फिल्म ‘धुरंधर’ राष्ट्रवाद, जासूसी और आतंकवाद जैसे गम्भीर विषयों को छूते हुए भारी कमाई तो कर रही है लेकिन विचार, नैतिकता और सिनेमाई ईमानदारी के स्तर पर बार-बार लड़खड़ाती है। यह नए दौर की प्रतीक फिल्म है जहां राष्ट्रवाद सिनेमा का विचार नहीं बल्कि सबसे सुरक्षित कारोबारी फाॅर्मूला बन चुका है
फिल्म ‘धुरंधर’ की सफलता को केवल बाॅक्स ऑफिस के आंकड़ों से समझना एक बड़ी भूल होगी। 350 करोड़ रुपए से अधिक की कमाई, भरे हुए सिनेमाघर और दर्शकों की तालियां इस बात का संकेत जरूर हैं कि फिल्म ने एक नस पकड़ ली है, लेकिन उससे बड़ा संकेत यह है कि आज भारतीय सिनेमा में राष्ट्रवाद किस तरह एक सुरक्षित, मुनाफे वाला और लगभग विवाद-प्रूफ प्रोडक्ट बन चुका है। ‘धुरंधर’ इसी प्रोडक्ट की सबसे ताजा, चमकदार और शोरगुल से भरी पैकेजिंग है।
फिल्म की शुरुआत 1999 के कंधार विमान अपहरण से होती है। शुरुआती दृश्य जान-बूझकर डॉक्यूमेंट्री सरीखे रचे गए हैं ताकि दर्शकों को यह भरोसा दिलाया जा सके कि वह किसी गम्भीर, तथ्यपरक और ऐतिहासिक कथा में प्रवेश कर रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और तत्कालीन विदेश मंत्री जैसे किरदारों की झलकें इतनी स्पष्ट हैं कि पहचानने में कठिनाई नहीं होती। संसद पर हमला, मुम्बई आतंकी हमला, इन घटनाओं का उल्लेख करते हुए फिल्म यह माहौल बनाती है कि भारत लगातार हमलों का शिकार रहा है और अब ‘कुछ बड़ा’ करने का समय आ गया है।
यहीं तक फिल्म संतुलित और अपेक्षाकृत विश्वसनीय लगती है। लेकिन इसके बाद जैसे ही कहानी भारतीय खुफिया एजेंसियों द्वारा पाकिस्तान में डीप ऐसेट’ भेजने की ओर बढ़ती है, फिल्म यथार्थ से ज्यादा कल्पना, अतिरंजना और स्टीरियोटाइप के सहारे चलने लगती है। रणवीर सिंह द्वारा निभाया गया नायक जसकीरत सिंह रांगी, जो पाकिस्तान में हमजा अली मजारी बनकर रहता है, कथित तौर पर भारत की आंख और कान है। लेकिन फिल्म कभी साफ नहीं करती कि उसका मिशन क्या है, सूचना इकट्ठा करना, हमलों को रोकना, या बस दुश्मन की दुनिया में घुसकर हिंसा फैलाना।
रणवीर सिंह का अभिनय शारीरिक और ऊर्जात्मक स्तर पर प्रभावी है। उन्होंने अपने शरीर, चाल-ढाल और आक्रामकता से यह साबित किया है कि वे इस तरह के किरदार के लिए पूरी तरह समर्पित हैं। एक्शन दृश्यों में उनकी मौजूदगी दमदार है। लेकिन समस्या यह है कि उनका किरदार एक ही भाव में अटका रहता है। वह लगातार गुस्से में है, लगातार मारने के लिए तैयार है और लगभग पूरी फिल्म में उसके भीतर कोई आंतरिक द्वंद्व नहीं दिखता। एक जासूस, जो बरसों दुश्मन की जमीन पर रहता है, उससे कहीं ज्यादा मानसिक, नैतिक और भावनात्मक जटिलता की उम्मीद होती है। रणवीर सिंह जैसे अभिनेता के पास यह सब दिखाने की क्षमता है, लेकिन पटकथा उन्हें वह जगह नहीं देती।
