Uttarakhand

जमीन के खेल में कोई सुरक्षित नहीं

उत्तराखण्ड में जमीनों की खरीद-फरोख्त अब सबसे बड़े आर्थिक अपराधों में बदलती जा रही है। फर्जी दस्तावेज, एक ही जमीन के कई सौदे, करोड़ों रुपए लेने के बाद रजिस्ट्री से इनकार और प्रभावशाली लोगों तक को निशाना बनाने वाले गिरोह सक्रिय हैं। पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के रिश्तेदार विक्रम राणा से कथित तौर पर 18 करोड़ रुपए से अधिक की ठगी का मामला इस पूरे नेटवर्क की गम्भीरता को उजागर करता है। दो पुलिस जांच, एफआईआर और हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बावजूद कार्रवाई का इंतजार कानून व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर रहा है

उत्तराखण्ड में तेजी से बढ़ते भूमि कारोबार के साथ-साथ जमीनों से जुड़ी धोखाधड़ी के मामले भी चिंताजनक स्तर तक पहुंच गए हैं। खासकर राजधानी देहरादून और उसके आसपास के क्षेत्रों में फर्जी दस्तावेज तैयार कर जमीन बेचने, एक ही भूमि का कई लोगों से सौदा करने, करोड़ों रुपए लेने के बाद रजिस्ट्री से मुकर जाने और सरकारी भूमि तक की खरीद-फरोख्त जैसे मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। प्रशासन और पुलिस के समक्ष आने वाली शिकायतों में भी भूमि विवाद और धोखाधड़ी के मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

इसी कड़ी में सामने आया एक हाई प्रोफाइल मामला पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोप है कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के रिश्तेदार और युवा उद्यमी विक्रम रावत से जमीन दिलाने के नाम पर 18 करोड़ रुपए से अधिक की कथित ठगी की गई। यह मामला न केवल पुलिस जांच और एफआईआर तक पहुंचा बल्कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक भी गया। इसके बावजूद आरोपियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के आरोप लग रहे हैं।

विक्रम रावत ने 29 दिसम्बर 2024 को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक देहरादून को दी गई शिकायत में आरोप लगाया था कि राजकुमार यादव और हरीश यादव ने स्वयं को एक कम्पनी की ओर से अधिकृत प्रतिनिधि बताते हुए देहरादून के पुरकुल गांव में 25 बीघा भूमि बेचने का प्रस्ताव रखा। 50 लाख रुपए प्रति बीघा की दर से सौदा तय हुआ और शुरुआती भुगतान के रूप में 1 करोड़ 81 लाख रुपए आरोपियों को दे दिए गए। कुल सौदा 12 करोड़ 50 लाखा में तय हुआ।

शिकायत के अनुसार जब भूमि का सीमांकन और समतलीकरण शुरू कराया गया तो कुछ लोग मौके पर पहुंचे और दावा किया कि सम्बंधित भूमि विभिन्न कम्पनियों के पास गिरवी है तथा उसमें उनका भी अधिकार है। आरोप है कि इन दावों के आधार पर विक्रम रावत पर अतिरिक्त भुगतान का दबाव बनाया गया। शिकायत के मुताबिक उन्होंने 10 करोड़ 10 लाख रुपए एक कम्पनी तथा 6 करोड़ 25 लाख रुपए दूसरी कम्पनी के खाते में हस्तांतरित कर दिए। इस तरह कुल भुगतान 18 करोड़ 16 लाख रुपए तक पहुंच गया। आरोप है कि बाद में रजिस्ट्री कराने का आश्वासन दिया गया, स्टाम्प शुल्क और टीडीएस तक जमा करा दिया गया लेकिन रजिस्ट्री के दिन विक्रेता पक्ष के लोग उप-पंजीयक कार्यालय नहीं पहुंचे। इसके बाद सम्पर्क भी बंद कर दिया गया।

रजिस्ट्री नहीं होने पर विक्रम रावत ने पूरे प्रकरण की स्वतंत्र स्तर पर पड़ताल शुरू की। उनका आरोप है कि जांच के दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिनसे उन्हें यह विश्वास हो गया कि उनके साथ ठगी करने की पूरी योजना पहले से तैयार की गई थी। शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया कि जिन कम्पनियों के नाम पर उनसे करोड़ों रुपए का अतिरिक्त भुगतान कराया गया, वे वास्तव में एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं। जिन लोगों ने मौके पर पहुंचकर भूमि को गिरवी या विवादित बताया, वे भी कथित रूप से उसी समूह का हिस्सा थे। उनका आरोप है कि फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के सहारे उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि यदि सम्बंधित कम्पनियों का बकाया नहीं चुकाया गया तो भूमि की रजिस्ट्री सम्भव नहीं होगी। इसी भरोसे में उन्होंने कुल 18 करोड़ 16 लाख रुपए का भुगतान कर दिया लेकिन इसके बावजूद न तो जमीन की रजिस्ट्री हुई और न ही उनकी रकम वापस मिली।

