भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या भारतीय जनता पार्टी अपने सहयोगी दलों को धीरे-धीरे कमजोर कर देती है? महाराष्ट्र की शिवसेना, पंजाब का अकाली दल हरियाणा की जजपा, बिहार की लोक जनशक्ति पार्टी और अब जदयू इन उदाहरणों को सामने रख, प्रतीत होता है कि भाजपा गठबंधन की राजनीति में अपने साथियों को अंततः जनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल देती है। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने ने इस बहस को और तेज कर दिया है। सवाल उठ रहा है कि क्या जेडीयू भी उसी राह पर है जिस पर कभी बीजेपी के अन्य सहयोगी दल चले थे?

भारतीय राजनीति में रूपक और प्रतीकों की अपनी एक अलग परम्परा रही है। कभी किसी नेता को ‘लौहपुरुष’ कहा जाता है तो कभी किसी राजनीतिक लहर को ‘आंधी’ का नाम दिया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय जनता पार्टी के संदर्भ में एक नया रूपक बार-बार सुनाई देने लगा है ‘भस्मासुर’। पौराणिक कथा में भस्मासुर वह असुर था जिसे वरदान मिला था कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। राजनीति में यह शब्द उस शक्ति के लिए इस्तेमाल होने लगा है जो अपने ही सहयोगियों की राजनीतिक जमीन को धीरे-धीरे खत्म कर देती है।

भाजपा के आलोचक कहते हैं कि आज भारतीय राजनीति में भाजपा का विस्तार कुछ इसी तरह का दिखाई देता है, पहले वह गठबंधन करती है, सहयोगियों के साथ सत्ता साझा करती है और फिर धीरे-धीरे उसी राज्य में अपनी ताकत इतनी बढ़ा लेती है कि वही सहयोगी उसके सामने कमजोर पड़ जाता है।

इस बहस को समझने के लिए भारत की गठबंधन राजनीति का इतिहास देखना जरूरी है। 1989 के बाद से भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ। उस समय राष्ट्रीय दलों के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों की भूमिका तेजी से बढ़ी। कई राज्यों में क्षेत्रीय दल ही निर्णायक शक्ति बन गए। भारतीय जनता पार्टी भी उसी दौर में राष्ट्रीय राजनीति में तेजी से उभर रही थी लेकिन उसे सत्ता में आने के लिए क्षेत्रीय दलों का सहारा लेना पड़ता था। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार दरअसल कई क्षेत्रीय दलों के समर्थन से ही चल पाई थी। उस समय शिवसेना, शिरोमणि अकाली दल, जनता दल (यूनाइटेड), तृणमूल कांग्रेस और बीजेडी जैसे कई दल भाजपा के मजबूत सहयोगी थे। उस दौर में शक्ति संतुलन ऐसा था कि भाजपा को अपने सहयोगियों के साथ बराबरी का रिश्ता बनाए रखना पड़ता था लेकिन 2014 के बाद भारतीय राजनीति का परिदृश्य तेजी से बदल गया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल किया और उसके बाद पार्टी का विस्तार लगातार बढ़ता गया। भाजपा ने उन राज्यों में भी अपनी मजबूत मौजूदगी बनाई जहां पहले उसका आधार बहुत सीमित था। यही वह मोड़ था जब भारतीय गठबंधन राजनीति का संतुलन बदलने लगा। अब भाजपा सिर्फ गठबंधन की एक पार्टी नहीं रही बल्कि कई राज्यों में वह स्वयं मुख्य राजनीतिक शक्ति बन गई। जब किसी गठबंधन में एक पार्टी बहुत ज्यादा मजबूत हो जाती है तो स्वाभाविक रूप से बाकी दलों की राजनीतिक जगह सिमटने लगती है।

