Uttarakhand

अर्धकुम्भ की राह में अखाड़ों की खींचतान

कुम्भ आयोजन को लेकर अखाड़ों संग बैठक करतीं मेलाधिकारी सोनिका बैठक में मौजूद अखाड़ों के संत
हरिद्वार में वर्ष 2027 में प्रस्तावित अर्धकुम्भ मेले की तैयारियों के बीच अखाड़ों के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। मेला अधिकारी सोनिका द्वारा बुलाई गई बैठक में 13 में से केवल 6-7 अखाड़ों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अतीत में कुम्भ और अर्धकुम्भ जैसे आयोजनों की सफलता अखाड़ों की एकजुटता पर टिकी रही है, ऐसे में शुरुआती चरण में उभरी यह दूरी प्रशासन और संत समाज दोनों के लिए चिंता का विषय बनती दिखाई दे रही है


हरिद्वार में अगले साल 2027 में प्रस्तावित अर्धकुम्भ मेले की तैयारियों को लेकर प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है लेकिन प्रारम्भिक दौर में ही अखाड़ों के बीच मतभेद की स्थिति सामने आने लगी है। हाल ही में अर्धकुम्भ मेला अधिकारी सोनिका द्वारा अखाड़ों के प्रतिनिधियों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई थी, जिसका उद्देश्य आगामी अर्धकुम्भ के आयोजन, अखाड़ों के आवंटन, शाही स्नान की तिथियों और अन्य व्यवस्थागत पहलुओं पर प्रारम्भिक चर्चा करनी थी। हालांकि बैठक में जो स्थिति सामने आई उसने मेला प्रशासन को असहज कर दिया। कुल 13 मान्यता प्राप्त अखाड़ों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन बैठक में केवल 6-7 अखाड़ों के प्रतिनिधि ही शामिल हुए। आधा दर्जन से अधिक प्रमुख अखाड़ों के प्रतिनिधियों के अनुपस्थित रहने से यह स्पष्ट हो गया कि अखाड़ों के बीच किसी न किसी स्तर पर मतभेद मौजूद हैं।


धर्मनगरी हरिद्वार के लिए अर्धकुम्भ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भारत की आध्यात्मिक परम्परा, संत संस्कृति और सामाजिक समरसता का विशाल प्रतीक है। गंगा तट पर आयोजित होने वाला यह मेला करोड़ों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। देश-विदेश से आने वाले साधु-संत, नागा संन्यासी और विभिन्न अखाड़ों के महंत इसमें भाग लेते हैं। ऐसे में अखाड़ों की एकजुटता आयोजन की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।

बैठक में अनुपस्थित रहने वाले अखाड़ों की ओर से भले ही कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है लेकिन सूत्रों के अनुसार कुछ अखाड़े भूमि आवंटन की प्रक्रिया, प्रशासनिक हस्तक्षेप और सुविधाओं के वितरण को लेकर असंतोष जता रहे हैं। कुछ का यह भी कहना है कि निर्णय प्रक्रिया में उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा जबकि अन्य अखाड़ों को प्राथमिकता दी जा रही है।

मेला अधिकारी सोनिका ने बैठक में उपस्थित अखाड़ों के प्रतिनिधियों से संवाद करते हुए भरोसा दिलाया कि प्रशासन सभी पक्षों को साथ लेकर चलने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि भूमि आवंटन, बिजली, पानी, सुरक्षा, यातायात और स्वच्छता जैसी मूलभूत व्यवस्थाओं पर पूरी पारदर्शिता के साथ काम किया जाएगा। साथ ही उन्होंने अनुपस्थित अखाड़ों से भी संवाद स्थापित कर उनकी नाराजगी दूर करने का प्रयास करने की बात कही। इतिहास गवाह है कि हरिद्वार में आयोजित कुम्भ और अर्धकुम्भ मेलों की सफलता अखाड़ों की एकजुटता और प्रशासनिक समन्वय पर ही आधारित रही है। वर्ष 2010 में आयोजित हरिद्वार कुम्भ को देश के सबसे सुव्यवस्थित कुम्भ आयोजनों में गिना गया था। उस समय अखाड़ों के बीच तालमेल और प्रशासनिक तैयारी के कारण करोड़ों श्रद्धालुओं ने शांतिपूर्वक गंगा स्नान किया था।

इसी प्रकार वर्ष 2021 में आयोजित हरिद्वार कुम्भ मेले में भी आधुनिक तकनीक का व्यापक उपयोग किया गया था। ड्रोन निगरानी, कंट्रोल रूम, डिजिटल सूचना प्रणाली और यातायात प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं ने आयोजन को नई दिशा दी। हालांकि कोविड-19 महामारी के कारण उस कुम्भ का स्वरूप सीमित रहा, फिर भी अखाड़ों की भागीदारी और शाही स्नान की परम्परा ने आयोजन की धार्मिक गरिमा को बनाए रखा।

