ऊधमसिंह नगर में काशीपुर के पैंगा गांव का किसान सुखवंत सिंह अब जीवित नहीं है लेकिन उसकी मौत से पहले रिकाॅर्ड किया गया फेसबुक लाइव वीडियो आज पूरे सिस्टम के लिए कठघरे में खड़ा करने का बयान बन चुका है। 10-11 जनवरी 2026 की रात, हल्द्वानी के थाना काठगोदाम के गौलापार क्षेत्र के एक होटल में खुद को गोली मारने से पहले सुखवंत सिंह ने जिन आरोपों को सार्वजनिक किया, उन्होंने उत्तराखण्ड की पुलिस, प्रशासन और भूमि व्यवस्था की नींव हिला दी है। जमीन व्यवसाय से जुड़े प्रभावशाली लोगों ने न केवल सुखवंत को आर्थिक रूप से तोड़ा बल्कि जब वह न्याय के लिए थाने और अधिकारियों के चक्कर काटता रहा, तब भी उसे सुनवाई नहीं मिली। सबसे बड़ा सवाल क्या यह केवल व्यक्तिगत हताशा में लिया गया फैसला था या फिर एक किसान को सिस्टम ने इतना मजबूर किया कि आत्महत्या ही आखिरी रास्ता बचा?


‘मैं और मेरी बीवी और बच्चे मर चुके हैं, हमारे शरीर के अंग बेचकर एसपी और पुलिसकर्मी रुपए रख लें’

यह किसी फिल्म का डायलााॅग नहीं बल्कि जनपद ऊधमसिंह नगर के पैंगा गांव के किसान सुखवंत सिंह के सुसाइड नोट में लिखी गई पंक्तियां हैं जिसे सिस्टम ने मौत के मुंह पर जाने के लिए मजबूर कर दिया। अपने सुसाइड नोट में सुखवंत सिंह ने पुलिस अधिकारियों सहित 27 लोगों पर आरोप लगाए हैं कि उसकी कई गुहारों के बावजूद पुलिस ने कोई करवाई नहीं की। इस घटना के बाद सरकार हरकत में आई और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने तत्काल जांच का आदेश देते हुए, कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत को जांच अधिकारी निुयक्त कर दिया। अगले दिन आईटीआई थाने के थानाध्यक्ष कुंदन सिंह रौतेला और पैंगा पुलिस चैकी प्रभारी प्रकाश बिष्ट को निलम्बित कर पूरी चैकी को लाइन हाजिर भी कर दिया और फिर सभी पुलिस कर्मियों का तबादला गढ़वाल रेंज में कर दिया। इस आत्महत्या कांड के बाद पुलिस महकमा भी सक्रिय हुआ आईजी कुमाऊं रिद्धिम अग्रवाल ने बागेश्वर के पुलिस अधीक्षक की अध्यक्षता में एक एसआईटी गठित कर दी, वहीं ऊधमसिंह नगर के एसएसपी ने भी एसआईटी गठित कर दी लेकिन शासन ने इन एसआईटी को भंग कर पुलिस महानिरीक्षक निलेश आनंद भरणे के नेतृत्व में नई एसआईटी गठित की है जिसमें ऊधमसिंह नगर से सम्बंधित किसी भी पुलिसकर्मी को शामिल नहीं किया गया है। सुखवंत आत्महत्या कांड ने सिस्टम की कार्य प्रणाली पर सवाल तो खड़े किए ही लेकिन इस घटना के कई राजनीतिक पहलुओं के साथ-साथ कई ऐसे सवालों को भी जन्म दिया है जो चिंता का सबब  होने चाहिए। सबसे पहले की क्या दिवंगत सुखवंत पर प्रताड़ना का स्तर इतना ज्यादा हो गया था और उसका विश्वास सिस्टम से इतना उठ गया था कि उसे लिखना पड़ा ‘क्योंकि हमारा कोई अलग देश नहीं है और अगर सिख अधिकारी होते तो मुझे न्याय मिल जाता’? और साथ ही मणिकांत मिश्रा के खिलाफ उठती आवाजों को मैदान पहाड़ की विभाजन के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। फेसबुक पर अमित तोमर लिखते हैं कि ‘‘पहले तो सिर्फ हम मैदानी लोगों को क्षेत्रवाद का सामना करना पड़ता था और अब सीधा डीएम और एसपी को टारगेट कर रहे हैं। हिस्ट्रीशीटर बहुत सम्मान हुआ। अब इनका इलाज करेंगे रुविरुद्ध।’’ तो क्या सुखवंत सिंह के बहाने यह लड़ाई क्षेत्रवाद के विभाजन की ओर तब्दील होती जा रही है। कोई लिखता है कि रुद्रप्रयाग के डीएम को इस लिए निशाना बनाया गया क्योंकि वह राजस्थान से हैं और जैन हैं।

