योगी कथामृत (Autobiography Of A Yogi) पुस्तक ने ही सुपर स्टार रजनीकांत जी को इस स्थान और बाबाजी का अनुयाई बनाया। मैंने क्लिनिकल डिप्रेशन से उबरने के लिए बहुत दवाई खाई हैं लेकिन इस एक पुस्तक और ‘हिमालय के संतों संग निवास’ (Living with Himalayan Masters) पुस्तक ने मुझे भी उन दवाइयों से पीछा छुड़ाने में बहुत मदद की। शब्दों और भावों का ऐसा अद्भुत संयोग इन पुस्तकों में है कि ये मात्र एक दो अध्ययन के बाद आपको अपने जीवन में बदलाव लाने की तीव्र इच्छा होने लगती है। अपनी इस यात्रा को अधिकांश लोग नहीं समझ पाते पर आप इस संतुलन को समझते-समझते अपने जीवन का हायर उद्देश्य ढूंढने लगते हैं और यही एलिवेशन आपको जीवन के संग्राम से उबार ले जाता है। अगर आपने अभी तक भी ‘योगी कथा मृत’ नहीं पढ़ी है तो अवश्य पढ़िए। एक तो हमारी पीढ़ी आध्यात्मिक अध्ययन से दूर हो चुकी है। मैंने इस पुस्तक को जब पढ़ना शुरू किया था तब मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि जीवन के हर मोड़ में मैं इस पुस्तक के पास लौटूंगी क्योंकी हर मुश्किल घड़ी के समय इसे पढ़ने से एक असीम शांति मिलती है। बुद्ध के तथागत बनने की यात्रा कहां आसान रही थी। सारा खेल मस्तिष्क का इसमें उपजने वाली सोच का है
श्वेता मासीवाल
सामाजिक कार्यकर्ता
दूनागिरि मंदिर स्थित एक वृहद वृक्ष के नीचे स्पष्ट लिखा हुआ है महावतार बाबाजी जी तपस्थली। यह एक अद्भुत संयोग है कि जिसे आप ढूंढ रहे होते हैं वो आपको प्राप्त होने लगता है। इतने साल से लगातार दूनागिरी जाने वाली मैं, बीते एक दशक वहां किसी कारण नहीं जा पाई और फिर अचानक हैड़ाखान बाबा की कृपा से इस वर्ष दिवाली के आस-पास यहां जाने हुआ और पहली बार मुझे उस वृक्ष के दर्शन हुए जिस स्थान पर महावतार बाबाजी ने तप किया था।
योगी कथामृत ( Autobiography Of A Yogi ) पुस्तक ने ही सुपर स्टार रजनीकांत जी को इस स्थान और बाबाजी का अनुयाई बनाया। मैंने क्लिनिकल डिप्रेशन से उबरने के लिए बहुत दवाई खाई हैं लेकिन इस एक पुस्तक और ‘हिमालय के संतों संग निवास’ ( Living with Himalayan Masters ) पुस्तक ने मुझे भी उन दवाइयों से पीछा छुड़ाने में बहुत मदद की। शब्दों और भावों का ऐसा अद्भुत संयोग इन पुस्तकों में है कि ये मात्र एक दो अध्ययन के बाद आपको अपने जीवन में बदलाव लाने की तीव्र इच्छा होने लगती है। अपनी इस यात्रा को अधिकांश लोग नहीं समझ पाते पर आप इस संतुलन को समझते-समझते अपने जीवन का हायर उद्देश्य ढूंढने लगते हैं और यही एलिवेशन आपको जीवन के संग्राम से उबार ले जाता है।
पूरे ब्रह्माांड को क्रियायोग सिखाने वाले महावतार बाबाजी के विषय में मुझे बहुत कुछ कहना है। कहते हंै ज्ञानगंज से शिव बाबा अवतार स्वरूप महावतार बाबाजी के रूप में धरा पर आए और लोगों को क्रियायोग से अवगत करवाया और फिर हैड़ाखान स्वरूप में दो दफा आकर कर्मयोग सिखाया। ये अवतार कहां पैदा हुए किसी को नहीं पता। लाहिड़ी महाशय ने महावतार बाबाजी को ये नाम दिया और हैड़ाखान बाबा भी स्थान नाम से प्रचलित हुए। कितनी दिव्यता है इन संतों के दर्शन में। आज के सोशल मीडिया के ब्लूटिक के दौर में इन महान आत्माओं ने अपने पूरे अस्तित्व को शिवमय कर रखा था। यहां तक कि अपना कोई नाम भी नहीं…!
