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असहिष्णुता की बढ़ती लहर

जब अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था तब एक नारा जोर-शोर से लगाया जा रहा था कि ‘अयोध्या तो झांकी है, अभी काशी-मथुरा बाकी है।’ इस नारे के जरिए भाजपा और उससे जुड़े उग्र हिंदुत्तवादी संगठन तब इशारा कर रहे थे कि राम जन्मभूमि विवाद खत्म होने के बाद काशी की ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद पर भी मंदिर के दावों को आगे बढ़ाया जाएगा। यह नारा अयोध्या में राममंदिर निर्माण के पूरा होने बाद अब परवान चढ़ने लगा है। वर्तमान समय में वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मस्जिद और उससे जुड़े काशी विश्वनाथ मंदिर से लेकर मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद और उत्तर प्रदेश के ही संभल में शाही जामा मस्जिद समेत अल्पसंख्यक समुदायक के धार्मिक स्थलों को बहुसंख्यक हिंदुवादी ताकतें अपने निशाने पर रख धार्मिक सौहार्द को बिगाड़ने का काम करती नजर आ रही हैं

वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मामले में फैसला सुनाया था। राममंदिर निर्माण के बाद अब बहुसंख्यक हिंदुवादी ताकतों के निशाने पर अल्पसंख्यक समाज के कई अन्य धर्म स्थल आ चुके हैं। मौजूदा समय में ऐसे कम से कम 12 मस्जिदों, दरगाह और स्मारकों के बारे में ये कहा जा रहा कि इन्हें मंदिर को तोड़ कर बनाया गया था और ये मांग की जा रही है कि इसे हिंदुओं को सौंप दिया जाना चाहिए। इसके लिए सर्वे की मांग भी होती है ताकि सबूत इकट्ठा किया जा सके। इन्हीं में से एक उत्तर प्रदेश के सम्भल में स्थित शाही जामा मस्जिद में स्थानीय कोर्ट के आदेश पर 24 नवंबर के दिन सर्वेक्षण के दौरान हिंसा भड़क उठी थी जिसमें पांच लोगों की मौत हो गई और करीब दो दर्जन लोग घायल हो गए हैं। घायलों में पुलिसकर्मी भी शामिल थे। पुलिस ने हिंसा मामले में ढाई हजार से अधिक लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है जिनमें से अधिकांश अज्ञात हैं। जिन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है उनमें समाजवादी पार्टी के सम्भल  से सांसद जिया उर रहमान बर्क और सम्भल के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सोहेल इकबाल भी शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सम्भल में शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा को लेकर पुलिस और प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि घटना से जुड़े उपद्रवियों के साथ पूरी कठोरता से निपटें। उन्होंने कहा कि ‘जिन लोगों ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है, उसे वापस ठीक कराने का खर्च उन्हीं उपद्रवियों से वसूल किया जाए। एक भी उपद्रवी बचना नहीं चाहिए चाहे गौतमबुद्ध नगर हो, अलीगढ़ हो या सम्भल अथवा कोई अन्य, अराजकता फैलाने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती।’

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया है। इसमें अन्य दो सदस्य सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अमित मोहन प्रसाद, जिन्होंने मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के अधीन कार्य किया है और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी अरविंद कुमार जैन जो अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी सरकार के कार्यकाल में 2015 में पुलिस, महानिदेशक थे, को शामिल किया गया है। ये फैसला ऐसे समय में लिया गया जब इस सम्बंध में जामा मस्जिद प्रबंधन समिति की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी थी।

एक ओर जहां विपक्षी दल के नेता इस न्यायिक जांच की अचानक घोषणा के फैसले को संदेह की नजर से देख रहे हैं वहीं तीन सदस्यीय आयोग की शर्तें और संदर्भ भी कई सवाल उठाते हैं क्योंकि वे हिंसा में मारे गए लोगों के परिजनों द्वारा पुलिस पर लगाए गए हत्या के गंभीर आरोपों को नजरअंदाज करते नजर आ रहे हैं। इस हिंसा में पांच की मौत हो गई थी, लेकिन सरकार ने केवल चार लोगों की मौत की बात ही स्वीकार की है।

इस मामले में गठित न्यायिक आयोग को चार काम करने हैं। पहला यह जांच करना कि क्या घटना अचानक हुई या सुनियोजित थी और किसी आपराधिक साजिश का नतीजा थी। दूसरा घटना के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिला प्रशासन और पुलिस द्वारा की गई व्यवस्था की जांच करना। तीसरा उन कारणों और परिस्थितियों का पता लगाना जिनके कारण ये घटना घटित हुई और चौथा ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए सुझाव देना।

