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कहां खो गई समानांतर सिनेमा की विरासत?

एक समय भारतीय सिनेमा में समानांतर धारा सामाजिक यथार्थ, वर्ग संघर्ष, जाति, लैंगिक असमानता और लोकतांत्रिक प्रश्नों को केंद्र में रखती थी। आज ओटीटी और स्वतंत्र फिल्मों के नए दौर के बावजूद यह सवाल बना हुआ है कि श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी और मृणाल सेन की वह वैचारिक परम्परा आखिर मुख्यधारा से क्यों गायब हो गई?

भारतीय सिनेमा का इतिहास केवल भव्य सेटों, गीत-संगीत और सुपर स्टारों का इतिहास नहीं है। इसके समानांतर एक ऐसी धारा भी रही जिसने समाज की उन परतों को आवाज दी जिन्हें मुख्यधारा का सिनेमा अक्सर नजरअंदाज करता था। इसे समानांतर सिनेमा, नई धारा या आर्ट सिनेमा कहा गया। 1970 और 1980 के दशक में यह आंदोलन भारतीय सिनेमा की सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उपलब्धियों में से एक बनकर उभरा लेकिन आज जब बाॅक्स आॅफिस, ओटीटी और पैन इंडिया फिल्मों का दौर है, तब यह सवाल बार-बार उठता है कि समानांतर सिनेमा की वह विरासत आखिर कहां खो गई?

समानांतर सिनेमा का जन्म उस समय हुआ जब देश सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। बेरोजगारी, गरीबी, ग्रामीण संकट, जातिगत असमानता और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते दबाव ने कई फिल्मकारों को यह महसूस कराया कि सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम भी हो सकता है। इसी सोच ने एक नए सिनेमाई आंदोलन को जन्म दिया।

इस धारा के प्रमुख चेहरों में श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, मृणाल सेन, अडूर गोपालकृष्णन, मणि कौल और कुमार शाहानी जैसे निर्देशक शामिल थे। इन फिल्मकारों ने बाजार की अपेक्षाओं के बजाय समाज की वास्तविकताओं को महत्व दिया। श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’, ‘निशांत’ और ‘मंथन’ जैसी फिल्मों ने ग्रामीण भारत, सामंती शोषण और सामाजिक असमानता को केंद्र में रखा। गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’ और ‘अर्धसत्य’ ने व्यवस्था, पुलिस तंत्र और न्याय प्रणाली की विफलताओं को तीखे ढंग से प्रस्तुत किया।

यह वह दौर था जब अभिनेता भी स्टार बनने के बजाय चरित्रों को जीवंत करने के लिए जाने जाते थे। स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, अमोल पालेकर और फारूक शेख जैसे कलाकारों ने अभिनय की ऐसी परम्परा विकसित की जिसमें ग्लैमर से अधिक महत्व संवेदनशीलता और यथार्थ को दिया गया। स्मिता पाटिल और शबाना आजमी की फिल्में केवल अभिनय का उदाहरण नहीं थीं बल्कि वे महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक न्याय की बहस का हिस्सा भी बनती थीं।

समानांतर सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत उसका वैचारिक साहस था। वह उन विषयों को उठाता था जिनसे मुख्यधारा का सिनेमा बचता था। जाति व्यवस्था, किसानों की बदहाली, आदिवासी जीवन, श्रमिक संघर्ष, महिलाओं पर अत्याचार और राजनीतिक भ्रष्टाचार जैसे विषय इन फिल्मों के केंद्र में होते थे। यही कारण था कि यह सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक दस्तावेज भी माना गया लेकिन 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय सिनेमा का परिदृश्य तेजी से बदलने लगा। बाजार का विस्तार हुआ, मल्टीप्लेक्स संस्कृति आई और फिल्मों के निर्माण की लागत लगातार बढ़ती गई। निर्माता ऐसी फिल्मों में निवेश करने लगे जो अधिक से अधिक दर्शकों को आकर्षित कर सकें। इसी दौर में रोमांस, पारिवारिक मनोरंजन और बड़े सितारों पर आधारित फिल्मों का प्रभुत्व बढ़ा। परिणामस्वरूप समानांतर सिनेमा धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया।

सरकारी संस्थाओं की भूमिका में आई कमी ने भी इस संकट को बढ़ाया। एक समय फिल्म फाइनेंस काॅरपोरेशन और बाद में नेशनल फिल्म डेवलपमेंट काॅरपोरेशन (एनएफडीसी) जैसी संस्थाएं गम्भीर और प्रयोगधर्मी फिल्मों को आर्थिक सहायता देती थीं लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था कमजोर होती गई। जिन निर्देशकों को कभी वैकल्पिक सिनेमा के लिए समर्थन मिलता था, उन्हें वित्त जुटाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। हालांकि यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि समानांतर सिनेमा समाप्त हो गया। वास्तव में उसने अपना रूप बदल लिया। अनुराग कश्यप, नीरज घेवन, नागराज मंजुळे, चैतन्य ताम्हाणे और रिमा दास जैसे निर्देशकों की फिल्मों में आज भी उस परम्परा की झलक दिखाई देती है। ‘मसान’, ‘कोर्ट’, ‘फैंड्री’, ‘सैराट’ और ‘विलेज राॅकस्टार्स’ जैसी फिल्मों ने सामाजिक यथार्थ को नए ढंग से प्रस्तुत किया लेकिन इन फिल्मों का प्रभाव उस व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन जैसा नहीं बन पाया जो 1970 और 1980 के दशक में दिखाई देता था।

ओटीटी प्लेटफाॅर्म के आगमन ने भी एक नई सम्भावना पैदा की। अब ऐसे विषयों पर काम करना सम्भव हुआ जिन्हें पारम्परिक बाॅक्स आॅफिस माॅडल में जोखिम माना जाता था। कई वेब सीरीज और स्वतंत्र फिल्मों ने समाज, राजनीति और पहचान से जुड़े प्रश्नों को नए तरीके से उठाया है। फिर भी आलोचकों का मानना है कि ओटीटी की सामग्री का बड़ा हिस्सा भी अंततः बाजार और दर्शक संख्या के दबाव से मुक्त नहीं है।

आज समानांतर सिनेमा की चर्चा केवल फिल्मों की चर्चा नहीं है बल्कि यह उस प्रश्न से जुड़ी हुई है कि कला और बाजार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। क्या सिनेमा का उद्देश्य केवल मनोरंजन है या उसे समाज के कठिन प्रश्नों से भी जूझना चाहिए? यह वही प्रश्न है जिसने कभी समानांतर सिनेमा को जन्म दिया था।

दरअसल समानांतर सिनेमा की विरासत कहीं खोई नहीं है बल्कि वह भारतीय सिनेमा की स्मृति में जीवित है। जब भी कोई फिल्म हाशिए पर खड़े लोगों की कहानी कहती है, जब भी कोई निर्देशक बाजार के दबाव से ऊपर उठकर सामाजिक यथार्थ को पर्दे पर लाता है, तब यह विरासत फिर से जीवित हो उठती है। चुनौती यह है कि क्या आज का सिनेमा उस परम्परा को आगे बढ़ाने का साहस जुटा पाएगा, जिसने कभी भारतीय समाज को उसकी सबसे सच्ची तस्वीर दिखाई थी।

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