महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजे न सिर्फ चैंकाने वाले हैं, बल्कि पक्ष-विपक्ष दोनों के लिए सबक भी हैं। सबक इस मायने में कि सत्ताधारी भाजपा को सोचना होगा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का उत्तर से लेकर दक्षिण तक देशभर में जनता ने बेशक स्वागत किया, लेकिन राष्ट्रवाद के अलावा हर क्षेत्र या प्रदेश की कुछ ऐसी जमीनी समस्याएं और मुद्दे भी होते हैं जिन्हें प्रमुखता से लेना जरूरी है। यह आत्ममंथन भाजपा को खुद करना है कि महाराष्ट्र में वह अपना पिछला प्रदर्शन क्यों नहीं दोहरा पाई, खासकर तब जबकि राज्य में उसने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस गठबंधन को इस मुद्दे पर भी घेरा कि एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल के तार पीएमसी घोटालेबाजों से जुड़े हुए हैं। एनसीपी प्रमुख शरद पवार पर भी भ्रष्टाचार को लेकर हमले किए गए। लेकिन कहीं न कहीं जनता में या संदेश भी गया कि पीएमसी बैंक के खाताधारक आत्महत्या कर रहे हैं, तो केंद्र सरकार का भी कुछ दायित्व है। केंद्र की भाजपा सरकार ने अपने को घोटाले से खुद अलग करते हुए मामला रिजर्व बैंक के ही हवाले कर डाला। जनता को केंद्र सरकार का यह रवैया चुभ गया।
कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के पास भाजपा की देवेन्द्र फडणवीस सरकार के खिलाफ धारदार मुद्दों का जिस प्रकार टोटा था, उसमें भी यदि इन पार्टियों का प्रदर्शन सुधरा है और राज्य में पंकजा मुंडे जैसे दिग्गज भाजपा नेताओं की हार हुई तो जाहिर है कि भाजपा को सोचना होगा कि आगे सिर्फ राष्ट्रवाद की लहर पर राजनीति नहीं की जा सकेगी। अपनी सहयोगी शिव सेना के मुकाबले भाजपा की सीटें काफी ज्यादा घटी हैं। यह भाजपा के लिए बहुत बड़ा झटका है।
हरियाणा में भाजपा नेताओं को लग रहा था कि कश्मीर से 370 हटाने के बाद राष्ट्रवाद की लहर लोकसभा चुनाव से ज्यादा प्रचंड है। पार्टी यहां 75 पार का सपना देख रही थी। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की रैलियों की प्रत्याशी जोर-शोर से मांग कर रहे थे, लेकिन उम्मीद के अनुरूप करिश्मा यहां काम नहीं आया। अब पार्टी को सरकार बनाने के लिए दूसरों का मुंह ताकना पड़ रहा है। यह सच है कि रणदीप सिंह सुरजेवाला जैसे बड़े कांग्रेसी नेता चुनाव हारे, लेकिन राज्य सरकार के वित्त मंत्री कैप्टिन अभिमन्यु की हार के आगे यह हार छोटी है।
विपक्षी कांग्रेस के लिए यह चुनाव इस मायने में सबक लेने वाला है कि हरियाणा में पार्टी प्रत्याशी लगातार बड़े नेताओं की सभाओं और रैलियों की मांग करते रहे, लेकिन दिग्गज महारथियों ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। ऐसे में भाजपा के बड़े महाराथियों के सामने कांग्रेस के साधारण योद्धा ही युद्ध में जूझते रहे। इसके बावजूद महाराष्ट्र और हरियाणा में कांग्रेस के उम्मीदवारों ने उम्मीदों और कयासों से ज्यादा सफलता हासिल की। बड़े नेता जरा भी चुनाव में रुचि लेते तो तस्वीर कुछ और अच्छी हो सकती थी। लिहाजा कांग्रेस को भविष्य के लिए सबक लेने की जरूरत है कि अपने प्रत्याशियों को युद्ध में झोंका जाए तो उनका मनोबल बढ़ाने के उपाय भी किए जाएं। राज्य में नेताओं की अंतर्कलह का नुकसान भी पार्टी को हुआ।
बीजेपी महाराष्ट्र में महज 100 के आंकड़े तक ही पहुंच पाई है तो हरियाणा में 40 सीटों पर ही सिमट गई। हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस और भाजपा में कांटे की टक्कर रही। ऐसे में भाजपा को सरकार बनाने के लिए जजपा यानी जननायक जनता पार्टी या निर्दलियों का सहारा लेना पड़ेगा। हालांकि कांग्रेस की राज्य इकाई के नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी विपक्षी दलों से एकजुट होकर सरकार बनाने की अपील की है। पूर्व सांसद और ताऊ कहे जाने वाले देवीलाल के परपोते दुष्यंत चैटाला की पार्टी जजपा ने भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों को सकते में ला दिया है। दुष्यंत ने दावा किया था कि हरियाणा में न तो भाजपा और न ही कांग्रेस 40 सीटें ला पाएगी। पार्टी के गठन का एक साल भी नहीं हुआ है, लेकिन इसको कमतर नहीं आंका जा सकता। नौ दिसंबर 2018 को अस्तित्व में आई जजपा ने एक साल के अंदर अपनी सियासी जमीन खासी मजबूत की है।
महाराष्ट्र में 2014 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी और बीजेपी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। जिसमें बीजेपी अकेले पहली बार 100 का आंकड़ा पार करने में कामयाब हुई थी। 122 सीटें जीतकर राज्य की सबसे बड़ी पार्टी भी बनी थी। शिवसेा 63 सीटें जीतकर दूसरी पार्टी बनी थी। लेकिन इस बार बीजेपी काफी नीचे गिर गई है। पिछले 2014 के विधानसभा चुनाव में लगातार तीन बार राज्य की सत्ता में काबिज रही। कांग्रेस एनसीपी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। तब कांग्रेस 42 सीटें जीतकर तीसरे और एनसीपी 41 सीटें जीतकर चैथे नंबर पर रही थी। हरियाणा में 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने राज्य में 47 सीटे जीतकर सरकार बनाई थी, जबकि आईएनएलडी को 19 सीटें और कांग्रेस को 15 सीटें मिली थी।