आयोग के पास अपनी जांच पूरी करने के लिए दो महीने का समय है। आयोग की अधिसूचना घटना के अन्य महत्वपूर्ण तत्वों का कोई विशेष संदर्भ नहीं देती है, जिसके व्यापक समझ के लिए जांच की आवश्यकता होगी। सबसे पहले इस विवाद की जड़ जो मामले का केंद्र बिंदु है अदालत द्वारा नियुक्त अधिवक्ता आयुक्त रमेश राघव ने किन परिस्थितियों में जल्दबाजी दिखाई और स्थानीय सिविल अदालत के आदेश के तीन घंटे के भीतर 19 नवंबर की शाम को मस्जिद का सर्वेक्षण किया।

गौरतलब है कि सिविल जज सीनियर डिवीजन ने मस्जिद में प्रवेश के अधिकार का दावा करने वाले एक सिविल मुकदमे के हिस्से के रूप में हिंदुत्व समर्थक वकील हरि शंकर जैन और हिंदू संत महंत ऋषिराज गिरी के नेतृत्व में आठ वादी द्वारा दायर एक आवेदन पर एक सर्वेक्षण के लिए आदेश पारित किया था। हिंदू कार्यकर्ताओं ने दावा किया है कि 16वीं शताब्दी में पहले मुगल सम्राट बाबर के समय में बनी मस्जिद, मूल रूप से विष्णु के अवतार कल्कि को समर्पित एक प्रमुख हिंदू मंदिर का स्थान था।

अब उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मामले में 

‘पाकिस्तान कनेक्शन’ सामने रखा है। पुलिस का दावा है कि जिस जगह हिंसा हुई थी वहां से उसे पाकिस्तान में बना एक कारतूस मिला है। पुलिस के दावे के बाद मीडिया चैनलों ने पाकिस्तान से सीधा कनेक्शन का एंगल दे दिया है। इस हिंसा को पाकिस्तान से जोड़ने की होड़ में कुछ हिंदी मीडिया वेबसाइट्स ने पुलिस के दावों को आधार बनाकर यहां तक कह दिया कि हिंसा में कथित तौर पर विदेशी फंडिंग के इस्तेमाल की भी आशंका है।

इन सवालों के जवाब भी अभी बाकी हैं कि जब अदालत ने एडवोकेट कमिश्नर को रिपोर्ट जमा करने के लिए 29 नवंबर तक कम से कम पूरे नौ दिन का समय दिया था तो अदालत के आदेशों के तुरंत बाद उन्हें सर्वेक्षण शुरू करने के लिए किसने प्रेरित किया? क्या प्रशासन ने स्थानीय धार्मिक समुदायों को विश्वास में लेने के लिए आवश्यक कदम उठाए, यह देखते हुए कि मस्जिद मिश्रित आबादी वाले क्षेत्र में स्थित है या स्थानीय आबादी को सर्वेक्षण के उद्देश्य के बारे में सूचित करने के लिए कोई शांति बैठकें आयोजित कीं? यह देखते हुए कि यह विषय साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील है, एडवोकेट कमिश्नर ने दूसरा सर्वेक्षण क्यों किया? यदि अधिवक्ता आयुक्त को रात के समय में सर्वेक्षण करने की सीमाओं के बारे में पता था तो इसे उसी दिन जल्दबाजी में क्यों शुरू किया गया?

पुलिस पर न केवल प्रदर्शनकारी मुसलमानों पर गोली चलाने और उन्हें मारने का आरोप है, जो उस भीड़ का हिस्सा थे, जिसने पुलिसकर्मियों पर पथराव किया और वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया, बल्कि उन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने अनावश्यक लाठीचार्ज से भीड़ को हिंसक बना दिया। मारे गए लोगों के परिजन, मस्जिद का प्रबंधन करने वाली समिति के अध्यक्ष जफर अली और सम्भल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क सहित विपक्षी नेताओं ने पुलिस द्वारा भीड़ पर गोलीबारी करने का आरोप लगाया है। पुलिस ने इन आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि उन्होंने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए केवल रबर की गोलियां, आंसू गैस छोड़ी और लाठीचार्ज किया। पुलिस ने यह भी दावा किया कि बंदूक की गोली से मारे गए चार लोगों को देशी हथियारों से मारा गया था, जिससे पता चलता है कि भीड़ के सदस्यों ने एक-दूसरे पर गोली चलाई होगी।