 
गोली और सिस्टम पर सवाल

सुखवंत सिंह ने वीडियो में दावा किया कि वह करीब चार करोड़ रुपए की जमीन धोखाधड़ी का शिकार हुआ। आरोप है कि सुखवंत को जमीन दिलाने के बहाने कुछ लोगों ने उससे साढ़े चार करोड़ की रकम ले ली लेकिन जिस जमीन का सौदा कराया गया उसे जमीन की कीमत 50 लाख रुपए भी नहीं थी। जब उसने इसकी शिकायत पहले पंगा चैकी पंगा थाने में की जो वहां सुनवाई नहीं हुई तो वह ऊधमसिंह नगर के एसपी मणिकांत मिश्रा से मिला मणिकांत मिश्रा ने अपने अधीनों से इसको देखने को तो कहा लेकिन उसके बाद न प्रियंका चैकी के प्रभारी और न ही कोतवाल आईटीआई ने इस ओर ध्यान दिया। बार-बार मामले को जांचाधीन बता कर टाल दिया गया। जमीन व्यवसाय से जुड़े प्रभावशाली लोगों ने न केवल सुखवंत को आर्थिक रूप से तोड़ा बल्कि जब वह न्याय के लिए थाने और अधिकारियों के चक्कर काटता रहा, तब भी उसे सुनवाई नहीं मिली। सबसे बड़ा सवाल क्या यह केवल व्यक्तिगत हताशा में लिया गया फैसला था या फिर एक किसान को सिस्टम ने इतना मजबूर किया कि आत्महत्या ही आखिरी रास्ता बचा?

गौरतलब है कि पुलिस ने शुरुआत में इसे आत्महत्या का मामला माना लेकिन वीडियो सामने आने के बाद यह मामला सिर्फ आत्महत्या तक सीमित नहीं रह गया है। 26 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई जिनमें स्थानीय लोग, कथित भू-माफिया और पुलिस कर्मियों के नाम शामिल हैं। यहीं से यह मामला एक मौत से आगे, सिस्टम की जवाबदेही का प्रश्न बन गया है। सबसे संवेदनशील पहलू जमीन का लेन-देन है। जमीन सौदे में बिचैलियों की भूमिका अहम थी लेकिन इस घटना को लेकर पुलिस और मुख्यमंत्री धामी पर सबसे पहला हमला उन्हीं की पार्टी के गदरपुर से विधायक अरविंद पाण्डे ने बोला। तब कांग्रेस और किसान संगठनों ने सीबीआई जांच की मांग तेज कर दी। सरकार ने मजिस्ट्रेट और एसआईटी जांच पर ज्यादा भरोसा जताया है जबकि सुखवंत का परिवार सीबीआई जांच की मांग कर रहा है। इस बीच उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने 26 आरोपियों की गिरफ्तारी पर अस्थायी रोक लगाते हुए सरकार से स्टेटस रिपोर्ट तलब की है। अगली सुनवाई 15 अप्रैल 2026 को होनी है। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने आरोपियों की गिरफ्तारी पर तो रोक लगा दी लेकिन एफआईआर रद्द करने की मांग ठुकरा दी। इसका मतलब हाईकोर्ट ने माना कि मामला गम्भीर है।