फिल्म का सबसे मजबूत अभिनय अक्षय खन्ना का है, जो रहमान डकैत के रूप में सामने आते हैं। एक बलोच माफिया, नेता और पावर ब्रोकर के रूप में उनका किरदार डरावना भी है और आकर्षक भी। अक्षय खन्ना की आंखों की ठंडक, संवादों की मितव्ययिता और शरीर की स्थिरता उन्हें कई दृश्यों में फिल्म का केंद्र बना देती है।
विडंबना यह है कि उनका किरदार भी अंततः एक सुविधाजनक स्टीरियोटाइप में बदल जाता है। बलोच संघर्ष, जो वास्तविकता में पाकिस्तान के लिए एक गहरा और जटिल मुद्दा है, फिल्म में महज आतंक और साजिश के औजार के रूप में इस्तेमाल होता है।
आर. माधवन फिल्म में वरिष्ठ खुफिया अधिकारी अजय सान्याल की भूमिका में हैं। माधवन हमेशा की तरह संयमित, गम्भीर और भरोसेमंद लगते हैं। वे फिल्म में एक ऐसे अधिकारी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो रणनीति और विवेक की बात करता है। लेकिन उनकी भूमिका भी संवादों और आदेशों तक सीमित रह जाती है। उन्हें न तो नैतिक बहस करने का अवसर मिलता है और न ही फैसलों की कीमत चुकाने का। संजय दत्त एक सख्त पुलिस अधिकारी के रूप में प्रभाव छोड़ते हैं लेकिन उनका किरदार भी भारी-भरकम मौजूदगी से आगे नहीं बढ़ पाता। अर्जुन रामपाल, जो एक सैन्य या खुफिया भूमिका में हैं, अपने शांत और गम्भीर अंदाज से कुछ दृश्यों को संभालते हैं, पर पटकथा की भीड़ में वे भी खो जाते हैं।
फिल्म का भावनात्मक पक्ष बनने वाली महिला भूमिका सारा अर्जुन ने निभाई है, जो एक पाकिस्तानी नेता की बेटी हैं। सारा अर्जुन अपने सीमित दायरे में ईमानदार और संवेदनशील लगती हैं। प्रेम, विश्वास और धोखे के बीच फंसी एक युवती के रूप में वे दर्शकों की सहानुभूति अर्जित करती हैं। लेकिन यह भूमिका भी अंततः पुरुष नायक की कथा को आगे बढ़ाने का साधन बनकर रह जाती है। उसे न पूरी सच्चाई बताई जाती है, न ही उसे स्वतंत्र नैतिक निर्णय लेने का अवसर मिलता है।
कथानक आगे बढ़ने के साथ और उलझता जाता है। फिल्म दिखाती है कि नायक की मौजूदगी के बावजूद आतंकी हमले होते रहते हैं। वह यह भी याद करता है कि उसने कसाब को हथियार थमाया था, यह दृश्य चैंकाने के बजाय कहानी को और अविश्वसनीय बना देता है। सवाल उठता है कि अगर यह जासूस इतना गहरे तक घुसा हुआ था, तो वह इन हमलों को रोक क्यों नहीं सका? फिल्म इन सवालों से टकराने के बजाय हिंसा और एक्शन की मात्रा बढ़ा देती है।
यहीं धुरंधर पूरी तरह एक एजेंडा फिल्म में बदल जाती है। इसमें नेता भ्रष्ट हैं, अफसर ईमानदार हैं, भारत नैतिक रूप से शुद्ध है और पाकिस्तान पूरी तरह खलनायक। यह सरलीकरण दर्शकों के एक वर्ग को संतोष देता है, लेकिन सिनेमा को कमजोर करता है। असल दुनिया में आतंकवाद, जासूसी और राजनीति इतनी सीधी रेखाओं में नहीं बंटी होती।