एपीसीआर की याचिका में कहा गया है कि भीड़ मस्जिद की खुदाई की अफवाहों के खिलाफ शांतिपूर्वक विरोध कर रही थी तभी पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया। लाठीचार्ज के बाद भीड़ कथित तौर पर हिंसक हो गई और पथराव करने लगी। सत्तारूढ़ भाजपा ने मुसलमानों पर कथित पुलिस गोलीबारी से ध्यान हटाने के लिए मीडिया में एक कहानी गढ़ी कि हिंसा दो मुस्लिम समुदायों-तुर्क और पठान के बीच लम्बे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता के कारण हुई। यह जरूरी होगा कि आयोग इस बात की भी जांच करें कि अज्ञात पुलिस सूत्रों के हवाले से मीडिया के बड़े हिस्से द्वारा प्रचारित दो समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने का यह निराधार सिद्धांत कैसे गढ़ा गया। ऐसे तमाम सवालों का जबाव तलाशे जाने बांकी हैं।

जानकारों का कहना है कि सम्भल अराजकता, अन्याय, क्रूरता और दरिंदगी की जीती जागती तस्वीर है। देश में सालों से फैली नफरत अब गोलियों तक पहुंच गई है। पूजा स्थलों की सुरक्षा के लिए कानून का पालन न करने से देश की शांति बिगड़ रही है। इन घटनाओं को रोका जाना चाहिए। पूजा स्थल अधिनियम-1991 के बावजूद निचली अदालतें मुस्लिम पूजा स्थलों का सर्वेक्षण करने के आदेश जारी कर रही हैं, जो कि कानून का उल्लंघन है। पुलिस की बर्बरता का एक लंबा इतिहास है, चाहे वह मलियाना हो या हाशिमपुरा, मुरादाबाद, हलद्वानी या सम्भल, हर जगह पुलिस का एक ही चेहरा देखने को मिलता है। हालांकि पुलिस का काम कानून और व्यवस्था बनाए रखना और लोगों के जीवन और संपत्ति की रक्षा करना है। दुर्भाग्य से पुलिस शांति की वकालत करने के बजाय अल्पसंख्यकों और विशेषकर मुसलमानों के साथ एक पार्टी की तरह व्यवहार करती है। पुलिस को बचाने का मतलब है कि पुलिस ने मुस्लिम युवाओं को मारने के लिए अपनी रणनीति बदल दी है। इसके लिए उन्होंने अवैध हथियारों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। सिर्फ एक सम्भल ही नहीं देश के कई जगहों पर जिस तरह से विवाद हो रहे हैं हमारे पूजा स्थलों के बारे में और जिस तरह से स्थानीय न्यायपालिका इन मामलों में गैर-जिम्मेदाराना फैसले ले रही हैं, वह 1991 में लाए गए धार्मिक पूजा स्थल अधिनियम पूजा स्थलों के संरक्षण पर कानून का उल्लंघन है।

क्या कहता है कानून?

साल 1991 में कानून बनाकर यह सुनिश्चित किया गया कि देश में धार्मिक स्थलों का जो स्वरूप 15 अगस्त, 1947 को था, उसे बदला नहीं जा सकेगा। लेकिन धार्मिक स्थलों को लेकर जन आकांक्षाओं को इससे दबाया नहीं जा सका था। 2023 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस बात की गुंजाइश बनी कि यह पता किया जा सकता था कि किसी धार्मिक स्थल का वास्तविक स्वरूप क्या बाद में इसे बदला गया है। इसके बाद धार्मिक स्थलों के पुराने स्वरूप को बहाल करने को लेकर अदालतों में कई दावे पेश किए गए और अदालतों ने इस पर सर्वे के आदेश भी दिए।

पूजा स्थल अधिनियम, 1991
साल 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों को लेकर भविष्य में होने वाले संघर्ष को रोकने के लिए पूजा स्थल अधिनियम, 1991 में पेश किया। संसद ने इस अधिनियम को पारित किया। यह अधिनियम कहता है कि किसी भी जगह का धार्मिक चरित्र, उसी रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए जैसा वह 15 अगस्त, 1947 को था।

विवादित ढांचे पर फैसला
2019 में उच्चतम न्यायालय ने राम जन्म भूमि मामले में अपना फैसला सुनाते हुए पूजा स्थल अधिनियम का समर्थन किया था। न्यायालय ने कहा था कि अधिनियम राजनीतिक व्यवस्था के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बचाने के लिए बनाया गया है। न्यायालय ने अपने 1994 के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अधिनियम का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि ‘इतिहास और उसकी गलतियां वर्तमान और भविष्य को दबाने के लिए उपकरण के तौर पर इस्तेमाल न की जाएं।’ फैसले में यह भी कहा गया कि अदालतें हिंदुओं के पूजा स्थलों के खिलाफ मुगल शासकों द्वारा उठाए गए कदमों से पैदा होने वाले दावों को सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं कर सकतीं।­­­

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