उद्यान विभाग घोटाला/भाग-5
नौ नवम्बर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखण्ड राज्य का निर्माण के बाद से ही प्रदेश का उद्यान विभाग भ्रष्टाचार और घोटालों का पर्याय बनकर उभरा है। अविभाजित उत्तर प्रदेश का उत्तराखण्ड क्षेत्र उद्यान विभाग के लिए भ्रष्टाचार का एक ऐसा खेत बन चुका था जिस पर घोटालों और अनियमितताओं की फसल जमकर बोई गई और काटकर आपस में बांटी जाती रही। पृथक राज्य बनने के बाद तो लगातार इस विभाग में भ्रष्टाचार के नए-नए रास्ते बनाए जाते रहे और करोड़ों रुपए हर वर्ष कृषि और बागवानी के नाम पर लूटे जाते रहे। हैरत की बात यह है कि उद्यान विभाग के करोड़ों के घोटालों पर सीबीआई जांच चल रही है जिसमें डेढ़ दर्जन से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ-साथ किसानों को पौधों की आपूर्ति करने वाली नर्सरियों के खिलाफ मुकदमा तक दर्ज करवाया गया है। बावजूद इसके उद्यान विभाग के अधिकारियों पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है
धामी सरकार में उद्यान मंत्री गणेश जोशी ने रुद्रप्रयाग में वर्ष 2020 में कागजी नींबू के पौधों में हुए बड़े घोटाले के सामने आने पर पूरे प्रकरण की तह में जाने के बजाय उन अधिकारियों को ही आरोपी बना डाला है जिनका इस लूट के खेला से कुछ लेना-देना ही नहीं। उद्यान विभाग के अपर निदेशक आर.के. सिंह और सेवानिवृत्त जिला उद्यान अधिकारी के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने का आदेश मंत्री ने दिया जिस पर विभाग द्वारा दोनों अधिकारियों को आरोप पत्र दे दिया गया। कहा जा रहा है कि सेवानिवृत्त जिला उद्यान अधिकारी की पेंशन से क्षतिपूर्ति की जाएगी। साथ ही पौधे सप्लाई करने वाली नर्सरी को भी काली सूची में डाले जाने का आदेश जारी किया गया है।

मंत्री गणेश जोशी के आदेश को धामी सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की तरह दर्शाया जा रहा है जबकि इस मामले में साफ तौर पर यह मामला उद्यान विभाग के उच्चाधिकारियों की बेलगाम काय शैली और भ्रष्टाचार को एक तरह से दबाने का ही मामला दिखाई देता है। अधिकारी इस कदर बेलगाम हो चुके हैं कि मंत्री के आदेशों को भी रद्दी की टोकरी में डालने से बाज नहीं आ रहे हैं।

बारहमासी कागजी नींबू के पौधे के घोटाले की नींव वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के समय रखी गई। राज्य सरकार द्वारा किसानों को विभागीय योजना के तहत फलदार पौधों को नि:शुल्क दिए जाने की योजना तब लाई गई थी। इस योजना में बीज द्वारा उत्पन्न फलदार पौधों को किसानों को दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि उद्यान विभाग द्वारा दो योजनाएं चलाई जाती हैं। इनमें हॉटिज़्कल्चर मिशन के तहत ग्राफ्टिंग और रूट स्टॉक प्रजाति के पौधे दिए जाते हैं जबकि विभागीय योजना के तहत फलों के पौधे पौधशालाओं में विकसित करके विभाग द्वारा किसानों को वितरित किए जाते हैं। योजना का उद्देश्य था कि जो हजारों की तादाद में उत्तराखण्ड के प्रवासी लोग कोरोना महामारी के चलते वापस लौट रहे थे उनके द्वारा छोड़े गए बंजर खेतों को आबाद करने के उद्देश्य से उद्यान विभाग द्वारा फलदार पौधों को वितरित किया जाए।
