‘खोसला का घोंसला’ एक चर्चित हिंदी फिल्म है जो 22 सितम्बर 2006 को रिलीज हुई थी। यह फिल्म जो भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और बिल्डर-माफिया-प्रशासन गठजोड़ पर करारा व्यंग्य है, उत्तराखण्ड के देहरादून जिले के रानीपोखरी क्षेत्र की एक सच्ची घटना से अप्रत्याशित रूप से मेल खाती है। यहां पर्यटन गतिविधियों के नाम पर किसानों और स्थानीय निवासियों से जमीनें खरीदी गईं। सरकार से पर्यटन परियोजना के नाम पर अनुमति ली गई, परंतु बाद में ये जमीनें बिल्डरों को बेच दी गईं। स्थानीय प्रशासन ने या तो जान-बूझकर आंखें मूंद लीं या प्रभावशाली लोगों के दबाव में आकर कोई कार्रवाई नहीं की। जब एक ईमानदार एसडीएम ने इस अवैध क्रियाकलाप पर संज्ञान लिया और कार्रवाई शुरू की तो उनका तत्काल ट्रांसफर कर दिया गया। अब तक न तो जमीन को सरकारी रिकाॅर्ड में जब्त किया गया है, न ही धोखाधड़ी करने वालों के विरुद्ध कोई ठोस कानूनी कार्यवाही हुई है। यह दर्शाता है कि भूमि माफिया-प्रशासन गठजोड़ का एक जीवंत उदाहरण उत्तराखण्ड जैसे शांत पहाड़ी राज्य में भी खुलकर सामने आ चुका है
बाॅलीवुड की एक मशहूर फिल्म ‘खोसला का घोसला’ में जमीनों की लूट-खसोट में बिल्डर और भू-माफियाओं का पुलिस और प्रशासन के गठजोड़ को बेहतर तरीके से दर्शाया गया था। साथ ही यह भी दिखाया गया कि किस तरह से सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे करने और उसे बेचने के लिए प्रपंच किए जाते हैं। ठीक उसी तरह से उत्तराखण्ड में भूमि की लूट-खसोट पर भी खोसला नाम चर्चित हो चुका है। प्रदेश में पयर्टन गतिविधियों को बढ़ाने के लिए ऋषिकेश तहसील के अंतर्गत रानीपोखरी क्षेत्र के झीलवाला में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने हेतु कई बीघा भूमि खरीदने की अनुमति ली लेकिन कुछ ही वर्ष बाद पर्यटन के नाम पर कोैड़ियों के भाव में खरीदी गई भूमि को करोड़ों में बिल्डर्स लाॅबी के हाथों बेचकर नौ दो ग्यारह हो गए। हैरत की बात यह है कि पर्यटन कारोबारी और बिल्डर्स लाॅबी के इस खेल को रोकने के लिए जमीन की रजिस्ट्रियों पर रोक लगाने का का साहस दिखाने वाले एसडीएम ऋषिकेश का ही तबादला कर दिया गया।
दिल्ली के कारोबारी आरती खोसला, आदर्श चंदोक और स्मृति खोसला और आदित्य खोसला ने अपनी कम्पनी सनाती काॅरपोरेशन के जरिए वर्ष 2010 में राज्य सरकार को प्रदेश में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए ग्राम बड़कोट माफी के परगना परवादून के झीलवाला क्षेत्र के खसरा नम्बर 1759, 1753, 1763, 1853 1854, 186., 1861, 1862 और खसरा नम्बर 1865 से 1871 और 1875 एवं 1878 से 1895 कुल रकबा 14-229. हेक्टेयर यानी 185 बीघा भूमि को खरीदने का प्रस्ताव शासन को दिया। प्रस्ताव में पर्यटन सम्बंधित गतिविधियां चलाने, हेल्थ स्पा, ध्यान योग केंद्र की स्थापना, एम्युजमेंट पार्क, वाटर पार्क नेचुरल एवं वोटनिकल पार्क, शैल उद्यान की स्थापना करने तथा कल्चरल सेंटर और स्वीमिंग पुल का निर्माण करके झीलवाला क्षेत्र को प्रदेश का बड़ा पर्यटन हब बनाने का उल्लेख किया गया था।
