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गिरती धारणा, तीखे सवाल और अर्थव्यवस्था का असहज सच बुरे फंसे ‘विश्वगुरु’

बीते कुछ समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को लेकर सवाल तेज हुए हैं जहां 2014 के बाद किए गए वादों को सोशल मीडिया पर बार-बार उठाया जा रहा है और उनके परिणामों पर बहस हो रही है। महिला आरक्षण जैसे कदमों के क्रियान्वयन को लेकर संशय बना हुआ है, कभी समर्थक रहीं मधु किश्वर के सोशल मीडिया पर जारी बयानों ने भाजपा को सकते में डाला तो कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डोनाल्ड ट्रम्प के बयानों और वैश्विक मुद्दों में भारत की भूमिका को लेकर सवाल उठे हैं। इन सब के बीच भाजपा के संस्थापकों में से एक वर्तमान में ‘मार्गदर्शक मंडल’ के सदस्य डाॅ. मुरली मनोहर जोशी का ‘विश्वगुरु’ कहने पर आपत्ति जताना इस बहस को और गहरा करता है। वहीं इंटरनेशनल मोनेटारी फण्ड के अनुसार 2026 में प्रति व्यक्ति जीडीपी में बांग्लादेश के भारत से आगे रहने का अनुमान उस दावे पर बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहा है जो भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर यह सरकार लगातार करती आई है

भारतीय राजनीति में ‘धारणा’ हमेशा से एक निर्णायक तत्व रही है लेकिन 2014 के बाद यह धारणा अभूतपूर्व रूप से एक व्यक्ति और एक नारे के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई और वह नारा था ‘विश्वगुरु भारत’। इस विचार ने सिर्फ एक राजनीतिक विजन नहीं, एक भावनात्मक कथा भी गढ़ी, जिसमें भारत को न केवल आर्थिक, बल्कि सांस्कृतिक, कूटनीतिक और नैतिक नेतृत्व के शिखर पर स्थापित करने की कल्पना की गई लेकिन 2026 आते-आते यही कथा अब सवालों के घेरे में है और सवाल सिर्फ विपक्ष नहीं बल्कि समय, परिस्थितियां और कुछ हद तक अपने ही समर्थकों द्वारा खड़े किए जा रहे हैं। सबसे पहले बात उस बदलती धारणा की, जिसकी गूंज अब साफ सुनाई देने लगी है। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, जो एक समय लगभग अजेय मानी जाती थी, अब पहले जैसी निर्विवाद नहीं दिखती। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि लोकप्रियता समाप्त हो गई है, लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि उसमें गिरावट की चर्चा अब मुख्यधारा का हिस्सा बन चुकी है।

सोशल मीडिया इस बदलाव का सबसे बड़ा मंच बन गया है जहां 2014 से लेकर अब तक के भाषण, वादे और घोषणाएं बार-बार सामने लाई जा रही हैं। ‘हर साल दो करोड़ रोजगार’, ‘किसानों की आय दोगुनी’, ‘काला धन वापस’, ‘नया भारत’, ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ये सभी नारे आज तुलना के पैमाने बन गए हैं। समर्थकों का तर्क है कि इतने बड़े संरचनात्मक बदलावों में समय लगता है जबकि आलोचकों का कहना है कि इन वादों को जिस निर्णायकता के साथ पेश किया गया था, उसी अनुपात में परिणाम दिखाई नहीं देते। महिला आरक्षण का मुद्दा इस पूरे विमर्श का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। संसद में पारित होने के बाद इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया लेकिन इसके लागू होने की समय-सीमा और प्रक्रिया को लेकर अब भी स्पष्टता नहीं है। आलोचक इसे ‘राजनीतिक टाइमिंग’ से जोड़कर देख रहे हैं यानी यह कदम प्रतीकात्मक रूप से प्रभावशाली था लेकिन जमीनी क्रियान्वयन की राह अभी लम्बी है। यही कारण है कि ‘नारी शक्ति’ के नाम पर लिया गया निर्णय अब उल्टा सवालों का कारण बन रहा है।
