नैनीताल उच्च न्यायालय में दाखिल एक जनहित याचिका ने यह भयावह सच सामने ला दिया है कि उत्तराखण्ड की चाइल्ड वेलफेयर से जुड़ी संस्थाओं में दिव्यांग बच्चों को सुरक्षा और शिक्षा नहीं, बल्कि प्रताड़ना, शोषण और उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। हल्द्वानी के ‘नेशनल इंस्टीट्यूट फाॅर ब्लाइंड’ से लेकर रामनगर के ‘जेनेट शीड राॅबर्ट्स स्कूल’ तक, हर जगह बच्चों की पीड़ा गवाही देती है कि राज्य का निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल है। पूर्व में हाईकोर्ट ने इसे गम्भीर संवैधानिक उल्लंघन मानते हुए राज्य सरकार और संस्थाओं पर कड़े निर्देश दिए थे लेकिन अदालत के आदेश कागजों तक ही रह गए
नैनीताल हाईकोर्ट में एक बेहद गम्भीर मामला सामने आया है, जिसमें याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि उत्तराखण्ड राज्य के विभिन्न बाल देखभाल संस्थानों, विशेषकर दृष्टिबाधित और दिव्यांग बच्चों की संस्थाओं में लगातार शोषण और उत्पीड़न की घटनाएं हो रही हैं। इन मामलों को लेकर उत्तराखण्ड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (यूकेएसएलएसए) ने नैनीताल उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है। इस याचिका में विस्तार से इस सच को सामने रखा गया है कि बच्चों के संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन हो रहा है और जिम्मेदार अधिकारी अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफल रहे हैं।
याचिका के अनुसार, नैनीताल के गौलापार स्थित नेशनल एसोसिएशन फाॅर ब्लाइंड (एनएबी) द्वारा संचालित बाल देखभाल संस्थान में दृष्टिबाधित और अन्य दिव्यांग बच्चों को प्रताड़ना का शिकार बनाया जा रहा है। एक गुप्त शिकायत के बाद जब जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, नैनीताल ने जांच की तो यह तथ्य सामने आया कि संस्था का अधीक्षक भूपेंद्र सिंह बिष्ट बच्चों को पीटता है, गाली-गलौज करता है और उन्हें बार-बार निकाल देने की धमकी देता है। संस्था का वार्डन विपिन भट्ट भी बच्चों से मारपीट करता है। कई बच्चों ने गवाही दी है कि उन्हें भोजन में घटिया और एक्सपायर सामग्री दी जाती है और शिकायत करने पर सजा दी जाती है। संस्था की अध्यक्ष सविता लाहोटी पर भी आरोप है कि उन्होंने बच्चों को शिकायत करने से रोकने के लिए डांट-फटकार लगाई और निष्कासन की धमकी दी।
बच्चों के बयान इस पूरे मामले को और भी भयावह बनाते हैं। एक 16 वर्षीय दृष्टिबाधित बालिका ने कहा कि ‘‘भूपेंद्र सर अच्छे इंसान नहीं हैं। यदि हम शिकायत करें तो वे गुस्सा होकर कहते हैं कि सहो या निकलो। मेरी एक सहेली को वास्तव में घर भेज दिया गया।’’ एक अन्य 15 वर्षीय लड़के ने कहा कि ‘‘भूपेंद्र सर ने मुझे लाठी से पीटा और विरोध करने पर मेरे साथी को संस्था से निकाल दिया गया। हमें एक्सपायर सामान खाने को दिया जाता है।’’ वहीं, एक 13 वर्षीय बच्चे ने कहा कि उसे बिना कारण पीटा गया और अब वह यहां रहना नहीं चाहता। कई बच्चों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें परीक्षा के दौरान लिखने वालों से जान-बूझकर गलत उत्तर लिखवाए जाते हैं।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि एक छात्रा, जिसने घर पर भाई द्वारा यौन शोषण की शिकायत संस्था को दी, उसकी मां के दबाव में संस्था ने कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई। गौरतलब है कि यह संस्था पूर्व में भी विवादों में रही है। वर्ष 2023 में इस संस्था के तत्कालीन अध्यक्ष श्याम धनक पर एक दृष्टिबाधित लड़की ने यौन शोषण का आरोप लगाया था। वे आज भी मुकदमे का सामना कर रहे हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से अब भी संस्था की प्रबंधन समिति में शामिल हैं।
