एक तरफ देश में यह धारणा बनाई जा रही है कि भारत ‘विश्व गुरु’ बन चुका है और उसकी अर्थव्यवस्था वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रही है, दूसरी ओर हालात यह हैं कि अमेरिका भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए ‘छूट’ दे रहा है। इस विरोधाभास ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या सचमुच भारत एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति है या फिर उसकी नीतियों पर बाहरी दबाव बढ़ता जा रहा है? इन सब के बीच एक बड़ा प्रश्न, एक बड़ी चर्चा, इस बात को लेकर भी हो रही है कि क्या भारत सरकार के शीर्ष नेतृत्व का अमेरिका के आगे नतमस्तक होने के पीछे एपस्टीन फाइल्स तो नहीं?


भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक प्रतिष्ठा को लेकर इस समय एक बड़ा राजनीतिक और कूटनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में अमेरिका द्वारा भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी ‘छूट’ देने की घोषणा ने कई गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी देते हुए कहा कि अमेरिकी वित्त मंत्रालय भारतीय रिफाइनरियों को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट दे रहा है। उनके अनुसार यह कदम मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष और उससे पैदा हुई ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता के कारण उठाया गया है। इसके बाद अमेरिकी वित्त विभाग ने एक औपचारिक बयान जारी किया जिसमें कहा गया कि 5 मार्च 2026 तक जहाजों पर लोड किए गए रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की भारत को डिलीवरी और बिक्री की अनुमति दी जा रही है।

प्रश्न उठता है कि अमेरिका कौन होता है कि वह भारत को किसी काम को करने की इजाजत देगा? क्या हम अमेरिका के गुलाम देश हैं? अमेरिकी मंत्री इस बदजुबानी के बावजूद भारत सरकार का खामोश रहना न केवल बड़ी हैरानी पैदा करता है बल्कि नेता विपक्ष राहुल गांधी के आरोपों की पुष्टि करता भी नजर आता है। 9 मार्च को संसद में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के ‘डरे होने’ की बात कही। निश्चित ही राहुल गांधी की बातों में अब एक बहुत बड़े वर्ग को सच नजर आने लगा है।
 
ब्रह्म चेलानी की प्रतिक्रिया

जाने-माने जियो-स्ट्रेटजिस्ट और स्तम्भकार ब्रह्मा चेलानी ने इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि यदि भारत वास्तव में स्वतंत्र रूप से तेल खरीद सकता होता तो उसे रूस से तेल लेने के लिए अमेरिकी लाइसेंस की आवश्यकता ही नहीं होती। उनके अनुसार यह छूट वास्तव में एक प्रतिबंध से राहत है और यह संकेत देती है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में अमेरिका का प्रभाव इतना व्यापक है कि कई देशों को उसके वित्तीय ढांचे के भीतर रहकर ही व्यापार करना पड़ता है।
 
हिंद महासागर में IRIS Dena घटना

इस पूरे विवाद के बीच हिंद महासागर में ईरान से जुड़े जहाज IRIS Dena को डुबोने की घटना ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। रिपोर्टों के अनुसार यह कार्रवाई अमेरिका से जुड़े सैन्य अभियान का हिस्सा मानी जा रही है। रणनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना संकेत देती है कि पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष अब हिंद महासागर क्षेत्र तक फैल सकता है।
 
जनरल वी.पी. मलिक की तीखी टिप्पणी

भारत के पूर्व सेना प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यह स्थिति उन्हें 1988 के ‘ऑपरेशन कैक्टस’ की याद दिलाती है। उन्होंने बताया कि उस समय मालदीव में तख्तापलट की कोशिश हुई थी और मालदीव सरकार ने भारत से मदद मांगी थी। जनरल मलिक के अनुसार उस समय अमेरिकी राजदूत जॉन गुंथर डीन का फोन आया था और उन्होंने कहा था कि इस संकट में भारत का पहला अधिकार है। उन्होंने भारत को सहायता की पेशकश भी की थी लेकिन भारत ने अमेरिकी मदद लेने के बजाय स्वयं कार्रवाई करने का निर्णय लिया और मात्र 36 घंटों में ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया।

