बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के स्वास्थ्य में लगातार दर्ज हो रही गिरावट और जदयू में नेतृत्व संकट ने फिर से भारतीय राजनीति में वंशवाद पर बहस छेड़ दी है। नीतीश कुमार के इकलौते बेटे निशांत कुमार राजनीति में सक्रिय होने की ओर बढ़ते हुए नजर आ रहे हैं, लेकिन सवाल इससे भी बड़ा है कि क्या भारत का लोकतंत्र अब पूरी तरह वंशवाद के शिकंजे में है? जब अखिलेश यादव, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, शरद पवार परिवार, स्टालिन, उद्धव ठाकरे और यहां तक कि भाजपा में भी कई नेता अपने बेटे-बेटियों को आगे ला रहे हों तो क्या अब नीतीश भी उसी रास्ते पर हैं?
बिहार की राजनीति एक बार फिर चौराहे पर खड़ी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सेहत को लेकर उठ रही चर्चाओं ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। कभी बेहद फुर्तीले और प्रशासनिक दक्षता के प्रतीक रहे नीतीश अब अक्सर सार्वजनिक मंचों से दूर रहते हैं और जब कभी सामने आते हैं तो उनकी देहभाषा और वक्तव्य में कमजोरी स्पष्ट दिखती है। विपक्षी दल जहां उनकी कार्यक्षमता पर सवाल खड़े कर रहे हैं, वहीं पार्टी के भीतर भी नेतृत्व को लेकर असमंजस की स्थिति है।
ऐसे समय में नीतीश के इकलौते बेटे निशांत कुमार का नाम धीरे-धीरे पार्टी और मीडिया में गूंजने लगा है। एक पढ़े-लिखे और शांत स्वभाव के व्यक्ति के रूप में निशांत अब तक राजनीति से दूर रहे हैं, लेकिन हाल के बयानों और उनकी सार्वजनिक उपस्थिति ने यह संकेत दिया है कि शायद अब वह राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में सामने आ सकते हैं। लेकिन यह कोई साधारण उत्तराधिकार, बल्कि यह भारत की उस पुरानी परम्परा का हिस्सा बनता दिख रहा है जिसमें राजनीति अब व्यक्ति नहीं, परिवारों के वंशवृक्ष से तय होती है।
नीतीश कुमार की जदयू पार्टी में हमेशा एक आदमी की सत्ता रही है। कोई भी नेता जो उनके बाद पार्टी में नेतृत्व कर सकता था, वह ज्यादा देर तक टिका नहीं। उपेंद्र कुशवाहा हों या प्रशांत किशोर, आरसीपी सिंह हों या ललन सिंह, हर किसी को नीतीश की छाया से बाहर निकलने की कोशिश महंगी पड़ी। नीतीश के बाद जदयू में कोई ‘फेस’ है ही नहीं। इसी शून्यता को अब वंशवाद के नाम पर भरने की कोशिश हो रही है।
लेकिन यह सवाल केवल जदयू तक सीमित नहीं है। आज का भारत जो लोकतंत्र के सबसे बड़े उदाहरणों में गिना जाता है, उसकी राजनीति तेजी से परिवारों का क्लब बनती जा रही है। वंशवाद अब अपवाद नहीं, परम्परा बन चुका है। उत्तर भारत से शुरू करें तो समाजवादी पार्टी का नाम सबसे ऊपर आता है। मुलायम सिंह यादव का पूरा परिवार, अखिलेश यादव, डिम्पल यादव, प्रतीक यादव, शिवपाल यादव, राजनीति में सक्रिय हैं। आज अखिलेश पार्टी के अध्यक्ष हैं और मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनकी पत्नी डिम्पल दो बार सांसद रह चुकी हैं।
शिवपाल अलग पार्टी बनाकर फिर अखिलेश के साथ आ गए। उधर लालू प्रसाद यादव का परिवार तो वंशवाद का प्रतीक बन चुका है। तेजस्वी यादव नेता प्रतिपक्ष हैं, डिप्टी सीएम रह चुके हैं, तेज प्रताप विधायक हैं, मीसा भारती राज्यसभा सांसद हैं। एक समय लालू की सात बेटियों में से भी कुछ को राजनीति में लाने की चर्चा थी।
कांग्रेस की बात करें तो यहां वंशवाद संस्था का नाम है। नेहरू से शुरू हुआ यह सिलसिला इंदिरा, फिर राजीव, फिर सोनिया और अब राहुल व प्रियंका तक चला आया है। राहुल गांधी आज भी कांग्रेस का चेहरा हैं, भले कितनी भी हारें मिल चुकी हों। प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस का अगला ‘आशा का दीप’ बताया गया। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शरद पवार से लेकर सुप्रिया सुले और अजित पवार तक पूरा घर सक्रिय राजनीति में है। शरद पवार की विरासत अब अजित पवार और सुप्रिया सुले के बीच बंटी हुई है जो हाल ही में महाराष्ट्र की राजनीति का एक प्रमुख बिंदु बन चुका है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी एक पारिवारिक पार्टी बन चुकी है। बाल ठाकरे से लेकर उद्धव और फिर आदित्य ठाकरे तक यह परिवार सत्ता में हिस्सेदार है। आदित्य अपने पिता की सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं।
