पंजाब के मुख्यमंत्री भगवत मान, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया
‘पंजाब केसरी’ समूह से जुड़े ठिकानों पर पुलिस कार्रवाई के बाद पंजाब की राजनीति में भूचाल आ गया है। विपक्ष इसे प्रेस को डराने और आलोचनात्मक पत्रकारिता पर दबाव की कोशिश बता रहा है जबकि राज्य सरकार का दावा है कि यह कानूनी प्रक्रिया है लेकिन विवाद केवल इस कार्रवाई तक सीमित नहीं है बल्कि कुछ ही समय पहले पंजाब में अखबारों की गाड़ियों को रोककर जांच के नाम पर वितरण बाधित होने की घटना ने पहले से ही प्रेस बनाम प्रशासन की बहस को हवा दे दी थी। अब दोनों घटनाओं को जोड़कर देखा जा रहा है और सवाल उठ रहा है कि क्या पंजाब में प्रेस पर दबाव का एक पैटर्न बन रहा है और क्या ‘नई राजनीति’ का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी सत्ता में आते ही उसी रास्ते पर बढ़ चली है जिसका पुरजोर विरोध कर उसने राजनीति में प्रवेश लिया था


पंजाब में इन दिनों राजनीति की सतह पर जो शोर सुनाई दे रहा है वह किसी चुनावी भाषण या किसी योजनागत घोषणाओं की गूंज नहीं बल्कि लोकतंत्र के उस मूल प्रश्न की प्रतिध्वनि है जो हर दौर में सत्ता को चुनौती देता रहा है कि क्या सरकारें आलोचना सहन कर सकती हैं? और यदि नहीं तो क्या वे प्रेस को दबाने की ओर बढ़ जाती हैं? ताजा विवाद ‘पंजाब केसरी’ समूह से जुड़े प्रकरण को लेकर है जिसमें कार्रवाई, जांच को लेकर विपक्ष और मीडिया का एक हिस्सा इसे ‘प्रेस पर हमला’ कहकर प्रचारित कर रहा है जबकि पंजाब सरकार यह कहते हुए आरोपों को सिरेे से खारिज कर रही है कि कार्रवाई नियमों के उल्लंघन तथा कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई है और इसे प्रेस-स्वतंत्रता से जोड़ना भ्रामक और राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित है लेकिन जिस तरह यह मामला बढ़ा, उसने इस प्रकरण को महज प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रहने दिया। यह अब राज्य से निकलकर राष्ट्रीय बहस बन गया है और इसी बहस के केंद्र में एक ऐसा सवाल उभर आया है जो अरविंद केजरीवाल की राजनीति, उनकी छवि और उनके पूरे आंदोलन-आधारित चरित्र को एक साथ कठघरे में खड़ा कर देता है कि आखिर अरविंद केजरीवाल को हुआ क्या है?

इस सवाल की वजह केवल ‘पंजाब केसरी’ प्रकरण नहीं है। वजह वह पृष्ठभूमि है जो पिछले कुछ महीनों में पंजाब में बनती चली गई। कुछ समय पहले ही राज्य में एक अलग लेकिन बेहद महत्वपूर्ण घटना सामने आई थी जब पंजाब पुलिस द्वारा व्यापक वाहन-जांच के नाम पर अखबारों की वितरण गाड़ियों को रोके जाने और तलाशी की वजह से कई शहरों और इलाकों में अखबार समय पर नहीं पहुंच सके थे। उस समय पंजाब की सरकार और पुलिस तंत्र का पक्ष यह था कि सुरक्षा और नशे के खिलाफ कार्रवाई के संदर्भ में चेकिंग चल रही थी और कोई भी वाहन जांच से बाहर नहीं रखा जा सकता। लेकिन प्रेस जगत और कई संगठनों ने इसे गम्भीर मसला माना। चंडीगढ़ प्रेस क्लब सहित कई संस्थाओं ने इसे अखबार वितरण में बाधा, स्टाफ से कथित बदसलूकी और मीडिया के कामकाज में दखल के रूप में उठाया। इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी ने भी चिंता जताई और अखबार वितरण वाहनों की निर्बाध आवाजाही की मांग की। कई रिपोर्टों में यह साफ तौर पर सामने आया कि पुलिस चेकिंग के कारण अखबार वितरण में व्यवधान पड़ा और राज्य में इस पर बहस छिड़ गई कि क्या प्रशासनिक ताकत का इस्तेमाल सूचनाओं के प्रवाह पर असर डालने में तो नहीं हो रहा। यही वजह है कि आज जब ‘पंजाब केसरी’ समूह से जुड़ी कार्रवाई का विवाद सामने आया तो लोग ने इसे अकेली घटना नहीं मान रहे हैं बल्कि उसी पृष्ठभूमि में रखकर देख रहे हैं यानी पहले वितरण बाधित, अब संस्थान पर कार्रवाई के संकेत क्या हैं?

लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ यह नहीं होता कि अखबारों को छापने की अनुमति है। प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ है कि प्रेस बिना भय, बिना दबाव और बिना संकेत के अपने काम को कर सके। जब सरकार या तंत्र किसी मीडिया संस्थान पर कार्रवाई करता है तो उसकी वैधानिकता अलग प्रश्न हो सकता है लेकिन उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव अलग होता है। आज का दौर वही है जहां ‘कागज पर कानून’ और ‘जमीन पर संदेश’ अक्सर अलग-अलग काम करते हैं। इसीलिए पंजाब केसरी प्रकरण पर विपक्ष का कहना है कि कार्रवाई का टाइमिंग, उसका स्वरूप और पिछले घटनाक्रम का क्रम यह दिखाता है कि सरकार आलोचनात्मक कवरेज से असहज है। विपक्ष इसे ‘आपातकाल जैसी मानसिकता’ और ‘प्रेस को सबक सिखाने’ की कोशिश कहकर पुकार रहा है। सरकार का कहना है कि मीडिया को ढाल बनाकर नियम उल्लंघन से बचने की कोशिश नहीं होनी चाहिए, कार्रवाई अगर हुई है तो वह कानून के तहत है और कोई भी संस्था नियमों से ऊपर नहीं।

यही वह बिंदु है जहां राजनीति के तर्क और लोकतंत्र की संवेदनशीलता टकराती है। प्रेस कोई विशेषाधिकार नहीं मांगता, वह केवल निष्पक्ष मैदान मांगता है। यदि नियम उल्लंघन हुआ है तो कार्रवाई हो लेकिन समान रूप से हो, पारदर्शी रूप से हो और इस तरह हो कि प्रेस समुदाय के भीतर यह भावना पैदा न हो कि ‘यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि तुमने गलत सवाल पूछ लिया।’ क्योंकि जब यह भावना जमती है तो प्रेस पर सबसे बड़ा हमला हो जाता है और वह हमला किसी कार्यालय पर छापा नहीं बल्कि पत्रकार के भीतर पैदा हुआ डर होता है। उसे ही आत्म-सेंसरशिप कहते हैं। यह वह बीमारी है जो लोकतंत्र को भीतर से खोखला करती है क्योंकि तब प्रेस को चुप कराने के लिए आदेश नहीं चाहिए होता, प्रेस खुद ही चुप होने लगता है।

