Uttarakhand

भाजपा में कई चेहरे, कांग्रेस में माहरा बनाम हीरा की चर्चा

  • संजय स्वार
आगामी विधानसभा चुनाव में अब नौ माह से भी कम समय शेष है और रानीखेत विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। कांग्रेस में पूर्व विधायक करण माहरा और पूर्व ब्लाॅक प्रमुख हीरा सिंह रावत के बीच टिकट को लेकर मुकाबले के संकेत हैं तो भाजपा में मौजूदा विधायक प्रमोद नैनवाल के अलावा कैलाश पंत, शांति उप्रेती, धन सिंह रावत, दीप पांडे और अन्य नेताओं की दावेदारी ने चुनावी समीकरणों को दिलचस्प बना दिया है। रानीखेत की राजनीति में एक बार फिर स्थानीय समीकरण, संगठनात्मक ताकत और व्यक्तिगत प्रभाव की परीक्षा होने जा रही है जबकि सत्ता विरोधी मतदान की पुरानी पहचान रखने वाले इस विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं का रुख 2027 के चुनाव की दिशा तय करेगा। कांग्रेस में मुकाबला अपेक्षाकृत सीमित दिख रहा है लेकिन भाजपा के भीतर टिकट की दौड़ कहीं अधिक तीखी और बहुस्तरीय नजर आ रही है

उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद अब तक हुए पांच विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की सरकारें ही बनती रही हैं। 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, 2007 में भाजपा, 2012 में फिर कांग्रेस तो 2017 के चुनाव में भाजपा ने सरकार बनाई लेकिन 2022 में उत्तराखण्ड के मतदाताओं ने पुरानी परंपराओं को दरकिनार करते हुए फिर भाजपा को ही चुन लिया। रानीखेत विधानसभा सीट की बात करें तो यहां के मतदाताओं ने उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद से हमेशा सत्ता में आने वाली पार्टी के खिलाफ ही अपना विधायक चुना। 2022 जरूर इसका अपवाद रहा। सत्ता विरोधी सोच के चलते ही रानीखेत की जनता को अपना प्रतिनिधि मुख्यमंत्री या मंत्री के रूप में तो नहीं, नेता प्रतिपक्ष या उपनेता प्रतिपक्ष के रूप में जरूर मिला। नतीजा रानीखेत विधानसभा क्षेत्र की मूलभूत जरूरतें और विकास की योजनाएं राजनीतिक दलों के पाले में गेंद की तरह इधर से उधर होती रहीं, मगर परिणाम हर दृष्टि से शून्य रहा। चाहे फिर वो कांग्रेस की सरकार रही हों या भाजपा की। कोई भी चुना हुआ जनप्रतिनिधि रानीखेत को अपने राजनीतिक चश्मे और निजी नफे- नुकसान से ऊपर नहीं देख पाया। जो दरियादिली 1952 के विधानसभा चुनाव से आज तक जनप्रतिनिधि चुनने में रानीखेत के मतदाताओं ने दिखाई वो व्यापक दृष्टि राजनीतिक दल और उनके चुने गए प्रतिनिधि नहीं दिखा पाए। जनप्रतिनिधियों के दायित्व और महत्वाकांक्षाओं का तो विस्तार होता गया, मगर रानीखेत के प्रति उनके विकास की सोच अपने व्यक्तिगत अहंकार के दायरों या खास व्यक्तियों के दायरों के अंदर सिकुड़ती चली गईं जिसका खामियाजा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत आज भी भुगत रहे हैं और भाजपा नेता अजय भट्ट ने 2017 के विधानसभा चुनाव में भुगता, जब उन्हें अपने शिष्य की वजह से पराजय का सामना करना पड़ा।

वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों में अब जब 9 माह से भी कम का समय बचा है तो विभिन्न राजनीतिक दलों के अंदर संभावित दावेदारों की सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच ही होता आया है। उत्तराखण्ड क्रांति दल और बहुजन समाज पार्टी ने कुछ चुनावों में अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराने की कोशिश की थी लेकिन वो कोशिश राजनीतिक दलों के रूप में कम व्यक्तिगत रूप से ज्यादा नजर आई थी, जैसे 2002 के चुनावों में उक्रांद प्रत्याशी के रूप में नरेंद्र रौतेला और 2007 में बसपा प्रत्याशी के रूप में पूरन सिंह डंगवाल का व्यक्तिगत प्रदर्शन था। 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के दावेदारों की बात करें तो पूर्व में रानीखेत से विधायक रहे और उत्तराखण्ड कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष, वर्तमान में कांग्रेस कार्य समिति के आमंत्रित सदस्य करण माहरा कांग्रेस के स्वाभाविक दावेदार हैं। उत्तराखण्ड कांग्रेस के अध्यक्ष से हटने के बाद रानीखेत विधानसभा में उनकी सक्रियता फिर से बढ़ गई है। कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में वो सल्ट क्षेत्र के पूर्व विधायक रणजीत रावत के निकट माने जाते हैं। हालांकि 2017 से 2022 के मध्य वो प्रीतम सिंह के करीबियों में शुमार होते थे लेकिन 2022 में करण माहरा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद प्रीतम सिंह और करण माहरा के सम्बंधों में तल्खियां आ गईं थी। हालांकि आजकल करण माहरा की नजदीकियां नए प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल से बढ़ी हैं। करण माहरा के साथ उनके पिता स्व. गोबिंद सिंह माहरा और भाई स्व. पूरन सिंह माहरा की राजनीतिक विरासत तो है ही, साथ ही भाजपा के दिग्गज अजय भट्ट को दो बार इस सीट पर हराने का रिकार्ड भी है। भले ही वो 2022 का विधानसभा चुनाव कभी अजय भट्ट के शिष्य रहे प्रमोद नैनवाल से हार गए। इस बार उनको चुनौती कभी उनके खास लोगों में शामिल रहे ताड़ीखेत ब्लाॅक के पूर्व ब्लाॅक प्रमुख रहे हीरा सिंह रावत से है। हीरा सिंह रावत, कभी करण माहरा की कोर टीम के महत्वपूर्ण सदस्यों में रहे हैं लेकिन पिछले पंचायत चुनावों में ब्लाॅक प्रमुख के चुनावों में दोनों के मध्य सम्बंधों में तल्खियां पैदा हुई हैं। हीरा सिंह रावत इस बार 2027 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस से मजबूती से अपनी दावेदारी रखने के मूड में बताए जा रहे हैं। हीरा सिंह रावत और उनकी पत्नी रचना रावत दोनों  ताडीखेत ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रह चुके हैं। 2025 के पंचायत चुनावों में रचना रावत ब्लॉक प्रमुख की उम्मीदवार थीं लेकिन वो चुनाव हार गईं। हीरा सिंह रावत के समर्थकों का कहना है कि उस वक्त करण माहरा ने रचना रावत को ब्लॉक प्रमुख बनाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। पंचायत चुनावों की ये लड़ाई 2027 के विधानसभा चुनावों में क्या असर दिखाएगी ये देखना दिलचस्प होगा। कांग्रेस से टिकट न मिलने की स्थिति में हीरा सिंह रावत  का अगला कदम क्या होगा, इसपर सबकी निगाहें रहेंगी। फिलहाल कांग्रेस के अंदर करण माहरा और हीरा सिंह रावत ही मुख्य दावेदार नजर आते हैं। रानीखेत विधानसभा के टिकट पर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत रुख पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा।
भाजपा के अन्दर इस बार दावेदारी पर रार
