साल के अंत में प्रस्तावित बिहार विधानसभा चुनाव की चैसर बिछने के साथ ही सभी राजनीतिक दल अपने-अपने कील-कांटे दूरस्थ करने में जुट गए हैं। एनडीए गठबंधन ने जहां अपना एजेंडा लागू कर दिया है वहीं राजद भी एक से बढ़कर एक मुद्दे उठा रही है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने सरकारी नौकरियों में 65 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का मुद्दा उठाकर एक बार फिर 2015 और 2020 के चुनावों की याद दिला दी है। तेजस्वी यादव ने राज्य के युवाओं से ऐसे युवा नेता को चुनने का आह्वान किया जो उनकी जरूरतों और आकांक्षाओं को समझता हो। तेजस्वी लगातार कह रहे हैं कि नीतीश कुमार ने अपने 20 साल के शासनकाल में बिहार को बर्बाद कर दिया है और अगर उन्हें फिर मौका मिला तो बिहार पूरी तरह बीमार राज्य बन जाएगा। वहीं नीतीश कुमार अपने भाषणों में बता रहे हैं कि बिहार के कुल 534 ब्लाॅकों में से लगभग 400 ब्लाॅकों में एक भी डिग्री काॅलेज नहीं है। अगर आपको नौकरी, रोजगार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए तो मौजूदा सरकार को बरकरार रखना होगा
देश में इन दिनों एक ओर जहां महाराष्ट्र में औरंगजेब के नाम से शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं रहा है और अब तो नौबत औरंगजेब की कब्र को तोड़ने तक पहुंच गई है तो उत्तर प्रदेश की सम्भल सियासत एक नया मोड़ ले चुकी है जहां मस्जिद में सर्वे के बाद अन्य धार्मिक स्थलों पर भी सर्वे की मांग तेज हो गई है। ‘जो हमारा है, वापस दो’ के नारे के बीच यह विवाद राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। वहीं हिंदी भाषा को लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की सियासत जारी है। आए दिन वह हिंदी के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं तो पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राज्य की राजनीति में हलचल मच गई है।
दूसरी तरफ इसी साल के अंत में प्रस्तावित बिहार विधानसभा चुनाव की चैसर बिछने लगी है और सभी राजनीतिक दल अपने-अपने कील- कांटे दूरस्थ करने में जुट गए हैं। एनडीए गठबंधन ने जहां अपना एजेंडा लागू कर दिया है वहीं राजद भी एक से बढ़कर एक मुद्दे उठा रही है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने सरकारी नौकरियों में 65 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का मुद्दा उठाकर एक बार फिर 2015 और 2020 के चुनावों की याद दिला दी है। तेजस्वी यादव ने राज्य के युवाओं से ऐसे युवा नेता को चुनने का आह्वान किया जो उनकी जरूरतों और आकांक्षाओं को समझता हो। तेजस्वी लगातार कह रहे हैं कि नीतीश कुमार ने अपने 20 साल के शासनकाल में बिहार को बर्बाद कर दिया है और अगर उन्हें फिर मौका मिला तो बिहार पूरी तरह बीमार राज्य बन जाएगा। ऐसे में तेजस्वी यादव ने नौकरी, डोमिसाइल और आरक्षण का मुद्दा उठाकर बड़ा दांव खेला है। वे युवाओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं।
तेजस्वी यादव ने विधानसभा चुनाव 2025 में सरकारी नौकरियों में 65 प्रतिशत आरक्षण बहाल करने का वादा किया है। वे दावा कर रहे हैं कि सत्ता में आने के एक महीने के भीतर युवाओं के हित के लिए युवा आयोग का गठन करेंगे और सरकारी नौकरियों में 100 प्रतिशत डोमिसाइल नीति लागू करेंगे और बिहार सरकार की भर्ती परीक्षाओं के लिए ली जाने वाली फीस भी माफ करेंगे।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राजद आने वाले विधानसभा चुनाव में आरक्षण का मुद्दा उछालकर बड़ी राजनीति साधने में जुट गई है? राजद के एक बड़े नेताओं की मानें तो इस बार तेजस्वी यादव युवाओं को लेकर कई और ऐलान करने वाले हैं। आने वाले दिनों में पटना में ही नहीं राज्य के हर जिले में 65 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के मुद्दे पर धरना-प्रदर्शन शुरू होगा। तेजस्वी यादव बिहार में अनुसूचित जाति और जनजाति, पिछड़ा-अति पिछड़ा वर्ग के युवाओं को नौकरी का नुकसान हो रहा है, यह घूम-घूम कर बताएंगे।