यही कारण है कि इस पूरे विवाद में आपातकाल का संदर्भ बार-बार उठ रहा है। भारत का लोकतंत्र आपातकाल के उस काले दौर को इसलिए नहीं भूलता क्योंकि उस समय राज्य सत्ता ने प्रेस को नियंत्रण में लेने के लिए न केवल कानून बल्कि भय का इस्तेमाल किया था। 1975 से 1977 के दौरान पूर्व-सेंसरशिप लागू रही। अखबारों को निर्देश दिए जाते थे कि क्या छपेगा और क्या नहीं। कई सम्पादकीय काट दिए जाते थे। अखबारों ने विरोध में खाली काॅलम छोड़े, ताकि जनता जान सके कि खबर थी, पर छापने की अनुमति नहीं मिली। पत्रकारों पर दबाव, गिरफ्तारियां और संस्थानों पर निगरानी के किस्से उस दौर के साथ जुड़े रहे। आपातकाल भारत के लिए यह चेतावनी बन गया कि सत्ता जब जवाबदेही से भागती है तो सबसे पहले सूचना को नियंत्रित करती है क्योंकि सूचना ही जनता की चेतना है। आज भले औपचारिक सेंसरशिप न हो लेकिन यदि प्रशासनिक और आर्थिक औजारों के जरिए प्रेस पर ऐसा दबाव बने कि वह सहम जाए तो लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बजती है।

खतरे की यह घंटी केवल पंजाब तक नहीं। देश के अलग-अलग हिस्सों में पत्रकारों पर हमले, धमकियां, झूठे मुकदमे, ऑनलाइन ट्रोलिंग और कभी-कभी हत्याएं, यह सब पत्रकारिता को एक जोखिमभरे पेशे में बदलते गए हैं। जब किसी राज्य में यह संदेश जाने लगे कि प्रेस पर सरकारी शिकंजा बढ़ रहा है, तो उसका असर सिर्फ खबरों पर नहीं, बल्कि जमीनी रिपोर्टिंग पर भी पड़ता है। रिपोर्टर का मनोबल टूटता है, सम्पादकीय लाइन दबाव में आती है और अंततः जनता तक पूरी सच्चाई नहीं पहुंचती। यही कारण है कि पंजाब केसरी प्रकरण को सिर्फ एक संस्थान का विवाद नहीं माना जा रहा, यह पत्रकारिता की सामूहिक सुरक्षा और स्वतंत्रता का विषय बन गया है।

अब सवाल यह है कि इस पूरे विवाद में अरविंद केजरीवाल का नाम क्यों केंद्रीय हो गया है। इसका कारण यह है कि केजरीवाल की राजनीति हमेशा ‘पुरानी राजनीति’ के विरोध की राजनीति रही है। उनका जन्म-क्षेत्र आंदोलन था। वे वही नेता हैं जिन्होंने सत्ता में बैठे लोगों से कहा था कि सरकारें जनता की नहीं, अपने हितों की रक्षा करती हैं, संस्थाओं का दुरुपयोग करती हैं और मीडिया को नियंत्रित करती हैं। उन्होंने स्वयं प्रेस को बार-बार लोकतंत्र की ताकत बताया। इसलिए जब उनकी पार्टी के प्रभाव वाले शासन पर प्रेस को दबाने के आरोप लगते हैं तो जनता के भीतर यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या सत्ता में आकर केजरीवाल भी बदल गए? क्या अब उन्हें भी सवाल पसंद नहीं? क्या वह भी उसी मानसिकता में फंस रहे हैं जहां विरोध को अपराध समझ लिया जाता है? इसी भाव से यह शीर्षक जन्म लेता है कि आखिर केजरीवाल की ‘आप’ को हुआ क्या है?

वस्तुतः यहां तीन स्तरों पर बहस चल रही है। एक स्तर पर सरकार कहती है कि कानून अपना काम कर रहा है और मीडिया को नियमों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। दूसरे स्तर पर विपक्ष कहता है कि कानून के नाम पर ‘चयनित दबाव’ बनाया जा रहा है। तीसरा स्तर वह है जो लोकतंत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। वह पूछता है कि अगर सरकार सही है तो वह अधिकतम पारदर्शिता क्यों नहीं दिखाती? कार्रवाई किन आधारों पर हुई, क्या अन्य संस्थानों पर भी समान कार्रवाई हुई, क्या प्रक्रिया में कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं और क्या यह सुनिश्चित किया गया कि मीडिया जगत में भय का वातावरण न बने? लोकतंत्र में सरकार का सबसे बड़ा कवच शक्ति नहीं, पारदर्शिता होती है। जहां पारदर्शिता होती है, वहां आलोचना भी कमजोर पड़ जाती है क्योंकि तब तथ्य बोलते हैं।