रुद्रप्रयाग जिले में भी बारहमासी कागजी नींबू के पौधों के लिए विभागीय योजना शुरू की गई। जिसके तहत करीब ढाई दजज़्न किसानों को नि:शुल्क पौधे दिए गए। इसी क्रम में वर्ष 2020 में रुद्रप्रयाग जिले के ऊखीमठ विकासखंड के सेना गढ़ सारी गांव के किसान मानवेंद्र नेगी द्वारा बारहमासी कागजी नींबू प्रजाति के पौधों के लिए उद्यान विभाग से मांग की जिस पर विभाग द्वारा 125 कागजी नींबू के पौधे उपलब्ध करवाए गए।
किसान मानवेंद्र नेगी को विभाग द्वारा बताया गया कि उक्त नींबू के पौधे बारहमासी कागजी नींबू के उच्च गुणवत्ता वाले हैं जिसमें ज्यादा फल आएंगे। यह पौधे उद्यान विभाग द्वारा प्रमाणिक नर्सरी संजीवनी नर्सरी सोरना विकासनगर जिला देहरादून से उपलब्ध कराए गए हैं। 5 वर्ष के बाद प्रति पौधे से ढाई से तीन हजार रुपए की सालाना आय किसानों को आसानी से मिल सकती है।
बहरहाल किसान मानवेंद्र नेगी द्वारा बड़े लगन से अपने 25 नाली खेतों में इन पौधों को नियमानुसार लगाया गया और इनकी पूरी देखभाल की गई। मानवेंद्र नेगी की हाड़तोड़ मेहनत का नतीजा रहा कि 125 में से महज 12 पौधे ही पनप नहीं पाए, शेष 113 पौधे बेहतर तरीके से पनपे और फले-फूले।
मानवेंद्र नेगी को धक्का तब लगा जब उसके पौधे में कागजी नींबू की जगह जंगली प्रजाति के जम्भीरी नींबू के फल लगने लगे। फिर भी मानवेंद्र नेगी को भरोसा था कि उद्यान विभाग द्वारा प्रमाणिक नर्सरी से मिले पौधे गलत नहीं हो सकते, एकाध गलत हो सकता है। परंतु जब सभी पेड़ों पर जम्भीरी नींबू के फल आने शुरू हुए तो मानवेंद्र नेगी के पैरों तले जमीन खिसक गई। सभी पेड़ जंगली जम्भीरी नींबू से लदे हुए नजर आ रहे थे।

मानवेंद्र नेगी के जैसे कई और किसान भी थे जिन्होंने उद्यान विभाग द्वारा कागजी नींबू की पौध अपने खेतों में लगाई और उम्मीद कर रहे थे कि पांच वष के बाद उनको बम्पर फसल होगी और उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर होगी लेकिन उन सभी के साथ धोखा हुआ। इस धोखे के बाद किसानों द्वारा उद्यान विभाग के अधिकारियों को इसकी शिकायत की। वर्ष 2023 के दिसम्बर में मानवेंद्र नेगी ने अपने खेतों में पैदा हुए जम्भीरी नींबू के फलों को उद्यान सचल दल केंद्र के प्रभारी के कायाज़्लय में जमा करवाया। इसके बावजूद विभागीय अधिकारियों ने किसानों को इन पेड़ों को या तो ग्राफ्टिंग करवाने या इनको कटवाने की सलाह दी। अनेक किसानों ने मन मारकर उद्यान विभाग के अधिकारियों की सलाह पर अमल करते हुए अपने खेतों से जम्भीरी नींबू के पेड़ों को कटवा दिया। मानवेंद्र नेगी ने विभागीय अधिकारियों से नाराजगी जताते हुए पेड़ों को काटने से साफ इनकार कर दिया और 25 अप्रैल 2024 को इसकी शिकायत रुद्रप्रयाग के तत्कालीन जिला उद्यान अधिकारी योगेंद्र सिंह से की। अपने साथ हुई धोखाधड़ी के खिलाफ कार्यवाही करने और आर्थिक क्षति का मुआवजा दिलाने की मांग की।