हरिद्वार में कुल 13 मान्यता प्राप्त अखाड़े सनातन धर्म की विभिन्न परम्पराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें सात शैव अखाड़े, तीन वैष्णव या बैरागी अखाड़े और तीन उदासीन परम्परा से जुड़े अखाड़े शामिल हैं। शैव अखाड़ों में जूना, निरंजनी और महानिर्वाणी जैसे प्रमुख अखाड़ों को विशेष महत्व प्राप्त है। कुम्भ और अर्धकुम्भ के दौरान इन अखाड़ों के संत शाही स्नान में भाग लेते हैं, जो इस आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है।
शाही स्नान केवल आस्था का प्रतीक ही नहीं बल्कि अखाड़ों की परम्परा, अनुशासन और प्रतिष्ठा से भी जुड़ा होता है। इसलिए प्रारम्भिक चरण में ही यदि अखाड़ों के बीच मतभेद उभरते हैं तो इसका प्रभाव पूरे आयोजन की संरचना पर पड़ सकता है। स्थानीय स्तर पर भी इस स्थिति को लेकर चर्चा का माहौल है। हरिद्वार के व्यापारी, होटल व्यवसायी और परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोग अर्धकुम्भ से बड़ी आर्थिक उम्मीदें लगाए बैठे हैं। यदि अखाड़ों के बीच मतभेद गहराते हैं तो इससे आयोजन की छवि प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।
प्रशासन की ओर से संकेत दिए गए हैं कि शीघ्र ही सभी अखाड़ों की एक व्यापक बैठक दोबारा आयोजित की जाएगी, जिसमें भूमि चिन्हांकन, सेक्टर निर्धारण और बुनियादी ढांचे की रूपरेखा पर सहमति बनाने का प्रयास किया जाएगा।

गंगा तट पर लगने वाला अर्धकुम्भ आस्था, विश्वास और एकता का पर्व माना जाता है। यह वह अवसर होता है जब विभिन्न सम्प्रदाय और परम्पराएं एक ही धारा में समाहित होती दिखाई देती हैं। ऐसे में आवश्यक है कि संत समाज और प्रशासन मिलकर आपसी संवाद के माध्यम से मतभेदों को दूर करें ताकि वर्ष 2027 का अर्धकुम्भ भी हरिद्वार की परंपरा के अनुरूप भव्य और सुव्यवस्थित रूप में आयोजित हो सके।

बात अपनी-अपनी

हमने सभी अखाड़ों को सूचना दी थी फिर भी सभी अखाड़े नहीं आ पाए क्योंकि बैठक पहले से ही तय थी इस वजह से अभी कुछ ही अखाड़ों के प्रतिनिधि आए हैं, कुछ आश्रम वालों को भी बुलाया था वह भी आए, आगे अगली बैठक में सभी अखाड़े शामिल होंगे और उनसे सौहार्दपूर्ण बातचीत होगी।
सोनिका, मेलाधिकारी, कुम्भ हरिद्वार

इस बार 2027 का कुम्भ महाकुम्भ होगा, भव्य और सुंदर होगा जहां तक अखाड़ों की बात है तो अभी कुछ अखाड़े आ नहीं पाए हैं। अखाड़ों का कभी कोई मतभेद नहीं होता। आज की बैठक में मूलभूत सुविधाओं पर चर्चा हुई है परंतु अगली बैठक में जब सभी अखाड़े शामिल होंगे। कुम्भ पर पूर्ण रूप से चर्चा होगी।
रवींद्र पुरी, अध्यक्ष, निरंजनी अखाड़ा, अखाड़ा परिषद 

होली का पर्व चल रहा है इसलिए इस बैठक में कई अखाड़े नहीं आ पाए हैं। शीघ्र ही नवरात्रों में अगली बैठक होगी उसमें सभी अखाड़े शामिल रहेंगे। अखाड़े में और हमारे बीच कोई भी मतभेद, किसी भी तरह का विवाद नहीं होता है।
हरि गिरि जी महाराज, महामंत्री, अखाड़ा परिषद

संतों की मांग को सरकार ने गम्भीरता से लिया है। कई सुझाव हमसे लिए गए, बाकी रही अखाड़ों की बात सभी अखाड़े बुलाए गए थे परंतु इस बैठक में नहीं आ पाए। साधु-संतों में कोई भी आपसी मतभेद नहीं है।
स्वामी रूपेंद्र प्रकाश जी महाराज शंकर आश्रम

अखाड़ों की नाराजगी के विषय पर मैं कुछ नहीं कहूंगा। अखाड़ों में कोई मतभेद नहीं है किसी और के बारे में मुझे नहीं पता है परंतु मैं हरिद्वार में नहीं था इसी वजह से हम उस बैठक में नहीं शामिल हो पाए।
राघवेंद्र दास जी महाराज, बड़ा उदासीन अखाड़ा

आज अखाड़ों के भीतर गुटबाजी अपने चरम पर पहुंच चुकी है और कुछ ऐसे लोग भी प्रभावशाली पदों पर पहुंच चुके हैं जिन्हें न तो वेदों का पर्याप्त ज्ञान है और न ही सनातन परम्परा का। मर्यादा का बोध कुम्भ आयोजन को लेकर भी सवाल उठता है। यदि सरकार द्वारा अखाड़ों को सीधे आर्थिक सहायता दी जाती है तो मातृ सदन इसका खुलकर विरोध करेगा। यह कुम्भ नहीं बल्कि अर्धकुम्भ है और अर्धकुम्भ की शास्त्रीय वैधता को लेकर भी समय-समय पर प्रश्न उठते रहे हैं।
स्वामी शिवानंद सरस्वती, मातृ सदन, हरिद्वार

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