दरअसल उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद जिस प्रकार तराई में उद्योगों की स्थापना हुई, सिडकुल तरीके औद्योगिक आस्थान अस्तित्व में आए तो तराई में ही क्या पूरे उत्तराखण्ड में जमीन के दामों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। भू-माफियाओं के एक बड़े वर्ग का जन्म हुआ जिसको राजनेताओं का तो संरक्षण प्राप्त था ही, साथ ही पुलिस और प्रशासन के निचले से लेकर उच्च अधिकारी तक का संरक्षण इनको प्राप्त रहा। पैसे की चकाचैंध में पुलिस अपने मूल कर्तव्य कानून और व्यवस्था को छोड़कर भू-माफियाओं के विवादों को सुलझाने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगी है जबकि जमीन के मामले सुलझाना पुलिस का काम नहीं है। अब जबकि भूमि विवाद के कई नए मामले सुखवंत आत्महत्या कांड के बाद सामने आने लगे हैं, उससे लगता है कि भानुमती का पिटारा खुलता जा रहा है, जिसमें राजनेता भी लपेटे में आने लगे हैं।
 
दो गुटों में बंटी भाजपा

सुखवंत कांड के बाद जिस प्रकार राजनीतिक हलचल हुई, अरविंद पांडे जिस प्रकार खुल कर सामने आए उससे लगता है कि भाजपा के अंदर राजनीतिक हिसाब-किताब चुकाने का दौर शुरू हो चुका है। ताज्जुब की बात है एक एसएसपी के नाम पर भाजपा दो फाड़ नजर आती है। भाजपा का एक बड़ा वर्ग एसएसपी मणिकांत मिश्रा के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। पार्टी के नेता एसएसपी ऊधमसिंह नगर  मणिकांत मिश्रा के पक्ष या विपक्ष में जिस तरह लामबंद होते दिख रहे हैं वो भाजपा की जमीनी हालत को बयां करता है। ऐसे में गदरपुर विधायक अरविंद पाण्डे हाशिए में जाते दिखाई दे रहे हैं। तराई में सिखों की बड़ी आबादी है जो चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाती है। ऊधमसिंह नगर जिला मुख्यमंत्री धामी का गृह जिला भी है, वे नहीं चाहेंगे कि इस जिले में भाजपा की स्थिति कमजोर हो। इसी के चलते उन्होंने सुखवंत आत्महत्या कांड पर तीव्र और सख्त निर्णय लिए। ऐसे में भाजपा के अंतर्विरोध मुख्यमंत्री के निर्णय को कमजोर कर सकते हैं। सिर्फ भाजपा नेता ही क्यों, तराई का एक वर्ग एसएसपी मणिकांत मिश्रा के पक्ष में खड़ा दिखाई दे रहा है, उससे लगता है कि पीड़ित सुखवंत सिंह नहीं मणिकांत मिश्रा हैं। ष्प् ैजंदक ूपजी डंदपांदज डपेीतंष् जैसी सोशियल मीडिया में चल रही पोस्ट में जब मणिकांत मिश्रा को मैदानी होने के नाते प्रताड़ित दिखाने का प्रयास किया जाता है तो फिर निलम्बित एस आई कुंदन सिंह रौतेला सहित अन्य पुलिसकर्मी, जो आरोपी हैं, तो उनके लिए क्या कहा जाय कि ये पर्वतीय क्षेत्र के लोग मैदान के लोगों द्वारा प्रताड़ित हुए हैं? इसी प्रकार सुखवंत सिंह द्वारा हाईकोर्ट को लिखे गए पत्र जो सोशियल मीडिया में वायरल हो रहा है, में यह कहना कि ‘‘अगर हमारा अलग देश होता, उसके जज साहब, पुलिस, सभी अधिकारी, कर्मचारी सिख होते तो हमको अपने देश में जरूर इंसाफ मिलता’’ ये किस ओर इशारा है? क्या ये बातें सुखवंत की सोच थी या फिर इसके पीछे किसी और का दिमाग था? क्या अलगाव की कहीं कोई चिंगारी अभी बची है? सुखवंत सिंह की मौत केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जहां जमीन सबसे बड़ा हथियार है, न्याय सबसे कठिन और आम किसान सबसे कमजोर कड़ी अब फैसला अदालत और जांच एजेंसियों को करना है कि यह मामला फाइलों में दफन होगा या फिर एक नजीर बनेगा।
 