बात अपनी-अपनी
मेरा इस विषय में इतना ही कहना है कि वहां अगर कोई कमियां हैं, उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाएगा। जो भी उच्च न्यायालय या विधिक सेवा प्राधिकरण हमें निर्देश देंगे, हम उसके हिसाब से काम करेंगे। हमारी जितनी भी सहभागिता है एक एनजीओ में, वैसे तो वो एक एनजीओ है, लेकिन उसमें हमारी सहभागिता भी होती है। जितनी हमारी सहभागिता होगी और उसमें जैसा भी हाईकोर्ट हमें निर्देश देंगे या विधिक सेवा प्राधिकरण हमें निर्देश देंगे, हम शासन के माध्यम से उसको पूरा करने का प्रयास करेंगे और जो कमियां हैं, उनको दूर करने का प्रयास करेंगे। मेरी नैब संस्था अध्यक्ष व समिति के सदस्यों के साथ इस सम्बंध में शीघ्र ही एक बैठक प्रस्तावित है।
वर्षा आर्य, जिला प्रोबेशन अधिकारी, नैनीताल
मेरा मानना है कि सरकार के जो भी चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूट चल रहे हैं उनमें एक स्वतंत्र एजेंसी के माध्यम से जांच होनी चाहिए। दिव्यांग बच्चों के लिए सीसीई का जो फंड है, उसके जो नाॅम्र्स, उसकी जो गाइडलाइंस है उनका पालन होना चाहिए। जो स्वतंत्र एजेंसी जांच करेगी उसमें स्टेकहोल्डर हो, उनको जांच की अथाॅरिटी मिलनी चाहिए। अभिभावकों के संगठन को इसमें इन्वाॅल्व किया जाना चाहिए। जैसी उत्तराखण्ड में घटनाएं बढ़ रही हैं, यह देवभूमि के लिए शर्म की बात है। पूरे भारत में दिव्यांग बच्चों के साथ ऐसी घटनाओं का प्रतिशत उत्तराखण्ड में सबसे अधिक है और दिव्यांग बच्चों के साथ जो ऐसा व्यवहार हो रहा है, उसके लिए कहीं न कहीं सख्त कदम उठाने की जरूरत है। इन चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूट को एक सख्त अप्रूवल के बाद ही चलाने की अनुमति मिलनी चाहिए।
गोविंद सिंह मेहरा, स्पेशल चाइल्ड राईट एक्टिविस्ट एवं, सचिव ‘रोशनी सोसायटी’
मैं नैब का आजीवन सदस्य हूं लेकिन मुझे किसी भी मीटिंग में बुलाया नहीं जाता है। देखिए, जिन पर पाॅक्सो केस थे वो आज भी संस्था के जिम्मेदार पदों पर हैं। मैं तो संस्था की आंतरिक राजनीति का शिकार हो गया और बच्चों के माध्यम से मुझ पर ऐसे आरोप लगवाए गए जिनकी मैं अपने जीवन में कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था। वह सब मेरे अपने बच्चों की तरह थे। अब देखिए बच्चे परेशान हैं जो सुविधाएं हमने उनको दी थी वह तो अब नदारद हैं। हमारे समय में पढ़े हुए अधिकांश बच्चे अब नौकरी कर रहे हैं। कुछ सरकारी अध्यापक बन गए हैं, कोई रेलवे में हैं तो कोई बैंक में पीओ हैं। हमने 90 बच्चों को डीएलएड मुम्बई से करवाया था जिनमें से सीटेट परीक्षा पास करके 80 पर्सेंट लोग नौकरी कर रहे हैं। मैंने इस संस्था के बहुत शानदार भविष्य की कल्पना की थी लेकिन आंतरिक राजनीति ने मुझे ऐसे आरोप में फंसा दिया कि जो कभी होना नहीं चाहिए था, ऐसी राजनीति
संस्थाओं को बर्बाद कर देती है।
श्याम सिंह धानिक, पूर्व अध्यक्ष, नैब