जनरल मलिक के शब्दों में ‘‘उस समय अमेरिका ने सम्मान पूर्वक कहा था कि यदि आपको हमारी मदद चाहिए तो बताइए। लेकिन आज IRIS Dena की घटना यह दिखाती है कि तथाकथित रणनीतिक साझेदारी के बावजूद अमेरिका क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई करते समय साझेदार देशों से परामर्श को जरूरी नहीं समझता।’’
 
भारत-अमेरिका सम्बंधों की पृष्ठभूमि

पिछले दो दशकों में भारत और अमेरिका के सम्बंध काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों ने रक्षा, तकनीक, व्यापार और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया है। 2025 में दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डाॅलर तक पहुंचाने का लक्ष्य भी तय किया था लेकिन इसके बावजूद कई मुद्दों पर मतभेद भी सामने आते रहे हैं। पिछले वर्ष अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ बढ़ाए थे, जिससे व्यापारिक तनाव पैदा हुआ।

अप्रैल 2025 में अमेरिका ने भारतीय आयात पर 26 प्रतिशत टैरिफ लगाया। बाद में इसे अस्थायी रूप से कम किया गया लेकिन फिर सभी आयातों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की गई। अगस्त में इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया। बाद में दोनों देशों के बीच बातचीत के बाद इसे घटाकर 18 प्रतिशत किया गया। इन घटनाओं ने यह संकेत दिया कि अमेरिका व्यापारिक नीतियों का इस्तेमाल कूटनीतिक दबाव के रूप में भी कर सकता है।
 
‘विश्व गुरु’ की छवि और वास्तविकता

अब आते हैं वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के सोशल मीडिया में जारी बयान पर। वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण की एक सोशल मीडिया पोस्ट इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। इस पोस्ट में उन्होंने कुख्यात अमेरिकी फाइनेंसर एपस्टीन से जुड़ी तथाकथित एपस्टीन फाइल्स के आधार पर वैश्विक राजनीति की एक बेहद गम्भीर और चिंताजनक तस्वीर पेश की है। भूषण का कहना है कि ‘‘एपस्टीन केवल यौन शोषण के मामलों में आरोपी व्यक्ति भर नहीं था बल्कि सम्भवतः वह एक बड़े ‘हनी-ट्रैप’ नेटवर्क का संचालन कर रहा था, जिसके जरिए दुनिया के शक्तिशाली राजनेताओं और काॅरपोरेट हस्तियों को फंसाकर उन्हें ब्लैकमेल किया जाता था।’’

प्रशांत भूषण की पोस्ट यह संकेत देती है कि एपस्टीन का नेटवर्क सम्भवतः केवल निजी अपराधों तक सीमित नहीं था बल्कि वह एक सुनियोजित ब्लैकमेल तंत्र का हिस्सा हो सकता है। यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति की निजी या आपत्तिजनक स्थिति के वीडियो या तस्वीरें रिकाॅर्ड कर ली जाएं तो वह व्यक्ति राजनीतिक या आर्थिक निर्णयों में दबाव में आ सकता है। यही कारण है कि कई विश्लेषकों ने वर्षों से यह सवाल उठाया है कि इतना बड़ा नेटवर्क इतने लम्बे समय तक कानून की पकड़ से बाहर कैसे रहा।

भूषण की पोस्ट का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू इजराइल से जुड़ा हुआ है। उनका संकेत है कि एपस्टीन के इजराइल से निकट सम्बंध थे और सम्भव है कि उसके पास मौजूद संवेदनशील वीडियो या तस्वीरें वहां की खुफिया एजेंसियों तक पहुंचाई गई हों।

पोस्ट का सबसे विवादास्पद हिस्सा वह है जहां भूषण वैश्विक नेताओं के बीच शक्ति संतुलन को ‘ब्लैकमेल की राजनीति’ से जोड़ते हुए टिप्पणी करते हैं। उनका संकेत है कि यदि किसी देश या एजेंसी के पास प्रभावशाली नेताओं से जुड़ी संवेदनशील जानकारी हो, तो वह अंतरराष्ट्रीय सम्बंधों में दबाव का एक साधन बन सकती है। इसी संदर्भ में उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उल्लेख करते हुए यह कहा कि वैश्विक शक्ति संतुलन कभी-कभी इस तरह के गुप्त दबावों से भी प्रभावित हो सकता है।

इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष शायद यही है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल सार्वजनिक घोषणाओं और औपचारिक कूटनीति तक सीमित नहीं होती। उसके पीछे खुफिया जानकारी, रणनीतिक हित, व्यक्तिगत सम्बंध और कभी-कभी निजी कमजोरियों का भी प्रभाव हो सकता है। प्रशांत भूषण की टिप्पणी इसी जटिल और अक्सर अदृश्य सत्ता संरचना की ओर इशारा करती है जहां वैश्विक भू-राजनीति के निर्णय कई बार उन तथ्यों से प्रभावित होते हैं जो आम जनता के सामने कभी पूरी तरह प्रकट ही नहीं होते।
 
विदेश नीति पर उठते बड़े सवाल

  • क्या भारत अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को पहले की तरह बनाए रख पा रहा है?
  • क्या वैश्विक शक्ति राजनीति में आर्थिक दबाव नया हथियार बन चुका है?
  • क्या भारत को अपनी विदेश नीति की दिशा पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है?
 
अंत में उठता बड़ा प्रश्न

भले ही भारतीय राजनीति और सार्वजनिक विमर्श में बार-बार यह दावा किया जाता हो कि भारत अब ‘विश्व गुरु’ बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम कई बार बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करते दिखाई देते हैं। जब किसी दूसरे देश का वित्त मंत्री यह घोषणा करता है कि भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए ‘छूट’ दी जा रही है तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या भारत की ऊर्जा नीति वास्तव में पूरी तरह स्वतंत्र है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के कई बयानों और हालिया घटनाओं को देखने के बाद कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका का रवैया कई बार भारत के प्रति एकतरफा और दबावपूर्ण दिखाई देता है।
 
व्यापारिक टैरिफ से लेकर ऊर्जा नीति और क्षेत्रीय सुरक्षा तक, कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जिनमें अमेरिका ने अपने हितों को प्राथमिकता देते हुए भारत पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की कोशिश की है।

ऐसी स्थिति में यह बहस स्वाभाविक है कि क्या भारत की विदेश नीति में कहीं न कहीं गम्भीर विचलन आ गया है। स्वतंत्र भारत की विदेश नीति लंबे समय तक ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के सिद्धांत पर आधारित रही है यानी भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेगा और किसी भी महाशक्ति के प्रभाव क्षेत्र में पूरी तरह शामिल नहीं होगा लेकिन आज की वैश्विक राजनीति में आर्थिक निर्भरता, प्रतिबंध व्यवस्था, सैन्य गठबंधन और ऊर्जा सुरक्षा जैसे कारकों ने स्थितियों को बेहद जटिल बना दिया है। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी विदेश नीति के उस आत्मविश्वास को फिर से मजबूत करे जिसने उसे दशकों तक एक स्वतंत्र और सम्मानित आवाज के रूप में स्थापित किया था।

भले ही भारतीय नेता खुद को ‘विश्व गुरु’ मानने का भ्रम पाले बैठे हों, लेकिन ट्रम्प और उनका देश अमेरिका लगातार भारत और भारतीय नेताओं के प्रति ऐसा व्यवहार करते दिखाई देते हैं जिसे कई लोग अपमानजनक मानते हैं। हालिया घटनाएं यह संकेत देती हैं कि हमारी विदेश नीति में कहीं न कहीं एक गम्भीर विचलन आ चुका है। यदि भारत वास्तव में वैश्विक मंच पर सम्मान और प्रभाव चाहता है तो उसे केवल घोषणाओं और नारों से आगे बढ़कर अपनी नीतियों में वह आत्मविश्वास और स्पष्टता दिखानी होगी जो किसी भी स्वतंत्र और शक्तिशाली राष्ट्र की पहचान होती है।

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