इस बदलते माहौल का एक और महत्वपूर्ण पहलू है, समर्थन का धीरे-धीरे दरकना। मधु किश्वर का उदाहरण यहां खास तौर पर उल्लेखनीय है। एक समय प्रधानमंत्री के समर्थन में पुस्तक लिखने वाली यह आवाज अब खुलकर आलोचनात्मक टिप्पणियां कर रही है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि उनके द्वारा लगाए गए आरोप या टिप्पणियां अंतिम सत्य नहीं मानी जा सकतीं, वे उनके व्यक्तिगत विचार और आरोप हैं लेकिन राजनीतिक विश्लेषण में यह तथ्य अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण होता है कि जो आवाज कभी समर्थन में थी वही अब असहमति में खड़ी है। यह बदलाव सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं बल्कि एक व्यापक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का संकेत हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि को लेकर बहस का नया दौर शुरू हुआ है। डोनाल्ड ट्रम्प के साथ प्रधानमंत्री के सम्बंधों को कभी ‘व्यक्तिगत केमिस्ट्री’ के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया था- ‘हाउ डी मोदी’ और ‘नमस्ते ट्रम्प’ जैसे आयोजनों ने इस छवि को मजबूत किया लेकिन हाल के समय में ट्रम्प के बयानों और रुख को लेकर यह धारणा बन रही है कि वे कई बार भारतीय नेतृत्व को लेकर असहज या आलोचनात्मक टिप्पणियां करते रहे हैं। यह कहना कि उन्होंने औपचारिक रूप से ‘साथ छोड़ दिया’ एक अतिरंजना हो सकती है लेकिन यह भी सच है कि वैश्विक राजनीति में व्यक्तिगत समीकरण स्थायी नहीं होते और यह बदलाव भी उसी का हिस्सा है। इसी संदर्भ में वैश्विक संघर्षों खासतौर पर पश्चिम एशिया में भारत की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे निर्णायक क्षणों में भारत की भूमिका उतनी प्रभावशाली नहीं दिखती, जितनी एक ‘उभरती वैश्विक शक्ति’ से अपेक्षित होती है।
यहां तुलना अक्सर पाकिस्तान से भी की जाती है, जहां कुछ मामलों में उसकी सक्रियता अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भारत की आधिकारिक नीति ‘रणनीतिक संतुलन’ (स्ट्रेटेजीक आॅटोनमी) पर आधारित रही है, यानी किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़े होने के बजाय अपने हितों के अनुसार संतुलन बनाए रखना। इसी पूरे परिदृश्य के बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी का बयान अचानक चर्चा के केंद्र में आ जाता है। उन्होंने कहा कि भारत को ‘विश्वगुरु’ कहना उचित नहीं है। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विपक्ष की ओर से नहीं बल्कि उसी वैचारिक परिवार के एक वरिष्ठ और अनुभवी नेता की ओर से आया है। जहां तक फैक्ट का सवाल है, उपलब्ध सार्वजनिक बयानों में उन्होंने विस्तार से ‘आंतरिक चुनौतियों’ की सूची नहीं गिनाई लेकिन उनका मूल संदेश यही था कि इस तरह के बड़े दावों से पहले देश को अपनी वास्तविक स्थिति का ईमानदारी से आकलन करना चाहिए। यानी यह कहना कि उन्होंने विस्तार से शिक्षा, स्वास्थ्य या अन्य समस्याओं का उल्लेख किया कि पूरी तरह प्रमाणित नहीं है लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि उनका बयान ‘आत्ममूल्यांकन’ की जरूरत पर जोर देता है।