महाराष्ट्र इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। दशकों तक शिवसेना और भाजपा का गठबंधन हिंदुत्व की राजनीति का मजबूत स्तम्भ माना जाता था। बाल ठाकरे के दौर से ही दोनों दलों के बीच राजनीतिक और वैचारिक तालमेल बना रहा लेकिन समय के साथ भाजपा की ताकत बढ़ती गई। 2014 के बाद महाराष्ट्र में भाजपा का संगठन और वोट प्रतिशत दोनों तेजी से बढ़े। 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद हुआ और अंततः शिवसेना ने भाजपा से अलग होकर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार बना ली। इसके बाद 2022 में जो राजनीतिक घटनाक्रम हुआ उसने महाराष्ट्र की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। पार्टी के भीतर बगावत हुई और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना का एक बड़ा गुट भाजपा के साथ चला गया। बाद में चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को ही आधिकारिक शिवसेना मान लिया। परिणाम यह हुआ कि शिवसेना दो हिस्सों में बंट गई और महाराष्ट्र की ­राजनीति में भाजपा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत दिखाई देने लगी।

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल का उदाहरण भी अक्सर इस बहस में सामने आता है। यह पार्टी लम्बे समय तक भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगियों में रही। पंजाब की राजनीति में अकाली दल और भाजपा का गठबंधन कई दशकों तक कायम रहा लेकिन 2020 में कृषि कानूनों के विरोध के बाद अकाली दल ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया। इसके बाद पंजाब की राजनीति में अकाली दल का प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। हालांकि इसके पीछे कई स्थानीय कारण भी थे लेकिन भाजपा के आलोचक इसे भी उसी व्यापक राजनीतिक प्रक्रिया से जोड़ते हैं जिसमें भाजपा का विस्तार क्षेत्रीय दलों के लिए चुनौती बनता जा रहा है।

हरियाणा में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी का उदाहरण भी इसी संदर्भ में दिया जाता है। 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद जजपा ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई और दुष्यंत चौटाला उपमुख्यमंत्री बने लेकिन कुछ ही वर्षों में पार्टी का जनाधार काफी कमजोर हो गया और बाद के चुनावों में उसका प्रदर्शन बेहद खराब रहा। इसी तरह बिहार में रामविलास पासवान की विरासत वाली लोक जनशक्ति पार्टी भी उनके निधन के बाद दो हिस्सों में बंट गई, एक तरफ चिराग पासवान और दूसरी ओर पशुपति कुमार पारस का गुट सामने आया। इस विभाजन ने पार्टी की राजनीतिक ताकत को काफी कम कर दिया।

उड़ीसा की राजनीति में भी इसी तरह की कहानी देखने को मिलती है। नवीन पटनायक की अगुवाई में बीजू जनता दल लम्बे समय तक राज्य की सबसे मजबूत राजनीतिक शक्ति रही। 1998 से लेकर 2009 तक बीजेडी और भाजपा का गठबंधन उड़ीसा की राजनीति में स्थिर सरकार का आधार बना रहा। उस दौर में भाजपा प्रदेश की राजनीति में अपेक्षाकृत छोटी शक्ति थी और बीजेडी स्पष्ट रूप से गठबंधन की बड़ी पार्टी मानी जाती थी लेकिन समय के साथ भाजपा ने राज्य में अपने संगठन को मजबूत करना शुरू किया।

2009 में दोनों दलों का गठबंधन टूट गया। उसके बाद कई वर्षों तक बीजेडी राज्य की सत्ता में बनी रही लेकिन इसी दौरान भाजपा धीरे-धीरे उड़ीसा में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाती रही। राष्ट्रीय राजनीति में
भाजपा के उभार के साथ उसका असर उड़ीसा भी दिखाई देने लगा। चुनाव दर चुनाव भाजपा का वोट प्रतिशत और सीटों की संख्या बढ़ती गई। परिणाम यह हुआ कि जिस राज्य में कभी भाजपा बीजेडी की सहयोगी और अपेक्षाकृत छोटी शक्ति थी, वहीं वह धीरे-धीरे बीजेडी की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी बनकर उभर आई।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह सिर्फ उड़ीसा की कहानी नहीं है, बल्कि उस व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें भाजपा उन राज्यों में भी अपनी मजबूत राजनीतिक मौजूदगी बनाने की कोशिश कर रही है जहां कभी क्षेत्रीय दलों का पूर्ण वर्चस्व था। भाजपा के आलोचक इसे इस बात का उदाहरण मानते हैं कि पार्टी पहले किसी राज्य में सहयोगी के रूप में प्रवेश करती है और फिर धीरे-धीरे वही राज्य उसके विस्तार की जमीन बन जाता है। हालांकि भाजपा इस आरोप को स्वीकार नहीं करती और उसका कहना है कि लोकतंत्र में जनता ही तय करती है कि किस पार्टी को कितना समर्थन देना है।