वर्ष 2011 में सनाती काॅरपोरेशन को शासन से भूमि खरीदने की अनुमति प्रदान कुछ शर्तों के साथ प्रदान कर दी गई। इसमें उक्त भूमि की श्रेणी कृषि भूमि थी जिसको भू उपयोग परिवर्तन करने तथा देहरादून- ऋषिकेश मुख्य मार्ग से भूमि तक जाने वाले मार्ग की चैड़ाई 9 मीटर करने और भू खण्ड में पड़ने वाले नदी, नाला, खाला एवं बरसाती नालों का संरक्षण करने तथा दोनों ओर 5 मीटर हरित पट्टी के विकसित करने और खसरा नम्बर 1847 का उपयोग सिर्फ रास्ते यानी मार्ग के लिए उपयोग करने की प्रमुख शर्त थी। उक्त परियोजना को निर्माण दूनघाटी महायोजना 2..1 के संशोधित भारत सरकार और दून घार्टी महायोगजना की अधिसूचना के तहत प्रभावी होने का स्पष्ट उल्लेख किया गया जिसमें अपने स्वामित्व के भू-भाग के वन क्षेत्र के चारांे ओैर सघन वृक्षारोपित पट्टिका को विकसित करने का साफ तौर पर उल्लेख किया गया। शासन द्वारा तय की गई शर्तों पर सहमति होने के बाद कृषि भूमि के भू उपयोग परिवर्तन के लिए भू उपयोग परिवर्तन शुल्क रुपए 59 लाख 76 हजार 186 रुपए दून घाटी विशेष क्षेत्र प्राधिकरण कोष में जमा करवाने का आदेश दिया गया। खोसला कारोबारियों द्वारा शासन और दून घाटी विशेष प्राधिकरण द्वारा तय की गई शर्तों को मान लिया और एक सप्ताह के भीतर ही भू उपयोग परिवर्तन शुल्क भी जमा करवा दिया गया।
भू उपयोग परिवर्तन शुल्क जमा होने के साथ ही खोसला परिवार की असल मंशा सामने आ गई। दरअसल प्रदेश सरकार द्वारा उद्योग आदि लगाने के लिए कृषि भूमि खरीदने की अनुमति तो दी थी लेकिन इसके लिए भू उपयोग परिवर्तन की जरूरी शर्त भी रखी थी जिसके बगैर किसी भी कृषि भूमि पर खेती के अलावा अन्य कार्य प्रतिबंधित होने के चलते जमीन की वैल्यू बेहद कम हो जाती है। इसके लिए भू उपयोग परिवर्तन करने के बाद उक्त भूमि को आवासीय या व्यावसायिक उपयोग में लाया जा सकता है जिससे भूमि की कीमत आसमान छूने लगती है।

यहीं से खोसला परिवार द्वारा कौड़ियों के भाव खरीदी खेती की कीमतें कई गुना बढ़ गई। अब खोसला परिवार द्वारा इस जमीन से करोड़ों कमाने का रास्ता मिल गया। इस जमीन को बिल्डर्स लाॅबी को बेचने का खेल शुरू किया गया। सूत्रों की मानें तो खोसला परिवार ने दिल्ली एनसीआर के कई बड़े बिल्डरों को जमीन बेचने का प्रयास किया लेकिन प्रदेश में भू कानून की ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि खरीद की एक निश्चित सीमा और भू उपयोग परिवर्तन की कठोर शर्तों के चलते सम्भवतः इसी के चलते एनसीआर के बिल्डर्स लाॅबी ने इस भूमि पर हाथ डालने से परहेज किया। लेकिन खोसला बंधुओं ने इसकी तोड़ निकाल ली और 2022 में उत्तराखण्ड के हरिद्वार निवासी और रियल स्टेट कारोबारी मेमपाल चैधरी के साथ सौदा किया गया। इस सौदे में खोसला परिवार को कई करोड़ का मुनाफा हुआ। हालांकि भूमि कितने में बेची गई यह तो स्पष्ट नहीं है लेकिन स्थानीय लोगांे का कहना है कि जिस तरह से झीलवाला क्षेत्र में 15 से 22 हजार रुपए प्रति वर्गमीटर भूमि को बाजारी रेट है उस हिसाब से एक बीघा भूमि की कीमत सवा करोड़ के करीब होती है तो इस 185 बीघा भूमि का बाजारी भाव कम से कम सवा दो सौ करोड़ से ज्यादा ही होने की सम्भावना है।
बहरहाल, रियल स्टेट कारोबारी द्वारा इस जमीन को आवासीय उपयोग और बहुमंजिला हाउसिंग कॉम्पलेक्स के तौर पर बेचे जाने का प्रयास किया गया। इसके लिए बाकायदा एक प्लान बनाकर इस भूमि पर ऋषि धाम आवासीय क्षेत्र बनाया गया और इसकी प्लाॅटिंग करके बेचने का कार्य शुरू कर दिया गया। आरेाप है कि नदी-खालों की जमीन को भी समतल करके उसकी भी प्लाॅटिंग करके बेचना शुरू कर दिया। यही नहीं इस भूमि से लगे हुए बरसाती नदी-नालों को भी पाटकर अपनी भूमि में शामिल करके उसे भी प्लॉट काटकर बेचना शुरू कर दिया गया।
