हल्द्वानी का देवखड़ी नाला राजस्व अभिलेखों में नाला भूमि और डूब क्षेत्र के रूप में दर्ज है। उच्च न्यायालय के आदेश पर किए गए एक संयुक्त निरीक्षण में नाले की भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण पाया गया है जिनमें शहर में निर्मित ‘वाॅकवे माॅल’ द्वारा नाले की भूमि तथा प्राकृतिक जलधारा पर किया गया अतिक्रमण भी शामिल है। इस रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि देवखड़ी नाले से जुड़े अतिक्रमण बने रहने की स्थिति में एशियन डेवलपमेंट बैंक की ड्रेनेज एवं फ्लड मैनेजमेंट परियोजना प्रभावित हो सकती है और उसके क्रियान्वयन में गम्भीर बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। राज्य सरकार का दावा है कि वह कई हजार एकड़ जमीन अतिक्रमण मुक्त करा चुकी है। यह रिपोर्ट लेकिन इशारा करती है कि केवल निचले तबके के अतिक्रमणों पर जरूर त्वरित कार्रवाई की जा रही है जबकि धनपतियों के अतिक्रमण पर सरकार आंख मूंद के बैठी है
उत्तराखण्ड में पुष्कर सिंह धामी सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि राज्य में सरकारी भूमि, वन भूमि, राजस्व भूमि और सार्वजनिक सम्पत्तियों पर हुए अतिक्रमण के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है और अब तक लगभग नौ हजार एकड़ से अधिक भूमि अतिक्रमण से मुक्त कराई जा चुकी है। सरकार इसे कानून का समान और निष्पक्ष अमल बताते हुए अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है लेकिन हल्द्वानी शहर में देवखड़ी नाले से जुड़ा मामला इस दावे और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई को उजागर करता है।
नैनीताल जनपद के हल्द्वानी शहर में नालों और जल निकासी व्यवस्था पर हुए अतिक्रमण को लेकर उत्तराखण्ड हाईकोर्ट में दाखिल प्रारम्भिक रिपोर्ट ने प्रशासन, शहरी विकास प्राधिकरण और बड़े व्यावसायिक हितों की भूमिका पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला अब केवल अवैध निर्माण तक सीमित नहीं है बल्कि यह इस बात का प्रतीक बन गया है कि अतिक्रमण हटाने की नीति क्या वाकई सबके लिए एक जैसी है।
रिट पेटिशन (पीआईएल) संख्या 157/2025 में दाखिल संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट के अनुसार देवखड़ी ड्रेन (नाला) राजस्व रिकाॅर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज है और यह तीन राजस्व गांवों, दमुवाढूंगा बंदोबस्ती, हरिपुर काॅलोनी वार्ड और हल्द्वानी खास से होकर गुजरता है। इन तीनों क्षेत्रों में नाले की भूमि स्पष्ट रूप से नाले के रूप में दर्ज है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर नाले की प्राकृतिक पहचान लगभग समाप्त कर दी गई है।
रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि राजस्व नक्शे, साजरा मैप, खतोनी रिकाॅर्ड (1431 से 1437 फसली वर्ष, अर्थात वर्ष 2024) और सैटेलाइट इमेज, सभी में देवखड़ी नाला साफ-साफ चिन्हित है। नक्शों में हरे रंग से नाले की वास्तविक स्थिति और नीले रंग से वर्तमान अतिक्रमित स्थिति दर्शायी गई है, जिससे यह प्रमाणित होता है कि नाले की धारा को योजनाबद्ध तरीके से बदला गया है।
संयुक्त निरीक्षण के दौरान देवखड़ी नाले के भीतर कुल 203 अतिक्रमण चिन्हित किए गए हैं। दमुवाढूंगा क्षेत्र में खसरा संख्या 617 जो स्वयं नाला दर्ज है, वहां 13 अतिक्रमण पाए गए। हरिपुर काॅलोनी वार्ड में खसरा संख्या 22, 33/1 और 46/1 पर 21 अतिक्रमण दर्ज किए गए। वहीं हल्द्वानी खास क्षेत्र में खसरा संख्या 9 और 13 पर 106 अतिक्रमण चिन्हित हुए। इन सभी मामलों में जीपीएस कोऑर्डिनेट्स के साथ क्षेत्रफल दर्ज किया गया है जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह कोई आकस्मिक चूक नहीं बल्कि लम्बे समय से चला आ रहा व्यवस्थित कब्जा है।