महावतार बाबाजी और हैड़ाखान बाबाजी के चरण पड़ने के कारण उत्तराखण्ड और भी पावन हो गया है। अगले अंक में प्रयास करूंगी कि महावतार बाबाजी के विषय में कह सकूं। अभी तो बस इतना कहूंगी कि दूनागिरी जहां इतनी पवित्रता और दिव्यता बसती है वहां पिछले साल का दृश्य देखकर हृदय भीतर तक क्लांत हो गया था। सीढ़ियों से निकलता अंगार फाॅरेस्ट दावानल का सबसे भयानक चेहरा था। उस वीडियो में नीचे की तरफ भक्त थे और मंदिर में ऊपर की तरफ से आग के गोले नीचे की तरफ आ रहे थे। अब मंदिर मार्ग में सीढ़ियां कवर कर दी गई है तो ये मार्ग एक टनल सा रूप ले चुका है। वो दृश्य बड़ा भयावह था। पिछली गर्मियों में लगी इस आग के निशान मैंने इस जाड़ों में भी देखे। सभी वृक्षों में मौसम परिवर्तन के बाद भी स्याह छाया शेष थी। शायद प्रकृति इस बदलाव के माध्यम से कुछ संदेश देना चाह रही है। इन स्थानों पर ज्ञानगंज से आए संतों ने तप किया है। यहां कुछ अनिष्ट तो नहीं हो सकता लेकिन कलयुग के इस चरण में ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में ये संकेत अनदेखे नहीं किए जा सकते। जब कभी आपको मौका लगे इस शांत अरण्य में शिव और शक्ति की ऊर्जा को महसूस करने अवश्य जाइए।
अगर आपने अभी तक भी ‘योगी कथा मृत’ नहीं पढ़ी है तो अवश्य पढ़िए। एक तो हमारी पीढ़ी आध्यात्मिक अध्ययन से दूर हो चुकी है। मैंने इस पुस्तक को जब पढ़ना शुरू किया था तब मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि जीवन के हर मोड़ में मैं इस पुस्तक के पास लौटूंगी क्योंकी हर मुश्किल घड़ी के समय इसे पढ़ने से एक असीम शांति मिलती है। बुद्ध के तथागत बनने की यात्रा कहां आसान रही थी। सारा खेल मस्तिष्क का इसमें उपजने वाली सोच का है।
योगानंद जी ने इस पुस्तक में लिखा है कि महावतार बाबाजी ने लाहिड़ी महाशय से कहा कि ‘यह क्रिया योग जिसे मैं इस उन्नीसवीं सदी में तुम्हारे जरिए इस दुनिया को दे रहा हूं, यह उसी विज्ञान का पुनः प्रवर्तन है जो भगवान कृष्ण ने सदियों पहले अर्जुन को दियाय और बाद में यह पतंजलि और ईसा मसीह, सेंट जाॅन, सेंट पाॅल और अन्य शिष्यों को ज्ञात हुआ।’ योगानंद जी ने यह भी लिखा कि बाबाजी और ईसा मसीह एक दूसरे से एक निरंतर समागम में रहते थे और दोनों ने साथ, ‘इस युग के लिए मुक्ति की एक आध्यात्मिक तकनीक की योजना बनाई।’
लाहिड़ी महाशय के माध्यम से, क्रिया योग जल्द ही भारत भर में फैल गया। लाहिरी महाशय के शिष्य स्वामी श्री युक्तेशवर गिरि के शिष्य योगानंद जी ने, 20वीं शताब्दी के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में क्रिया योग का प्रसार किया।
अब ये बचपन में पड़ी हुई बात मुझे तब याद आई जब मैं भयानक अवसाद के दौर से गुजर रही थी और नवीनतम इलाज प्रणाली के अनुसार ऐसी दवाओं पर थीं जो कुछ समय के लिए आपके संवेदी तंतुओं का नाश कर देता है। सारा दिन आप बस सोये रहते हैं और एस्केपिस्ट का जीवन जीते हैं। ऐसे में ही एक और हिमालय में साधनारत तपस्वी के सम्पर्क में आई और उनका शायद मेरे जीवन में इतना ही योगदान होना था कि उन्होंने उस संवाद में चक्र शब्द कह दिया और मुझे परमहंस जी की पुस्तक में लिखे ऊर्जा केंद्रों का स्मरण हो आया। जिसे लौकिक दुखों के बाद जागृत करना था। इस ऊर्जा को तो मैं दवाई से सुला देती थी। ये ठीक उसका उल्टा था जो मुझे करना था और फिर मैंने धीरे-धीरे ऊर्जा ध्यान शुरू किया और कहते हुए प्रसन्नता होती है कि भयानक रूप से इन दवाओं की आदी होने के बावजूद आज मैं बगैर किसी दवाई से आराम से सो पाती हूं। संवेदनशील तो अब भी हूं पर अब अवसाद कुछ कम महसूस होता है।