इस पर जिला उद्यान अधिकारी द्वारा विभागीय स्तर पर इन पौधों पर कागजी नींबू की ग्राफ्टिंग करवाए जाने की बात कही, लेकिन स्वयं विभाग के ही विशेषज्ञों के अनुसार ग्राफ्टिंग का समय दिसम्बर से फरवरी माह तक ही हो सकता है। साथ ही जम्भीरी नींबू के पेड़ ज्यादा बड़े होने के चलते उन पर ग्राफ्टिंग सफल होगी या नहीं इस पर संशय बना हुआ था। मानवेंद्र नेगी ने भी इसी संशय को देखते हुए ग्राफ्टिंग की बजाय नए पौधे दिलवाए जाने की मांग की।
जिला उद्यान विभाग रुद्रप्रयाग ने 29 अप्रैल को उद्यान सचल दल केंद्र अगस्तमुनि के प्रभारी को मानवेंद्र नेगी के मामले में स्थलीय निरीक्षण के लिए भेजा। स्थलीय निरीक्षण में मामले को सही पाया और उद्यान सचल दल केंद्र अगस्तमुनि ने अपनी जांच आख्या 6 मई 2024 को जिला उद्यान अधिकारी को भेज दी। इस जांच रिपोर्ट के साथ जिला उद्यान अधिकारी योगेंद्र सिंह द्वारा 20 मई 2024 को उद्यान निदेशक को पूरे प्रकरण में किसानों को हुई आर्थिक क्षति की पूतिज़् के लिए सम्बंधित नसज़्री संजीवनी नसज़्री सोरना विकास नगर जिला देहरादून से वसूल करने तथा नसज़्री के खिलाफ सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज करने का आग्रह किया। विदित हो कि उद्यान विभाग द्वारा संजीवनी नर्सरी से 15 रुपए प्रति पौध की दर से खरीदा था। सूत्रों के अनुसार 25 किसानों ने इन नींबू के पौधों को अपने खेतों में लगाया था। परंतु उद्यान निदेशक चौबटिया रानीखेत द्वारा इस मामले में विभागीय जांच और कार्यवाही की संस्तुति मिलने के बाद भी
कोई कार्यवाही करना तो दूर उक्त पत्र को ही फाइलों में दबा दिया गया। जब मामला समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में आया तब भी इस मामले में विभागीय उच्चाधिकारियों द्वारा कोई कदम तक नहीं उठाया।
आरटीआई एक्टिविस्ट और पर्वतीय कृषक, कृषि एवं बागवानी और उद्यमी संगठन के सचिव दीपक करगेती द्वारा इस मामले को सोशल मीडिया में खूब प्रचारित किया गया और समाचार पत्रों में इसकी गूंज सुनाई देने लगी। साथ ही उद्यान विभाग के कर्मचारी संगठन भी इसको लेकर मुखर हुए तो विभाग की फजीहत होते देख कृषि मंत्री गणेश जोशी ने दिसम्बर 2024 में विभागीय अधिकारियों को कार्यवाही करने के आदेश के साथ ही मामले में दोषी पाई गई संजीवनी नर्सरी को ब्लैकलिस्ट करने के आदेश दे दिए। हैरत की बात यह है कि उद्यान विभाग के मिशन निदेशक महेंद्र पाल ने विभागीय मंत्री के आदेशों को भी ताक पर रखते हुए जनवरी में फिर से शीतकालीन पौधों का आवंटन करने का ठेका इसी नर्सरी को जारी कर दिया। यह मामला फिर से सुर्ख़ियों में आया तो उद्यान निदेशक महेंद्र पाल को अपने आदेश को वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा।