अब आते हैं उस पहलू पर जो इस पूरे विमर्श को सबसे ज्यादा ठोस आधार देता है, अर्थव्यवस्था।  इंटरनेशनल मोनेटारी फण्ड की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट ने भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार 2026 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी (per capita GDP) बांग्लादेश से थोड़ी कम रहने का अनुमान है, बांग्लादेश लगभग $2,911 और भारत लगभग $2,812। पहली नजर में यह अंतर छोटा लगता है लेकिन इसका प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा है। पर कैपिटआ जीडीपी का अर्थ है, देश की कुल आय को उसकी आबादी से विभाजित करना। यानी यह सीधे-सीधे बताता है कि एक औसत नागरिक की आर्थिक स्थिति क्या है। 2023 और 2024 में भी बांग्लादेश इस मामले में भारत से आगे था 2025 में भारत ने मामूली बढ़त बनाई 2026 में फिर बांग्लादेश आगे निकलता दिख रहा है। यह एक अस्थायी उतार-चढ़ाव हो सकता है लेकिन यह एक पैटर्न भी दर्शाता है कि भारत की विशाल अर्थव्यवस्था का लाभ प्रति व्यक्ति स्तर पर उतनी तेजी से नहीं पहुंच रहा। हालांकि तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कुल जीडीपी में भारत लगभग $4.1 ट्रिलियन के साथ बांग्लादेश के $510 बिलियन से बहुत आगे है। 2027 में फिर भारत के प्रति व्यक्ति जीडीपी में आगे निकलने का अनुमान है और 2031 तक भारत के आगे बने रहने की सम्भावना जताई गई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि भारत एक ‘बड़ी अर्थव्यवस्था’ जरूर है लेकिन ‘समृद्ध समाज’ बनने की राह अभी अधूरी है और यहीं ‘विश्वगुरु’ का नारा सबसे ज्यादा चुनौती में आता है क्योंकि ‘विश्वगुरु’ केवल आकार से नहीं बनता, वह बनता है गुणवत्ता, समानता और जीवन स्तर से।
अगर किसी देश की कुल अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही हो लेकिन उसके नागरिकों की औसत आय अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ रही हो तो वह असंतुलन लम्बे समय में राजनीतिक और सामाजिक सवाल खड़े करता है। यही वजह है कि आईएमफ का यह आंकड़ा सिर्फ एक आर्थिक डेटा नहीं बल्कि एक राजनीतिक संकेत भी बन जाता है। अब इस पूरे परिदृश्य को एक साथ जोड़कर देखें तो एक तरफ बड़े नारे और वैश्विक नेतृत्व का दावा तो दूसरी ओर सोशल मीडिया पर पुराने वादों की याद दिलाती जनता, एक समय के समर्थकों का आलोचनात्मक रुख, अंतरराष्ट्रीय मंच पर बदलते समीकरण और आर्थिक आंकड़े जो मिश्रित तस्वीर पेश करते हैं उनसे स्पष्ट होता है कि ‘विश्वगुरु’ की कहानी अब एकतरफा नहीं रही। यह अब एक बहस है, एक ऐसा विचार जिसे साबित करना होगा, न कि केवल दोहराना।
यह कहना गलत होगा कि भारत उस दिशा में नहीं बढ़ रहा लेकिन यह कहना भी उतना ही जरूरी है कि वह रास्ता अब पहले से कहीं ज्यादा कठिन, जटिल और जवाबदेही से भरा हुआ है। आखिरकार, इतिहास केवल उन देशों को ‘गुरु’ का दर्जा देता है जो न केवल अपने लिए बल्कि दुनिया के लिए भी एक आदर्श स्थापित करते हैं। आदर्श केवल दावों से नहीं बनते, वे बनते हैं ठोस उपलब्धियों, संतुलित नीतियों और नागरिकों के वास्तविक जीवन में दिखने वाले बदलावों से। शायद यही वह कसौटी है, जिस पर आज का भारत खड़ा है और यही वह प्रश्न है, जिसका उत्तर आने वाले वर्षों में तय होगा कि ‘विश्वगुरु’ एक सपना था, एक नारा था, या एक वास्तविकता बनने की दिशा में बढ़ता हुआ लक्ष्य।

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