गत् पखवाड़े नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) की राजनीति विज्ञान की एक पुस्तक में शामिल अध्याय जिसमें न्यायपालिका की जवाबदेही, पारदर्शिता और सम्भावित भ्रष्टाचार पर चर्चा की गई, को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक के प्रकाशन, पुनर्मुद्रण और प्रसार पर रोक लगाने की दिशा में सख्त टिप्पणियां की। अदालत ने इसे न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित करने वाला विषय बताते हुए केंद्र सरकार को इस मामले की जांच के लिए कहा।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यदि इस प्रकार की सामग्री को अनियंत्रित रूप से प्रसारित होने दिया गया तो यह न्यायपालिका की साख को सार्वजनिक दृष्टि में कमजोर कर सकता है। अदालत ने सम्बंधित अधिकारियों को नोटिस भी जारी किए और यह भी संकेत दिया कि जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
मामला यहीं नहीं रुका। यह विषय केंद्र सरकार के शीर्ष तक जा पहुंचा है। प्रधानमंत्री ने कैबिनेट बैठक में यह प्रश्न उठाया कि पाठ्य-पुस्तकों की सामग्री की निगरानी कौन कर रहा है? उन्होंने इस प्रकरण पर नाराजगी व्यक्त करते हुए जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता पर बल दिया। केंद्रीय शिक्षा मंत्री द्वारा यह कहा गया कि न्यायपालिका के प्रति सरकार का पूर्ण सम्मान है और यदि कोई त्रुटि हुई है तो उसे सुधारा जाएगा तथा सम्बंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। विवाद के बढ़ने के बाद, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग ने सम्बंधित पुस्तकों की आगे की छपाई और वितरण पर रोक लगा दी तथा पहले से वितरित प्रतियों को वापस मंगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। साथ ही पुस्तक के उस अध्याय को हटाने का निर्णय भी लिया गया। इस प्रकार, एक शैक्षणिक अध्याय से प्रारम्भ हुआ विवाद संवैधानिक संस्थाओं के बीच संवेदनशील विमर्श का विषय बन गया।
मेरी समझ से विद्यालयी शिक्षा का लक्ष्य केवल संस्थाओं का गुणगान करना नहीं बल्कि विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच विकसित करना है। लोकतंत्र में संस्थाएं मनुष्यों द्वारा संचालित होती हैं और जहां मनुष्य हैं वहां त्रुटि की सम्भावना भी होती है। प्रश्न उठता है यदि छात्र संसद में भ्रष्टाचार पर चर्चा कर सकते हैं, प्रशासनिक घोटालों का अध्ययन कर सकते हैं तो न्यायपालिका के संदर्भ में यह विमर्श क्यों वर्जित हो? एनसीईआरटी के इस अध्याय का मूल प्रश्न यही था कि क्या न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार सम्भव है? और यदि हां तो उसकी जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जाती है?
स्मरण रहे भारतीय न्यायपालिका ने कई ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से संविधान की आत्मा को संरक्षित किया है। मौलिक अधिकारों की व्याख्या, आपातकालीन अतिक्रमणों की समीक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा में इसकी भूमिका केंद्रीय रही है। इसी कारण न्यायपालिका को ‘संविधान का संरक्षक’ कहा जाता है। परंतु क्या यह स्थिति उसे प्रश्नों से मुक्त कर देती है? लोकतंत्र में किसी भी संस्था की शक्ति उसकी पारदर्शिता और उत्तरदायित्व से आती है, न कि आलोचना से बचने की प्रवृत्ति से।
भारतीय न्यायपालिका भीतर सब कुछ ठीक नहीं है इसके कई प्रमाण मौजूद हैं। भ्रष्टाचार की दीमक लोकतंत्र के इस स्तम्भ को भी अपनी चपेट में ले चुकी है। 1990 के दशक में न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी के खिलाफ भ्रष्टाचार के गम्भीर मामले सामने आए थे। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उच्च न्यायाधीश रहते उन पर वित्तीय अनियमितताओं की जांच हेतु एक समिति गठित की गई जिसने आरोपों को सही पाया। तब तक वे सुप्रीम कोर्ट के जज बन चुके थे। उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया लोकसभा में शुरू की गई थी लेकिन कांग्रेस द्वारा समर्थन न दिए जाने चलते यह प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया था। संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया पर राजनीतिक समीकरणों के कारण पारित नहीं हो सका। यह पहली बार था जब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नैतिकता पर खुली बहस हुई। 2011 में राज्यसभा ने कोलकाता हाईकोर्ट के न्यायाधीश सौमित्र सेन के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव पारित किया। आरोप भ्रष्टाचार का था। लोकसभा में मतदान से पूर्व उन्होंने इस्तीफा दे दिया। सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी. डी. दिनाकरन पर भूमि घोटाले और सम्पत्ति सम्बंधी आरोपों के चलते 2011 में महाभियोग प्रक्रिया प्रारम्भ हुई, अंततः उन्होंने इस्तीफा दे दिया। गत् वर्ष 14 मार्च के दिन दिल्ली हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के यहां करोड़ों की नकदी मिलने का मामला सामने आया। उनके खिलाफ महाभियोग चलना तय माना जा रहा है। यशवंत वर्मा पर वित्तीय अनियमितताओं के गम्भीर आरोप हैं।
ये उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि न्यायपालिका पूर्णतः आरोपमुक्त संस्था नहीं रही है। सबसे गम्भीर आरोप स्वयं सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत पर लगे हैं। जनवरी 2019 में ‘दि कारवां’ (The Caravan) में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट में न्यायमूर्ति सूर्यकांत पर गम्भीर आरोपों का उल्लेख किया गया था। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ये आरोप मीडिया रिपोर्टों में प्रकाशित थे, किसी न्यायिक निर्णय द्वारा सिद्ध अपराध नहीं है किंतु महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि ऐसे आरोप सार्वजनिक विमर्श और न्यायिक रिकाॅर्ड का हिस्सा बने तो क्या उन पर चर्चा वर्जित होनी चाहिए?