पुलिस व्यवस्था में झोल ही झोल

इन सब घटनाओं के बीच पुलिस विभाग के अंदर चल रहे कुछ झोल-खुल कर भी सामने आए हैं। बागेश्वर एसपी से एसीआर प्रतिकूल एंट्री पाए उपनिरीक्षक कुंदन सिंह रौतेला को काशीपुर में आईटीआई जैसा महत्वपूर्ण और संवेदनशील थाना कैसे सौंप दिया गया जबकि थानाध्यक्ष सामान्य तौर पर इंस्पेक्टर स्तर के पुलिसकर्मी ही होते हैं। साथ ही जब कुंदन सिंह रौतेला बागेश्वर से ऊधमसिंह नगर पनिशमेंट पर ही भेजे गए थे तो विभाग द्वारा प्रतिकूल प्रविष्टि पाए एसआई कुंदन सिंह रौतेला पर एसएसपी ऊधमसिंह नगर मणिकांत मिश्रा की इतनी कृपा क्यों रही? जांच के लिए बनाई गई पुलिस महानिरीक्षक ऋद्धिम अग्रवाल और एसएसपी ऊधमसिंह नगर द्वारा बनाई गई एसआईटी को पुलिस मुख्यालय ने दरकिनार कर पुलिस महानिरीक्षक नीलेश आनंद भरणे के नेतृत्व में एक नई एसआईटी का गठन किया है। जिसमें ऊधमसिंह नगर के किसी भी पुलिसकर्मी को शामिल नहीं किया गया है, यहां तक की सुखवंत सिंह के परिवार को ऊधमसिंह नगर जिले से बाहर की पुलिस की सुरक्षा दी गई है।
 
यह मामला उधम सिंह नगर जिले से हटकर काठगोदाम थाने के सुपुर्द कर दिया गया है, जहां सारी पूछताछ की कार्यवाहियां चलेंगी। सवाल है कि मुख्यालय क्या एसपी मणिकांत मिश्रा पर विश्वास नहीं करता? तो जब सारे पुलिसकर्मी जो कि आरोपी थे उनको ऊधमसिंह नगर से ही नहीं कुमाऊं रेंज से बाहर कर दिया तो मणिकांत मिश्रा को एसएसपी ऊधमसिंह नगर बनाए रखना कई सवाल खड़े करता है। एक दिलचस्प बात और देखने में आई है पुलिस महानिदेशक दीपम सेठ ने एक नई एसआईटी गठित की है जो यह जांच करेगी की कुंदन सिंह रौतेला की चरित्र पंजिका सार्वजनिक कैसे हुई क्योंकि यह गोपनीय होती है। क्या पुलिस महानिदेशक दीपम सेठ को यह पता नहीं था कि जो व्यक्ति थाने के इंचार्ज के रूप में अपनी अहर्ताएं पूरी नहीं करता उसे थानाध्यक्ष बनाकर बैठा दिया गया? कुमाऊं में कई ऐसे मामले हैं जहां पर अर्हता पूरी न करने वाले पुलिसकर्मी भी थानाध्यक्ष बनकर बैठे हुए हैं। क्या दीपम सेठ इसकी भी जांच करवाएंगे? सुखवंत सिंह द्वारा अपने आत्महत्या की वीडियो 9 जनवरी 2026 को सोशल मीडिया पर डाली गई थी और उसने आत्महत्या जैसा कदम 11 और 12 जनवरी की रात को उठाया था तो हमेशा सोशल मीडिया चेक करते रहने वाली पुलिस ने क्या सुखवंत सिंह का वीडियो सोशल मीडिया पर नहीं देखा या फिर वह सरकार विरोधी खबरों वाले सोशल मीडिया अकाउंट पर ही नजर डालते हैं? और उन्हें हटाने के लिए लोगों पर दबाव डालते हैं?

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