अगर हम धुरंधर की तुलना दूसरी जासूसी और राष्ट्रवादी फिल्मों से करें, तो इसकी सीमाएं और स्पष्ट हो जाती हैं। राजी में आलिया भट्ट का किरदार भी पाकिस्तान में जासूसी का है, लेकिन वहां हर हत्या के साथ अपराधबोध और नैतिक पीड़ा जुड़ी होती है। अंत की उसकी चीख राष्ट्रवाद के नाम पर की गई अमानवीयता पर सवाल बन जाती है। इजरायली जासूस इली कोहेन की कहानी पर बनी सीरीज ‘द स्पाई’ दिखाती है कि एक जासूस किस तरह व्यवस्था का सबसे प्रभावी हथियार बनता है और अंततः उसी का शिकार हो जाता है। स्टीवन स्पीलबर्ग की म्यूनिख बदले की राजनीति को ही कटघरे में खड़ा कर देती है।
भारतीय सिनेमा में हाल के वर्षों में ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरल स्टोरी’, ‘तानाजी’ और ‘शेरशाह’ जैसी फिल्मों ने राष्ट्रवाद को अलग-अलग तरीकों से पेश किया है। इनमें से कुछ फिल्में अपने उद्देश्य को लेकर स्पष्ट हैं, कुछ भावनात्मक अतिरंजना का शिकार हैं, और कुछ ने गम्भीर बहसें भी खड़ी की हैं। ‘धुरंधर’ इन सबके बीच खड़ी होकर न तो पूरी तरह जासूसी थ्रिलर बन पाती है, न गम्भीर राजनीतिक फिल्म और न ही चरित्र-केंद्रित सिनेमा।
साढ़े तीन घंटे की लम्बाई के बावजूद यह साफ नहीं होता कि अंततः इस नायक का क्या हुआ, उसे कैसे तैयार किया गया और उसके मिशन का परिणाम क्या निकला। दर्शक को सीक्वल के भरोसे छोड़ दिया जाता है। यानी कहानी अधूरी, लेकिन कमाई पूरी। इस अर्थ में फिल्म का शीर्षक अपने निर्माताओं पर ज्यादा सटीक बैठता है, जो अधपके राष्ट्रवाद को डबल पैसे में बेचने में सफल रहे।
आखिरकार सवाल यही है कि हम किस तरह का राष्ट्रवाद सिनेमा में देखना चाहते हैं। क्या ऐसा राष्ट्रवाद, जो सवालों से डरता है और हिंसा को समाधान बताता है? या ऐसा राष्ट्रवाद, जो अपनी ताकत के साथ अपनी सीमाओं को भी पहचानता है? धुरंधर इस सवाल का जवाब नहीं देती। वह सिर्फ यह बताती है कि आज के दौर में शोर, गुस्सा और दुश्मन गढ़ना बिकता है और यही उसकी सबसे बड़ी सफलता और सबसे बड़ी विफलता दोनों है।
यहीं तक फिल्म संतुलित और अपेक्षाकृत विश्वसनीय लगती है। लेकिन इसके बाद जैसे ही कहानी भारतीय खुफिया एजेंसियों द्वारा पाकिस्तान में डीप ऐसेट’ भेजने की ओर बढ़ती है, फिल्म यथार्थ से ज्यादा कल्पना, अतिरंजना और स्टीरियोटाइप के सहारे चलने लगती है। रणवीर सिंह द्वारा निभाया गया नायक जसकीरत सिंह रांगी, जो पाकिस्तान में हमजा अली मजारी बनकर रहता है, कथित तौर पर भारत की आंख और कान है। लेकिन फिल्म कभी साफ नहीं करती कि उसका मिशन क्या है, सूचना इकट्ठा करना, हमलों को रोकना, या बस दुश्मन की दुनिया में घुसकर हिंसा फैलाना।