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिस पुरकुल क्षेत्र की भूमि को लेकर यह विवाद है, उसकी बाजार कीमत पिछले कुछ वर्षों में कई गुना बढ़ चुकी है। राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी पुरकुल-मसूरी रोपवे परियोजना के चलते इस पूरे इलाके में भूमि की मांग तेजी से बढ़ी है। प्रस्तावित रोपवे स्टेशन के आस-पास पर्यटन और व्यावसायिक गतिविधियों की सम्भावनाओं ने जमीनों के दाम अचानक बढ़ा दिए हैं। विक्रम रावत का आरोप है कि जब उन्होंने सौदा किया था, तब भूमि का मूल्य अलग था लेकिन आज उसकी कीमत कई गुना बढ़ जाने के कारण ही उनके पक्ष में रजिस्ट्री नहीं की जा रही है।

शिकायत मिलने के बाद पुलिस क्षेत्राधिकारी मसूरी को मामले की जांच सौंपी गई। जांच रिपोर्ट में इसे सिविल प्रकृति का विवाद बताते हुए विक्रम रावत को सिविल न्यायालय की शरण लेने की सलाह दी गई। हालांकि शिकायतकर्ता इस निष्कर्ष से संतुष्ट नहीं थे। उनका कहना था कि यह केवल अनुबंध का विवाद नहीं बल्कि सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला है, जिसमें करोड़ों रुपए की आर्थिक ठगी की गई है।

इसी बीच विक्रम रावत का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने न्याय नहीं मिलने की स्थिति में आत्महत्या जैसा कदम उठाने की चेतावनी दी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि उनसे 18 करोड़ रुपए से अधिक की रकम लेने के बावजूद न तो उन्हें जमीन दी गई और न ही पुलिस उनकी शिकायत पर प्रभावी कार्रवाई कर रही है। उस समय प्रदेश में भूमि विवाद से जुड़े एक अन्य आत्महत्या प्रकरण ने भी व्यापक राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी थी। लगातार वायरल हो रहे ऐसे वीडियो के बाद तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक देहरादून ने मामले की दोबारा जांच के निर्देश दिए।

दूसरी जांच पुलिस अधीक्षक (सिटी) स्तर पर कराई गई। इस जांच में पहले की रिपोर्ट का पुनर्मूल्यांकन किया गया और बैंक खातों, भुगतान के दस्तावेजों तथा दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों की विस्तार से जांच की गई। शिकायत के अनुसार इस दौरान यह तथ्य सामने आया कि आरोपी पक्ष द्वारा जिस दूसरे व्यावसायिक प्रोजेक्ट का हवाला देकर करोड़ों रुपए के भुगतान को उचित ठहराने की कोशिश की जा रही थी, उसके समर्थन में कोई विश्वसनीय दस्तावेज जांच अधिकारियों के सामने प्रस्तुत नहीं किया जा सका। दूसरी ओर शिकायतकर्ता द्वारा बैंकिंग माध्यम से किए गए करोड़ों रुपए के भुगतान के दस्तावेज उपलब्ध कराए गए, जिनका परीक्षण भी किया गया। इन्हीं तथ्यों के आधार पर पुलिस ने अपना रुख बदला और 14 सितम्बर 2025 को राजपुर थाने में आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी सहित विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया। मुकदमा दर्ज होने के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि मामले में गिरफ्तारी और आगे की कानूनी कार्रवाई तेजी से होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आरोपियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और गिरफ्तारी से राहत प्राप्त कर ली। इसके साथ ही एफआईआर को निरस्त कराने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका भी दाखिल कर दी, जिसके बाद मामला न्यायालय की निगरानी में पहुंच गया।

उच्च न्यायालय में इस मामले की विस्तृत सुनवाई हुई। दोनों पक्षों के दस्तावेजों, बैंक लेन-देन और जांच रिपोर्टों पर लम्बी बहस के बाद न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया। सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि शिकायतकर्ता से बड़ी धनराशि प्राप्त होने के तथ्य पर गम्भीर विवाद नहीं है। न्यायालय ने उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रस्तुत तथ्यों का परीक्षण करने के बाद माना कि प्रथम दृष्टया मामला केवल एक साधारण सिविल विवाद का नहीं है बल्कि इसमें आपराधिक पहलुओं की भी जांच आवश्यक है।

