हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए चुनाव हारने की घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं। 2022 में चरणजीत सिंह चन्नी अपनी दोनों सीटों से पराजित हुए, 2024 में नवीन पटनायक अपनी पारंपरिक सीट गंवा बैठे, 2026 में ममता बनर्जी और एम.के. स्टालिन को भी मुख्यमंत्री रहते हार का सामना करना पड़ा। इससे पहले 1971 में त्रिभुवन नारायण सिंह, 2009 में शिबू सोरेन और 2011 में बुद्धदेब भट्टाचार्य भी चुनाव हार चुके हैं। 2017 में प्रेम कुमार धूमल को भाजपा ने मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाया, पार्टी सत्ता में आ गई लेकिन धूमल स्वयं चुनाव हार गए। 2017 में हरीश रावत मुख्यमंत्री रहते चुनाव हारे तो 2012 में मुख्यमंत्री रहते भुवन चंद्र खड़ूड़ी भी चुनाव हार गए थे। ऐसे उदाहरणों ने सत्ता में बैठे मुख्यमंत्रियों के लिए अपनी चुनावी सीट के चयन को भी रणनीतिक प्रश्न बना दिया है। यही कारण है कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अगली चुनावी सीट को लेकर भी व्यापक मंथन चल रहा है। धामी 2022 में अपनी परम्परागत खटीमा सीट हारे और बाद में चम्पावत उपचुनाव जीतकर विधायक बने। अब यदि उनके लिए किसी अपेक्षाकृत सुरक्षित सीट की तलाश की चर्चा हो रही है तो इसे केवल स्थानीय राजनीतिक समीकरण नहीं बल्कि देशभर में उभर रहे उस नए चुनावी ट्रेंड के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए, जिसमें मुख्यमंत्री होना अब चुनावी जीत की गारंटी नहीं रह गई है

वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के चलते उत्तराखण्ड में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चली हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि फरवरी  माह में होने जा रहे अर्द्धकुम्भ के चलते विधानसभा चुनाव दीपावली के बाद नवम्बर में कराए जा सकते हैं। इन चर्चाओं के बीच सभी राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज भी कर दी हैं। संगठन के स्तर से अपने अनुषांगिक संगठनों के माध्यम के जरिए जहां भाजपा मतदाता तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, वहीं बिखरी हुई कांग्रेस अपने कुछ खास नेताओं के नेतृत्व में क्षेत्रीय सम्मेलनों के माध्यम से अपनी खोई साख पाने और भाजपा के मुकाबले खड़े होने की कोशिश कर रही है। इन सबके बीच सबसे अहम है राजनीतिक दलों द्वारा प्रत्याशियों का चयन। आंतरिक व गोपनीय सर्वे के जरिए भाजपा और कांग्रेस दावेदारों के दावों का वजन तौलने में जुटी हैं। नेता अपने लिए सबसे सुरक्षित सीट की तलाश में जुटे हैं। भाजपा नेतृत्व पुष्कर सिंह धामी के चेहरे के साथ चुनाव मैदान में उतरने का ऐलान कर ही चुकी है तो वहीं कांग्रेस नेतृत्व के मामले में अभी कशमकश की स्थिति से गुजर रही है। भाजपा भीतर भी एक प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी किस सीट से चुनाव लड़ेंगे इस पर संशय बरकरार है। शायद संशय होना लाजमी भी है क्योंकि उत्तराखण्ड में 2012 से 2022 तक और हालिया विधानसभा चुनावों में देखे गए ट्रेंड ने राजनीतिक पडितों को भी हैरत में डाला है।

2012 से उत्तराखण्ड के मतदाता ने एक ऐसी चुनावी परम्परा स्थापित की है, जिसने कई स्थापित मिथकों को तोड़ा है। 2012 के चुनाव में और उसके बाद जिसके नेतृत्व में भाजपा और कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल चुनाव लड़े  या कहें जिस चेहरे पर इन दलों ने भरोसा जताया उसी चेहरे को मतदाताओं ने नकार दिया। विडम्बना देखिए 2002, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों के बाद इन राजनीतिक दलों द्वारा मुख्यमंत्री के रूप में उन चेहरों को लाया गया जो विधानसभा चुनाव लड़े ही नहीं थे। उत्तराखण्ड के अब तक हुए 8 मुख्यमंत्रियों में से 5 ऐसे रहे जो मुख्यमंत्री बनने के बाद उपचुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचे। 