2022 के चुनावों में प्रमोद नैनवाल भाजपा के अन्दर ही एक बड़े वर्ग के विरोध के बावजूद भाजपा से टिकट झटक लाए थे। सिटिंग विधायक होने के चलते उनकी स्वाभाविक दावेदारी है लेकिन पिछले दिनों मीडिया में भाजपा के एक कथित आन्तरिक सर्वे की रिपोर्ट के चलते जिसमें विधायक प्रमोद नैनवाल की स्थिति कमजोर होने की बात कही गई थी, भाजपा के कुछ दावेदारों के हौंसले बुलंद हैं। प्रमोद नैनवाल के अतिरिक्त भाजपा के अन्य दावेदारों में दायित्वधारी कैलाश पंत, दीप पाण्डे, सौला द्वितीय से वर्तमान जिला पंचायत सदस्य शांति उप्रेती, ताड़ीखेत के पूर्व ब्लाॅक प्रमुख धन सिंह रावत, पूर्व जिला पंचायत सदस्य विमला रावत के नाम प्रमुख हैं। रानीखेत विधानसभा में भाजपा का पूरा संगठन बिखराव की स्थिति में है जिसके चलते जितने नेता उतने ही धड़े हैं। विधायक नैनवाल संगठन के इस बिखराव को रोक नहीं पाए। पिछले चार सालों  में कुछ कामकाजी नेताओं को छोड़ दें तो प्रमोद नैनवाल के स्थानीय भाजपा नेताओं से सम्बंध बहुत सहज नहीं रहे। जिससे भाजपा के संगठन के अंदर टकराव की स्थिति बनी रही। कैलाश पंत जो कभी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के दावेदार थे, त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार और पुष्कर सिंह धामी की सरकार में दायित्वधारी हैं। क्षेत्र में उनकी निरंतर सक्रियता दिखाई देती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के करीबी माने जाने वाले कैलाश पंत, 2022 के चुनावों में भी गम्भीर दावेदार थे। मगर प्रमोद नैनवाल के राजनीतिक दांव-पेचों और अल्मोड़ा के सांसद अजय टम्टा की प्रमोद नैनवाल की पैरवी कैलाश पंत पर भारी पड़ गई। इस बार उनके समर्थकों को पूरा विश्वास है कि कैलाश पंत ही 2027 के विधानसभा चुनावों में भाजया की पहली पसंद होंगे। दूसरा नाम सौला द्वितीय से जिला पंचायत सदस्य शांति उप्रेती का है। दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए (ऑनर्स) शांति उप्रेती अंतरराष्ट्रीय योगाचार्य और नैचुरोपैथिस्ट हैं। सामाजिक संगठनों से जुड़ी शांति उप्रेती ने जिला पंचायत सदस्य बनने के बाद अपने जिला पंचायत क्षेत्र में सीमित न रहकर पूरे रानीखेत विधानसभा क्षेत्र में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाई है। ‘एप्पल मैन’ कहे जाने वाले और धनिए की पौध से ‘गिनीज बुक ऑफ़ द वल्र्ड रिकाॅर्ड’ में नाम दर्ज कराने वाले उनके पति गोपाल उप्रेती किसानों के मुद्दे को प्रदेश स्तर तक पहुंचाने के लिए जनप्रतिनिधि के रूप में किसानों की आवाज बनना चाहते हैं। लोकसभा सांसद अजय भट्ट के नजदीकी गोपाल उप्रेती की भाजपा में अच्छी पकड़ मानी जाती है। ताड़ीखेत के पूर्व ब्लाॅक प्रमुख धन सिंह रावत जो राज्य आंदोलनकारी रहे हैं, भी भाजपा दावेदारों के प्रमुख चेहरों में हैं। छात्र राजनीति से निकले धन सिंह रावत को युवाओं का अच्छा-खासा समर्थन है। रानीखेत महाविद्यालय में छात्र संघ अध्यक्ष रहे धन सिंह रावत जिला पंचायत सदस्य भी रह चुके हैं। भाजपा की अंदरूनी राजनीति में कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य के करीबी धन सिंह रावत इस बार भी मजबूती से दावेदारी पेश कर सकते हैं लेकिन केंद्रीय मंत्री अजय टम्टा उनके लिए रूकावटें पैदा कर सकते हैं। धन सिंह रावत की पत्नी विमला रावत भी दावेदारों की दौड़ में जरूर हैं लेकिन ब्लाॅक प्रमुख चुनाव में उनकी हार ने उनके दावे को कमजोर किया है। भाजपा प्रत्याशी के रूप में वो ब्लाॅक प्रमुख के चुनाव में तीसरे स्थान पर रहीं थी। एक नया नाम जो तेजी से उभर कर सामने आया है वो हैं दीप पाण्डे। सशत्र सीमा बल (एसएसबी) सहायक सेना नायक पद से स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर आए युवा दीप पाण्डे भाजपा में लम्बे समय से सक्रिय हैं। भाजपा से जुड़ने के बाद उन्होंने भाजपा संगठन और संघ में ऊपर तक अपनी पकड़ बनाई है। अर्द्धसैनिक पृष्ठभूमि और युवा चेहरे के तौर पर वो भाजपा में ताकतवर विकल्प के रूप में उभरे हैं। रानीखेत विधानसभा में उनकी सक्रियता ने भाजपा के अन्य दावेदारों के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। उत्तराखण्ड क्रांति दल और बहुजन समाज पार्टी का यहां विशेष जनाधार नजर नहीं आता।
कुल मिलाकर रानीखेत विधानसभा क्षेत्र के अंदर कांग्रेस के अंदर दावेदारी की लड़ाई करण माहरा और हीरा सिंह रावत के बीच सिमटी है तो भारतीय जनता पार्टी के अंदर दावेदारों की एक लम्बी फेहरिस्त के चलते ज्यादा घमासान नजर आता है।

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