वहीं नीतीश कुमार अपने भाषणों में बता रहे हैं कि बिहार के कुल 534 ब्लाॅकों में से लगभग 400 ब्लाॅकों में एक भी डिग्री काॅलेज नहीं है। ऐसे में अगर आपको नौकरी, रोजगार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए तो मौजूदा सरकार को बरकरार रखना होगा। विधानमंडल के बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष के नाते तेजस्वी ने नीतीश कुमार को घेरा तो उनका रिएक्शन देखने लायक था। नीतीश ने संवैधानिक मर्यादा और वैधानिक प्रोटोकाॅल का भी ख्याल नहीं किया और घरेलू अंदाज में तेजस्वी को बच्चा तक कह दिया। तेजस्वी के साथ नीतीश कुमार की झड़प हुई तो लालू प्रसाद यादव भी नीतीश के निशाने पर आ गए। यही नहीं विधान परिषद में नीतीश की तेजस्वी की मां राबड़ी देवी से भी झड़प हुई।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो तेजस्वी यादव की इस रणनीति के पीछे लालू यादव का दिमाग काम कर रहा है। लालू यादव इस बार के चुनाव में हर हालत में इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाना चाहते हैं। क्योंकि इस बार के चुनाव में युवा वोटरों की संख्या जीत-हार में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। ऐसे में नौकरी, डोमिसाइल और आरक्षण का मामला काफी असरदार साबित हो सकता है। साल 2022 में जब राज्य में महागठबंधन की सरकार थी तो आरक्षण की सीमा 50 से बढ़ाकर 65 फीसदी कर दी गई थी। इस फैसले के बाद राज्य में ईडब्ल्यूएस कोटे को मिलाकर बिहार में आरक्षण की सीमा 75 प्रतिशत तक हो गई थी लेकिन पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में यह मामला गया और इस पर रोक लग गई। अब इस फैसले का लाभ एक बार फिर से राजद लेना चाहती है इसलिए तेजस्वी ने नीतीश सरकार और केंद्र सरकार को ‘आरक्षण चोर’ कहा है। हालांकि इस रणनीति में राजद की राह आसान होने वाली नहीं लग रही है।
एनडीए में शामिल पार्टियों के अलावा जन सुराज और ओवैसी की एआईएमआईएम भी चुनाव के दौरान तेजस्वी यादव को ही निशाने पर रखेंगी। एनडीए में शामिल भाजपा, जेडीयू, एलजेपी-आर, हम और आरएलएम के नेता अभी से तेजस्वी पर हमलावर हैं। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की नजर में नीतीश कुमार जितना चुभते हैं उससे अधिक तेजस्वी यादव उनके निशाने पर रहते हैं। असदुद्दीन ओवैसी का उभार इस बार भी तेजस्वी के खिलाफ ही जाता दिख रहा है।
जहां तक पीके की बात है जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर अक्सर तेजस्वी को नौंवी फेल बताकर उनका उपहास करते हैं। वे तेजस्वी की योग्यता सिर्फ लालू यादव की संतान होना मानते हैं। आरजेडी ने शायद इसी वजह से अपने कार्यकर्ताओं-नेताओं को प्रशांत किशोर से सचेत भी किया था। जन सुराज को आरजेडी ने भाजपा की ‘बी’ टीम भी बताया था। प्रशांत किशोर के भाषण में तेजस्वी का जिक्र नीतीश कुमार के साथ आता ही है। दोनों को बिहार के लिए प्रशांत किशोर नुकसानदेह बताते है।
ओवैसी भी खफा हैं तेजस्वी से
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी महागठबंधन की तरह ही भाजपा के विरोधी हैं। लेकिन उनके हमले की जद में तेजस्वी ज्यादा रहते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि बाद में तेजस्वी ने उनमें से चार विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया था। मुसलमानों के हितैषी के रूप में सीमांचल में ओवैसी की अच्छी खासी पकड़ है। इस बार भी वे महागठबंधन के खिलाफ मैदान में उतरेंगे ही उतरेंगे।
कांग्रेस ने बढ़ाई तेजस्वी की टेंशन तेजस्वी की परेशानी इससे भी समझी जा सकती है कि महागठबंधन में रहते हुए कांग्रेस महागठबंधन सरकार के कार्यकाल में हुए फैसलों पर सवाल उठा चुकी है। राहुल गांधी पटना गए तो लालू यादव से मुलाकात करने उनके घर गए लेकिन कांग्रेस के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावारु ने बिहार में महीने भर रहने के बावजूद लालू से मिलना मुनासिब नहीं समझा। यहां तक कि जिस भक्त चरण दास का लालू ने भकचोन्हर दास नामकरण किया था वे भी उनसे मिलने में प्रभारी रहते संकोच नहीं करते थे। प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह पर भी लालू का करीबी होने का आरोप लगता रहा है। फिलहाल कांग्रेस ने जिस तरह नजरें पलट ली हैं उससे ऐसा लगता है कि वह तेजस्वी की एनडीए या दूसरे दलों से भी बड़ी दुश्मन बनने से परहेज नहीं करेगी वहीं कन्हैया कुमार को बिहार भेजकर कांग्रेस ने तेजस्वी की टेंशन बढ़ा दी है।
