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फिर खिलेगा कमल या लौटेगा हाथ?

देश की राजनीति में इस समय तीन राज्यों केरल, असम और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को हुए बम्पर मतदान के बाद चुनाव परिणामों को लेकर सस्पेंस चरम पर है। चुनाव आयोग के अनुसार असम में 85.38, पुडुचेरी में 89.83 और केरल में 78.03 फीसदी मतदान दर्ज किया गया है जो अपने आप में एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में सवाल गूंज रहे हैं कि बम्पर वोटिंग किसके अरमान पूरे करेगी? असम और पुडुचेरी में फिर खिलेगा कमल या लौटेगा हाथ? केरल में सत्ता की हैट्रिक या खत्म होगा कांग्रेस का वनवास जैसे तमाम सवाल आमजन से लेकर नेताओं के मस्तिष्क में घूम रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि केरल में पारम्परिक रूप से उच्च मतदान देखा जाता है लेकिन इस बार बढ़ा हुआ उत्साह संकेत दे रहा है कि मतदाता बदलाव या मजबूती दोनों में से किसी एक के पक्ष में स्पष्ट संदेश देना चाहते हैं। पिनराई विजयन के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा अपने कामकाज और कल्याणकारी योजनाओं के आधार पर इसे अपने पक्ष में मान रहा है, कांग्रेस इसे सत्ता विरोधी लहर का संकेत बता रही है। बम्पर मतदान अक्सर एंटी इंकम्बेंसी को बढ़ावा देता है लेकिन केरल की राजनीति में यह ट्रेंड हमेशा स्पष्ट नहीं रहा। मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं के रुझान भी अहम भूमिका निभाएंगे। अब सबकी नजर नतीजों पर है जो तय करेंगे कि यह जन सैलाब बदलाव लाएगा या मौजूदा सरकार को फिर मौका देगा। गौरतलब है कि केरल में दस साल से लेफ्ट का कब्जा है तो वाम मोर्चा सत्ता में है और विपक्ष ने चुनाव प्रचार में इसी को हथियार बनाया था। कांग्रेस का दावा है कि निकाय चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में उसके बेहतर प्रदर्शन के आधार पर उसे अब विधानसभा चुनाव में सत्ता में वापसी की उम्मीद है तो वहीं मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के लिए यह चुनाव करो या मरो की लड़ाई है और विजयन के विकास और योजनाओं के बूते एलडीएफ तीसरी बार सत्ता में लौटने का दावा कर रहा है।

बात अगर असम की करें तो राज्य में परिसीमन के बाद हो रहे चुनाव में 126 सीटों पर अब तक का सबसे ज्यादा मतदान हुआ है। चुनाव प्रचार में बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए जोर लगाती दिखी तो कांग्रेस अपने 10 साल के वनवास को खत्म करने की कोशिश में। बदरुद्दीन अजमल मुस्लिम वोटों के सहारे चुनावी लड़ाई को त्रिकोणीय बना सकते हैं। असम की चुनावी लड़ाई जितनी सीधी दिख रही थी, उतनी है नहीं क्योंकि राज्य की सियासत तीन इलाकों में बंटी हुई है। ऊपरी, मध्य और निचले असम की चुनावी और राजनीतिक जंग है जहां का सामाजिक ढांचा, मुद्दे और वोटिंग के पैटर्न एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है। असम के 2021 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन को 75 और कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थी। तब बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) भी कांग्रेस गठबंधन में शामिल थी, लेकिन इस बार उसने अलग चुनाव लड़ा है। कुल मिलाकर असम में बम्पर मतदान ने चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। भारी वोटिंग को लोकतंत्र के प्रति जनता के बढ़ते विश्वास के रूप में देखा जा रहा है लेकिन इसके राजनीतिक मायने भी अहम हैं। भाजपा इसे अपने विकास और नेतृत्व पर भरोसे का संकेत मान रही है तो वहीं कांग्रेस इसे बदलाव की लहर के रूप में देख रही है लेकिन ज्यादा मतदान अक्सर सत्ता विरोधी रुझान को दर्शाता है, हालांकि असम में क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण भी नतीजों को प्रभावित करेंगे। अब देखना होगा कि यह बम्पर मतदान किसके पक्ष में जनादेश देता है।

केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी पर नजर डालें तो बम्पर मतदान ने चुनावी तस्वीर को दिलचस्प बना दिया है और इसके राजनीतिक मायनों पर चर्चा तेज हो गई है। आमतौर पर ज्यादा मतदान को जनता की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी और बदलाव की इच्छा के संकेत के रूप में देखा जाता है। इस बार भी रिकाॅर्ड स्तर की वोटिंग ने संकेत दिया है कि मतदाता अपनी भूमिका को लेकर पहले से अधिक सजग हैं। भाजपा और उसके सहयोगी इसे अपने शासन और विकास कार्यों पर जनता के भरोसे के रूप में देख रहे हैं वहीं कांग्रेस इसे सत्ता विरोधी रुझान का संकेत मान रही है और वापसी की उम्मीद जता रही है लेकिन पुदुचेरी जैसे छोटे केंद्रशासित प्रदेश में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों की छवि और गठबंधन की रणनीति काफी अहम भूमिका निभाती है। यहां हर वोट का महत्व ज्यादा होता है, इसलिए बम्पर मतदान नतीजों को अप्रत्याशित बना सकता है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह वोटिंग किसके पक्ष में जाएगी लेकिन इतना तय है कि पुदुचेरी में इस बार मुकाबला बेहद कड़ा और परिणाम चैंकाने वाले हो सकते हैं।

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