यही वजह है कि पंजाब सरकार को यदि यह साबित करना है कि वह प्रेस विरोधी नहीं है तो उसे केवल बयान नहीं बल्कि डेटा और तथ्य के साथ सामने आना होगा। दूसरी ओर मीडिया संस्थानों को भी यह ध्यान रखना होगा कि प्रेस स्वतंत्रता का अर्थ नियमों से मुक्ति नहीं लेकिन दोनों के बीच बारीक रेखा यह है कि नियम लागू करते समय ऐसा न लगे कि कार्रवाई का उद्देश्य ‘कानून का पालन’ नहीं, बल्कि ‘संदेश देना’ है क्योंकि संदेश देने वाली राजनीति लोकतंत्र में सबसे पहले प्रेस पर उतरती है और उसके बाद नागरिक अधिकारों पर।

नवम्बर 2025 में अखबार वितरण की गाड़ियों को रोकने वाला प्रकरण इसी ‘संदेश’ की समस्या पैदा करता है। चाहे प्रशासन का इरादा सुरक्षा जांच का रहा हो लेकिन परिणाम यह निकला कि अखबारों की सप्लाई बाधित हुई, प्रेस संगठनों ने इसे गम्भीर मुद्दा माना और जनता के भीतर यह संदेश गया कि सूचना के प्रवाह को भी बाधित किया जा सकता है। यही संदेश लोकतंत्र के लिए खतरनाक होता है और आज ‘पंजाब केसरी समूह से जुड़ी कार्रवाई का विवाद, उसी संदेश की छाया में और अधिक संदिग्ध दिखने लगता है।

समय रहते यदि यह स्पष्ट नहीं किया गया तो यह विवाद पंजाब के लिए भी भारी पड़ सकता है और आम आदमी पार्टी के लिए भी क्योंकि ‘आप’ की राजनीतिक पूंजी ही यही रही है कि वह पुरानी राजनीति से अलग है। यदि लोग यह मानने लगेंगे कि सत्ता में आते ही ‘आप’ भी वही कर रही है जो बाकी दल करते रहे हैं तो ‘नई राजनीति’ की नैतिक जमीन खिसक जाएगी। यही कारण है कि यह केवल पंजाब सरकार का प्रशासनिक मामला नहीं बल्कि अरविंद केजरीवाल और ‘आप’ की राजनीतिक साख का भी प्रश्न है।

आज लोकतंत्र को सबसे अधिक जरूरत उस साहस की है जिसमें सरकार सवालों से डरती नहीं, जवाब देती है और प्रेस जवाबदेही की मांग करते हुए भी जिम्मेदारी निभाता है। स्मरण रहे अंततः प्रेस सत्ता का दुश्मन नहीं, लोकतंत्र का पहरेदार है। यदि पहरेदार भयभीत होगा तो घर असुरक्षित होगा। पंजाब का यह पूरा विवाद उसी बुनियादी सत्य की ओर इशारा कर रहा है। और यही वजह है कि यह शीर्षक केवल एक लाइन नहीं, एक चेतावनी है कि आखिर केजरीवाल की पार्टी को हुआ क्या है? क्या स्वयं अरविंद अब भी आलोचना को लोकतंत्र का अनिवार्य तत्व मानते हैं या सत्ता का स्वाद उन्हें भी उसी राह पर ले जा रहा है जिस राह पर इंदिरा गांधी का आपातकाल गया था? यह प्रश्न केवल विपक्ष नहीं पूछ रहा बल्कि यह प्रश्न इतिहास पूछ रहा है और लोकतंत्र की आत्मा पूछ रही है।

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