इस बार कांग्रेस को भनक लग चुकी है कि आरजेडी उसकी सीटों में कटौती की तैयारी कर चुकी है। इसलिए पहले से ही कांग्रेस ने तेवर कड़े कर लिए हैं। चर्चा है कि कांग्रेस ने सौ सीटों पर सर्वेक्षण भी कराया है। पिछली बार कांग्रेस के हिस्से 70 सीटें थीं जिनमें वह सिर्फ 19 ही जीत पाई। कांग्रेस कह रही है कि इस बार उसे वैसी ही सीटें चाहिए जो वह जीत सके। कन्हैया कुमार तो यह भी कहते हैं कि कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें नहीं मिलीं तो सभी 243 सीट पर कांग्रेस चुनाव लड़ेंगी। बहरहाल, राजद और कांग्रेस के आधिकारिक पक्ष से इतर बड़े सवाल ये कि क्या तेजस्वी यादव और लालू यादव बिहार में कन्हैया कुमार की सक्रियता पसंद करेंगे? क्या राहुल गांधी बिहार कांग्रेस के भविष्य को लेकर कुछ नई
रणनीति बना रहे हैं। गौरतलब है कि 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा के लिए इसी साल चुनाव होने हैं। एनडीए की कोशिश जहां बिहार की सत्ता को बरकरार रखने की होगी, वहीं तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी सत्ता के सिंहासन पर पहुंचने के लिए बेकरार है।
मुकेश सहनी पर भी भरोसा नहीं
वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी के बयानों और उनके बारे में चल रही चर्चाओं को लेकर कहा जा रहा है कि वे भी तेजस्वी के कहीं दुश्मन न बन जाएं। सहनी 60 सीटों की मांग कर रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भी सहनी सीटों के ही मुद्दे पर खफा होकर चुनाव से ठीक पहले एनडीए में चले गए थे। तब जिस तरह के शब्द बाण उनके तर्कश से तेजस्वी पर चले थे उसकी पुनरावृत्ति इस बार भी हुई तो आश्चर्य नहीं होगा और सीटों पर पेंच फंसा तो मुकेश सहनी एनडीए में पुनर्वापसी कर सकते हैं।
हिंदुत्व के जरिए बिहार जीतने की तैयारी में भाजपा
बिहार में जीत हासिल करना सत्ताधारी दल बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। हिंदी पट्टी में बिहार ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां अभी तक बीजेपी का मुख्यमंत्री नहीं है। इसकी वजह है जातीय राजनीति। बिहार में जातीय समीकरण अक्सर धर्म के मुद्दे को पीछे छोड़ देता है। उत्तर प्रदेश में धर्म के सामने अक्सर जातियों का महत्व नहीं रहता है। खासकर सीएम योगी को हिन्दुत्व का फायर ब्रांड नेता कहा जाता है। मगर बिहार में ऐसा नहीं है। हालांकि यूपी की तरह बिहार में भी बीजेपी हिन्दुत्व का कार्ड चल सकती है। चुनाव से पहले बाबा बागेश्वर से लेकर कई धर्म गुरुओं की उपस्थिति इसी ओर इशारा करती है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि बीते दिनों गोपालगंज में हिंदू राष्ट्र की हुंकार भरते हुए बाबा बागेश्वर आचार्य धीरेंद्र शास्त्री के कुछ बयानों पर गौर करें तो उनका क्या ध्येय है और उनकी बातों के क्या अर्थ हैं। उन्होंने कहा- ‘देश रघुवर का है बाबर का नहीं। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाएंगे। हिंदुओं को एक करेंगे। हिंदुओं को घटने नहीं देंगे। संकट में हिंदू कहां जाएंगे।’ ऐसे में जातियों में बुरी तरह विभक्त बिहार के समाज को एकजुट करने में अगर थोड़ी भी सफलता बाबा बागेश्वर को मिलेगी तो यह बीजेपी की राजनीति को ही फायदा पहुंचाएगी।
वहीं श्री श्री रविशंकर भी बिहार के दौरे पर गए और वह सत्संग और अध्यात्म की अलख जगा रहे हैं। पटना के गांधी मैदान में आध्यात्मिक गुरु रविशंकर का भव्य दो दिवसीय सत्संग में रविशंकर 1000 साल पुराने पवित्र शिवलिंग के साथ बिहार पहुंचे थे। खास बात यह है कि यह शिवलिंग वही है जिसे महमूद गजनवी ने 1026 ईस्वी में खंडित किया था। महमूद गजनवी का नाम आगे आना प्रदेश की राजनीति के ध्रुवीकरण की कवायद हो सकती है और इसका फायदा भी भाजपा और एनडीए की राजनीति को ही होगा। यही नहीं चुनाव से ठीक पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत मुजफ्फरपुर को बेस बनाकर पांच दिनों के बिहार दौरे पर गए थे और विभिन्न जिलों में संघ के कार्यक्रम में शामिल हुए। उनके इस कार्यक्रम को बीजेपी के वोट बेस को मजबूत बनाने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।