सुनवाई पूरी होने के बाद 3 जून 2026 को उच्च न्यायालय ने आरोपियों को दी गई अंतरिम राहत समाप्त कर दी। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि याचिका में तथ्यों को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया और अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया गया। इसके साथ ही आरोपियों पर ढाई लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया तथा इस प्रकरण में पूर्व में पारित सभी अंतरिम आदेश निरस्त कर दिए। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस आदेश के बाद जांच एजेंसी के सामने कार्रवाई का रास्ता और अधिक स्पष्ट हो गया था।

इसके बावजूद शिकायतकर्ता का आरोप है कि आज तक आरोपियों के विरुद्ध अपेक्षित कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। विक्रम रावत ने कई बार सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगाया कि एफआईआर दर्ज होने, दो-दो पुलिस जांच पूरी होने और उच्च न्यायालय के आदेश आने के बाद भी पुलिस मामले में आगे नहीं बढ़ रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर भी शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि उन पर समझौते का दबाव बनाया जा रहा है। हालांकि पुलिस की ओर से इन आरोपों पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
इस पूरे प्रकरण ने उत्तराखण्ड में भूमि कारोबार की कार्यप्रणाली पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

गौरतलब है कि पिछले एक दशक में देहरादून, ऋषिकेश, मसूरी, डोईवाला, सहस्रधारा रोड, पुरकुल, प्रेमनगर और आसपास के क्षेत्रों में भूमि की कीमतों में कई गुना वृद्धि हुई है। इसी तेजी का फायदा उठाकर कुछ संगठित गिरोह फर्जी दस्तावेज तैयार करने, विवादित जमीन को बेदाग बताकर बेचने, एक ही भूमि के कई सौदे करने और भुगतान लेने के बाद रजिस्ट्री टालने जैसे तरीकों से करोड़ों रुपए की ठगी कर रहे हैं। हाल के दिनों में प्रेमनगर क्षेत्र में भी एक रियल एस्टेट कारोबारी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है कि उससे जमीन के नाम पर 1 करोड़ 32 लाख रुपए लेने के बावजूद डेढ़ वर्ष बीत जाने पर भी रजिस्ट्री नहीं कराई गई। पुलिस इस मामले की जांच कर रही है। यह घटना भी बताती है कि भूमि से जुड़े आर्थिक अपराध अब लगातार सामने आ रहे हैं और उनका दायरा बढ़ता जा रहा है।
देहरादून के पूर्व जिलाधिकारी सविन बंसल के जनता मिलन कार्यक्रमों में भी सबसे अधिक शिकायतें जमीनों की खरीद-फरोख्त, फर्जी बैनामों और भुगतान के बाद रजिस्ट्री नहीं होने से सम्बंधित आती रही थीं। कई मामलों में प्रशासन ने जांच और कार्रवाई के निर्देश भी दिए लेकिन शिकायतों की संख्या में उल्लेखनीय कमी नहीं आई। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या राज्य में भूमि कारोबार की निगरानी व्यवस्था और कानून का डर दोनों कमजोर पड़ते जा रहे हैं?

विक्रम रावत का मामला इसलिए भी विशेष महत्व रखता है क्योंकि यदि पूर्व मुख्यमंत्री के परिवार से जुड़ा एक व्यक्ति भी कथित तौर पर करोड़ों रुपए गंवाने के बाद वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है तो सामान्य नागरिकों की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। यह मामला केवल एक व्यक्ति की शिकायत नहीं बल्कि उत्तराखण्ड में तेजी से फैल रहे भूमि फर्जीवाड़े के उस बड़े संकट की ओर संकेत करता है, जिस पर अब सरकार, पुलिस और न्याय व्यवस्था, तीनों को अधिक प्रभावी और त्वरित कार्रवाई करनी होगी।