कांग्रेस की बात करें तो यहां वंशवाद संस्था का नाम है। नेहरू से शुरू हुआ यह सिलसिला इंदिरा, फिर राजीव, फिर सोनिया और अब राहुल व प्रियंका तक चला आया है। राहुल गांधी आज भी कांग्रेस का चेहरा हैं, भले कितनी भी हारें मिल चुकी हों। प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस का अगला ‘आशा का दीप’ बताया गया। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शरद पवार से लेकर सुप्रिया सुले और अजित पवार तक पूरा घर सक्रिय राजनीति में है। शरद पवार की विरासत अब अजित पवार और सुप्रिया सुले के बीच बंटी हुई है जो हाल ही में महाराष्ट्र की राजनीति का एक प्रमुख बिंदु बन चुका है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी एक पारिवारिक पार्टी बन चुकी है। बाल ठाकरे से लेकर उद्धव और फिर आदित्य ठाकरे तक यह परिवार सत्ता में हिस्सेदार है। आदित्य अपने पिता की सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं।
दक्षिण भारत भी वंशवाद से अछूता नहीं है। करुणानिधि के बेटे एम.के. स्टालिन आज तमिलनाडु के मुख्यमंत्री हैं और उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन पहले ही मंत्री बन चुके हैं। करुणानिधि के दूसरे बेटे अलागिरी भी राजनीति में थे। डीएमके लगभग करुणानिधि परिवार की पार्टी बन चुकी है। आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी अपने पिता वाई.एस. राजशेखर रेड्डी की विरासत सम्भालकर मुख्यमंत्री बने। तेलंगाना में केसीआर के बेटे केटी रामाराव और बेटी कविता दोनों राजनीति में सक्रिय हैं। नेशनल काॅफ्रेंस में फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, पीडीपी में महबूबा मुफ्ती और उनके पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद, अकाली दल में बादल परिवार, झारखंड में शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन, हर ओर एक ही पैटर्न दोहराया जा रहा है।
अक्सर वंशवाद की आलोचना करने वाली भाजपा भी इस पैटर्न की गिरफ्त में है। राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह, यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा, अनुराग ठाकुर, मनोहर जोशी के बेटे, माधव राव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया, यह सब उदाहरण भाजपा के भीतर वंशवाद के हैं। वंश के नाम पर नेतृत्व देना भाजपा के लिए भी कोई असम्भव चीज नहीं रही है, सिर्फ नामकरण अलग रहा है।
इस पूरे परिदृश्य में नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार क्या नया करेंगे, यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इस राजनीतिक संस्कृति में वह कोई अपवाद नहीं होंगे। निशांत ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है, अविवाहित हैं और लम्बे समय तक राजनीति से दूर रहे हैं। लेकिन जदयू के नेता अब उनके नाम की चर्चा खुलकर कर रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने बीते दिनों इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘‘नीतीश से बिहार नहीं सम्भल रहा तो अपने बेटे को लाएं।’’
सवाल यह है कि क्या एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेतृत्व योग्यता से तय होगा या वंश से? क्या जदयू, जो खुद वंशवाद की आलोचना करती रही है, अब वही रास्ता पकड़ेगी? प्रश्न यह भी है कि क्या बिहार जनता निशांत कुमार को स्वीकारेगी और क्या तेजस्वी यादव के समक्ष वे टिक पाएंगे? प्रश्न कई हैं लेकिन एक बात स्पष्ट रूप से तय है कि भारतीय राजनीति में वंशवाद अब अपनी पकड़-जकड़ मजबूत कर चुका है।