उद्यान विभाग के निदेशक के इस नए कारनामे को लेकर खूब फजीहत हुई और तमाम समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में सरकार और मंत्री गणेश जोशी पर गम्भीर सवाल खड़े होने लगे तो 14 फरवरी को इस मामले की पूरी पत्रावली तलब की और मामले में जुलाई 2024 में सेवानिवृत्त हो चुके जिला उद्यान अधिकारी योगेंद्र सिंह और उप निदेशक आर.के. सिंह के खिलाफ कार्यवाही करने के आदेश दे दिए।

यह पूरा प्रकरण साफ तौर पर उद्यान विभाग में चल रहे बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार का है। जिला उद्यान अधिकारी योगेंद्र सिंह द्वारा संजीवनी नर्सरी के खिलाफ कार्यवाही करने की संस्तुति पत्र को तत्कालीन उद्यान निदेशक दीप्ति सिंह द्वारा करीब 5 माह तक दबाए रखना और मौजूदा उद्यान निदेशक महेंद्र पाल द्वारा विभागीय मंत्री के आदेशों को भी ताक पर रखते हुए विभागीय जांच में दोषी पाई गई संजीवनी नर्सरी को ही फिर से फलों के पौधे आवंटन करने का टेंडर जारी करना बड़े घोटाले की तरफ इशारा करता है। इसके अलावा उप निदेशक आर.के. सिंह को भी इस मामले में दोषी बताकर उनको आरोप पत्र जारी किया गया है जबकि उनकी भूमिका इस मामले में नहीं है। बावजूद इसके दोनों ही अधिकारियों को मामले में दोषी बताकर इसमें संलिप्त बड़े चेहरों को बचाए जाने का प्रयास किया जा रहा है। चर्चा है कि इस पूरे प्रकरण में उद्यान निदेशक के साथ-साथ देहरादून जिला उद्यान अधिकारी को बचाने की पूरी कवायद की जा रही है। राज्य के नर्सरी एक्ट के अनुसार जिस जिले में पौधे का आवंटन करने वाली नर्सरी होगी उसका सत्यापन उसी जिले के जिला उद्यान अधिकारी द्वारा किया जाएगा। इस मामले में संजीवनी नर्सरी का सत्यापन और आवंटन किए जाने वाले पौधों की जांच और परीक्षण का जिम्मा जिला उद्यान अधिकारी देहरादून मीनाक्षी जोशी का ही था।
जिला उद्यान अधिकारी मीनाक्षी जोशी के खिलाफ सीबीआई यूके
हाईटेक नर्सरी देहरादून को को करोड़ों का पौधा सप्लाई का ठेका आवंटन करने और 3 करोड़ 28 लाख 92 हजार रुपए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना के तहत किसानों के खाते में न देकर यूके हाईटेक नर्सरी देहरादून के खाते में स्थानांतरण करने के आरोप में दोषी पाते हुए मुकदमा दर्ज करवा चुकी है। हैरानी की बात यह है कि सीबीआई जांच के बाद मुकदमा दर्ज होने के बावजूद अभी तक मीनाक्षी जोशी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही के नाम पर सिर्फ स्थानांतरण ही किया गया है। इससे यह बात साफ हो जाती है कि उद्यान विभाग में किस तरह से अधिकारियों का रसूख है और विभाग ऐसे अधिकारियों को बचाने के लिए छोटे अधिकारियों को मामले में दोषी बनाकर बड़े चेहरों को बचा रहा है।
प्रदेश के नर्सरी एक्ट के प्रावधानों में से किसी एक का भी पालन नहीं किया गया। रुद्रप्रयाग जिले के किसानों के साथ इतनी बड़ी धोखाधड़ी होने के बाद जिला उद्यान अधिकारी द्वारा मामले की स्थलीय जांच में सभी आरोप सही पाए जाने के उद्यान निदेशक को कार्यवाही के लिए पत्र लिखने के बाद भी उद्यान निदेशक ने मामले को दबा दिया गया और संजीवनी नर्सरी सोरना विकासनगर जिला देहरादून के खिलाफ कार्यवाही करने की बजाय उसको बचाने की कवायद में जुट गया।