उत्तराखण्ड में भूमि से जुड़े अपराधों की बढ़ती संख्या के पीछे केवल व्यक्तिगत धोखाधड़ी नहीं बल्कि एक संगठित तंत्र के सक्रिय होने की आशंका भी लगातार व्यक्त की जाती रही है। पुलिस और राजस्व विभाग की जांच में पिछले कुछ वर्षों के दौरान ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जिनमें फर्जी पावर आॅफ अटाॅर्नी, कूटरचित दस्तावेज, जाली पहचान पत्र, फर्जी उत्तराधिकार प्रमाणपत्र और एक ही भूमि की बार-बार बिक्री जैसे तरीके अपनाकर करोड़ों रुपए की ठगी की गई। कई मामलों में सरकारी भूमि और ग्राम समाज की भूमि तक पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कब्जे या बिक्री के प्रयास भी सामने आए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2000 में राज्य गठन के बाद देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, मसूरी और नैनीताल जैसे क्षेत्रों में रियल एस्टेट बाजार तेजी से बढ़ा। पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सेवानिवृत्त लोगों की बढ़ती बसावट ने जमीनों की मांग को कई गुना बढ़ा दिया। इसके साथ ही बाहरी निवेशकों का रुझान भी उत्तराखण्ड की ओर बढ़ा। जमीनों की कीमतों में आए इसी उछाल का लाभ उठाने के लिए कई ऐसे लोग भी इस कारोबार में उतर आए, जिनका उद्देश्य वैध व्यापार नहीं बल्कि फर्जीवाड़े के जरिए मोटा मुनाफा कमाना था।

देहरादून सबसे अधिक प्रभावित जिलों में माना जाता है। यहां सहस्रधारा रोड, राजपुर रोड, पुरकुल, प्रेमनगर, डोईवाला, मोहकमपुर, शिमला बाईपास और आस-पास के क्षेत्रों में भूमि विवादों की संख्या लगातार बढ़ी है। पुलिस के पास आने वाली शिकायतों में बड़ी संख्या उन मामलों की होती है, जिनमें खरीदारों से करोड़ों रुपए लेने के बाद या तो रजिस्ट्री नहीं कराई जाती या बाद में यह पता चलता है कि सम्बंधित भूमि पहले से किसी अन्य व्यक्ति के नाम दर्ज है अथवा उस पर न्यायालय में विवाद लम्बित है।

भूमि विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआती स्तर पर इन्हें अक्सर ‘सिविल विवाद’ मान लिया जाता है जबकि कई मामलों में बाद की जांच से सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और जालसाजी के तत्व सामने आते हैं। यही कारण है कि अनेक मामलों में वर्षों तक पीड़ित न्यायालयों और सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटते रहते हैं जबकि आरोपी कानूनी प्रक्रिया की जटिलताओं का लाभ उठाते रहते हैं।

विक्रम रावत प्रकरण ने भी यही सवाल खड़ा किया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यदि पहली जांच में ही बैंक लेन-देन, दस्तावेजों और परिस्थितियों की गम्भीरता से जांच होती तो शायद मामला इतने लम्बे समय तक नहीं खिंचता। बाद में दूसरी जांच में जिन तथ्यों के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई, वे यह संकेत देते हैं कि प्रारम्भिक जांच और अंतिम निष्कर्षों में स्पष्ट अंतर था। यही वजह है कि इस पूरे प्रकरण को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।

उत्तराखण्ड में लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों के बीच कानून के जानकार यह मांग भी उठा रहे हैं कि करोड़ों रुपए के भूमि सौदों के लिए दस्तावेजों का अनिवार्य डिजिटल सत्यापन, स्वामित्व का स्वतंत्र प्रमाणीकरण, गिरवी और मुकदमों की ऑनलाइन जानकारी तथा बड़े भूमि लेन-देन की विशेष निगरानी जैसी व्यवस्थाएं लागू की जानी चाहिए। उनका मानना है कि केवल एफआईआर दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं होगा बल्कि आर्थिक अपराधों की त्वरित जांच, समयबद्ध अभियोजन और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई ही ऐसे संगठित भूमि फर्जीवाड़ों पर प्रभावी अंकुश लगा सकती है।

विक्रम रावत का मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन इसने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि यदि करोड़ों रुपए के कथित लेन-देन, दो पुलिस जांच, एफआईआर और उच्च न्यायालय की टिप्पणियों के बाद भी कार्रवाई को लेकर सवाल बने रहें तो आम नागरिकों का भूमि कारोबार और कानून व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहेगा। उत्तराखण्ड में बढ़ते लैंड फ्राॅड के मामलों के बीच यह प्रश्न अब केवल एक व्यक्ति के न्याय का नहीं बल्कि पूरे भूमि प्रशासन तंत्र की विश्वसनीयता का बन चुका है।