पर्यटन विकास के नाम पर खरीदी गई जमीन पर प्लाॅटिंग करके बेचने की जानकारी स्थानीय निवासियों को मिलने लगी तो इसकी शिकायत उपजिलाधिकारी ऋषिकेश को दी गई। तत्कालीन एसडीएम शैलेंद्र नेगी ने इस प्रकरण की जांच के लिए राजस्व लेखपाल ओैर सर्वेयर की टीम को भेजा लेकिन टीम की जांच रिपोर्ट से संतुष्ट न होकर फिर से एक जांच टीम भेजी गई और स्वयं उपजिलाधिकारी शैलेंद्र नेगी द्वारा झीलवाला भूमि का दौरा किया गया और खोसला परिवार को नोटिस जारी करके उनका स्पष्टीकरण मांगा। नोटिस में इस बात का खास तोैर पर उल्लेख किया गया था कि धारा 154 के अंतर्गत भूमि खरीदने की अनुमति में दो वर्ष तक जिस उपयोग के लिए भूमि खरीदी गई है अगर उसका उपयोग नहीं किया जाता है तो उक्त समूची भूमि सरकार में निहित हो जाएगी।
इन सबके बावजूद खोसला परिवार ने नोटिस का कोई जबाब नहीं दिया तो फिर से कई बार नोटिस जारी किए गए। आखिरकार खोसला परिवार को एसडीएम ऋषिकेश की कोर्ट में सुनवाई पर आना पड़ा लेकिन भूमि पर कोई उपयोग न होने और बेचने पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए। एसडीएम ऋषिकेश द्वारा उत्तराखण्ड प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि बदोबस्त अधिनियम 1950 की धारा 166 और 167 में सुनवाई करते हुए उक्त सम्बंधित भूमि के समस्त क्रय-विक्रय तथा स्वरूप परिवर्तन और सभी निर्माण कार्यों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी तथा इसकी प्रवृष्टि खतौनी में भी दर्ज करवा दी।
एसडीएम ऋषिकेश शैलेंद्र नेगी द्वारा कड़ी कार्यवाही के बाद प्लाॅटिंग का कार्य तो रोक दिया गया लेकिन इस रोक के कुछ समय बाद ही शैलेंद्र नेगी का स्थानांतरण घनशाली टिहरी कर दिया गया। बताया जाता है कि शैलेंद्र नेगी द्वारा डोईवाला उपजिलाधिकारी रहते हुए कई कई सौ बीघा भूमि पर अनाधिकृत आवासीय काॅलोनियां, प्लाॅटिंग पर कार्यवाही करके रोक लगा दी थी, साथ ही ग्राम समाज की जमीनों पर भू-माफियों द्वारा अवैध कब्जा करके निर्माणों को भी ध्वस्त करवा दिया था। इसी के चलते नेगी सत्ताधारियों और राजनीतिक रसूखदारों की आंखों की किरकिरी बन गए थे जिसके चलते उनका डोईवाला से ऋषिकेश ट्रांसफर कर दिया गया। ऋषिकेश में भी करोड़ों की जमीन का यह मामला सामने आने के बाद कार्यवाही करने पर उनका स्थानांतरण नगर निगम ऋषिकेश मुख्य नगर आयुक्त के तौर पर कर दिया गया।
इस पूरे मामले में जिस तरह से तमाम नियमों को ताक पर रखा गया वह अपने आप में चौंकाता है। सबसे पहले इस भूमि का भू उपयोग पर्यटन कारोबार और गतिविधियों के लिए किया गया था इसलिए इस भूमि को आवासीय उपयोग में नहीं लाया जा सकता है। बावजूद इसके भूमि पर प्लाॅटिंग करके आवासीय कॉलोनियां बसाए जाने का प्रयास किया गया। दूसरी बात यह है कि 2011 में भूमि की खरीद की अनुमति कई शर्तों के साथ दी गई जिसमें मुख्य मार्ग से भूमि तक के मार्ग को 9 मीटर यानी 30 फीट चैड़ी सड़क का निर्माण किया जाना था वह भी महज 6 मीटर से ज्यादा चोैड़ी सड़क नहीं है, साथ ही 10 वर्ष तक सम्बंधित विभाग के अधिकारी सोये रहे जबकि 2013-14 में ही इस भूमि पर निर्माण कार्य शुरू हो जाने चाहिए थे लेकिन 2022 में इस भूमि को बेच रियल स्टेट कारोबार के लिए बेच दिया गया और शासन-प्रशासन के साथ-साथ दून घाटी विशेष प्रधिकरण भी कुम्भकर्णी नींद सोया रहा।
