भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में सुधार आता नजर आ रहा है। तनाव के दौर के बाद ढाका की नवगठित सरकार ने संवेदनशील मुद्दों पर साफ बातचीत की वकालत की है और दिल्ली ने भी नई सरकार के साथ मिलकर सम्बंधों को आगे बढ़ाने के संकेत दिए हैं
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में सुधार आता नजर आ रहा है। पिछले डेढ़ साल से अधिक समय से चले आ रहे तनाव और अनिश्चितता के दौर के बाद अब दोनों देशों की ओर से रिश्तों को सामान्य और सकारात्मक दिशा में ले जाने के संकेत मिल रहे हैं। हालिया बयानों और कूटनीतिक गतिविधियों से यह स्पष्ट हो रहा है कि नई परिस्थितियों में दोनों देश संवाद और सहयोग के जरिए मतभेदों को सुलझाने के इच्छुक हैं।
भारत में बांग्लादेश के उच्चायुक्त एम. रियाज हामिदुल्लाह ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि भारत और बांग्लादेश जैसे करीबी पड़ोसियों के बीच यदि कोई ‘संवेदनशील या कठिन मुद्दे’ हैं तो उन्हें बिना हिचक के पूरी ईमानदारी और स्पष्टता के साथ उठाया जाना चाहिए। उनका यह बयान दोनों देशों के बीच रिश्तों की मौजूदा दिशा को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सम्बंधों को मजबूत बनाए रखने के लिए पारदर्शी संवाद ही सबसे प्रभावी माध्यम है।
हामिदुल्लाह ने अपने सम्बोधन में यह भी रेखांकित किया कि भारत और बांग्लादेश के रिश्ते केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं बल्कि इनकी जड़ें इतिहास, संस्कृति, भाषा और भूगोल में गहराई से जुड़ी हुई हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय भारत ने जो भूमिका निभाई, वह दोनों देशों के सम्बंधों की मजबूत नींव है। उन्होंने यह भी कहा कि समय के साथ इन रिश्तों ने व्यापार, सम्पर्क और लोगों के बीच आदान-प्रदान के जरिए और विस्तार पाया है।
हालांकि पिछले कुछ समय में दोनों देशों के रिश्तों में खटास भी देखने को मिली। जुलाई 2024 में बांग्लादेश में हुए छात्र आंदोलन और उसके बाद के राजनीतिक घटनाक्रम ने भारत-बांग्लादेश सम्बंधों को प्रभावित किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने और भारत में शरण लेने के बाद दोनों देशों के बीच अविश्वास का माहौल बना। इसके बाद अंतरिम सरकार के दौर में भी कई मुद्दों पर मतभेद उभरकर सामने आए जिससे द्विपक्षीय सम्बंधों में ठहराव की स्थिति बनी रही। अब फरवरी में हुए चुनावों के बाद बांग्लादेश में नई सरकार के गठन के साथ ही रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिशें तेज हुई हैं। नई सरकार ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह भारत के साथ ‘व्यावहारिक, परस्पर सम्मानजनक और लाभकारी’ सम्बंधों को प्राथमिकता देगी। यह बदलाव केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं दिख रहा बल्कि इसके साथ ठोस कूटनीतिक पहल भी जुड़ी हुई है।
इसी क्रम में बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान का आगामी 8 अप्रैल को नई दिल्ली दौरा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि यह दौरा औपचारिक द्विपक्षीय यात्रा के रूप में नहीं होगा और इसे ट्रांजिट विजिट के तौर पर देखा जा रहा है, फिर भी इसे दोनों देशों के बीच संवाद को फिर से सक्रिय करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। इस दौरान होने वाली मुलाकातों और चर्चाओं से आने वाले समय में सम्बंधों की दिशा तय होने की उम्मीद है।
भारत की ओर से भी सकारात्मक रुख सामने आया है। विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने हाल ही में कहा कि भारत और बांग्लादेश के रिश्ते ऐतिहासिक विश्वास और साझा मूल्यों पर आधारित हैं। उन्होंने 1971 के मुक्ति संग्राम का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौर में बने सम्बंध आज भी दोनों देशों के बीच सहयोग की आधारशिला हैं। सिंह ने यह भी कहा कि भारत नई बांग्लादेशी सरकार के साथ मिलकर बहुआयामी साझेदारी को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।
