सरला माहेश्वरी : 21 जुलाई 1954 - 12 फरवरी 2026

दूरदर्शन की मशहूर न्यूज रीडर सरला माहेश्वरी का 12 फरवरी को 71 वर्ष की आयु में किडनी फेल होने के चलते निधन हो गया। उनके जाने की खबर ने उस पीढ़ी के भीतर एक गहरा खालीपन छोड़ दिया है, जिसने उनके स्वर में देश-दुनिया की धड़कन सुनी थी। वे केवल समाचार पढ़ने वाली आवाज नहीं थीं, वे विश्वास की प्रतिमा थीं। उनके चेहरे की शालीनता, उनके उच्चारण की स्पष्टता और उनके स्वर का संतुलन उस दौर की पत्रकारिता का मानक था। कह सकते हैं कि उनकी मृत्यु के साथ केवल एक जीवन का अवसान नहीं हुआ है बल्कि एक पूरी पत्रकारिता संस्कृति जैसे स्मृतियों में सिमटती जा रही है, वह संस्कृति जिसमें समाचारों को सजाया नहीं जाता था, बेचा नहीं जाता था बल्कि साझा किया जाता था। वह समय जब समाचार अनुष्ठान थे।

याद कीजिए अपने बड़े होने के दौर को जब दूरदर्शन भारतीय घरों की शाम का अभिन्न हिस्सा था। टेलीविजन हर घर में नहीं था। जिन घरों में होता, वहां मोहल्ले के लोग भी इकट्ठा हो जाते। छत पर एंटीना घुमाया जाता, नीचे से आवाज आती, ‘अब ठीक दिख रहा है!’ फिर वह विशिष्ट सिग्नेचर ट्यून बजती और स्क्रीन पर समाचार वाचक का स्थिर चेहरा उभरता। घर में सन्नाटा छा जाता। बच्चों को चुप कराया जाता। समाचार केवल सूचना नहीं थे, वे अनुशासन थे।
 
उससे पहले रेडियो का वह स्वर्णिम दौर भी याद कीजिए ‘‘यह आकाशवाणी

है… अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनिए।’’ भला हमारी पीढ़ी का कौन है जो इस उद्घोषणा को भूल सकता है? जैसे ही आकाशवाणी से यह वाक्य गूंजता था, घरों में एक अलग-सा ठहराव उतर आता था। बातचीत थम जाती थी। लोग रेडियो के पास खिंच आते थे। वह केवल समाचारों की शुरुआत नहीं होती थी, वह विश्वास की शुरुआत होती थी। दूरदर्शन पर सलमा सुल्तान, शोभना जगदीश, तेजेश्वर सिंह, श्यामला पुरी जैसे नाम विश्वसनीयता के पर्याय थे। वे कैमरे के सामने स्वयं को नहीं, खबर को प्रस्तुत करते थे।
 
पत्रकारिता का धर्म और भाषा की मर्यादा

उस समय पत्रकारिता का एक स्पष्ट नैतिक स्वरूप था। समाचार पढ़ते समय शब्दों का चयन सावधानी से होता था। संवेदनशील घटनाओं में संयम बरता जाता था। सरला माहेश्वरी की हिंदी शुद्ध, सधी हुई और गरिमामयी थी। वे नाटकीयता से दूर रहती थीं। उनके चेहरे पर स्थिरता होती थी जो दर्शकों को आश्वस्त करती थी कि जो कहा जा रहा है, वह तथ्य है, राय नहीं। पत्रकारिता में तब एक अदृश्य अनुशासन था। एंकर अपनी भूमिका जानते थे, वे माध्यम थे, केंद्र नहीं।
 
उदारीकरण और मीडिया का बाजारीकरण

वर्ष 1990 के दशक में उदारीकरण के साथ निजी चैनलों का प्रवेश हुआ। प्रतिस्पर्धा बढ़ी। 24×7 समाचार चैनलों ने सूचना की गति बढ़ा दी लेकिन इसी गति के साथ बाजार का दबाव भी आया। विज्ञापन राजस्व टीआरपी पर निर्भर हुआ। धीरे-धीरे समाचार ‘उत्पाद’ में बदलने लगे। खबर अब केवल सूचना नहीं रही, वह पैकेज बन गई। उसे रोचक बनाना जरूरी हो गया। उसे बेचने योग्य बनाना आवश्यक हो गया। यहीं से पत्रकारिता के मूल्यों पर पहला गहरा आघात लगा।
 
मीडिया ट्रायल और शोर का युग

वर्ष 2020 में जब अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु हुई, वह एक संवेदनशील और दुखद घटना थी लेकिन कई चैनलों ने उसे न्याय की लड़ाई के नाम पर लगातार उत्तेजना में बदल दिया। स्टूडियो अदालत बन गए। हर रात बहसें हुईं। आरोप लगे। निष्कर्ष पहले से तय कर दिए गए। अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती को जांच से पहले ही दोषी की तरह प्रस्तुत किया गया। निजी संदेश, निजी रिश्ते, निजी दुख, सब सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना दिए गए। कुछ एंकरों, विशेषकर अर्णब गोस्वामी की शैली ने इस प्रवृत्ति को चरम पर पहुंचाया। ऊंची आवाज, तीखे आरोप और आक्रामक मुद्रा, यह सब पत्रकारिता से अधिक अभियोजन जैसा प्रतीत हुआ। सवाल यह नहीं कि सवाल पूछे क्यों गए? सवाल यह है कि क्या पत्रकार का काम न्यायालय बन जाना है?
 
एंकर का उदय, पत्रकार का पतन

आज कई चैनलों पर एंकर स्वयं ब्रांड हैं। उनकी आवाज, उनका हावभाव, उनकी राजनीतिक स्थिति, सब चर्चा का विषय बनते हैं। खबर पीछे छूट जाती है। व्यक्तित्व आगे आ जाता है। पहले एंकर की पहचान उसकी शुद्ध भाषा और संयम से होती थी। आज पहचान उसकी आक्रामकता और लोकप्रियता से होती है। यह परिवर्तन केवल शैली का नहीं, मूल्य का है। आज जब हम सरला माहेश्वरी को याद करते हैं तो एक प्रश्न मन में उठता है कि क्या हम उस संतुलन को फिर पा सकेंगे? क्या समाचार फिर से समाचार बन पाएंगे? क्या एंकर फिर से पत्रकार बन पाएंगे? उनकी 71 वर्ष की जीवन यात्रा हमें यह सिखाती है कि पत्रकारिता का मूल आभूषण शोर नहीं, विश्वास है। आज स्टूडियो में आवाजें ऊंची हैं लेकिन उनकी शांत आवाज स्मृतियों में और स्पष्ट सुनाई देती है। सरला माहेश्वरी जी आपने हमें सिखाया कि कैमरे के सामने बैठना अभिनय नहीं, दायित्व है। आपकी आवाज समय से बड़ी है और वह हमारे भीतर हमेशा जीवित रहेगी।

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