2002 में पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत बाद कांग्रेस आलाकमान ने नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा जो बाद में रामनगर विधानसभा सीट से उपचुनाव जीते। 2007 में भुवन चन्द्र खण्डूड़ी को भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तराखण्ड की कमान सौंपी वो धूमाकोट से उपचुनाव लड़े और जीत दर्ज की। उस वक्त उत्तराखण्ड ने एक अप्रत्याशित दलबदल देखा जब धूमाकोट से कांग्रेस के विधायक लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) टीपीएस रावत ने भुवन चन्द्र खण्डूड़ी के लिए घूमाकोट सीट खाली कर दी। बाद में वो भुवन चन्द्र खण्डूड़ी द्वारा खाली की गई पौड़ी सीट से लोकसभा के लिए चुने गए। 2012 में भाजपा को शिकस्त देने में सफल रही कांग्रेस ने विजय बहुगुणा को उत्तराखण्ड की कमान सौंपी। इस बार झटका लगने की बारी भाजपा की थी। भाजपा के सितारगंज से विधायक किरन मंडल ने विजय बहुगुणा के लिए सीट खाली कर दी। विजय बहुगुणा सितारगंज से उपचुनाव जीतकर विधायक बने। 2014 में हरीश रावत मुख्यमंत्री बनने के बाद धारचूला से उपचुनाव लड़े। 2022 में खटीमा में मिली अप्रत्याशित हार के बाद पुष्कर सिंह धामी चम्पावत से उपचुनाव लड़कर जीते। इस तरह उत्तराखण्ड की पहली तीन निर्वाचित सरकारों के मुख्यमंत्री उपचुनाव जीत कर विधानसभा की दहलीज पर पहुंचे।
इससे स्पष्ट है कि 2012 के विधानसभा चुनाव से उत्तराखण्ड के मतदाता का मिजाज बदला है। 2012 से ही उत्तराखण्ड में राजनीतिक पार्टियों ने चेहरों को आगे कर चुनाव लड़ना शुरू किया था लेकिन उनके क्षेत्र के मतदाताओं ने उन्हें अपनी कसौटी पर खरा नहीं पाया। जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया उसे मतदाता ने खारिज कर दिया। 2012 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ‘खण्डूड़ी हैं जरूरी’ के नारे के साथ चुनाव में गई लेकिन खण्डूड़ी खुद कोटद्वार से चुनाव हार गए। 2017 का चुनाव कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत को चेहरा बनाकर ‘सबकी चाहत, हरीश रावत’ के नारे पर लड़ा। उस चुनाव में पार्टी 11 सीटों पर तो सिमटी ही, किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण से खुद हरीश रावत भी चुनाव हार गए। उधर 2017 के विधानसभा चुनाव में अजय भट्ट भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष दोनों थे और मुख्यमंत्री पद के सशक्त दावेदार भी। भट्ट के नेतृत्व में भाजपा ने 57 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत पाया लेकिन अजय भट्ट रानीखेत से खुद का चुनाव हार गए। अगर 2017 में अजय यह चुनाव न हारे होते तो शायद वो उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री होते। 2022 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चेहरे पर भाजपा चुनाव में गई, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने धामी ‘फ्लावर नहीं फायर है’ का नारा बुलंद किया था लेकिन 2022 में भी 2012 और 2017 दोहराया गया। भाजपा को बहुमत मिल गया मगर धामी खुद चुनाव हार गए। हालांकि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने उनकी इस हार को नजरअंदाज कर उन्हें उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री की गद्दी फिर सौंप दी। चम्पावत उपचुनाव में मिली भारी जीत ने सत्ता तो स्थिर की लेकिन एक सवाल जीवित रखा कि क्या धामी को लगातार ‘सुरक्षित सीट’ की जरूरत पड़ रही है? सवा चार वर्षों में पुष्कर सिंह धामी ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का भरपूर विश्वास तो अर्जित किया लेकिन मुख्यमंत्री धामी के लिए चुनौती बनी हुई है कि 2022 का दोहराव न हो और इसके लिए उन्हें दरकार है एक सुरक्षित सीट की जिससे वो बेफिक्र होकर चुनाव