रणवीर सिंह का अभिनय शारीरिक और ऊर्जात्मक स्तर पर प्रभावी है। उन्होंने अपने शरीर, चाल-ढाल और आक्रामकता से यह साबित किया है कि वे इस तरह के किरदार के लिए पूरी तरह समर्पित हैं। एक्शन दृश्यों में उनकी मौजूदगी दमदार है। लेकिन समस्या यह है कि उनका किरदार एक ही भाव में अटका रहता है। वह लगातार गुस्से में है, लगातार मारने के लिए तैयार है और लगभग पूरी फिल्म में उसके भीतर कोई आंतरिक द्वंद्व नहीं दिखता। एक जासूस, जो बरसों दुश्मन की जमीन पर रहता है, उससे कहीं ज्यादा मानसिक, नैतिक और भावनात्मक जटिलता की उम्मीद होती है। रणवीर सिंह जैसे अभिनेता के पास यह सब दिखाने की क्षमता है, लेकिन पटकथा उन्हें वह जगह नहीं देती।
फिल्म का सबसे मजबूत अभिनय अक्षय खन्ना का है, जो रहमान डकैत के रूप में सामने आते हैं। एक बलोच माफिया, नेता और पावर ब्रोकर के रूप में उनका किरदार डरावना भी है और आकर्षक भी। अक्षय खन्ना की आंखों की ठंडक, संवादों की मितव्ययिता और शरीर की स्थिरता उन्हें कई दृश्यों में फिल्म का केंद्र बना देती है।
विडंबना यह है कि उनका किरदार भी अंततः एक सुविधाजनक स्टीरियोटाइप में बदल जाता है। बलोच संघर्ष, जो वास्तविकता में पाकिस्तान के लिए एक गहरा और जटिल मुद्दा है, फिल्म में महज आतंक और साजिश के औजार के रूप में इस्तेमाल होता है।
आर. माधवन फिल्म में वरिष्ठ खुफिया अधिकारी अजय सान्याल की भूमिका में हैं। माधवन हमेशा की तरह संयमित, गम्भीर और भरोसेमंद लगते हैं। वे फिल्म में एक ऐसे अधिकारी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो रणनीति और विवेक की बात करता है। लेकिन उनकी भूमिका भी संवादों और आदेशों तक सीमित रह जाती है। उन्हें न तो नैतिक बहस करने का अवसर मिलता है और न ही फैसलों की कीमत चुकाने का। संजय दत्त एक सख्त पुलिस अधिकारी के रूप में प्रभाव छोड़ते हैं लेकिन उनका किरदार भी भारी-भरकम मौजूदगी से आगे नहीं बढ़ पाता। अर्जुन रामपाल, जो एक सैन्य या खुफिया भूमिका में हैं, अपने शांत और गम्भीर अंदाज से कुछ दृश्यों को संभालते हैं, पर पटकथा की भीड़ में वे भी खो जाते हैं।
फिल्म का भावनात्मक पक्ष बनने वाली महिला भूमिका सारा अर्जुन ने निभाई है, जो एक पाकिस्तानी नेता की बेटी हैं। सारा अर्जुन अपने सीमित दायरे में ईमानदार और संवेदनशील लगती हैं। प्रेम, विश्वास और धोखे के बीच फंसी एक युवती के रूप में वे दर्शकों की सहानुभूति अर्जित करती हैं। लेकिन यह भूमिका भी अंततः पुरुष नायक की कथा को आगे बढ़ाने का साधन बनकर रह जाती है। उसे न पूरी सच्चाई बताई जाती है, न ही उसे स्वतंत्र नैतिक निर्णय लेने का अवसर मिलता है।