भारत में उच्च न्यायपालिका की नियुक्ति ‘काॅलेजियम प्रणाली’ के माध्यम से होती है। समय-समय पर इसकी पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रश्न उठे हैं। यदि शिकायतें लम्बित रहें और पदोन्नति हो तो सार्वजनिक विमर्श स्वाभाविक है। न्यायपालिका से जुड़े हालिया विवादों, चाहे वे महाभियोग प्रक्रियाएं हों या अन्य आरोप, ने यह दिखाया है कि संस्थागत गरिमा और जवाबदेही के बीच संतुलन आसान नहीं है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस अध्याय पर कड़ा रुख अपनाना इस असहजता को दर्शाता है। प्रधानमंत्री तक मामला पहुंचना यह संकेत देता है कि विषय राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी गम्भीर माना जा रहा है।
इस मुद्दे पर पूर्व एनसीईआरटी निदेशक प्रो. जे.एस. राजपूत का कहना उचित है कि ‘‘छात्र समाज की चर्चाओं का हिस्सा होते हैं और उन्हें वास्तविक मुद्दों से दूर नहीं रखा जाना चाहिए, शिक्षा की मूल भावना को रेखांकित करता है। यदि घरों में, मीडिया में और सार्वजनिक मंचों पर न्यायपालिका की भूमिका और उसके विवादों पर चर्चा हो रही है तो पाठ्य-पुस्तकें मौन क्यों रहें?’’ वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण का पूरा वक्तव्य इस बहस को और स्पष्ट करता है। उन्होंने सोशल मीडिया में जारी पोस्ट में कहा है कि ‘‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सर्वोच्च न्यायालय और कुछ वरिष्ठ वकीलों ने एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका पर जो नया अध्याय जोड़ा गया है, जिसमें यह कहा गया है कि भ्रष्टाचार न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों में से एक है उस पर आपत्ति जताई।
न्यायपालिका में पर्याप्त भ्रष्टाचार है, जिसे वादकारी तीव्र रूप से देखते और महसूस करते हैं। 2007 में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने पाया था कि जनता की धारणा के अनुसार न्यायपालिका दूसरा सबसे भ्रष्ट संस्थान है। सर्वोच्च न्यायालय के कई सेवानिवृत्त न्यायाधीश भी न्यायिक भ्रष्टाचार पर बोल चुके हैं। इस विषय पर किसी भी चर्चा को दबाने की कोशिश केवल जनता के बीच न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की धारणा को और बढ़ाएगी।’’
अब जब सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है और मामला प्रधानमंत्री स्तर तक पहुंच चुका है, यह स्पष्ट है कि यह विवाद साधारण शैक्षणिक असहमति नहीं रह गया। यह संवैधानिक संस्थाओं की संवेदनशीलता, शिक्षा की दिशा और लोकतांत्रिक विमर्श की सीमा, तीनों से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।
इतिहास, महाभियोग प्रक्रियाएं, मीडिया रिपोर्ट और वर्तमान घटनाक्रम, सभी यह संकेत देते हैं कि न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी हुई है। ऐसे में यदि पाठ्यपुस्तक यह प्रश्न उठाती है कि ‘‘क्या न्यायपालिका में भ्रष्टाचार सम्भव है?’’ तो यह लोकतंत्र का स्वाभाविक प्रश्न है। संस्था की वास्तविक शक्ति उसकी आलोचना सहने की क्षमता में है। विश्वास मौन से नहीं, पारदर्शिता से जन्म लेता है और यदि लोकतंत्र को जीवित रखना है तो प्रश्न पूछने का अधिकार सुरक्षित रखना होगा, फिर प्रश्न न्यायपालिका से ही क्यों न हो। हालांकि यह भी कटु सत्य है कि वर्तमान में हालात बेहद खराब हो चले हैं और अब जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में ‘आंखों की शर्म’ कहा जाता है, उसका कोई अर्थ रही नहीं गया है। भ्रष्टाचार को हमारे समाज ने शिष्टाचार मान स्वीकार लिया है। सच यह भी बेहद कटु है लेकिन सच है कि हम सभी हर दृष्टि से स्वयं भ्रष्ट हो चले हैं इसलिए भले ही लाख प्रश्न पूछे जाएं, हो-हल्ला मचे, होने बदलने वाला कछ है नहीं। तब तक, जब तक व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव की बयार न बहे। यह बयार केवल और केवल क्रांति के मार्ग से ही आ सकती है।
