पार्टी में अनुशासन और नीति के साथ राजनीति का पुरजोर समर्थन करने वाली भाजपा का चेहरा-मोहरा अब समय के साथ बदलता जा रहा है। जिस तरह से आगामी
लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा की तरफ से तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है उसे देखकर ऐसा लगने लगा है कि भाजपा अब ‘चाणक्य नीति’ पर उतर आयी
है यानि ‘युद्ध का सिर्फ एक ही नियम होता है, शत्रु की पराजय’। भाजपा में चाणक्य के रूप में विख्यात हो चुके अमित शाह की नयी रणनीति उदाहरण के तौर पर पेश की जा सकती है।

भाजपा इस बार के लोकसभा चुनाव में नयी रणनीति के साथ चुनाव मैदान में नजर आयेगी। पूर्व की भांति इस बार की रणनीति भी अमित शाह के दिशा-निर्देशों पर तैयार की गयी है। खासतौर से यूपी की 80 लोकसभा सीटों पर एक बार फिर से इतिहास दोहराना पार्टी का प्रमुख मकसद है। भाजपाई चाणक्य की नयी रणनीति के तहत पार्टी इस बार दलित और पिछड़ों के सहारे मैदान में नजर आयेगी क्योंकि पार्टी दिग्गजों को इस बात का अहसास हो चुका है कि इस बार देश की लगभग 80 प्रतिशत ‘हिन्दू’ आबादी पर  इस बार न तो राम मन्दिर निर्माण का आश्वासन काम आने वाला है और न ही बेरोजगारों को रोजगार देने जैसे शगूफे काम आयेंगे। रही बात मुसलमानों की तो भले ही शिया वर्ग का कुछ हिस्सा भाजपा में आस्था जताने की बात कर रहा हो लेकिन अधिकतर शियाओं की आबादी आज भी भाजपा की प्रबल विरोधी है। सुन्नी तो पहले से ही भाजपा को अछूत मानता आया है। अब बचा दलित और पिछड़ा वर्ग। हालांकि यह वर्ग भी बसपा और सपा का समर्थक माना जाता है लेकिन इस वर्ग को भाजपा की तरफ मोड़ना मुस्लिम वोट बैंक की भांति इतना मुश्किल नही है। विगत लोकसभा चुनाव और विगत वर्ष सम्पन्न हुए यूपी विधानसभा चुनाव में इस वोट बैंक का भाजपा की तरफ झुकाव देखा जा चुका है। प्रश्न यह उठता है कि यदि विगत लोकसभा और यूपी के विधानसभा चुनाव में दलित और पिछड़ा वर्ग भाजपा के साथ था तो इस बार भाजपा को अपनी रणनीति सिर्फ दलित और पिछड़ों को लेकर क्यों बनानी पड़ रही है? जवाब सीधा है, हाल ही में सम्पन्न हुए उप चुनावों में भाजपा को मिली करारी मात ने उसे इस बात का अहसास करा दिया है कि जिस दलित वर्ग ने पिछले आम चुनावों में उसका साथ दिया था वह अब उससे दूर छिटक चुका है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि दलित और पिछड़ा वर्ग ही ऐसा वोट बैंक है जो हिन्दुओं की नाराजगी की भरपायी कर सकता है। शायद यही वह वजह है जिसने भाजपा हाई कमान को नयी रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरने के लिए विवश कर दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने स्वयं चुनाव की बागडोर अपने हाथों में ली है और वे इसी हफ्ते से यूपी में चुनावी रणनीति को अमली जामा पहनाना शुरु कर देंगे। अमित शाह लोकसभा चुनाव सम्पन्न होने तक लगातार प्रत्येक महीने यूपी में दो बार प्रवास करेंगे। इससे पहले वे संगठन के अहम पदों पर पिछड़ों और दलितों को बिठाने का कार्य करेंगे ताकि रणनीति को हवा देते समय व्यवधान की संभावना काफी कम हो। हालांकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के इस फैसले को लेकर यूपी भाजपा में अभी से मनमुटाव नजर आने लगा है लेकिन अमित शाह के लिए सबसे पहले पार्टी की जीत सुनिश्चित
करनी है लिहाजा उन्हें यूपी भाजपा में मनमुटाव को लेकर कोई गिला-शिकवा नहीं और न ही वे ध्यान देना चाहते हैं।