मेरी जिम्मेदारी बच्चों की देखभाल की है। क्योंकि यहां दृष्टिबाधित बच्चे हैं, इसलिए हमारी जिम्मेदारियां और भी बढ़ जाती हैं। हमें बच्चों का विशेष ख्याल रखना पड़ता है। बच्चे इधर उधर भागे नहीं, खेल रहे हैं तो गिरे नहीं, आपस में लड़े नहीं। अगर बच्चे मानते नहीं हैं तो थोड़ा डांट-फटकार तो लगानी ही पड़ती है। अगर हम थोड़ा बहुत भी नहीं डाटेंगे तो बच्चे आपस में ही भिड़ जाते हैं और कहीं टकरा गए कुछ चोट लग गई तो जवाबदेही तो हमारी हुई ना। बच्चे आपस में लड़ेंगे तो उनको डांटना पड़ता है। 2023 की घटना के बाद बच्चों के मन का डर या कहें कि अनुशासन में रहने की भावना निकल चुकी है। हम यहां बच्चों की बेहतरी और देखभाल के लिए हैं। अब तो बच्चों को उनकी गलतियों पर रोकना टोकना भी हमारी शिकायत के लिए काफी है। ऐसे में बच्चों को अनुशासन में रहने को कहना भी मुश्किल हो गया है।
विपिन भट्ट, वार्डन, नैब, हल्द्वानी
मैं यहां जब 2023 में कुछ विवाद हुआ था उसके बाद यहां आया। उस वक्त कई एजेंसी और पुलिस-प्रशासन के अधिकारी संस्थान आए थे। उनके द्वारा बच्चों से कहा गया कि आपसे कोई भी कुछ कहता है तो आप डरना मत हमसे शिकायत करना। कुछ बच्चों ने उसे सकारात्मक रूप से न लेकर गलत तरीके से लिया। कुछ बच्चे अनुशासनहीनता करते हैं, जैसे स्कूल जाने से मना करना, कक्षा में नहीं जाना, टीचर्स का कहना नहीं मानना या ग्रुपिंग बनाकर बैठना। हम कुछ भी समझाने का प्रयास करते हैं तो बच्चे अब हमें ही धमकी देने लगे हैं कि आपकी शिकायत कर देंगे। हम डांठते जरूर हैं, मगर मारपीट का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। इतना जरूर कहा होगा कि अगर आप कहना नहीं मानेंगे तो आपके घर भेज देंगे। बच्चों की आड़ लेकर मेरे खिलाफ भी षड्यंत्र किया गया है ताकि कि मैं यहां से निकल जाऊं और बच्चों को मेरे खिलाफ भड़काया गया है। बच्चे हर छोटी-छोटी बात पर शिकायत करने की धमकी देते हैं। यहां तक कि ब्रश करने को कहने पर, क्लास में जाने को कहने पर, ग्रुपिंग न करने को कहने पर भी बच्चे शिकायत की धमकी देने लगे हैं। जहां तक अस्वस्थ होने, बच्चों को घर भेजने प्रश्न है, हम जबरन किसी को घर नहीं भेजते। अभिभावक की मांग और उनकी स्वीकृति पर ही बच्चे अपने घर जाते हैं।
भूपेंद्र सिंह बिष्ट, अधीक्षक, नैब, हल्द्वानी
इस संस्थान को एस्टेब्लिश करने में मेरी शुरुआत से भूमिका रही है। मेरा तो इन बच्चों से लगाव अपने बच्चों की तरह है। बच्चों की देखभाल के लिए हाउस मदर हैं जो उनका ख्याल रखती हैं। जो बच्चों के सुबह उठने से लेकर रात सोने और भोजन तक हर चीज का ख्याल रखती हैं। बच्चों द्वारा कुछ गलत करने पर अगर वो कुछ कहती हैं और वो मानते नहीं हैं तो उनको अगर वह डांटती हैं तो सर्वे के दौरान बच्चे शिकायत कर देते हैं। अब हम क्या करें आप ही बताइए। अनुशासन बनाए रखने के लिए बच्चों पर थोड़ी-बहुत सख्ती तो करनी पड़ेगी। लेकिन सख्ती का मतलब ये नहीं कि हमारे द्वारा मारपीट की जाती है या स्कूल से निकालने की धमकी दी जाती है। जब से 2023 वाला कांड हुआ है तब से बच्चे समझ बैठे हैं कि हम उनसे कुछ न कहें। बच्चों का व्यवहार ऐसा हो गया है कि उन्हें मनमानी करने दी जाए लेकिन उनसे कुछ कहा नहीं जाए। बताइए हम क्या करें और सर्वे के दौरान शिकायत कर देते हैं। नैनीताल के पब्लिक स्कूलों के हाॅस्टल में वह व्यवस्था नहीं होगी जो व्यवस्था और सुविधा हमारे यहां भोजन की है। एक बच्चा उद्दंड है उससे सारे बच्चे बिगड़ रहे हैं। अगर उसे डांटे नहीं तो क्या करें। हमारे यहां बच्चों का पूरी तरह से ख्याल रखा जाता है। बच्चों को डांटने और मारपीट का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। लेकिन हमारे अंदर और कुछ बाहर से ऐसे उलटे-सीधे मैसेज जा रहे हैं कि हम काम ना कर पाएं और संस्था का माहौल खराब हो। हम ईमानदारी से काम कर रहे हैं। हम बच्चों का भविष्य बनाना चाहते हैं, बिगाड़ना नहीं चाहते।
सविता लाहोटी, अध्यक्ष, नेशनल एसोसिएशन फाॅर ब्लाइंड, गौलापार

