेहतर हवाई सेवा को लेकर सरकार तेजी से काम कर रही है। पंतनगर का एयरपोर्ट अंतरराष्ट्रीय बनाने के लिए राज्य सरकार प्रयासरत है। देहरादून से दिल्ली तक एलिवेटेड रोड बनाने का काम तेजी के साथ चल रहा है। इससे अब मात्र दो से ढाई घंटे में देहरादून से दिल्ली पहुंच सकेंगे। चारधाम यात्रा पर बेहतर कनेक्टिविटी हुई है। साथ ही किच्छा में राज्य का दूसरा एम्स का सैटेलाइट बनने जा रहा है। जिससे मरीजों को बेहतर इलाज के लिए दिल्ली-नोएडा जैसे शहरों की तरफ जाने से छुटकारा मिलेगा।
न तुम जीते, न हम हारे!
बदरीनाथ और मंगलौर उपचुनाव की बात करें तो भाजपा ने कुछ पाया नहीं है तो कुछ खोया भी नहीं है। बदरीनाथ सीट पहले भी कांग्रेस के पास थी और अब भी यह कांग्रेस के ही खाते में जुड़ चुकी है। हालांकि इस दौरान प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के प्रयासों से राजेंद्र भंडारी को कांग्रेस से लाना, भाजपा के टिकट पर पुनः चुनाव लड़ाना और यह सीट हार जाना कहीं न कहीं संगठन की राजनीतिक कमजोर इच्छाशक्ति पर जरूर सवाल खड़े कर गया। अगर मंगलौर विधानसभा के उपचुनाव को देखें तो यह सीट पहले बसपा के खाते में थी। इस सीट पर भाजपा कभी मुकाबले में नहीं रही। पार्टी के प्रत्याशी अधिकतर तीसरे स्थान पर रहे हैं। लेकिन पिछले 23 सालों में यह पहला मौका था जब भाजपा के उम्मीदवार करतार सिंह भड़ाना जीत के करीब आकर हार गए। यह भी निश्चित था कि अगर मतदान के दिन लिब्बाहेड़ी में जाट-मुस्लिम झगड़ा ना होता तथा भाजपा नेता रविंद्र सिंह पनियाला फायर ब्रांड नेता बनने के चक्कर में मंच से भड़काऊ भाषण ना देते और वह वीडियो वायरल ना होती तो भाजपा यह सीट जीत जाती।
मंगलौर विधानसभा की राजनीति में भाजपा सदैव हाजी और काजी की पिछलग्गू ही रहती थी। पिछले विधानसभा चुनावों की स्थिति पर गौर करंे तो 2022 में यहां से भाजपा के टिकट पर दिनेश पवार चुनाव लड़े थे। पवार गुर्जर बिरादरी से हैं। उन्हें 17000 वोट मिले थे। जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से ऋषिपाल बालियान चुनाव लड़े थे। बालियान जाट बिरादरी से आते हैं, उन्हें 16000 मत प्राप्त हुए थे। 2012 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े कलीम अंसारी को मात्र 3000 ही वोट मिले थे। जबकि 2007 में हरपाल हवलदार भाजपा के कैंडिडेट के तौर पर 1300 वोट पर ही सिमट गए थे।
दो माह पूर्व आए लोकसभा चुनाव के नतीजों में हरिद्वार में मंगलौर विधानसभा सीट पर अन्य सभी सीटों में कांग्रेस को सर्वाधिक 44,101 मत हासिल हुए हैं तो वहीं भाजपा को 21,100 वोट मिले थे। जबकि बसपा के खाते में 5,507 वोट ही आए। इस तरह देखें तो लोकसभा चुनाव में उत्तराखण्ड में कांग्रेस की यह 23000 की बढ़त अपने आप में किसी भी विधानसभा में सबसे बड़ी बढ़त थी। उस हिसाब से देखें तो कांग्रेस उम्मीदवार बहुत मजबूत थे। भाजपा के करतार सिंह भड़ाना अपने निकटतम कांग्रेस प्रत्यासी से महज 422 वोटांे के मामूली अंतर से चुनाव हार गए। भाजपा प्रत्यासी भड़ाना पैराशूट प्रत्याशी होने के साथ ही बाहरी होने के बावजूद अब तक पार्टी का सबसे अधिक मत प्राप्त करने का रिकॉर्ड (31 हजार 261 वोट) बना गए।
