पाकिस्तान अब भारत-विरोध की अपनी पुरानी नीति को एक नए और कहीं ज्यादा खतरनाक ढंग से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। नाटो की तर्ज पर ‘इस्लामी सुरक्षा ढांचा’ खड़ा करके वह यह संदेश देना चाहता है कि पाकिस्तान पर किसी भी कार्रवाई को पूरे मुस्लिम जगत पर हमला माना जाएगा। सऊदी अरब के साथ सुरक्षा संधि और तुर्किए संग सम्भावित भागीदारी इस दिशा में बड़े संकेत हैं। यदि यह रणनीति सफल हुई तो भारत की जवाबी कार्रवाई की कूटनीतिक कीमत बढ़ेगी, पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय ढाल मिलेगी और दक्षिण एशिया में भारत पर दबाव के नए मोर्चे खुलेंगे। सवाल यह है कि क्या भारत के पास इस चुनौती का तोड़ है या वह सिर्फ ‘नजर रख रहे हैं’ कहकर समय गंवा रहा है?
नाटो यानी ‘नाॅर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन’ एक सैन्य गठबंधन है जिसकी स्थापना 4 अप्रैल 1949 को हुई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब दुनिया दो ध्रुवों में बंट रही थी, तब पश्चिमी देशों ने सोवियत संघ के प्रभाव और विस्तार को रोकने के लिए इसे बनाया। नाटो का मूल उद्देश्य था कि सदस्य देशों की सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और यह सिद्धांत लागू हो कि किसी एक सदस्य देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा। इसी ‘सामूहिक रक्षा’ की अवधारणा ने नाटो को केवल एक संगठन नहीं बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य राजनीतिक शक्ति का रूप दे दिया।
सोशल मीडिया के दौर में कई बार कोई एक विचार या आशंका इतनी तेजी से फैलती है कि वह देश की राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाती है। इन दिनों एक गम्भीर चिंता सामने आ रही है कि पाकिस्तान भारत के लिए एक नई, बड़ी और दूरगामी समस्या खड़ी करने में जुटा हुआ है। दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान नाटो की तर्ज पर एक ‘इस्लामी नाटो’ या इस्लामी देशों का ऐसा सामूहिक सुरक्षा तंत्र बनाना चाहता है जिसमें किसी एक सदस्य देश पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाएगा और सभी देश मिलकर जवाब देंगे। इस चर्चा में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पहले से हो चुकी सुरक्षा संधि का जिक्र है जिसमें ऐसे प्रावधान की बात कही जा रही है साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि अब तुर्किए के इस ढांचे में शामिल होने की सम्भावनाएं बढ़ रही हैं और बहुत जल्दी फैसला हो सकता है। आगे चलकर अन्य मुस्लिम देशों के भी जुड़ने की सम्भावना जताई जा रही है। विशेष रूप से मध्यपूर्व के देशों की चर्चा है लेकिन पाकिस्तान अपने बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है। अगर ऐसा हुआ तो भारत के लिए यह केवल सीमायी या कूटनीतिक संकट नहीं रहेगा बल्कि एक व्यापक रणनीतिक चुनौती बन जाएगा।
