अफगानिस्तान में 18 मार्च 2026 को पाकिस्तान के हवाई हमलों में लगभग 400 लोगों की मौत के बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। इस हमले ने न केवल मानवीय संकट पैदा किया है बल्कि इसके पीछे छिपे लम्बे सीमा विवाद और आतंकी गतिविधियों के आरोपों को भी एक बार फिर उजागर कर दिया है

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच लम्बे समय से सुलग रहा विवाद 18 मार्च 2026 को उस समय गम्भीर सैन्य टकराव में बदल गया, जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के पूर्वी और दक्षिणी सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। इन हमलों में लगभग 400 लोगों के मारे जाने की खबर सामने आई है जिनमें बड़ी संख्या में आम नागरिक, महिलाएं और बच्चे शामिल बताए जा रहे हैं। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता और भय का माहौल पैदा कर दिया है।

अफगानिस्तान के प्रमुख मीडिया संस्थान टोलो न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने इन हमलों को आतंकवाद विरोधी कार्रवाई बताते हुए दावा किया कि उसने उन ठिकानों को निशाना बनाया जहां से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के लड़ाके सक्रिय थे। पाकिस्तान लम्बे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल टीटीपी द्वारा पाकिस्तान में हमले करने के लिए किया जा रहा है। हाल के महीनों में पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान क्षेत्रों में आतंकी घटनाओं में वृद्धि हुई है जिससे उसकी सुरक्षा एजेंसियों पर दबाव बढ़ा। हालांकि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने पाकिस्तान के इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि पाकिस्तान ने बिना किसी ठोस सबूत के उनकी सम्प्रभुता का उल्लंघन किया है। अफगान अधिकारियों का आरोप है कि जिन क्षेत्रों पर बमबारी की गई, वहां आतंकवादी ठिकाने नहीं बल्कि आम नागरिकों की बस्तियां थीं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हमलों के बाद कई गांव पूरी तरह तबाह हो गए और बड़ी संख्या में लोग बेघर हो गए।

इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न की हैं। अंतरराष्ट्रीय मुस्लिम विद्वान संघ ने पाकिस्तान की इस कार्रवाई की कड़ी निंदा करते हुए इसे इस्लामी सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय कानून दोनों का उल्लंघन बताया है। विद्वानों ने स्पष्ट कहा कि निर्दोष नागरिकों की हत्या किसी भी परिस्थिति में जायज नहीं ठहराई जा सकती और पाकिस्तान को तत्काल अपनी सैन्य कार्रवाई रोकनी चाहिए।

यह पहली बार नहीं है जब दोनों देशों के बीच तनाव इस स्तर तक पहुंचा है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच विवाद की जड़ें काफी पुरानी हैं, जिनमें सबसे प्रमुख मुद्दा डूरंड रेखा का है। यह सीमा 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन के दौरान निर्धारित की गई थी लेकिन अफगानिस्तान ने कभी इसे औपचारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच सीमा पर अक्सर झड़पें होती रहती हैं। इसके अलावा दोनों देशों के बीच संघर्ष का एक बड़ा कारण आतंकवाद और उग्रवादी संगठनों की मौजूदगी भी है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की जमीन पर टीटीपी जैसे संगठन सक्रिय हैं जो पाकिस्तान में हमले करते हैं। वहीं अफगानिस्तान बार-बार यह कहता रहा है कि पाकिस्तान स्वयं विभिन्न उग्रवादी समूहों को समर्थन देता रहा है और अब वह उसी नीति का खामियाजा भुगत रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का यह हवाई हमला उसकी ‘हाॅट पर्सूट’ नीति का हिस्सा हो सकता है जिसके तहत वह अपने दुश्मनों का पीछा करते हुए दूसरे देश की सीमा में घुसकर कार्रवाई करता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून में इस तरह की कार्रवाई को बेहद सीमित परिस्थितियों में ही मान्यता दी जाती है और वह भी तब जब सम्बंधित देश की सहमति हो जो इस मामले में स्पष्ट रूप से नहीं थी।

मानवीय दृष्टिकोण से यह घटना बेहद गम्भीर है। जिन क्षेत्रों में हमले हुए हैं, वहां पहले से ही बुनियादी ढांचे की स्थिति कमजोर थी। अब बमबारी के बाद अस्पतालों, स्कूलों और घरों को भारी नुकसान पहुंचा है। राहत और बचाव कार्यों में भी कठिनाइयां आ रही हैं क्योंकि प्रभावित इलाकों तक पहुंचना आसान नहीं है। कई अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों ने तत्काल सहायता की आवश्यकता जताई है। इस घटना के बाद अफगानिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा है। राजधानी काबुल सहित कई शहरों में विरोध-प्रदर्शन जारी हैं।

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