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धुले दाग, अब होगा भाजपा पर वार

दिल्ली शराब नीति मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट से मिली बड़ी राहत के बाद आम आदमी पार्टी ने राजनीतिक आक्रामकता का बिगुल बजा दिया है। पार्टी का आरोप है कि जो नेता सत्ताधारी दल में शामिल हो जाते हैं उनके दाग धुल जाते हैं और जो विरोध में खड़े रहते हैं उन्हें जांच एजेंसियों के जरिए घेरा जाता है। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह सहित 23 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को ‘आप’ अब भाजपा के खिलाफ बड़े राजनीतिक अभियान में बदलने की तैयारी में है और इसका अगला पड़ाव होगा भाजपा का मजबूत गढ़ गुजरात


भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में एक व्यंग्यात्मक लेकिन व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द उभरा है ‘वाॅशिंग मशीन’। विपक्ष का आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी की इस कथित वाॅशिंग मशीन में जो प्रवेश कर जाता है उसके ऊपर लगे भ्रष्टाचार के दाग धुल जाते हैं और जो इसमें शामिल होने से इनकार करता है, उसके खिलाफ जांच एजेंसियों की कार्रवाई तेज हो जाती है। यह आरोप केवल एक राजनीतिक नारा नहीं बल्कि कई उदाहरणों के साथ बार-बार दोहराया गया विमर्श है।

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा कभी कांग्रेस में थे और उन पर भाजपा नेताओं ने गम्भीर आरोप लगाए थे लेकिन भाजपा में शामिल होने के बाद वही नेता पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए। महाराष्ट्र में अजित पवार पर स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा तीखे आरोप लगाए गए थे किंतु राजनीतिक समीकरण बदले और वे सत्ता के साथ आए तो राजनीतिक भाषा भी बदल गई। विपक्ष इन उदाहरणों को यह कहने के लिए इस्तेमाल करता रहा है कि सत्ता में शामिल होते ही दाग फीके पड़ जाते हैं।
 
इसी पृष्ठभूमि में दिल्ली की आबकारी नीति का मामला सामने आया। एक जन आंदोलन से निकली पार्टी, आम आदमी पार्टी ने जब राष्ट्रीय राजनीति में अपने कदम तेज किए और सत्ताधारी दल के साथ किसी प्रकार के समझौते से दूरी बनाई रखी, तब उसके शीर्ष नेतृत्व पर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई शुरू हुई।

2021 में लागू की गई नई आबकारी नीति को दिल्ली सरकार ने राजस्व बढ़ाने, अवैध बिक्री रोकने और लाइसेंसिंग प्रणाली को पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से लागू किया था लेकिन जल्द ही आरोप लगे कि नीति में ऐसे बदलाव किए गए जिनसे कुछ चुनिंदा कारोबारी समूहों को लाभ हुआ। उपराज्यपाल की सिफारिश पर सीबीआई जांच शुरू हुई और बाद में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) भी जांच में शामिल हो गई।

फरवरी 2023 में दिल्ली के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को गिरफ्तार किया गया था। वे उस समय आबकारी विभाग सम्भाल रहे थे। वे 530 दिन यानी लगभग पौने दो साल जेल में रहे। इसके बाद 4 अक्टूबर 2023 को राज्यसभा सांसद संजय सिंह को भी ईडी ने गिरफ्तार किया। 26 जून 2024 में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को हिरासत में लिया गया। 156 दिन जेल में रहे। इसके अलावा कई कारोबारी और अधिकारी भी जांच के दायरे में आए जिनमें तेलंगाना की नेता के. कविता का नाम भी प्रमुखता से सामने आया।

गिरफ्तारियों का सिलसिला लम्बा चला। आप ने इसे ‘राजनीतिक बदले की कार्रवाई’ बताया जबकि एजेंसियों ने कहा कि यह ठोस साक्ष्यों पर आधारित कार्रवाई है। संसद से लेकर सड़कों तक यह मुद्दा लगातार गरमाया रहा। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव के औजार के रूप में किया जा रहा है।