इस मुद्दे को ठीक से समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि नाटो जैसा गठबंधन आखिर होता क्या है और उसके बनने का मतलब क्या होता है। नाटो एक औपचारिक, संधि-आधारित और कानूनी रूप से बाध्यकारी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था है। उसका सबसे चर्चित सिद्धांत यही है कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। यह केवल एक भावनात्मक या सांकेतिक समर्थन नहीं होता बल्कि नाटो के सदस्य देशों के लिए यह बाध्यता भी बन जाती है कि वे सैन्य, रणनीतिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया में सहयोग करें। यदि पाकिस्तान किसी तरह इस्लामी देशों के बीच ऐसा ही कोई तंत्र खड़ा करने में सफल हो गया तो भारत के लिए यह चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि तब भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाला तनाव केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं रहेगा। उसे ‘इस्लामी सुरक्षा मोर्चा बनाम भारत’ के फ्रेम में बदलने की कोशिश होगी।
हालांकि यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि ‘इस्लामी नाटो’ शब्द औपचारिक कूटनीतिक भाषा का हिस्सा नहीं है। यह मीडिया और राजनीतिक विमर्श में चलने वाला शब्द है। फिर भी इसके पीछे कुछ वास्तविक घटनाक्रम जरूर हैं जिनकी वजह से यह आशंका जोर पकड़ रही है। सबसे बड़ा घटनाक्रम पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुआ वह रक्षा-सुरक्षा समझौता है। यह केवल सामान्य सहयोग, प्रशिक्षण या सैन्य आदान-प्रदान तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसकी व्याख्या ऐसे हो रही है कि यदि किसी एक पर हमला हुआ तो उसे संयुक्त चुनौती माना जाएगा और दोनों देशों के हितों पर हमला समझकर प्रतिक्रिया होगी। पाकिस्तान के लिए यह बहुत बड़ा लाभ है क्योंकि वह लम्बे समय से खुद को मुस्लिम दुनिया के ‘रक्षा’ और ‘फ्रंटलाइन’ देश के तौर पर पेश करता रहा है। भारत के खिलाफ वह हर मंच पर यही नैरेटिव बनाने की कोशिश करता है कि कश्मीर का मुद्दा ‘मुस्लिम मुद्दा’ है और भारत का रुख ‘मुस्लिम विरोधी’ है। अब अगर उसके पास सऊदी जैसे प्रभावशाली देश के साथ सुरक्षा ढांचे जैसी कोई व्यवस्था बन जाती है तो वह इसे भारत-विरोधी राजनीतिक किलेबंदी में बदलने की पूरी कोशिश करेगा।
तुर्किए की सम्भावित भागीदारी इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक संवेदनशील बनाती है। तुर्किए पिछले कुछ वर्षों में सैन्य तकनीक, ड्रोन और रक्षा उद्योग में तेजी से उभरा है। एर्दोआन के नेतृत्व में तुर्किए की विदेश नीति अधिक वैचारिक और आक्रामक रही है जिसमें इस्लामी पहचान का राजनीतिक उपयोग दिखाई देता है। भारत के संदर्भ में भी तुर्किए कई मंचों पर पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा दिखा है। ऐसे में यदि तुर्किए वास्तव में इस तरह के सुरक्षा ढांचे से जुड़ता है तो पाकिस्तान इसे ‘इस्लामी सामूहिक शक्ति’ के प्रमाण की तरह प्रचारित करेगा। इस स्थिति में एक नई धुरी का निर्माण सम्भव है जिसमें सऊदी धन और क्षेत्रीय नेतृत्व के साथ तुर्किए सैन्य तकनीक और सक्रिय कूटनीति जोड़ सकता है जबकि पाकिस्तान अपने सैन्य ढांचे, परमाणु क्षमता और दक्षिण एशिया की
भौगोलिक स्थिति के जरिए इस गठबंधन को एक ‘रणनीतिक नुकीला हथियार’ बनाने की कोशिश करेगा।
यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या ऐसा सुरक्षा तंत्र स्पष्ट रूप से भारत के खिलाफ बनाया जाएगा या इसका उद्देश्य केवल सामान्य सुरक्षा सहयोग तक सीमित रहेगा। कूटनीति में अक्सर ऐसा होता है कि किसी समझौते को ‘रक्षा’ के नाम पर किया जाता है लेकिन भविष्य में उसका राजनीतिक और सामरिक उपयोग किसी विशेष लक्ष्य के लिए किया जा सकता है। सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के भारत के साथ आर्थिक और ऊर्जा सम्बंध बहुत गहरे हैं। इन देशों को भारत जैसे बड़े बाजार और बड़े ऊर्जा-खरीदार देश से दूरी बनाने में नुकसान अधिक होगा। इसलिए यह मान लेना कि ये देश सीधे भारत-विरोधी मोर्चा बनाकर खड़े हो जाएंगे जल्दबाजी हो सकती है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पाकिस्तान की नीति दशकों से भारत विरोध पर आधारित रही है और वह हर मंच पर भारत को घेरने के लिए नए-नए रास्ते खोजता है। इसलिए इस ढांचे का सीधा सैन्य इस्तेमाल न भी हो तो भी इसका राजनीतिक उपयोग भारत के खिलाफ हो सकता है।
भारत के लिए इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा खतरा यह है कि पाकिस्तान के खिलाफ सीमित सैन्य कार्रवाई या जवाबी कार्रवाई की लागत बढ़ जाएगी। अभी भारत जब भी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ कोई सीमित या सटीक सैन्य प्रतिक्रिया देता है तो दुनिया उसे भारत-पाक का द्विपक्षीय तनाव मानती है। अधिकांश देश दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील करते हैं और मामला किसी तरह शांत करने की कोशिश होती है। लेकिन पाकिस्तान यह दावा करने लगे कि उस पर हुआ हमला केवल पाकिस्तान पर नहीं बल्कि सामूहिक सुरक्षा तंत्र पर हमला है तो वह भारत की कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीयकरण करने की कोशिश करेगा। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत कार्रवाई नहीं कर पाएगा बल्कि इसका अर्थ यह है कि भारत को हर कार्रवाई से पहले और बाद में कई नए मोर्चों पर लड़ना होगा। राजनयिक भी, रणनीतिक भी और नैरेटिव के स्तर पर भी।
दूसरी समस्या यह है कि पाकिस्तान को एक तरह की कूटनीतिक ढाल मिल सकती है। भारत लगातार कोशिश करता रहा है कि पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक मंचों पर अलग-थलग किया जाए। लेकिन अगर पाकिस्तान के पास सऊदी और तुर्किए जैसे देशों की नैतिक या राजनीतिक ढाल मौजूद हो जाती है तो पाकिस्तान अपनी छवि को ‘आतंकवाद समर्थक’ के बजाय ‘इस्लामी सुरक्षा के भागीदार’ के रूप में पेश करेगा। यह नैरेटिव बदलाव भारत के लिए चुनौती बनेगा क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में छवि और धारणा की भूमिका बहुत बड़ी होती है।
तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत की खाड़ी नीति यानी ‘गल्प डिप्लोमेसी’ है। भारत ने पिछले दशक में खाड़ी देशों के साथ मजबूत रिश्ते बनाए हैं। ऊर्जा सुरक्षा, निवेश, व्यापार और प्रवासी भारतीयों के कारण ये सम्बंध भारत के लिए अत्यंत उपयोगी और जरूरी रहे हैं लेकिन अब मध्यपूर्व का भू-राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है। यह इलाका केवल तेल और व्यापार का केंद्र नहीं रह गया बल्कि सुरक्षा संधियों, सामरिक धुरियों और सैन्य गठबंधनों का मैदान बनता जा रहा है। जब सुरक्षा संधियां बनती हैं तो वे व्यापारिक समझौतों की तुलना में अधिक कठोर और दीर्घकालिक होती हैं क्योंकि उनमें राष्ट्रीय प्रतिष्ठा, सेना और सत्ता की स्थिरता जुड़ी होती है। ऐसे में भारत को अपनी खाड़ी नीति को केवल आर्थिक रिश्तों तक सीमित नहीं रखना होगा। उसे रक्षा और सुरक्षा सहयोग को भी उसी स्तर पर ले जाना होगा ताकि कोई भी देश पाकिस्तान को ‘एकमात्र सुरक्षा साझेदार’ न माने।