ऊर्जा केंद्र आपके शरीर में पड़े साॅफ्टवेयर की तरह है जिसका महताब आप जितनी जल्दी समझेंगे उतना आपके लिए हितकारी होगा। खैर वापस चलते हैं महाअवतार बाबाजी की कथा की तरफ।
तो एक बार बंगाल के दानापुर मिलिट्री अकाउंट के एक कर्मचारी को अचानक रानीखेत अल्मोड़ा स्थांतरित कर दिया गया। श्यामाचरण लाहिड़ी नामक इस अपूर्व आत्मा के जीवन के विषय में जानना भी बाबाजी को समझने के लिए आवश्यक है। कोई भी कार्य इस धरा पर बगैर हेतु नहीं होता। अंग्रेजों के उस दौर में इतनी दूर की ये पोस्टिंग बेवजह नहीं थीं। रानीखेत में पोस्टेड रहते समय अपने खघली समय में लाहिड़ी महाशय भ्रमण करते और प्रकृति से संवाद करते।
और यूं ही एक दिन द्रोणागिरी पर्वत तक पहुंच गए (आज का दूनागिरी)। वहां पहुंचते ही इन्हें एक युवा संत स्वरूप दर्शन हुए और उन्होंने कहा मैंने ही तुम्हें यहां बुलाया है। इसके बाद पूर्वजन्मों का वृत्तांत बताते हुए शक्तिपात किया। बाबा जी से दीक्षा का जो प्रकार प्राप्त हुआ उसे क्रिया योग कहा गया है। क्रियायोग की विधि केवल दीक्षित साधकों को ही बताई जाती है। यह विधि पूर्णतया शास्त्रोक्त है और गीता उसकी कुंजी है। गीता में कर्म, ज्ञान, सांख्य इत्यादि सभी योग है और वह भी इतने सहज रूप में जिसमें जाति और धर्म के बंधन बाधक नहीं होते। आप हिंदू, मुसलमान, ईसाई सभी को बिना भेदभाव के दीक्षा देते थे। इसीलिए आपके भक्त सभी धर्मानुयायी हैं। उन्होंने अपने समय में व्याप्त कट्टर जातिवाद को कभी महत्व नहीं दिया। वह अन्य धर्मावलम्बियों से यही कहते थे कि आप अपनी धार्मिक मान्यताओं का आदर और अभ्यास करते हुए क्रिया योग द्वारा मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। पात्रानुसार भक्ति, ज्ञान, कर्म और राजयोग के आधार पर व्यक्तित्व और प्रवृत्तियों के अनुसार साधना करने की प्रेरणा देते। उनके मत से शास्त्रों पर शंका अथवा विवाद न कर उनका तथ्य आत्मसात करना चाहिए। अपनी समस्याओं के हल करने का आत्मचिंतन से बढ़कर कोई मार्ग नहीं।
आज के कठिन दौर में महावतार बाबाजी और फिर उन्हीं का एक और विराट स्वरूप हैड़ाखान बाबाजी मेरे अहोभाग्य की अपनी दिनचर्या का कुछ समय मैं इनके विषय में सोचने में बिताती हूं। धर्म और संकीर्ण सोच से बंटे हुए आज के समाज में हिमालय की गुफाओं से जो अलौकिक ज्ञान पुंज प्रस्फुटित हुआ सत्य वही है। ये विचार मेरे क्लांत मन को शांत कर जाता है, न धरा बंटी है न प्रकृत्ति। जो बंटकर रह जाए वो सोच विराट नहीं हो सकती।
महाअवतार बाबाजी लाहिड़ी महाशय हैड़ाखान बाबाजी के विषय में बताते वक्त मुझे अत्यंत उत्साह महसूस होता है। ऐसा लगता है जहां धर्म और कलियुग के प्रभाव वाली खबरें हमारी सोच को जकड़ लेती है मेरी रिक्तता को ये महान संत और उनका दर्शन भर देते हैं। ये एक लम्बी यात्रा है और कई भागों में इसका वर्णन कर पाउंगी।
साम्ब सदाशिव!
क्रमशः
(लेखिका रेडियों प्रजे़न्टर, एड फिल्म मेकर तथा वत्सल सुदीप फाउंडेशन की सचिव हैं)