भारत ने यह भी संकेत दिया है कि वह अपने ‘जन-केंद्रित’ दृष्टिकोण के तहत सहयोग को आगे बढ़ाना चाहता है। इसका मतलब यह है कि दोनों देशों के बीच होने वाले प्रोजेक्ट्स और समझौते केवल सरकारों तक सीमित न रहें बल्कि उनका सीधा लाभ आम लोगों तक पहुंचे। कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स, व्यापार सुगमता, सीमा पार आवागमन और ऊर्जा सहयोग जैसे क्षेत्रों में इस दिशा में काम किए जाने की सम्भावना जताई जा रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि हाल के घटनाक्रमों में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी है कि दोनों देश अब अपने मतभेदों को छिपाने के बजाय उन्हें खुले तौर पर स्वीकार कर रहे हैं और समाधान के लिए बातचीत पर जोर दे रहे हैं। यह दृष्टिकोण लम्बे समय में सम्बंधों को अधिक स्थिर और टिकाऊ बना सकता है। बांग्लादेश की ओर से ‘स्पष्ट और ईमानदार संवाद’ की बात इसी दिशा में एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दोनों देश बदलते वैश्विक परिदृश्य में अपनी भूमिका को भी नए सिरे से परिभाषित करना चाहते हैं। हामिदुल्लाह ने अपने सम्बोधन में ‘ओपन रीजनलिज्म’ और ‘मल्टीलेटरलिज्म’ की बात करते हुए कहा कि भारत और बांग्लादेश को क्षेत्रीय और वैश्विक मंचों पर मिलकर काम करना चाहिए। इससे न केवल दोनों देशों के हित सुरक्षित होंगे बल्कि दक्षिण एशिया में स्थिरता और सहयोग को भी बढ़ावा मिलेगा।
भारत के लिए बांग्लादेश न केवल एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है बल्कि ‘एक्ट ईस्ट पाॅलिसी’ के तहत पूर्वोत्तर राज्यों के विकास और क्षेत्रीय सम्पर्क को बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाता है, वहीं बांग्लादेश के लिए भारत एक बड़ा व्यापारिक साझेदार और रणनीतिक सहयोगी है। ऐसे में दोनों देशों के लिए सम्बंधों में स्थिरता बनाए रखना आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद जरूरी है।
हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार और सम्पर्क के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। रेल, सड़क और जलमार्ग के जरिए कनेक्टिविटी बढ़ाने के प्रयासों ने दोनों देशों के बीच आर्थिक गतिविधियों को गति दी है। इसके अलावा ऊर्जा सहयोग, बिजली आपूर्ति और सीमा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी दोनों ने मिलकर काम किया है। हालांकि कुछ मुद्दों पर मतभेद बने रहे लेकिन अब उन्हें सुलझाने की दिशा में नई पहल की जा रही है।
ढाका में यह धारणा भी रही है कि भारत का सहयोग पहले की सरकार के साथ अधिक केंद्रित था और आम लोगों तक उसका लाभ सीमित रूप में पहुंचा। ऐसे में भारत द्वारा ‘जन-केंद्रित’ दृष्टिकोण पर जोर देना इस धारणा को बदलने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। यदि यह रणनीति सफल होती है तो दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग का स्तर और मजबूत हो सकता है।
राजनीतिक स्तर पर भी दोनों देशों के बीच सम्पर्क बढ़ाने की कोशिशें दिख रही हैं। भारत के प्रधानमंत्री द्वारा बांग्लादेश की नई सरकार के साथ शुरुआती संवाद और शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय प्रतिनिधित्व को सकारात्मक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। इससे यह संदेश गया है कि भारत नई परिस्थितियों में भी
बांग्लादेश के साथ अपने सम्बंधों को प्राथमिकता देता है। कुल मिलाकर भारत और बांग्लादेश के बीच मौजूदा स्थिति को ‘रीसेट’ के दौर के रूप में देखा जा सकता है। जहां एक ओर पुराने मतभेदों को स्वीकार करते हुए उन्हें सुलझाने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी तरफ नए अवसरों की तलाश भी जारी है। यदि दोनों देश इसी तरह खुले संवाद और पारस्परिक सम्मान के आधार पर आगे बढ़ते हैं तो आने वाले समय में ये सम्बंध और अधिक मजबूत हो सकते हैं। कूटनीतिक गतिविधियां इस बात को तय करेंगी कि यह सुधार कितनी तेजी और स्थिरता के साथ आगे बढ़ता है।
बांग्लादेश के साथ अपने सम्बंधों को प्राथमिकता देता है। कुल मिलाकर भारत और बांग्लादेश के बीच मौजूदा स्थिति को ‘रीसेट’ के दौर के रूप में देखा जा सकता है। जहां एक ओर पुराने मतभेदों को स्वीकार करते हुए उन्हें सुलझाने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी तरफ नए अवसरों की तलाश भी जारी है। यदि दोनों देश इसी तरह खुले संवाद और पारस्परिक सम्मान के आधार पर आगे बढ़ते हैं तो आने वाले समय में ये सम्बंध और अधिक मजबूत हो सकते हैं। कूटनीतिक गतिविधियां इस बात को तय करेंगी कि यह सुधार कितनी तेजी और स्थिरता के साथ आगे बढ़ता है।