यहां पर गौर करने वाली बात यह हेै कि भू उपयोग शुल्क लेने वाला दून घाटी विशेष क्षेत्र प्राधिकरण को राज्य सरकार द्वारा समाप्त करके उसको मसूरी देहरादून विकास प्राधिकारण में विलय कर दिया गया है। लेकिन इस भूमि के विकास और नियमों का अनुपालन करने की जिम्मेदारी दून घाटी विशेष क्षेत्र प्राधिकरण की ही थी जिसके अधिकारी कुंभकर्णी नींद सोये हुए थे। सूत्रों के अनुसार रियल स्टेट कारोबारी इस भूमि पर अपना प्रोजेक्ट फिर से आरम्भ करवाने के लिए तमाम तरह की जुगत भिड़ा रहे हैं जिसमें धामी सरकार द्वारा 2022 में भू कानून में धारा 144 में दो वर्ष की सीमा को हटा दिया गया है उसी का भरपूर लाभ अब रियाल स्टेट कारोबारी को मिलने की पूरी सम्भावना जताई जा रही है। जानकारों की मानें तो फिलहाल इस भूमि का भू परिवर्तन होना कठिन है लेकिन खोसला परिवार द्वारा कृषि भूमि का भू उपयोग परिवर्तन पर्यटन गतिविधियों और पर्यटन विकास के लिए करवाया जा चुका है। अगर रियल स्टेट कारोबारी इस भूमि का भू उपयोग परिवर्तन आवासीय करवा देता है तो इसका लाभ भू कानून के नए संशोधन के तहत मिल सकता है। सूत्र तो यह भी बताते हैं कि इस मामले में सत्ताधारी पार्टी भाजपा के कुछ सूत्र भी रियल स्टेट कारोबारी के हक में जुगत भिड़ाने को काम कर रहे हैं। अगर इस भूमि पर आवासीय काॅलोनी खड़ी होती है तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।
बात अपनी-अपनी
मेरे पास स्थानीय लोगों की शिकायत आई थी और स्थानीय समाचार पत्रों में इस प्रकरण की खबरें आई तो मैंने एक जांच टीम भेजी लेकिन जांच टीम की रिपोर्ट से मैं संतुष्ट नहीं हुआ तो मैंने इसकी पूरी जांच करवाई और स्वयं भी वहां गया। वहां बड़े स्तर पर प्लाॅट काटे जा रहे थे और ग्राम समाज की भूमि पर भी कब्जा किया जा रहा था। इस पर मैंने धारा 154 के तहत भूमि खरीद प्रक्रिया के नियमों के तहत नोटिस जारी किया और संतुष्टि पूर्वक जवाब न मिलने पर धारा 166 व 167 में सुनवाई की और उक्त भूमि की रजिस्ट्री और निर्माण कार्यों पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी, साथ ही इसे खतौनी में भी दर्ज करवा दिया था। फिर मेरा स्थानांतरण हो गया। अब इसकी क्या स्थिति है यह तो पता नहीं लेकिन जहां तक मेरी जानकारी है कि रोक आज भी लगी हुई है।
शैलेंद्र नेगी, पूर्व एसडीएम ऋषिकेश व वर्तमान मुख्य नगर आयुक्त नगर निगम ऋषिकेश
यह कोई नई बात नहीं है। पूरे क्षेत्र में अवैध काॅलेानियां रातोंरात प्लाॅट काट कर खड़ी हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में बगैर सरकारी अनुमति से कोई भी तय सीमा से ज्यादा भूमि नहीं खरीद सकता और खेती की जमीेन पर कोई निर्माण नहीं हो सकता लेकिन इसका तोड़ ऐसे निकाला जा रहा है कि 10 से ढाई सौ गज के प्लाॅट काट कर काॅलोनी बसाई जा रही है। जमीन मालिक द्वारा ही आसानी से रजिस्ट्रियां करवाई जा रही है क्योंकि 10 से ढाई सौ गज भूमि कृषि की श्रेणी में नहीं आती। लेकिन इससे कई-कई सौ बीघा भूमि आवासीय भूमि में बदली जा चुकी है। रजिस्ट्री करते समय भूमि का स्वरूप नहीं देखा जा रहा है। यह सब रजिस्ट्रार कार्यालय और भू-माफियाओं की मिलीभगत से ही हो रहा है। यह प्रकरण भी इसी तरह का है। पर्यटन के नाम पर कम दामों में जमीन खरीदी गई। भू उपयोग परिवर्तन करवाया गया और बाद में बिल्डर को करोड़ों में जमीन बेच दी गई। जबकि नियमानुसार यह जमीन सरकार में निहित हो जानी चाहिए थी लेकिन नहीं हुई और अब धामी सरकार के भू-कानून में दो-दो संशोधनों के बाद इसका फायदा बिल्डरों को ही मिलना तय है।
चंद्र प्रकाश बुडाकोटी, पत्रकार व स्थानीय निवासी बड़कोट ग्रामसभा