इन उदाहरणों के आधार पर विपक्ष बार-बार यह आरोप लगाता है कि भाजपा की राजनीति का एक पैटर्न है। पहले वह किसी क्षेत्रीय दल के साथ गठबंधन करती है, फिर उसी राज्य में अपना संगठन मजबूत करती है और धीरे-धीरे वही दल उस क्षेत्रीय पार्टी का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बन जाता है। विपक्ष के कई नेता, राहुल गांधी, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव और एम.के. स्टालिन खुले मंचों से यह आरोप लगा चुके हैं कि भाजपा पूरे देश में क्षेत्रीय दलों को कमजोर करके एक दलीय प्रभुत्व स्थापित करना चाहती है लेकिन इस बहस का दूसरा पक्ष भी है।
 
भाजपा इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है। पार्टी का कहना है कि लोकतंत्र में चुनाव ही अंतिम निर्णायक होते हैं। यदि किसी राज्य में भाजपा मजबूत हो रही है तो इसका कारण जनता का समर्थन है, न कि किसी सहयोगी को कमजोर करने की साजिश। भाजपा यह भी कहती है कि उसने कई मौकों पर अपने सहयोगियों के लिए बड़े पद छोड़े हैं। बिहार में लम्बे समय तक मुख्यमंत्री पद जेडीयू के पास रहा जबकि भाजपा के पास भी पर्याप्त राजनीतिक ताकत थी। महाराष्ट्र में भी भाजपा ने मुख्यमंत्री पद अपने पास रखने के बजाय एकनाथ शिंदे को दिया। पार्टी का कहना है कि यह गठबंधन धर्म का पालन ही है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सच्चाई शायद इन दोनों दावों के बीच कहीं है। राजनीति में शक्ति का संतुलन हमेशा बदलता रहता है। जब कोई पार्टी तेजी से विस्तार करती है तो स्वाभाविक रूप से उसके सहयोगियों के लिए जगह कम होने लगती है। भाजपा का विस्तार भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कई क्षेत्रीय दल अपने संगठन को मजबूत रखने में असफल रहे हैं। कई पार्टियां एक ही नेता के करिश्मे पर टिकी रही हैं। जैसे ही वह नेता कमजोर होता है या राजनीति से हटता है, पार्टी का ढांचा भी कमजोर पड़ जाता है।

अब यही चुनौती बिहार में जेडीयू के सामने खड़ी है। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद पार्टी को नए नेतृत्व और नई रणनीति की जरूरत होगी। जेडीयू की राजनीति काफी हद तक नीतीश कुमार के व्यक्तित्व और प्रशासनिक छवि पर आधारित रही है। अगर पार्टी अपने संगठन को मजबूत रख पाती है और नया नेतृत्व तैयार कर पाती है तो वह भाजपा के साथ रहते हुए भी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रख सकती है लेकिन अगर पार्टी का पूरा ढांचा सिर्फ एक नेता के इर्द-गिर्द था तो आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति में भाजपा का प्रभाव और बढ़ सकता है।

अंततः यह सवाल कि ‘क्या भाजपा भस्मासुर है’ केवल एक राजनीतिक रूपक है। वास्तविकता इससे कहीं ज्यादा जटिल है। भाजपा का तेजी से बढ़ता राजनीतिक प्रभाव भारतीय राजनीति के शक्ति संतुलन को बदल रहा है। यह बदलाव कई क्षेत्रीय दलों के लिए चुनौती बन गया है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि राजनीति में कोई भी दल हमेशा के लिए कमजोर या मजबूत नहीं रहता। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्षेत्रीय दल इस बदलती राजनीति में अपनी जगह कैसे बचाते हैं। बिहार में जेडीयू का भविष्य शायद इस बड़े सवाल का सबसे ताजा और महत्वपूर्ण परीक्षण बनने जा रहा है कि क्या भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दल अपनी पहचान बनाए रख पाएंगे या राष्ट्रीय दलों के विस्तार के सामने धीरे-धीरे कमजोर पड़ते जाएंगे।

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