लड़ सकें। ‘फायर’ से ‘धाकड़ धामी’ और अब ‘धुरंधर धामी’ यदि सही में सुरक्षित सीट तलाश रहे हैं तो प्रश्न उठता है कि क्यों उन्हें सीट बदलने की जरूरत है। यदि एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री मौजूदा सीट छोड़कर नई सीट तलाशता है तो इसके दो राजनीति संदेश हो सकते हैं या तो पार्टी बेहद आक्रामक रणनीति बना रही है या मुख्यमंत्री अपनी चुनावी सुरक्षा को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी किस विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे इस बात की चर्चाओं के बीच कालाढूंगी, खटीमा, चम्पावत, गदरपुर जैसी सीटों का आंकलन इस रूप में किया जा रहा है कि सबसे सुरक्षित सीट उनके लिए कौन सी होगी? चम्पावत विधानसभा सीट जिसका प्रतिनिधित्व इस वक्त पुष्कर सिंह धामी कर रहे, में हालांकि ऊपरी तौर पर वो सुरक्षित जरूर देखे जा रहे हैं लेकिन इस जिले की पार्टी नगर पंचायत सीट पर जिस प्रकार एक निर्दलीय ने भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी को अध्यक्ष पद पर हरा दिया उससे संकेत बेहतर निकल कर नहीं आ रहे हैं। हालांकि भाजपा नेता सूरज प्रहरी का कहना है कि मुख्यमंत्री धामी के लिए चम्पावत सीट पर कोई खतरा नहीं है, वही सबसे बेहतर प्रत्याशी हैं और उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री के लिए कोई सुरक्षित सीट है तो वह चम्पावत ही है। दरअसल कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चुनाव क्षेत्र चम्पावत में भाजपा का हर नेता छोटा हो या बड़ा अपने को मुख्यमंत्री ही मानकर चल रहा है जिससे पार्टी के अंदर आंतरिक झगड़े बढ़े हैं। जिस कारण अंदरूनी स्तर पर चम्पावत भाजपा में एक बड़ा विभाजन है।
गौरतलब है कि 2022 में पुष्कर सिंह धामी अपनी पारम्परिक सीट खटीमा से चुनाव हार गए थे इसके बाद उन्होंने चम्पावत से उपचुनाव में रिकाॅर्ड मतों से जीत हासिल की थी। ऐसे में दोबारा सीट बदलने पर विपक्ष उन्हें असुरक्षित नेता के रूप में पेश कर सकता है और पलायन का विमर्श गढ़ सकता है। ऊधमसिंह नगर जिले की गदरपुर विधानसभा सीट वर्तमान में अरविंद पाण्डेय का क्षेत्र है जो यहां से लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं। हाल के दिनों में राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा उठी है कि क्या सीएम धामी गदरपुर से किस्मत आजमा सकते हैं। इन चर्चाओं को बल तब मिला जब अरविंद पांडे और पुष्कर सिंह धामी के बीच तल्ख संबंधों की बर्फ पिघलते दिखी। इस सीट पर सिख, बंगाली और ओबीसी मतदाताओं का अच्छा खासा प्रभाव है। हालांकि चम्पावत या खटीमा की तुलना में गदरपुर में धामी का सीधा व्यक्तिगत जुड़ाव कम रहा है लेकिन जिला ऊधमसिंह नगर (जो धामी का गृह जिला भी है) होने के नाते इसे उनके लिए एक विकल्प के रूप में देखा जाता रहा है। इस सम्भावना की कमजोर कड़ी अरविंद पाण्डेय हैं जिनकी मजबूत दावेदारी के बीच यहां बदलाव की सम्भावना केवल केंद्रीय नेतृत्व के विशेष रणनीतिक निर्णय पर ही निर्भर करेगी लेकिन एक सवाल यह भी है कि पुष्कर धामी के करीबी माने जाने वाले किच्छा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला ने अरविंद पाण्डेय पर 2022 के चुनाव में पुष्कर सिंह धामी और उन्हें हराने का आरोप लगाया था। क्या मुख्यमंत्री इस बात का जोखिम लेंगे कि वह अरविंद पाण्डेय की मजबूत पकड़ वाली सीट पर चुनाव लड़कर अपने को खतरे में डालें? भले ही वहां के चुनावी समीकरण कागजों में भाजपा के पक्ष में नजर आते हों। अब बात करते हैं खटीमा सीट की जो धामी की पारंपरिक राजनीतिक कर्मभूमि रही है। इस सीट से उनका पुराना भावनात्मक और राजनीतिक संबंध है और चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने क्षेत्र से निरंतर संपर्क बनाए रखा। क्षेत्र में उनका व्यक्तिगत नेटवर्क और वर्षों का जनसम्पर्क एक बड़ी ताकत है। यदि वे खटीमा लौटते हैं तो ‘घर वापसी’ का संदेश जा सकता है लेकिन यही सीट उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है। पिछला चुनाव हारना इस बात का संकेत था कि व्यक्तिगत