बात अपनी-अपनी

राजकुमार यादव और हरीश यादव से मेरी जान- पहचान एक कारोबारी के तौर पर पहले से थी। इन दोनों ने मुझे पुरूकुल में 25 बीघा लैंड के बारे में बताया और कहा कि साईं इंफ्रा की यह जमीन है जिसे बेचना चहते हैं और इसको बेचने के लिए कम्पनी ने उन्हें अधिकृत किया हुआ है। हमारा सौदा 50 लाख रुपए प्रति बीघा का तय हुआ जिसका मैंने बैंक खाते में भुगतान कर दिया। मैंने करोड़ों रुपए इन लोगों को दे दिए लेकिन जमीन की रजिस्ट्री नहीं करवाई गई। मैंने एसएसपी देहरादून को शिकायत की जिस पर सीओ मसूरी ने जांच की जिसमें जांच के दौरान राजकुमार यादव और अन्यों ने मेरे ऊपर झूठा आरोप लगाया कि कोई तमिलनाडु की बिंडमील कम्पनी के लिए ही मैंने जमीन खरीदी है और भुगतान भी बिंडमील के नाम पर किया है जबकि मेरे द्वारा किए गए सभी भुगतान बैंक खाते में किए गए हैं जिसमें कोई बिंडमील कम्पनी का वजूद ही नहीं था। सीओ मसूरी ने मेरे द्वारा दिए गए तथ्यों को नकार दिया और जांच में इस मामले को सिविल का बताकर मामला रफा-दफा कर दिया। फिर मैंने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन और प्रधानमंत्री कार्यालय तक इस मामले की शिकायत की लेकिन मुझे कोई राहत नहीं मिली। जब सरकार और पुलिस मेरी बात नहीं सुन रही थी तो मैं बुरी तरह से हताश हो गया जिस पर मैंने आत्महत्या करने जैसा कदम उठाने का वीडियो सोशल मीडिया में डाल दिया। इस पर एसएसपी देहरादून ने तुरंत इस मामले की जांच एसपी सिटी को दी जिसमें जांच की गई और बिंडमील कम्पनी का झूठा आरोप तो हटाया ही और जांच में मेरे साथ धोखाधड़ी का मामला सही पाया गया। इसके बाद सभी आठों आरोपियों के खिलाफ राजपुर थाने में मुकदमा दर्ज किया गया लेकिन फिर भी पुलिस ने आरोपियों पर कोई कार्यवाही नहीं की और उनको हाईकोर्ट से अंतरिम जमानत मिल गई। मैं भी इस मामले में हाईकोर्ट गया और सुनवाई हुई जिसमें हाईकोर्ट के जज साहब ने आरोपियों की अपील को खारिज कर ढाई लाख का जुर्माना भी लगा दिया और इस मामले में पूर्व में दिए गए सभी आदेशों को भी रद्द कर दिया जिसमें अंतरिम जमानत का ओदश भी शामिल है। जब जमानत ही रद्द हो गई तो कैसे आरोपी बाहर खुला घूम रहे हैं। पुलिस की इस मामले में मिलीभगत है और पुलिस जान-बूझकर इस मामले में कार्यवाही नहीं कर रही है। मुझ पर समझौता करने का दबाव भी बनाया जा रहा है।
विक्रम राणा, पीड़ित कारोबारी

हम तो शुरू से ही कह रहे हैं कि जब से भाजपा सरकार आई है तब से प्रदेश की कानून व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो चुकी है। सरकार अपने आप काम नहीं कर रही है, सरकार को अधिकारी चला रहे हैं। सरकार में इतनी भी हिम्मत नहीं है कि वह नकारा और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही कर सके। प्रदेश में जमीनों की लूट मची हुई है। तीरथ सिंह रावत जी जो कि भाजपा के ही नेता हैं, सांसद रहे हैं। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं, के नजदीकी रिश्तेदार सगे भांजे के साथ करोड़ों की ठगी हो जाती है जिस पर हाईकोर्ट कार्यवाही का आदेश देता है लेकिन पुलिस कार्यवाही नहीं कर रही है। इसका तो एक ही अर्थ निकलता है कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था और शासन नाम की कोई चीज बची ही नहीं है। जब एक पूर्व मुख्यमंत्री के रिश्तेदार को न्याय नहीं मिल पा रहा है तो आम आदमी की क्या हालत होगी, यह अच्छी तरह से समझा जा सकता है।
गणेश गोदियाल, अध्यक्ष, प्रदेश कांग्रेस कमेटी उत्तराखण्ड

पुरूकुल स्थित विवादित भूखंड

You may also like