एक समय हिंदी फिल्मों का खलनायक तस्कर, डाकू, स्मगलर या भ्रष्ट जमींदार होता था और नायक नैतिकता का प्रतीक लेकिन आज ‘पुष्पा’, ‘केजीएफ’, ‘एनिमल’ और ‘कबीर सिंह’ जैसे किरदारों की लोकप्रियता ने इस विभाजन को धुंधला कर दिया है। अब दर्शक खलनायक के भीतर नायक तलाश रहा है और नायक के भीतर विद्रोह। आखिर भारतीय सिनेमा का नैतिक भूगोल कैसे बदल गया?
हिंदी सिनेमा का इतिहास केवल नायकों का इतिहास नहीं है। जितनी लोकप्रियता उसके नायकों ने हासिल की, उतनी ही गहरी छाप उसके खलनायकों ने भी छोड़ी। कभी प्राण का नाम सुनते ही दर्शक सिहर उठते थे तो कभी अमजद खान का ‘गब्बर सिंह’ आतंक का पर्याय बन गया। अमरीश पुरी का ‘मुगैम्बो’ हिंदी सिनेमा का सबसे चर्चित विलेन बना लेकिन यदि आज के सिनेमा पर नजर डालें तो तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। अब खलनायक केवल कहानी का विरोधी पात्र नहीं रह गया बल्कि कई बार वही कहानी का सबसे लोकप्रिय चेहरा बन जाता है। कई फिल्मों में तो नायक और खलनायक के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। यह बदलाव अचानक नहीं आया। यह भारतीय समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और लोकप्रिय संस्कृति में आए बदलावों के साथ धीरे-धीरे विकसित हुआ। जिस तरह हर दौर का नायक अपने समय की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है, उसी तरह उसका खलनायक भी उस दौर के सामाजिक डर और नैतिक संकटों का प्रतीक होता है।
1950 और 1960 के दशक में हिंदी फिल्मों का खलनायक अक्सर जमींदार, साहूकार, मिल मालिक या शोषक होता था। यह वही दौर था जब भारत समाजवादी विकास माॅडल की ओर बढ़ रहा था। इसलिए फिल्मों में गरीब किसान, मजदूर और आम आदमी का शोषण करने वाले पात्र खलनायक बनते थे। महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ का सूदखोर सुखीलाल केवल एक व्यक्ति नहीं था बल्कि ग्रामीण शोषण का प्रतीक था। उस समय का सिनेमा साफ- साफ बताता था कि अच्छा कौन है और बुरा कौन।
1970 का दशक आया तो खलनायक भी बदल गया। देश में बेरोजगारी, महंगाई, तस्करी और अपराध बढ़ रहे थे। फिल्मों में अंतरराष्ट्रीय स्मगलर, माफिया और अपराध सरगना दिखाई देने लगे। ‘दीवार’ में अपराध की दुनिया, ‘डाॅन’ में अंडरवल्र्ड और ‘शान’ में संगठित अपराध का नया चेहरा सामने आया। इसी दौर में ‘शोले’ का गब्बर सिंह भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा खलनायक बनकर उभरा। वह केवल डाकू नहीं था बल्कि कानून और व्यवस्था की विफलता का प्रतीक भी था।
1980-90 के दशक में अमरीश पुरी ने ‘मुगैम्बो’ जैसे किरदार के जरिए खलनायकी को लगभग पौराणिक ऊंचाई दे दी। ‘मिस्टर इंडिया’ का मुगैम्बो सत्ता, सैन्य शक्ति और वैश्विक वर्चस्व की महत्वाकांक्षा का प्रतीक था। उसकी क्रूरता इतनी अतिरंजित थी कि दर्शक बिना किसी नैतिक दुविधा के उसके खिलाफ खड़े हो जाते थे। यही उस दौर के सिनेमा की सबसे बड़ी विशेषता थी, नायक और खलनायक की सीमाएं बिल्कुल स्पष्ट थीं। जब विलेन ही बन गया नायक नई सदी के साथ यह स्पष्टता टूटने लगी। वैश्वीकरण, उदारीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति ने सफलता की परिभाषा बदल दी। अब दर्शक ऐसे किरदारों की ओर आकर्षित होने लगे जो पूरी तरह अच्छे या पूरी तरह बुरे नहीं थे। इसी दौर में एंटी-हीरो का प्रभाव बढ़ा।