इसी संदर्भ में बांग्लादेश की चर्चा भी सामने आती है। यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि पाकिस्तान बांग्लादेश को अपने साथ जोड़ने में लगा है और यदि वह सफल हुआ तो भारत रणनीतिक रूप से घिर जाएगा। हालांकि बांग्लादेश की राष्ट्रीय प्राथमिकताएं और सुरक्षा चिंताएं अलग हैं। उसके सामने भारत के साथ लम्बे सीमा सम्बंध हैं, व्यापारिक निर्भरता और आंतरिक स्थिरता के प्रश्न भी हैं। इसलिए किसी ‘इस्लामी सुरक्षा गठबंधन’ में शामिल होना उसके लिए आसान नहीं होगा। लेकिन यह सम्भव है कि बांग्लादेश पाकिस्तान के साथ रक्षा खरीद, सैन्य प्रशिक्षण या रणनीतिक संवाद बढ़ाए जिससे भारत के लिए नई चिंता पैदा हो सकती है।
इस पूरी बहस का एक संवेदनशील पहलू यह भी है कि क्या मोदी सरकार की हिंदुत्व की राजनीति मुस्लिम देशों में भारत के खिलाफ गुस्सा बढ़ा रही है। इस प्रश्न को समझने के लिए भी संतुलन जरूरी है। एक तरफ यह तथ्य है कि मोदी सरकार ने खाड़ी देशों के साथ कई बड़े निवेश, व्यापार और रणनीतिक समझौते किए हैं और अरब नेतृत्व के साथ रिश्ते मजबूत हुए हैं। दूसरी तरफ यह भी सच है कि भारत के भीतर यदि साम्प्रदायिक तनाव, मुस्लिम विरोधी बयान, धार्मिक विवाद या हिंसा जैसी खबरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाती हैं तो मुस्लिम देशों की जनता में भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा होती है। सरकारें चाहे आर्थिक कारणों से भारत से रिश्ते बनाए रखें, लेकिन जनमत का दबाव लम्बे समय में उनकी नीति पर असर डाल सकता है। पाकिस्तान इसी जनभावना को भड़काकर अपने पक्ष में नैरेटिव बनाने में माहिर है। इसलिए भारत के लिए यह केवल सीमा या रक्षा का मामला नहीं है, यह भारत की लोकतांत्रिक छवि और घरेलू सामाजिक संतुलन से भी जुड़ जाता है।
इस पूरे परिदृश्य का निष्कर्ष यही है कि ‘इस्लामी नाटो’ का डर पूरी तरह अतिरंजित भी नहीं है और इसे अपराजेय मान लेना भी गलत है। नाटो जैसा औपचारिक गठबंधन रातों-रात बन नहीं सकता क्योंकि मुस्लिम देशों के आपसी मतभेद, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धाएं और हितों का टकराव बहुत बड़ा है। फिर भी यह सच है कि सामूहिक सुरक्षा जैसे प्रावधानों के साथ कुछ नया ढांचा बन रहा है और पाकिस्तान उसे भारत के खिलाफ रणनीतिक दबाव में बदलने की कोशिश करेगा। भारत को इसका जवाब केवल सैन्य शक्ति से नहीं बल्कि कूटनीति, रक्षा साझेदारी और नैरेटिव युद्ध, तीनों मोर्चों पर देना होगा। यदि भारत खाड़ी देशों के साथ सम्बंधों को रक्षा-स्तर तक विस्तारित करता है, यदि वह आतंकवाद पर पाकिस्तान की जवाबदेही को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से बनाए रखता है और यदि वह अपनी लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है तो पाकिस्तान के ‘इस्लामी नाटो’ जैसे प्रयास भारत के लिए निर्णायक घेरा नहीं बन पाएंगे। वे अधिकतम एक बड़ा शोर, एक कूटनीतिक चाल और एक नैरेटिव का हथियार बनकर रह जाएंगे जिसे भारत दृढ़ता और दूरदर्शिता के साथ निष्प्रभावी कर सकता है।