लोकप्रियता हमेशा जीत की गारंटी नहीं होती। स्थानीय नाराजगी, एंटी-इन्कम्बेंसी और पुराने समीकरण फिर चुनौती बन सकते हैं। भले ही खटीमा विधानसभा क्षेत्र में ऊपर से सब सामान्य नजर आता हो लेकिन पार्टी के अंदर उनके विरोधी अभी भी 2022 की तरह सक्रिय हैं। उत्तराखण्ड में भाजपा ऋषिकेश और कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्रों को पूरे प्रदेश में सबसे सुरक्षित यानी ‘ए’ ग्रेड की सीटों में शुमार करती है। कालाढूंगी विधानसभा सीट से सीएम धामी के चुनाव लड़ने की सम्भावनाओं को लेकर चर्चाएं खासी तेज हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री द्वारा इस क्षेत्र में 114 करोड़ रुपए से अधिक की विकास योजनाओं की सौगात देना और स्थानीय ‘घोड़ा लाइब्रेरी महोत्सव’ में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना इस बात का बड़ा संकेत माना जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए बड़ी धनराशि भी उपलब्ध कराई है। परिसीमन के बाद बनी कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र से बंशीधर भगत पहले विधायक चुने गए थे। उसके बाद 2017 और 2022 में उन्होंने बड़े अंतर से जीत हासिल की थी और हर चुनाव में उनकी जीत का अंतर बढ़ता ही चला गया था। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी यहां विकास कार्यों के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी काफी सक्रिय नजर आ रहे हैं।
कालाढूंगी और उसके आस-पास के पार्टी कार्यकर्ताओं को दायित्व देकर साधने की कोशिश की गई है। उसमें वो नेता भी शामिल हैं जो यहां से 2027 के विधानसभा चुनावों में दावेदारों की दौड़ में शामिल हैं। गत् दिनों मुख्यमंत्री धामी का कालाढूंगी विधानसभा से चुनाव लड़ चुके पूर्व कांग्रेसी महेश शर्मा के आवास में जाना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है। महेश शर्मा का कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में अच्छा-खासा प्रभाव है। पहाड़ और मैदान मिश्रित कालाढूंगी विधानसभा सीट राजनीतिक, जातीय और भौगोलिक पैमाने पर मुख्यमंत्री धामी के लिए सबसे सटीक सीट बैठती है। जिस प्रकार भाजपा का प्रतिबद्ध कैडर वोट कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में है उसमें भितरघात की संभावनाओं के लिए कोई खास जगह नहीं बचती है। हालांकि इस बीच देखने में आया है कि कालाढूंगी विधानसभा में बंशीधर भगत के विरोधी नेता सांसद अजय भट्ट की संगति में आजकल ज्यादा नजर आ रहे हैं। क्या ये भाजपा के अंदर बनता कोई नया समीकरण है। कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में नेताओं का एक तबका ऐसा भी है जिनके मुख्यमंत्री धामी से सहज संबंध नहीं रहे हैं। इनमें हल्द्वानी के मेयर गजराज बिष्ट प्रमुख हैं। गजराज बिष्ट लम्बे समय से कालाढूंगी विधानसभा से दावेदारी जता रहे हैं। विधायक बंशीधर भगत इस क्षेत्र में गहरी पैठ रखते हैं उन्हें साधना भी भाजपा के लिए जरूरी होगा। इस क्षेत्र की खासियत ये है कि भाजपा के दिग्गज इसी क्षेत्र में निवास करते हैं जिनमें सांसद अजय भट्ट, हल्द्वानी के मेयर गजराज बिष्ट, दायित्वधारी सुरेश भट्ट, जिला पंचायत अध्यक्ष दीपा दरम्वाल, भाजयुमो के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शशांक रावत सहित कई बड़े नेता शामिल हैं। फिलहाल मुख्यमंत्री धामी की कालाढूंगी सीट पर दिलचस्पी के चलते इसके आस-पास की सीटों पर भी राजनीतिक समीकरणों पर भी प्रभाव पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है।

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