यह जगजाहिर है कि समान नागरिक संहिता, लव- जिहाद और लैंड-जिहाद जैसे मुद्दों पर प्रोएक्टिव एप्रोच और सरकारी जमीनों का अतिक्रमण कर बनाई गई मजारों का ध्वस्तीकरण कर मुख्यमंत्री धामी ने अपनी नई छवि को तराशने का काम किया है। वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद हिंदुत्व का सबसे बड़ा चेहरा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, योगी लेकिन न तो खांटी भाजपाई हैं और न ही वे आरएसएस से आते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उनके मतभेद हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। ऐसे में पार्टी आलाकमान नई पीढ़ी के जिन खांटी भाजपाई नेताओं को हिंदुत्व का चेहरा बनाने का प्रयास कर रहा है, धामी उनमें सबसे आगे हैं। आरएसएस के एक पदाधिकारी की मानें तो पुष्कर सिंह धामी को हिंदुत्व के युवा चेहरा बतौर आगे बढ़ाने की रणनीति पर इन दिनों काम किया जा रहा है। यह रणनीति यदि कामयाब रही तो आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बरअक्स एक खांटी भाजपा चेहरा पुष्कर सिंह धामी हिंदुत्व का नया ब्रांड एम्बेसडर बनने की ओर अग्रसर हैं
बात अपनी-अपनी
उपचुनाव हारने की घबराहट में महेंद्र भट्ट ने जो मेरे ऊपर मंदिर शिलान्यास के आरोप लगाए हैं, मैं बता देना चाहता हूं कि सैकड़ों मंदिरों के निर्माण में मैंने माटी में हाथ लगाए लेकिन कभी धाम नहीं बनाए। भाजपा ने पहले अपने राजनीतिक वर्चस्व के लिए शंकराचार्य पदों को विवाद में डाला और अब अपनी ना समझी कहिए या राजनीतिक स्वार्थ के लिए केदारनाथ धाम को भी विवाद में ला दिया है। उत्तराखण्ड के अंदर चारधाम, चार पीठें हैं, यदि उत्तराखण्ड से बाहर भी हम धाम स्थापित करने लग जाएंगे तो ऐसे धामों की बाढ़ आ जाएगी। किसी स्थान को धाम चिन्हित करने और स्थापित करने का आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और दैविक अधिकार किसके पास है, यह हमारे धर्म के अंदर पहले से ही निर्धारित है उसमें कहीं भी भाजपा को इस तरीके से किसी स्थल को धाम घोषित करने का अधिकार है या किसी सरकार को कहीं धाम घोषित करने का अधिकार है, यह चिन्हित नहीं है। मैं उन लोगों के आंदोलन के साथ हूं जो इस तरीके से धाम घोषित करने के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड
दिल्ली में जो केदारनाथ मंदिर का निर्माण किया जा रहा है, वह एक निजी ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। उस ट्रस्ट का नाम भी केदारनाथ धाम ट्रस्ट दिल्ली है। दिल्ली में केदारनाथ धाम नहीं बल्कि केदारनाथ मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। इस मंदिर में उत्तराखण्ड सरकार का कोई योगदान नहीं है। चूंकि उक्त ट्रस्ट द्वारा राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को समारोह में सम्मानपूर्वक बुलाया गया तो वे वहां चले गए। इसी प्रकार से वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रहे श्री हरीश रावत ने भी मुम्बई में श्री बदरीनाथ मंदिर के निर्माण का शिलान्यास किया था। दिल्ली में मंदिर बनवा रहे लोग उत्तराखण्ड के निवासी हैं और परम्परा को आगे बढ़ाने सहित ट्रस्ट द्वारा और भी कई सामाजिक व धार्मिक कार्य समय-समय पर किए जाते हैं।
महेंद्र भट्ट, सांसद एवं प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड भाजपा