कथानक आगे बढ़ने के साथ और उलझता जाता है। फिल्म दिखाती है कि नायक की मौजूदगी के बावजूद आतंकी हमले होते रहते हैं। वह यह भी याद करता है कि उसने कसाब को हथियार थमाया था, यह दृश्य चैंकाने के बजाय कहानी को और अविश्वसनीय बना देता है। सवाल उठता है कि अगर यह जासूस इतना गहरे तक घुसा हुआ था, तो वह इन हमलों को रोक क्यों नहीं सका? फिल्म इन सवालों से टकराने के बजाय हिंसा और एक्शन की मात्रा बढ़ा देती है।
यहीं धुरंधर पूरी तरह एक एजेंडा फिल्म में बदल जाती है। इसमें नेता भ्रष्ट हैं, अफसर ईमानदार हैं, भारत नैतिक रूप से शुद्ध है और पाकिस्तान पूरी तरह खलनायक। यह सरलीकरण दर्शकों के एक वर्ग को संतोष देता है, लेकिन सिनेमा को कमजोर करता है। असल दुनिया में आतंकवाद, जासूसी और राजनीति इतनी सीधी रेखाओं में नहीं बंटी होती।
अगर हम धुरंधर की तुलना दूसरी जासूसी और राष्ट्रवादी फिल्मों से करें, तो इसकी सीमाएं और स्पष्ट हो जाती हैं। राजी में आलिया भट्ट का किरदार भी पाकिस्तान में जासूसी का है, लेकिन वहां हर हत्या के साथ अपराधबोध और नैतिक पीड़ा जुड़ी होती है। अंत की उसकी चीख राष्ट्रवाद के नाम पर की गई अमानवीयता पर सवाल बन जाती है। इजरायली जासूस इली कोहेन की कहानी पर बनी सीरीज ‘द स्पाई’ दिखाती है कि एक जासूस किस तरह व्यवस्था का सबसे प्रभावी हथियार बनता है और अंततः उसी का शिकार हो जाता है। स्टीवन स्पीलबर्ग की म्यूनिख बदले की राजनीति को ही कटघरे में खड़ा कर देती है।
भारतीय सिनेमा में हाल के वर्षों में ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरल स्टोरी’, ‘तानाजी’ और ‘शेरशाह’ जैसी फिल्मों ने राष्ट्रवाद को अलग-अलग तरीकों से पेश किया है। इनमें से कुछ फिल्में अपने उद्देश्य को लेकर स्पष्ट हैं, कुछ भावनात्मक अतिरंजना का शिकार हैं, और कुछ ने गम्भीर बहसें भी खड़ी की हैं। ‘धुरंधर’ इन सबके बीच खड़ी होकर न तो पूरी तरह जासूसी थ्रिलर बन पाती है, न गम्भीर राजनीतिक फिल्म और न ही चरित्र-केंद्रित सिनेमा।
साढ़े तीन घंटे की लम्बाई के बावजूद यह साफ नहीं होता कि अंततः इस नायक का क्या हुआ, उसे कैसे तैयार किया गया और उसके मिशन का परिणाम क्या निकला। दर्शक को सीक्वल के भरोसे छोड़ दिया जाता है। यानी कहानी अधूरी, लेकिन कमाई पूरी। इस अर्थ में फिल्म का शीर्षक अपने निर्माताओं पर ज्यादा सटीक बैठता है, जो अधपके राष्ट्रवाद को डबल पैसे में बेचने में सफल रहे।
आखिरकार सवाल यही है कि हम किस तरह का राष्ट्रवाद सिनेमा में देखना चाहते हैं। क्या ऐसा राष्ट्रवाद, जो सवालों से डरता है और हिंसा को समाधान बताता है? या ऐसा राष्ट्रवाद, जो अपनी ताकत के साथ अपनी सीमाओं को भी पहचानता है? धुरंधर इस सवाल का जवाब नहीं देती। वह सिर्फ यह बताती है कि आज के दौर में शोर, गुस्सा और दुश्मन गढ़ना बिकता है और यही उसकी सबसे बड़ी सफलता और सबसे बड़ी विफलता दोनों है।

