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दिल्ली की सत्ता का बदलता परिदृश्य : कैग रिपोर्ट से उठते सवाल

दिल्ली के राजनीतिक परिदृश्य में हाल ही में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। लम्बे समय से सत्ता में रही आम आदमी पार्टी की सरकार को अपदस्थ कर भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली की सत्ता सम्भाल ली है। नवगठित भाजपा सरकार ने विधानसभा में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की 14 लम्बित रिपोर्टें प्रस्तुत की हैं, जिनमें पूर्ववर्ती केजरीवाल सरकार की आबकारी नीति और मुख्यमंत्री आवास से जुड़े मुद्दों पर गम्भीर आरोप लगाए गए हैं। इन रिपोर्ट के सामने आने के बाद केजरीवाल और उनकी पार्टी बैक फुट में आ गई है

दिल्ली की राजनीतिक परिदृश्य में हाल ही में हुए महत्वपूर्ण बदलाव बात अब सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और पूर्ववर्ती केजरीवाल सरकार के समय में हुए कठिन भ्रष्टाचार को सामने लाने में जुट गई है। लम्बे समय से सत्ता में रही आम आदमी पार्टी की सरकार के बाद भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली की सत्ता सम्भाली है। नवगठित भाजपा सरकार ने विधानसभा में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की 14 लम्बित रिपोर्टें प्रस्तुत की हैं जिनमें पूर्ववर्ती केजरीवाल सरकार की आबकारी नीति और मुख्यमंत्री आवास से जुड़े मुद्दों पर गम्भीर आरोप लगाए गए हैं। कैग की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब आप बैक फुट में आ चुकी है। इन रिपोर्टों के सार्वजनिक होने से दिल्ली की राजनीति में हलचल मच गई है। भाजपा ने केजरीवाल सरकार पर भ्रष्टाचार और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के गग्भीर आरोप लगाए हैं, जबकि आप ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हुए खारिज किया है। आगामी दिनों में इन मुद्दों पर और भी राजनीतिक बहस और कानूनी कार्रवाइयों की सम्भावना है जो दिल्ली की राजनीतिक दिशा को प्रभावित कर सकती हैं।

आबकारी नीति पर कैग रिपोर्ट

कैग की रिपोर्ट में 2021-22 की आबकारी नीति के कारण दिल्ली सरकार को 2002 करोड़ रुपए के राजस्व नुकसान का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार नई शराब नीति कमजोर थी और लाइसेंस प्रक्रिया में गड़बड़ियां थीं। विशेषज्ञ पैनल द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों को तत्कालीन उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने नजरअंदाज कर दिया था। इससे सरकार को भारी वित्तीय नुकसान हुआ। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आबकारी नीति के तहत, नाॅन-कन्फर्मिंग वार्डों (जहां व्यावसायिक गतिविधियां अनुमत नहीं हैं) में शराब की दुकानें नहीं खोली गईं, जिससे 941.53 करोड़ रुपए का सम्भावित राजस्व नुकसान हुआ। यदि इन क्षेत्रों में दुकानें स्थापित की जातीं तो सरकारी आय में वृद्धि होती और अवैध शराब बिक्री पर रोक लगती। इतना ही नहीं कैग ने पाया है कि कई लाइसेंसधारकों द्वारा अपने लाइसेंस सरेंडर करने के बावजूद, सरकार ने उन्हें पुनः नीलाम नहीं किया, जिससे 890 करोड़ रुपए का सम्भावित राजस्व नुकसान हुआ।

कैग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार ने जोनल लाइसेंसधारकों को 144 करोड़ रुपए की शुल्क माफी प्रदान की, जबकि आबकारी विभाग ने ऐसा न करने की सलाह दी थी। कैग ने यह भी पाया कि कई लाइसेंसधारकों से 27 करोड़ रुपए की सुरक्षा जमा राशि वसूलने में विफलता रही, जिससे सरकारी राजस्व को नुकसान हुआ। कैग ने यह भी पाया कि दिल्ली सरकार ने थोक विक्रेताओं का लाभ मार्जिन 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत कर दिया, जिससे सरकारी राजस्व में गिरावट आई। कैग ने दिल्ली आबकारी नियम, 2010 के नियम 35 के अनुसार एक ही व्यक्ति या कम्पनी को अलग-अलग प्रकार के लाइसेंस (थोक, खुदरा, होटल-रेस्तरां) नहीं दिए जा सकते। हालांकि कुछ कम्पनियों को एक साथ कई प्रकार के लाइसेंस जारी किए गए।

मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता की कमी का उल्लेख करते हुए कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि थोक विक्रेताओं को शराब की फैक्ट्री से निकलने वाली कीमत तय करने की स्वतंत्रता दी गई, जिससे कीमतों में हेर-फेर हुआ और सरकार को उत्पाद शुल्क के रूप में नुकसान हुआ। कैग ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी कैबिनेट की मंजूरी के बिना नई आबकारी नीति 2021-22 में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए जाने तथा उपराज्यपाल की राय के बिना किए जाने पर की है जिसके चलते कैग के अनुसार सरकारी खजाने को नुकसान हुआ।

शीश महल विवाद

पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा बनाया गया आलीशान शीश महल

कैग की एक अन्य रिपोर्ट में मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास, जिसे भाजपा ने ‘शीश महल’ करार दिया है, के नवीनीकरण में अनियमितताओं का उल्लेख है। शुरुआत में इस परियोजना के लिए 7.61 करोड़ रुपए मंजूर किए गए थे, लेकिन अप्रैल 2022 तक यह लागत बढ़कर 33.66 करोड़ रुपए हो गई, जो 342 प्रतिशत की वृद्धि है। भाजपा और कांग्रेस ने इस खर्च को सार्वजनिक धन का दुरुपयोग बताते हुए केजरीवाल पर निशाना साधा है। आम आदमी के हितों के संरक्षण के नाम पर सत्ता में आई केजरीवाल सरकार ने 96 लाख रुपए मुख्यमंत्री के आवास पर खर्च किए, माॅडर्न रसोई के लिए 39 लाख रुपए, माॅडर्न टीवी कंसोल के लिए 20 लाख रुपए तो जिम उपकरणों पर 18 लाख रुपए, सिल्क कालीन पर 16 लाख, दीवारों के लिए मार्बल स्टोन के लिए 66 लाख खर्च किए जाने की बात कैग की रिपोर्ट में कही गई है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि नवीनीकरण के दौरान 4.8 लाख रुपए का मिनी बार स्थापित किया गया।

विपक्ष हमलावर

दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता आतिशी मार्लेना

भाजपा ने आरोप लगाया है कि वास्तविक खर्च 75 से 80 करोड़ रुपए तक हो सकता है, क्योंकि कुछ सामानों के गायब होने की रिपोर्ट भी सामने आई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘जब दिल्ली के लोग कोविड-19 महामारी से जूझ रहे थे, तब दिल्ली सरकार अपने ‘शीश महल’ के निर्माण में व्यस्त थी।’ कैग की रिपोर्ट में न केवल अत्यधिक खर्च का उल्लेख है, बल्कि टेंडर प्रक्रिया और अनुमोदन में पारदर्शिता की कमी पर भी सवाल उठाए गए हैं।

भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने अरविंद केजरीवाल पर वीवीआईपी संस्कृति अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि वह वीवीआईपी कल्चर के प्रतीक बन गए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री आवास के नवीनीकरण में 12 करोड़ रुपए के पर्दों और 1 करोड़ रुपए के मार्बल्स के उपयोग को फिजूलखर्ची बताया।

आप की प्रतिक्रिया

 

आम आदमी पार्टी की प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़

आम आदमी पार्टी की मुख्य प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने भाजपा के आरोपों को झूठा प्रचार करार दिया है। उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री आवास में किसी नियम का उल्लंघन हुआ है, तो मीडिया को अंदर जाने से क्यों रोका गया? उन्होंने भाजपा को सकारात्मक राजनीति करने की सलाह देते हुए प्रधानमंत्री के ‘राजमहल’ की जांच की मांग की, जिसमें 2750 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। बहरहाल दिल्ली की जनता और राजनीतिक विश्लेषक इन घटनाक्रमों पर करीबी नजर रखे हुए हैं, क्योंकि ये न केवल वर्तमान सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली को प्रभावित करेंगे, बल्कि आगामी चुनावों और राजनीतिक गठबंधनों पर भी असर डाल सकते हैं।

पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं

 

आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता मयंक गांधी

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जुड़े लेखक, राजनीतिक विश्लेषक और सक्रिय वक्ता मयंक गांधी ने 2018 में ही आप और उसके नेता अरविन्द केजरीवाल कि नियत और नीति पर अपनी पुस्तक ‘आप एंड डाउनः एन इनसाइडर स्टोरी ऑफ द आम आदमी पार्टी’ में आम आदमी पार्टी के भीतर की राजनीति, सत्ता की भूख और नेतृत्व की निर्णय प्रक्रियाओं की आलोचनात्मक समीक्षा कर दीं थी स इस पुस्तक में उन्होंने आम आदमी पार्टी और अन्ना आंदोलन के दौरान हुई अंदरूनी राजनीति, फैसले और गुटबाजी पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। मयंक गांधी का आरोप है कि अरविंद केजरीवाल ने अन्ना आंदोलन के बाद सत्ता पाने के लिए रणनीतिक रूप से आम आदमी पार्टी बनाई। न्होंने लिखा है कि केजरीवाल ने आंदोलन को एक राजनीतिक दल में बदलने के लिए कार्यकर्ताओं पर दबाव बनाया, जबकि अन्ना हजारे इसके खिलाफ थे। पस्तक में बताया गया है कि आप के भीतर लोकतंत्र नाममात्र का था। उन्होंने दावा किया कि महत्वपूर्ण फैसले केवल अरविंद केजरीवाल और उनके करीबी सहयोगियों द्वारा लिए जाते थे। पार्टी में अलग राय रखने वालों को किनारे कर दिया जाता था।

मयंक गांधी का कहना है कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी से बाहर निकालने का फैसला पार्टी के नेताओं ने नहीं, बल्कि सिर्फ अरविंद केजरीवाल ने किया था। उन्होंने दावा किया कि इस फैसले पर पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पारदर्शिता नहीं थी। इस मुद्दे पर उन्होंने खुद बैठक में आपत्ति जताई थी, जिसके कारण उन्हें भी पार्टी से अलग कर दिया गया। किताब में आरोप लगाया गया है कि आप की फंडिंग को लेकर कई अनसुलझे सवाल हैं। मयंक गांधी के मुताबिक पार्टी को मिलने वाले चंदे और उसके इस्तेमाल में पारदर्शिता नहीं थी। उन्होंने दावा किया कि आप ने सत्ता में आने के लिए उन्हीं पारम्परिक राजनीतिक हथकंडों का इस्तेमाल किया, जिनका वह विरोध करने का दावा करती थी। जनता के बीच ईमानदारी और पारदर्शिता की जो छवि बनाई गई थी, वह अंदरूनी स्तर पर सच्चाई से बहुत दूर थी।

यह भी आरोप लगाया कि आप के शीर्ष नेतृत्व ने जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की। पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता के साथ ही, नए अवसरवादियों को ज्यादा तरजीह दी गई, जबकि पुराने कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया गया। मयंक गांधी ने यह भी लिखा है कि जब उन्होंने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के निष्कासन का विरोध किया तो उनके खिलाफ भी षड्यंत्र रचे गए और उन्हें पार्टी से अलग कर दिया गया। उन्होंने दावा किया कि उन पर दबाव बनाया गया कि वे पार्टी लाइन से हटकर कोई बयान न दें।

मयंक गांधी की यह पुस्तक आप और अरविंद केजरीवाल की राजनीति का एक इनसाइडर व्यू देती है। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे एक आदर्शवादी आंदोलन धीरे-धीरे सत्ता और राजनीति के चक्रव्यूह में फंसकर अपनी मूल विचारधारा से भटक गया।

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