प्रदेश भाजपा के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता का दावा है कि यूपी में नए प्रभारी के रूप में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भूपेन्द्र यादव नजर आ सकते हैं। ऐसा इसलिए ताकि यूपी की राजनीति में पिछड़ों की भूमिका का अधिक से अधिक लाभ उठाया जा सके। मौजूदा ओम प्रकाश माथुर के स्थान पर भूपेन्द्र यादव को लाए जाने का दूसरा बड़ा कारण यह है कि ओम प्रकाश माथुर विगत वर्ष हुए यूपी विधानसभा चुनाव के बाद न तो राजधानी लखनऊ स्थित पार्टी कार्यालय में ही नजर आए और न ही उनकी गतिविधियां ही पार्टी हित में नजर आयीं। गौरतलब है कि श्री माथुर पार्टी में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं। हालांकि अभी उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाए जाने का कोई विचार नहीं है लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में उन्हें कोई दूसरी जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। भाजपा की इस चाणक्य नीति का दूसरा सबसे बड़ा कारण है सपा-बसपा का गठजोड़, जिसने हाल ही में सम्पन्न हुए उप चुनाव में भाजपा को चैंका दिया है। यूपी भाजपा के लोग भी यही मान रहे हैं कि यदि यूपी में सपा-बसपा गठबन्धन की काट नहीं निकाली गयी तो निश्चित तौर पर इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा को चैंकाने वाले परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।

भाजपा ने रणनीति के तहत सपा-बसपा के बागियों को भी पार्टी में शामिल करने की योजना बनायी है। प्रदेश स्तर के नेताओें की मानें तो बहुत जल्द सपा-बसपा के कई चर्चित चेहरे शर्तों के साथ भाजपा में नजर आयेंगे। यानी भाजपा इस बार विभीषणों के सहारे भी अपने प्रतिद्वंदियों को मात देने का मन बना चुकी है। चर्चा को आधार मानें तो सपा के कुछ बड़े नेता स्वयं पाला बदलकर यूपी की राजनीति में ट्विस्ट ला सकते हैं। समाजवादी पार्टी के ये वह नेता हैं जो हाल ही में यादव परिवार के बीच हुए घमासान के बाद पार्टी में असहज महसूस कर रहे हैं। इनमें से कुछ चेहरे ऐसे भी हैं जो जिनके बारे में दावे के साथ कहा जा सकता है कि वे सपा के लिए मुसीबत का सबब बन सकते हैं। भाजपा के निशाने पर खासतौर से वे नेता भी हैं जिन्हें अखिलेश की अगुवाई में टिकट कटने का अंदेशा है। चूंकि इस बार सपा और बसपा गठबन्धन के साथ मैदान में उतरने वाले हैं तो निश्चित तौर पर सपा के कई दिग्गजों का पत्ता साफ होने वाला है। वे कौन लोग हैं जिनका पत्ता साफ होने वाला है? भाजपा की तरफ से इसकी जानकारी युद्धस्तर पर जुटायी जा रही है ताकि समय रहते ऐसे नेताओं का लाभ उठाया जा सके। यही हाल बसपा का भी है। कई बड़े नेता इस बार दूसरे दलों में अपनी संभावना तलाश रहे हैं। जाहिर है इसका फायदा भी भाजपा उठायेगी।

भाजपा ने हाल ही कि दिनों में कई ऐसी नीतियांे को अमल में लाना शुरु किया है जिससे दलितों और पिछड़ों के बीच यह संदेश पहुंच जाए कि भाजपा ही अब उनका एकमात्र सहारा है। इस वर्ग को लाभ पहुंचाने की गरज से सरकार ने एक पांच सदस्यीय पैनल तैयार किया है। इतना ही नहीं हाई कमान के निर्देश पर निगम, आयोग और बोर्डों के खाली पड़े पदों पर दलितों और पिछड़ी जाति के लोगों को बिठाना शुरु कर दिया है। इस बात की पुष्टि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र नाथ पाण्डेय स्वयं करते हैं। वे कहते हैं कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के निर्देश पर नामित पदों में से 50 फीसदी पर ओबीसी, 15 फीसदी दलित और शेष 35 फीसदी पदों पर अगड़ी जातियों को बिठाने का  फैसला लिया गया है।

साफ जाहिर है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा पूरी तरह से चाणक्य नीति के साथ ही चुनाव मैदान में नजर आयेगी। भाजपा की यह रणनीति कितनी कारगर साबित होती है? यह तो चुनाव परिणाम ही तय करेंगे लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा के चाणक्य की यह नीति यदि काम कर गयी तो निश्चित तौर पर यूपी में एक बार फिर से भाजपा की बल्ले-बल्ले तय है।

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