लम्बी सुनवाई और बहसों के बाद राउज एवेन्यू कोर्ट ने 27 फरवरी 2026 को अपना फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष व्यापक आपराधिक साजिश और कथित किकबैक के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक नीति निर्माण और आपराधिक षड्यंत्र के बीच स्पष्ट अंतर है। यदि नीति में खामियां हों तो यह अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं होता, जब तक कि आपराधिक मंशा और अवैध लाभ का ठोस प्रमाण न हो।

अदालत ने यह भी कहा कि प्रस्तुत किए गए साक्ष्य, गवाहों के बयान और वित्तीय दस्तावेज आरोपों की पुष्टि के लिए पर्याप्त नहीं हैं। आपराधिक न्याय प्रणाली में दोषसिद्धि के लिए उच्च मानक निर्धारित हैं और केवल राजनीतिक या परिस्थितिजन्य संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।

फैसले के बाद आम आदमी पार्टी ने इसे ‘सत्य की जीत’ बताया। पार्टी मुख्यालय में जश्न का माहौल है। नेताओं ने कहा कि वर्षों तक चले दुष्प्रचार का अंत हुआ है, वहीं भाजपा की ओर से कहा गया कि अदालत के निर्णय का सम्मान किया जाता है और आगे की कानूनी सम्भावनाओं पर विचार किया जाएगा। केजरीवाल फैसले के बाद प्रेस से मुखातिब हुए और रो तक पड़े।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला अब कानूनी दायरे से निकलकर पूरी तरह राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। आप इस फैसले को अपने नैरेटिव की पुष्टि के रूप में पेश कर रही है कि उसने सत्ता के दबाव के आगे झुकने से इनकार किया और अंततः अदालत ने उसे राहत दी।

अब पार्टी की नजर दिल्ली से बाहर है। विशेष रूप से गुजरात को लेकर रणनीति बनाई जा रही है। गुजरात लम्बे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है लेकिन पिछली विधानसभा चुनावों में आप ने उल्लेखनीय वोट प्रतिशत हासिल कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। पार्टी का आकलन है कि यदि वह ‘राजनीतिक प्रतिशोध बनाम सत्य’ के नैरेटिव को जनमानस में स्थापित कर सके तो उसे भाजपा के परम्परागत वोट बैंक में सेंध लगाने का अवसर मिल सकता है।

सूत्रों के अनुसार, आप गुजरात में संगठन विस्तार, बूथ स्तर की मजबूती, युवा नेतृत्व को आगे लाने और स्थानीय मुद्दों, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी पर केंद्रित अभियान चलाने की तैयारी में है। दिल्ली और पंजाब माॅडल को प्रचारित कर पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह शासन के वैकल्पिक माॅडल के साथ मैदान में है।
यह मामला भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत विश्वसनीयता पर भी प्रश्न खड़ा करता है। यदि बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद अदालत में आरोप टिक नहीं पाते तो जनता के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। वहीं दूसरी ओर यदि भ्रष्टाचार के आरोपों को केवल राजनीतिक साजिश कहकर खारिज कर दिया जाए तो जवाबदेही की प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है। इसलिए यह आवश्यक है कि जांच एजेंसियां और राजनीतिक दल दोनों ही पारदर्शिता और जवाबदेही के उच्च मानकों का पालन करें।