शाहरुख खान ने ‘बाजीगर’ और ‘डर’ में ऐसे पात्र निभाए जो नैतिक रूप से नायक नहीं थे लेकिन दर्शकों ने उन्हें अस्वीकार नहीं किया। बाद में ‘कम्पनी’, ‘सत्या’ और ‘वंस अपॉन अ टाइम इन मुम्बई’ जैसी फिल्मों ने अपराधियों को केवल खलनायक के रूप में नहीं बल्कि जटिल मानवीय चरित्रों के रूप में प्रस्तुत किया। दर्शक पहली बार यह समझने लगे कि अपराधी भी परिस्थितियों से बनता है। वास्तविक बदलाव पिछले दस वर्षों में दिखाई देता है। आज ‘पुष्पा’, ‘केजीएफ’ का राॅकी, ‘एनिमल’ का रणविजय और ‘कबीर सिंह’ जैसे पात्र दर्शकों के बीच अपार लोकप्रिय हैं। इनमें से कोई भी पारम्परिक अर्थों में आदर्श नायक नहीं है। वे हिंसक हैं, कानून तोड़ते हैं, कई बार स्त्री विरोधी व्यवहार करते हैं और नैतिक सीमाओं का उल्लंघन करते हैं। इसके बावजूद दर्शक उन्हें नायक की तरह देखते हैं।
आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्यों आज का दर्शक उस किरदार से प्रभावित हो जाता है जो कभी हिंदी फिल्मों में खलनायक माना जाता? इसका उत्तर केवल सिनेमा में नहीं बल्कि समाज में आए बदलावों में छिपा है। आज का भारत 1970 या 1980 के दशक का भारत नहीं है। आर्थिक उदारीकरण, तीव्र प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया, उपभोक्तावाद और व्यक्तिवाद ने सफलता की नई परिभाषा गढ़ी है। अब समाज में परिणाम को कई बार प्रक्रिया से अधिक महत्व दिया जाता है। यही सोच धीरे-धीरे फिल्मों के पात्रों में भी दिखाई देने लगी।
‘पुष्पा’ का नायक कानून का पालन करने वाला नागरिक नहीं है। वह लाल चंदन की तस्करी करता है, हिंसा करता है और सत्ता को चुनौती देता है। फिर भी दर्शक उसके साथ खड़ा दिखाई देता है। इसका कारण यह है कि फिल्म उसे केवल अपराधी के रूप में नहीं दिखाती बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है जो सामाजिक अपमान, वर्गीय भेदभाव और सत्ता के खिलाफ संघर्ष कर रहा है। दर्शकों को उसके अपराध से अधिक उसका विद्रोह आकर्षित करता है।
‘केजीएफ’ का राॅकी भी पारम्परिक नायक नहीं है। वह अपराध की दुनिया का हिस्सा है लेकिन उसकी महत्वाकांक्षा, संघर्ष और आत्मविश्वास उसे दर्शकों का प्रिय बना देते हैं। फिल्म उसके हिंसक पक्ष की आलोचना करने के बजाय उसकी असाधारण शक्ति और व्यक्तित्व का उत्सव मनाती है। यही कारण है कि दर्शक उसके अपराधों को नैतिक कसौटी पर नहीं बल्कि सिनेमाई अनुभव के रूप में देखने लगता है।
‘कबीर सिंह’ ने इस बहस को और तीखा कर दिया। फिल्म के समर्थकों ने इसे एक जटिल, भावुक और टूटे हुए प्रेमी की कहानी बताया जबकि आलोचकों ने कहा कि इसमें आक्रामकता, स्त्री के प्रति असम्मान और विषाक्त पुरुषत्व का महिमामंडन किया गया है। फिल्म ने अभूतपूर्व व्यावसायिक सफलता हासिल की लेकिन साथ ही यह प्रश्न भी खड़ा कर दिया कि क्या दर्शकों की नैतिक संवेदनाएं बदल रही हैं या वे केवल पर्दे और वास्तविक जीवन के बीच अंतर करना जानते हैं?
यह बहस ‘एनिमल’ के साथ और तेज हो गई। फिल्म के मुख्य पात्र में हिंसा, प्रतिशोध और पितृसत्तात्मक सोच के अनेक तत्व दिखाई देते हैं। इसके बावजूद फिल्म ने बाॅक्स आॅफिस पर शानदार सफलता हासिल की। एक वर्ग ने इसे आधुनिक सिनेमा का साहसिक प्रयोग कहा जबकि दूसरे वर्ग ने इसे हिंसा और विषाक्त मर्दानगी का महिमामंडन बताया। दिलचस्प बात यह रही कि फिल्म पर जितनी आलोचना हुई, उतनी ही उसकी लोकप्रियता भी बढ़ी। दरअसल, आज का सिनेमा दर्शकों को नैतिक शिक्षा देने के बजाय उन्हें जटिल पात्रों के साथ छोड़ देता है। अब फिल्मकार यह तय नहीं करते कि दर्शक किसे अच्छा और किसे बुरा माने। यह निर्णय दर्शकों पर छोड़ दिया जाता है। यही कारण है कि आज का खलनायक एक आयामी नहीं बल्कि बहुआयामी चरित्र बन गया है।
ओटीटी और एंटी-हीरो का नया दौर इस बदलाव में ओटीटी प्लेटफाॅर्म की भी बड़ी भूमिका है। वेब सीरीज ने ऐसे पात्रों को जन्म दिया है जो पूरी तरह नायक भी नहीं हैं और पूरी तरह खलनायक भी नहीं।
‘मिर्जापुर’ का कालीन भैया और मुन्ना, ‘सेक्रेड गेम्स’ का गणेश गायतोंडे, ‘पाताल लोक’ के अपराधी पात्र या ‘राणा नायडू’ जैसे चरित्र नैतिक धुंधले में जीते हैं। दर्शक उनकी क्रूरता से असहमत हो सकता है लेकिन उनके व्यक्तित्व से प्रभावित भी होता है। यह जटिलता पहले के हिंदी सिनेमा में बहुत कम दिखाई देती थी।
मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि आधुनिक दर्शक पूर्णतः आदर्श पात्रों की अपेक्षा त्रुटिपूर्ण और जटिल पात्रों से अधिक जुड़ाव महसूस करता है। उसे ऐसे किरदार अधिक वास्तविक लगते हैं जिनमें अच्छाई और बुराई दोनों मौजूद हों। यही कारण है कि आज फिल्मों में नायक और खलनायक के बीच की स्पष्ट रेखा लगभग मिट चुकी है। इस बदलाव को लेकर चिंता भी व्यक्त की जा रही है। अनेक फिल्म समीक्षकों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि यदि हिंसा, अपराध और स्त्री विरोधी व्यवहार को लगातार करिश्माई रूप में प्रस्तुत किया जाएगा तो उसका सामाजिक प्रभाव भी पड़ेगा। विशेषकर किशोर दर्शक कई बार इन पात्रों की शैली, भाषा और व्यवहार को अनुकरणीय मानने लगते हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रभाव को और बढ़ा दिया है। फिल्मों के संवाद, चाल-ढाल और हिंसक दृश्य वायरल संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं। दूसरी ओर फिल्मकारों का तर्क है कि सिनेमा का काम समाज को आईना दिखाना है, नैतिक उपदेश देना नहीं। उनका कहना है कि यदि साहित्य में दोस्तोयेव्स्की, शेक्सपियर या प्रेमचंद जटिल पात्रों को जन्म दे सकते हैं तो सिनेमा भी ऐसे पात्रों को प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। उनके अनुसार किसी पात्र को दिखाना और उसका समर्थन करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
बदलती नैतिकता या बदलता मनोरंजन?
वास्तव में यह बहस केवल फिल्मों की नहीं बल्कि समाज की बदलती नैतिकता की भी है। 1960 और 1970 के दशक का भारत सामूहिक मूल्यों पर आधारित समाज था। आज का भारत अधिक व्यक्तिवादी, प्रतिस्पर्धी और महत्वाकांक्षी समाज बन चुका है। इसलिए फिल्मों के पात्र भी उसी परिवर्तन को प्रतिबिंबित कर रहे हैं। पहले नायक समाज को बदलना चाहता था, आज वह स्वयं सफल होना चाहता है। पहले खलनायक व्यवस्था के बाहर खड़ा होता था, आज कई बार वही व्यवस्था को चुनौती देने वाला नायक बन जाता है।
अब खलनायक बाहर नहीं, नायक के भीतर है
यदि हिंदी सिनेमा के इतिहास को देखें तो हर दौर का खलनायक अपने समय के डर और संकट का प्रतिनिधि रहा है। कभी वह अंग्रेज था, कभी जमींदार, कभी स्मगलर, कभी डाकू, कभी आतंकवादी और अब कई बार वह स्वयं नायक के भीतर मौजूद है। यही आधुनिक सिनेमा का सबसे बड़ा बदलाव है। अब बुराई बाहर कम और व्यक्ति के भीतर अधिक दिखाई जाती है। यही कारण है कि आज का दर्शक ‘मुगैम्बो’ से अधिक ‘पुष्पा’ को याद रखता है। मुगैम्बो से उसे नफरत थी लेकिन पुष्पा के लिए वह तालियां बजाता है। गब्बर सिंह से वह डरता था लेकिन राॅकी भाई की शैली की नकल करता है। यह परिवर्तन केवल फिल्मों का नहीं बल्कि दर्शकों की बदलती मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सोच का भी संकेत है।
शायद इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि हिंदी सिनेमा में खलनायक खत्म नहीं हुआ है बल्कि उसने अपना रूप बदल लिया है। आज का खलनायक अब अलग से खड़ा कोई व्यक्ति नहीं बल्कि कई बार वही नायक है जिसे दर्शक सबसे अधिक पसंद कर रहा है। यही आधुनिक सिनेमा की सबसे बड़ी विडम्बना भी है और उसकी सबसे बड़ी जटिलता भी। यही परिवर्तन बताता है कि हिंदी सिनेमा अब केवल अच्छाई और बुराई की सीधी लड़ाई नहीं दिखाता बल्कि उस धुंधले क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है जहां नैतिकता, महत्वाकांक्षा, हिंसा और सफलता एक-दूसरे में घुलती हुई दिखाई देती हैं। शायद यही वजह है कि आज का सबसे लोकप्रिय नायक कई बार कल का सबसे बड़ा खलनायक भी हो सकता है।