उद्यान विभाग किस तरह से संजीवनी नर्सरी को बचाने का काम कर रहा था इसका प्रमाण इस बात से ही पता चल जाता है कि जम्भीरी नींबू के पेड़ों को कटवाने की सलाह किसानों को स्वयं उद्यान विभाग के अधिकारी देते रहे और किसानों को यह कहते रहे कि जम्भीरी नींबू एक जंगली नींबू की प्रजाति है जिसका कोई उपयोग नहीं है। इसके चलते कई किसानों ने अपने खेतों से इन जम्भीरी नींबू के पेड़ों को कटवा दिया। विभागीय अधिकारी अपने षड़यंत्र में कामयाब भी हो गए लेकिन मानवेंद्र नेगी ने ऐसा नहीं किया और उनके खेतों में उगे जम्भीरी नींबू के फलों से लदे पेड़ पूरे घोटाले का एक मात्र प्रमाण बनकर सामने आया है।
नर्सरी एक्ट में हैं कड़े प्रावधान
वर्ष 2019 में तत्कालीन त्रिवेंद्र रावत सरकार द्वारा प्रदेश में हॉटिज़्कल्चर मिशन के तहत बागवानों के हितों के लिए उत्तराखण्ड राज्य फल पौध अधिनियम 2019 बनाया जिसमें कई तरह के कठोर प्रावधान रखे गए। इस कानून की धारा 18 की उपधारा 1 में प्रावधान है कि पौधशाला स्वामी जो अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के किसी उपबंध का उल्लंघन करेगा वह प्रथम दोष सिद्धि पर रुपए 50 हजार तक का जुर्माना तथा जुर्माना न देने की दशा में छह माह तक के कारावास से दंडित किया जाएगा। साथ ही द्वितीय दोष या प्रथम दोष के पश्चात किसी नियम का उल्लंघन करता है तो उस पर 50 हजार रुपए का जुर्माना और छह माह के कारावास से दंडित किया जाएगा।
इसके अलावा उत्तराखण्ड राज्य फल पौध अधिनियम में परिशिष्ठ एक में घोषणा नम्बर 6 में पौधशाला स्वामी द्वारा घोषणा किए जाने का भी प्रावधान रखा गया है जिसमें नर्सरी स्वामी घोषणा करता है कि ‘जिन पौधों को मेरे द्वारा विक्रय या वितरित किया जाएगा वह उसी प्रजाति के होंगे जो मेरे द्वारा संस्तुति की गई है तथा वह पौधे सम्पूर्ण कीट और व्याधियों से मुक्त होंगे अन्यथा किसान के समस्त प्रतिकरों का वहन मेरे द्वारा किया जाएगा।’ प्रतिकर का निर्धारण अनुज्ञप्ति अधिकारी या उसके द्वारा नामित जिला उद्यान अधिकारी द्वारा गठित कमेटी द्वारा किया जाएगा। अधिनियम की धारा 97 की उपधारा 1 के ग के अनुसार अपराध या दोष सिद्ध होने पर अनुज्ञापत्र निलंबित या निरस्त किया जा सकता है। इसके बावजूद संजीवनी नर्सरी के खिलाफ कार्यवाही करने की बजाय उसको बचाने और मामले के सामने आने के बाद भी संजीवनी नर्सरी को ही शीतकालीन फलों की आपूर्ति का ठेका देने के आदेश दिए गए।
बात अपनी-अपनी
