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बांग्ला से इस्लामी राष्ट्रवाद की तरफ

बांग्लादेश में अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद से देश में राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के गठन के बाद, देश में हिंसा, अराजकता, और इस्लामी कट्टरपंथ का उदय देखा जा रहा है

गत वर्ष, आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलनों ने बांग्लादेश में व्यापक अशांति पैदा कर दी थी। इन प्रदर्शनों के दौरान, लगभग 300 लोगों की मृत्यु हुई, जिससे देश में अस्थिरता बढ़ी। इस स्थिति में सेना ने हस्तक्षेप किया और प्रधानमंत्री शेख हसीना को 45 मिनट के भीतर देश छोड़ने का अल्टीमेटम दिया। परिणामस्वरूप, शेख हसीना ने इस्तीफा देकर भारत में शरण ले ली।

शेख हसीना के निर्वासन के बाद, मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का गठन किया गया। हालांकि पिछले छह महीनों में यह सरकार देश में स्थिरता लाने में असफल रही है। बांग्लादेश में महंगाई बढ़ी है, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई है और कपड़ा उद्योग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गिरावट देखी गई है। इसके अलावा, राजनीतिक हिंसा और अराजकता में वृद्धि हुई है, जिससे देश की सुरक्षा और स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

इस्लामी कट्टरपंथ का उदय

अंतरिम सरकार के कार्यकाल में बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथी समूहों की सक्रियता में वृद्धि हुई है। शेख हसीना ने मोहम्मद यूनुस की सरकार पर देश को आतंकवाद और अराजकता का केंद्र बनाने का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि यूनुस ने अराजकता को पनपने दिया और आतंकवादी तत्वों को बढ़ावा दिया, जिससे देश की सुरक्षा को खतरा पैदा हुआ है।

सांस्कृतिक और धार्मिक प्रभाव

इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ते प्रभाव के साथ, बांग्लादेश में सांस्कृतिक और धार्मिक परिवर्तनों की लहर देखी जा रही है। धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं, और समाज में धार्मिक असहिष्णुता में वृद्धि हुई है। इसके अलावा, धार्मिक नियमों और मान्यताओं को समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया जा रहा है, जिससे देश की धर्मनिरपेक्ष पहचान पर प्रश्नचिह्न लग रहा है। बांग्लादेश की स्थापना 1971 में एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में हुई थी, लेकिन इसके बाद के दशकों में कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं, जब यह इस्लामी राष्ट्र की ओर बढ़ा।

शेख मुजीर्बुर रहमान की हत्या

बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान को 15 अगस्त 1975 को एक सैन्य तख्तापलट में हत्या कर दी गई थी। इसके बाद जनरल जियाउर रहमान सत्ता में आए और उन्होंने धीरे-धीरे इस्लामी ताकतों को मजबूत किया। उन्होंने 1977 में संविधान संशोधन कर धर्मनिरपेक्षता की जगह ‘बिस्मिल्लाह-इर-रहमान-इर-रहीम’ जोड़ा और इस्लाम को अधिक महत्व दिया।

इस्लाम आधिकारिक राज्य धर्म घोषित

वर्ष 1982 में जनरल हुसैन मोहम्मद इरशाद ने सत्ता संमाली और इस्लामिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए। 1988 में उन्होंने संविधान में संशोधन कर इस्लाम को बांग्लादेश का आधिकारिक राज्य धर्म घोषित कर दिया। इस निर्णय के बाद, कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों को अधिक राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव मिलने लगा।

इस्लामी ताकतों का उदय

वर्ष 1991 में खालिदा जिया (बीएनपी) की सरकार बनी, जिसने कट्टरपंथी इस्लामी समूहों को समर्थन दिया। कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी को राजनीति में मुख्यधारा में आने का मौका मिला और मदरसों के विकास को बढ़ावा दिया गया। इस दौर में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले भी बढ़े।

कट्टरपंथी आतंकवाद का विस्तार

वर्ष 2001 में बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी की गठबंधन सरकार सत्ता में आई, जिससे बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ को और बढ़ावा मिला। वर्ष 2005 में बांग्लादेश में इस्लामी आतंकवादी संगठन ‘जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी)’ ने 63 जिलों में सिलसिलेवार बम धमाके किए। इस्लामी कट्टरपंथियों ने धीरे-धीरे अधिक प्रभाव जमाना शुरू किया और कई उदारवादी नेताओं की हत्या की।

धर्मनिरपेक्षता की बहाली

वर्ष 2010 में शेख हसीना की सरकार ने 1972 के धर्मनिरपेक्ष संविधान को बहाल किया, लेकिन इस्लाम को ‘राज्य धर्म’ बनाए रखा। 2013 में ‘शाहबाग आंदोलन’ के दौरान कट्टरपंथी संगठन हिफाजत-ए-इस्लाम ने इस्लामी शासन की मांग की और ब्लाॅगरों, धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों की हत्या का सिलसिला तेज हुआ। 2016 में गुलशन कैफे हमला, जिसमें आईएसआईएस से जुड़े आतंकवादियों ने कई विदेशी नागरिकों की हत्या कर दी, यह दिखाता है कि कट्टरपंथ अभी भी मौजूद था। शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद, इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों को अधिक शक्ति मिल रही है। अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ रहे हैं और इस्लामिक कानूनों को धीरे-धीरे लागू करने की मांग हो रही है।

भविष्य की चुनौतियां

बांग्लादेश वर्तमान में राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। अंतरिम सरकार की अक्षमता और इस्लामी कट्टरपंथ के उदय ने देश की स्थिरता और विकास पर गम्भीर प्रभाव डाला है। आगामी समय में बांग्लादेश को इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक मजबूत और समावेशी राजनीतिक ढांचे की आवश्यकता होगी, जो देश की धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा कर सके।
अंततः शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में उत्पन्न हुई स्थिति ने देश को एक संवेदनशील मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां से आगे का मार्ग देश के नेताओं और नागरिकों के सामूहिक प्रयासों पर निर्भर करेगा।

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