दिल्ली शराब नीति केस का यह अध्याय फिलहाल समाप्त हुआ प्रतीत होता है लेकिन इसकी राजनीतिक गूंज अभी बाकी है। आप इसे अपने विस्तार का अवसर मान रही है जबकि भाजपा इसे न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बता रही है। सीबीआई ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया है। आने वाले चुनावों में यह मुद्दा किस रूप में सामने आता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अदालत के फैसले ने राजनीतिक धूल झाड़ दी है। अब वार का रुख भाजपा की ओर मोड़ने की तैयारी हो रही है और अगली बड़ी जंग गुजरात की जमीन पर लड़ी जा सकती है। साथ ही उम्मीद की जानी चाहिए कि  अरविंद और उनकी टीम को भी एहसास हुआ होगा कि बगैर तथ्यों के केवल राजनीतिक लाभ की दृष्टि से लगाए गए आरोप कितने घातक होते हैं। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया पर ट्रायल कोर्ट ने आरोप खारिज कर दिए। केजरीवाल रो भी पड़े। इसे अगर स्वाभाविक फीलिंग की तरह देखा जाए तो बेमतलब गुनाहगार साबित होना पीड़ा पैदा करता है, यही जाहिर होगा लेकिन ये पीड़ा क्या सिर्फ अरविंद केजरीवाल की है? क्या ये डाॅ मनमोहन सिंह, श्रीमती सोनिया गांधी, श्रीमती शीला दीक्षित ने महसूस नहीं की होगी जिन्हें अरविंद केजरीवाल ने केवल प्रोपेगेंडा की खातिर खूब बदनाम किया, मीडिया ट्रायल किया। झूठे आरोप, नकली मसीहा, खोखला लोकपाल, इन सबका प्रपंच रचा। कांग्रेस नेता वी.वी. श्रीनिवास ने इस फैसले के बाद बहुत सटीक टिप्पणी सोशल मीडिया में की है। बकौल श्रीनिवास, मोदी सरकार तो जांच एजेंसियों को शतरंज के मोहरों की तरह इस्तेमाल करती ही है। जहां चुनाव, वहां ईडी उसकी शतरंज की बिसात पर विरोधी पक्ष का सिर्फ एक व्यक्ति स्थायी है, राहुल गांधी! केवल उसे ही घेरना है और इसके लिए वो बाकी सभी मोहरों को काले से सफेद और सफेद से काले करते ही रहते हैं! इसलिए कोर्ट के इस निर्णय से इतर, ये आंसू तभी सच्चे माने जाएंगे, जब इनमें केवल अपनी पीड़ा नहीं, थोड़ा पश्चाताप भी होगा। महात्मा गांधी कहते थे – ‘‘अनैतिक साधनों से नैतिक लक्ष्य कभी प्राप्त नहीं हो सकता।’’ ये बात अरविंद केजरीवाल को समझनी होगी। गांधी एक और बात पर जोर देते थे। वो कहते थे कि कथनी, करनी और व्यवहार में सामंजस्य होना चाहिए। सोच, शब्द और आचरण अलग-अलग नहीं होने चाहिए।

अरविंद केजरीवाल आरटीआई के चैम्पियन थे। इसी लिए मैग्सेसे अवार्ड से पुरस्कृत भी हुए थे लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही मीडिया की आजादी छीनकर उसे पूरी तरह कंट्रोल करना शुरू कर दिया। दिल्ली हो या पंजाब, उनकी सरकार का चरित्र फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के खिलाफ ही रहा है। दिल्ली सचिवालय से मीडिया को बाहर करना, या पंजाब विधान सभा से ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘ट्रिब्यून’, ‘पंजाबी जागरण’ के वरिष्ठ पत्रकारों को बाहर करने की हिमाकत केजरीवाल की पार्टी ने ही की है।  पंजाब में मीडिया के खिलाफ पुलिस तंत्र का वैसा ही  उपयोग ‘आप’ सरकार करती रही है, जिसके लिए मोदी कुख्यात है। यकीन न हो तो पंजाब केसरी, अजीत अखबार या अनेकों आरटीआई एक्टिविस्ट और यूट्यूबर से पूछ लें, जिन पर पंजाब की जांच एजेंसियों ने केस लगाए हैं और प्रताड़ित किया है।

स्वराज, सीधा लोकतंत्र और विकेंद्रीकरण जो अरविंद केजरीवाल प्रचारित करते थे, वो सब पंजाब की ‘आप’ सरकार में ढूंढे नहीं मिलेगा। हां, कांग्रेस के सभी प्रमुख लीडरों पर पंजाब की जांच एजेंसियों के दुरुपयोग की लम्बी दास्तान जरूर मिल जाएगी। उम्मीद है कि अरविंद केजरीवाल के आंसुओं के कुछ कतरे पश्चाताप के भी होंगे। उम्मीद है मीडिया बंधुओं और कांग्रेस लीडरों की प्रताड़ना जो ‘आप’ की सरकार पंजाब में कर रही है, वो बंद करने का आदेश केजरीवाल मुख्यमंत्री को देंगे! नहीं तो ये आंसू या तो घड़ियाली आंसू कहे जाएंगे या फिर एक स्व-केंद्रित नेता का प्रोपेगेंडा का हथियार ही माने जाएंगे!

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