जब रुद्रप्रयाग के डीएचओ ने अपनी रिपोर्ट डायरेक्टर को भेज दी थी और उसमें साफ मेंशन किया था कि नर्सरी के खिलाफ कार्यवाही की जाए तो तभी इस मामले में कार्यवाही की जानी चाहिए थी। मैं विभागीय अधिकारी हूं और मैं कर्मचारी आचरण नियमावली से बंधा हुआ हूं इसलिए मेरा इस मामले में कुछ कहना उचित नहीं है लेकिन जहां तक मुझे आरोप पत्र दिए जाने की बात है उसमें मेरा इतना ही कहना है कि राज्य के नसज़्री एक्ट के अनुसार सभी कायज डायरेक्टर के तहत ही होते हैं और पौधों के सत्यापन का काम जिस जिले में नर्सरी स्थापित है उस जिले के डीएचओ का ही काम होता है। संजीवनी नर्सरी देहरादून जिले में है तो देहरादून जिले के डीएचओ का सत्यापन का काम था। एक्ट में वितरित किए गए पौधों में कोई कमी आती है तो उसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी नर्सरी संचालक की ही होगी और उस पर नर्सरी एक्ट के अनुसार कार्यवाही होनी चाहिए। इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है।
आर.के. सिंह, उपनिदेशक, उद्यान
मेरे पास जब किसान मानवेंद्र का मामला आया था तो मैंने अगस्तमुनि के उद्यान केंद्र के अधिकारी को टीम के साथ स्थलीय निरीक्षण के लिए भेज दिया था। उन्होंने मुझे अपनी रिपोर्ट दी जिसमें मैंने मामले को सही पाया। मैंने संजीवनी नर्सरी के खिलाफ कार्यवाही करने और किसानों को क्षतिपूर्ति दिलवाने की संस्तुति के साथ उद्यान निदेशक को पत्र भेज दिया था। जुलाई 2024 में मैं रिटायर्ड हो गया। इसके बाद मुझे पता नहीं क्या कार्यवाही हुई लेकिन समाचार पत्रों से मुझे पता चला कि मुझे ही इस मामले में दोषी बताकर मेरे खिलाफ कार्यवाही करने की बात कही जा रही है। यह गलत है और इससे मेरा ह्रासमेंट भी हो रहा है। यह सब बड़े अधिकारियों को बचाने का षड़यंत्र रचा जा रहा है। आर.के. सिंह जी की भी इसमें कोई भूमिका नहीं है लेकिन उनको भी आरोप पत्र दिया जा रहा है। पांच महीने तक मेरा पत्र निदेशक ने दबाए रखा उस पर कार्यवाही क्यों नहीं की गई यह उनसे पूछना चाहिए। मैं इस मामले में कानूनी कार्यवाही भी कर सकता हूं और मेरा नाम इस मामले में घसीटने से मैं मानहानि का दावा भी करूंगा।
योगेंद्र सिंह, सेवानिवृत्त जिला उद्यान अधिकारी, रुद्रप्रयाग
हमने विभाग को इस मामले में बताया तो उन्होंने हमें और कई विकल्प दिए। उन्होंने कहा कि इसमें कागजी नींबू की ग्राफ्टिंग विभाग द्वारा करवाई जाएगी लेकिन यह भी कहा कि अब पेड़ बड़े हो गए हैं तो ग्राफ्टिंग पता नहीं कामयाब होगी या नहीं बता नहीं सकते? तो हमने उनको कहा कि आपने हमें कागजी नींबू के पौधे दिए तो हमारे इस जम्भीरी नींबू को विभाग नींबू की कीमत से खरीदें और हमारी क्षतिपूर्ति करें। पांच साल हमने विभाग के भरोसे पर मेहनत की लेकिन इसका हमें बहुत नुकसान हुआ। मुझे विभाग के पत्र मिल रहे हैं लेकिन कहीं भी हमें क्षतिपूर्ति दिए जाने की बात नहीं कही जा रही है। अगर हम पांच साल इसकी जगह कोई और फसल लगाते तो हमें नुकसान नहीं होता। अब हम करें क्या? इन पेड़ों को काट नहीं सकते और इनके फलों की कोई कीमत नहीं है। हम दोहरे नुकसान में ही हैं।
मानवेंद्र नेगी, किसान सेना गढ़ सारी गांव, रुद्रप्रयाग

