हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी कलह खुलकर सामने आती दिखाई दे रही है। ताजा विवाद तब शुरू हुआ जब पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने सांसद कल्याण बनर्जी को लोकसभा में पार्टी का ‘चीफ व्हिप’ नियुक्त कर दिया। इस फैसले से पार्टी की कई महिला सांसद नाराज बताई जा रही हैं। सबसे मुखर विरोध महुआ मोइत्रा की ओर से सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक मोइत्रा समेत कई नेताओं का मानना है कि पार्टी नेतृत्व लगातार कुछ खास नेताओं को तरजीह दे रहा है जबकि चुनावी हार की जिम्मेदारी तय करने के बजाय पुराने चेहरों को ही मजबूत किया जा रहा है। स्थिति तब और गम्भीर हो गई जब कालीघाट में आयोजित समीक्षा बैठक से कई चर्चित सांसद और वरिष्ठ नेता दूरी बनाते नजर आए। राजनीतिक गलियारों में इसे पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मौन विरोध के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस भी अब टीएमसी की इस अंदरूनी लड़ाई पर नजर बनाए हुए हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व फिलहाल डैमेज कंट्रोल में जुट गया है। सूत्रों के अनुसार विभिन्न जिलों में हार के कारणों की जांच के लिए ‘फैक्ट फाइंडिंग कमेटियां’ बनाई जा रही हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल समितियां बनाकर बढ़ते असंतोष को रोका जा सकेगा? राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या टीएमसी में बड़ी बगावत या टूट हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ममता बनर्जी जल्द संगठनात्मक संतुलन नहीं साध पाईं तो टीएमसी में बड़े स्तर पर टूट या बगावत की स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे में आने वाले महीनों में बंगाल की राजनीति और ज्यादा दिलचस्प होने के संकेत मिल रहे हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। पार्टी की कमान जब से सुनेत्रा पवार के हाथों में आई है तभी से संगठन के भीतर बड़े बदलावों और वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों में लगातार यह चर्चा चल रही है कि पार्टी के कई पुराने और प्रभावशाली चेहरों की भूमिका सीमित की जा रही है। सबसे ज्यादा चर्चा दो बड़े नेता सुनील तटकरे और प्रफुल पटेल को लेकर हो रही है। कहा जा रहा है कि संगठन में नई टीम तैयार करने की कवायद के बीच इन दोनों नेताओं को धीरे-धीरे किनारे किया जा रहा है। हाल ही में जारी नई पदाधिकारियों की सूची में प्रफुल्ल पटेल का नाम प्रमुख रूप से सामने नहीं आया वहीं सुनील तटकरे को भी प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी नहीं मिली। इसके बाद से ही पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चाएं और तेज हो गईं। इसी बीच बीते 12 मई को महाराष्ट्र की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम देखने को मिला। सुनील तटकरे अचानक मुम्बई स्थित शरद पवार के ‘सिल्वर ओक’ आवास पर उनसे मिलने पहुंचे। दिलचस्प बात यह रही कि उसी दिन प्रफुल पटेल ने भी शरद पवार से मुलाकात की, वहीं रोहित पवार का बयान भी काफी चर्चा में है। उन्होंने दावा किया कि सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल अपने समर्थक विधायकों के साथ भाजपा का दामन थाम सकते हैं। हालांकि इस तरह की अटकलों पर अभी तक किसी नेता की ओर से खुलकर प्रतिक्रिया नहीं आई है लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चाएं लगातार तेज हैं। इन मुलाकातों और बयानबाजी ने प्रदेश की राजनीतिक हलकों में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल उठने लगे हैं कि क्या एनसीपी के दोनों गुटों के भीतर कोई बड़ा राजनीतिक दांव-पेच चल रहा है? क्या एनसीपी में सब कुछ ठीक नहीं है? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि महाराष्ट्र की राजनीति में एनसीपी पहले ही दो धड़ों में बंट चुकी है। ऐसे में यदि पार्टी के भीतर असंतोष और बढ़ता है तो आने वाले समय में बड़े राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में सुनेत्रा पवार क्या कोई बड़ा राजनीतिक कदम उठाती हैं या फिर पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी को शांत करने के लिए संगठन में नया संतुलन बनाया जाता है। फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में इतना जरूर साफ दिख रहा है कि एनसीपी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 21 मई को हुई केंद्रीय मंत्रिपरिषद की अहम बैठक के बाद दिल्ली के सत्ता गलियारों में राजनीतिक अटकलों का दौर तेज हो गया है। एक तरफ अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज संकट जैसे वैश्विक मुद्दों पर सरकार की रणनीतिक तैयारी की चर्चा है तो दूसरी ओर केंद्र सरकार और भाजपा संगठन में बड़े फेरबदल की सम्भावनाएं भी जोर पकड़ रही हैं। मोदी सरकार 3.0 के दो वर्ष पूरे होने वाले हैं। 9 जून 2024 को लगातार तीसरी बार सत्ता सम्भालने वाली भाजपा अब अपने अगले राजनीतिक चरण की तैयारी में जुटी दिखाई दे रही है। यही वजह है कि जून के दूसरे सप्ताह में सम्भावित कैबिनेट विस्तार और संगठनात्मक बदलाव की चर्चाएं तेज हो गई हैं। इन अटकलों की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि पश्चिम बंगाल और असम समेत कई राज्यों के चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं और अब भाजपा की नजर 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों पर है। हाल ही में हुए योगी मंत्रिमंडल विस्तार को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिससे संकेत मिलते हैं कि भाजपा पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुकी है। फिलहाल केंद्रीय मंत्रिपरिषद में 72 सदस्य हैं जबकि संवैधानिक रूप से 81 मंत्री बनाए जा सकते हैं। ऐसे में नए चेहरों की एंट्री और कुछ मंत्रियों की जिम्मेदारियों में बदलाव लगभग तय माना जा रहा है। सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने पर भी पार्टी का खास फोकस रहने की चर्चा है। माना जा रहा है कि पार्टी के युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम में अनुभवी नेताओं के साथ युवा चेहरों को भी बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। राष्ट्रीय महासचिव स्तर पर भी नए चेहरों को मौका देकर राज्यों के नेताओं को राष्ट्रीय राजनीति के लिए तैयार करने की रणनीति पर काम चल रहा है। सूत्रों के मुताबिक भाजपा मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में संगठनात्मक संतुलन साधने की तैयारी कर रही है। महिला नेताओं और युवा चेहरों को अधिक प्रतिनिधित्व दिए जाने की संभावना भी जताई जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा में संभावित फेरबदल केवल प्रशासनिक कवायद नहीं बल्कि लंबी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। पार्टी अगले दशक की राजनीति को ध्यान में रखते हुए नए नेतृत्व को तैयार करने और संगठन को अधिक आक्रामक चुनावी मशीन में बदलने की दिशा में काम कर रही है। अब सबकी नजर जून महीने पर टिकी है, जब यह साफ हो सकेगा कि सत्ता और संगठन में बदलाव महज अटकलें हैं या फिर भाजपा वास्तव में बड़ी राजनीतिक सर्जरी की तैयारी कर चुकी है।