रिपोर्ट का सबसे संवेदनशील और गम्भीर हिस्सा हल्द्वानी स्थित एक बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान ‘वाॅकवे’ माॅल से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार माॅल के समीप लगभग 40 वर्ग मीटर नाला भूमि पर अतिक्रमण पाया गया है। यह भूमि कैटेगरी 6(1) के अंतर्गत आती है, जिसे डूबी हुई नाला भूमि (Submerged Drain Land) माना गया है। इसी क्षेत्र में नाले को ढककर सड़क और मार्ग विकसित किया गया जिससे माॅल के लिए अलग आवागमन का अधिकार (Right of Way) उपलब्ध कराया जा सके और भारी ट्रैफिक तथा व्यावसायिक गतिविधियों को सुचारू रखा जा सके।
रिपोर्ट यह भी दर्ज करती है कि यह मार्ग लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के स्वामित्व में है, माॅल का इस पर कोई स्वामित्व नहीं है, मार्ग की चैड़ाई लगभग 5.5 से 6 मीटर है और यह मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा लोक निर्माण विभाग को हैंडओवर किया गया है। लेकिन रिपोर्ट यह भी स्वीकार करती है कि नाले की प्राकृतिक संरचना को माॅल के लिए बदला गया जो नियमों और पर्यावरणीय कानूनों के अनुसार प्रतिबंधित है।
इसी मामले की सुनवाई के दौरान 1 सितम्बर 2025 को पारित हाईकोर्ट के आदेश ने पूरे प्रकरण को निर्णायक मोड़ दे दिया। मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष वॉकवे माॅल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह स्वीकार किया कि रिपोर्ट में जिस अतिक्रमण की ओर संकेत किया गया है उसे निजी प्रतिवादी द्वारा दो माह के भीतर हटा दिया जाएगा। अदालत ने इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया है कि वे विशेष रूप से एक अधिकारी नामित करें जो अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई सुनिश्चित करे और उसकी एक्शन टेकन रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल करे।
माॅल प्रबंधन द्वारा अतिक्रमण स्वीकार किए जाने के बाद अब यह प्रश्न और गहरा हो गया है कि यदि अतिक्रमण था तो वह वर्षों तक कैसे बना रहा। किसकी अनुमति या किसकी लापरवाही से नाले की भूमि पर निर्माण और मार्ग विकसित हुआ। क्या यह महज प्रशासनिक चूक थी या फिर माॅल प्रबंधन और सम्बंधित विभागों के बीच मिलीभगत का परिणाम। सबसे अहम सवाल यह कि क्या केवल अतिक्रमण हटाना ही पर्याप्त होगा या फिर उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाएगी, जिनके कार्यकाल में यह सब सम्भव हुआ।
रिपोर्ट के अंतिम हिस्से में यह भी स्वीकार किया गया है कि प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने के लिए नोटिस जारी किए हैं लेकिन यह भी कहा गया है कि बड़ी संख्या में लोग तीन पीढ़ियों से इन क्षेत्रों में रह रहे हैं और अतिक्रमण हटाने से कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। इसके बावजूद कई मामलों में बिना समुचित सुनवाई और नोटिस के गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों के घर तोड़े जाने की शिकायतें सामने आई हैं।
इसी पृष्ठभूमि में उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने अन्य अतिक्रमण मामलों में भी बिना नोटिस ध्वस्तीकरण पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है। कोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किस प्रकार किया जा रहा है।
रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि भारत सरकार और एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीए) के बीच हुए 200 मिलियन डाॅलर के ऋण समझौते के तहत हल्द्वानी में 36 किलोमीटर ड्रेनेज और जल प्रबंधन संरचना विकसित की जानी है लेकिन मौजूदा अतिक्रमण की स्थिति में इस परियोजना का क्रियान्वयन असम्भव बताया गया है।
अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
देवखड़ी नाले और वाॅकवे माॅल से जुड़े पूरे मामले ने कई विभागीय सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस समय माॅल का निर्माण हुआ, उस समय निर्माण मानचित्र की स्वीकृति किस अधिकारी ने दी और किस आधार पर दी। जिला विकास प्राधिकरण (एचडीए) ने नाले की भूमि पर निर्माण को कैसे स्वीकृति दे दी। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), जिसके स्वामित्व में मार्ग बताया गया है, उसने नाले को ढकने पर आपत्ति क्यों नहीं की। जल विभाग, सिंचाई विभाग और नगर निगम जैसे विभाग, जिनका नालों और जल निकासी से सीधा सम्बंध है, वे इस पूरे समय खामोश क्यों रहे। क्या इन विभागों ने कोई आपत्ति दर्ज की या नहीं और यदि नहीं की तो क्यों? अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित रहेगी या फिर उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई करेगी जिनकी लापरवाही या मौन से यह अतिक्रमण वर्षों तक बना रहा।
सरकार के दावे बनाम जमीनी हकीकत
सरकार का दावा है कि राज्य भर में अतिक्रमण के खिलाफ अभियान चलाकर हजारों एकड़ सरकारी भूमि मुक्त कराई गई है। इस दावे के सहारे सरकार यह संदेश देना चाहती है कि कानून सबके लिए समान है लेकिन हल्द्वानी का देवखड़ी नाला मामला बताता है कि जमीनी स्तर पर तस्वीर अलग है। जहां गरीब और कमजोर वर्ग के घर बिना नोटिस तोड़े गए, वहीं एक बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान के मामले में अतिक्रमण वर्षों तक बना रहा और अंततः अदालत में स्वीकारोक्ति के बाद हटाने की बात सामने आई। यही विरोधाभास सरकार के दावों और वास्तविक अमल के बीच अंतर को उजागर करता है और यह सवाल खड़ा करता है कि क्या अतिक्रमण के खिलाफ अभियान वास्तव में निष्पक्ष है या फिर प्रभावशाली वर्ग के लिए नियम अलग हैं।
अतिक्रमण कर बसी है वैशाली काॅलोनी
हरिपुर कर्नल वार्ड में ही वैशाली काॅलोनी और कृष्ण कुंज नाम की दो काॅलोनियां हैं। नैनीताल रोड स्थित बृजलाल हाॅस्पिटल के नजदीक बनी इन काॅलोनियों में प्रशासन के अनुसार बंदोबस्ती नक्शे में दर्ज देवखड़ी नाला मौके पर गायब है। राजस्व विभाग के नक्शे के अनुसार देवखड़ी नाले से होते हुए ही बरसात का पानी नदी में जाता था, लेकिन इस नाले को पाट कर यहां पर काॅलोनियां बसा दी गई है जबकि यहां के निवासियों का कहना है कि जब भूमि खरीदी गई थी वहां पर न ही गूल न ही कोई नाला अस्तित्व में था जिसका दावा अब प्रशासन कर रहा है। बताया जाता है कि वैशाली काॅलोनी बसाने वाले वीरेंद्र गोयल पौड़ी सांसद अनिल बलूनी के खास लोगों में शुमार हैं। वैशाली काॅलोनी और कृष्ण कुंज में शहर के नामी लोगों के आवास हैं, जिनमें रिटायर्ड उच्च पदस्थ अधिकारी, डाॅक्टर और नेता शामिल हैं। हालांकि अभी ये विवाद नागरिकों और प्रशासन के बीच बना हुआ है कि यहां देवखड़ी नाला था भी या नहीं लेकिन उच्च न्यायालय में दाखिल रिपोर्ट देवखड़ी नाले के होने की पुष्टि करती है। सवाल यही है कि अगर देवखड़ी नाले को प्रशासन यहां खोज निकालता है तो उसके कार्रवाई करने की सीमा
क्या होगी?
नाले में अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं
देवखड़ी नाला राजस्व अभिलेखों में ड्रेन/नाला भूमि के रूप में दर्ज है। यह नाला दमुवाढूंगा बंदोबस्ती, हरिपुर कर्नल वार्ड तथा हल्द्वानी खास, इन तीन राजस्व गांवों से होकर गुजरता है। नाले का सर्वे बंदोबस्ती राजस्व मानचित्रों के आधार पर किया गया है। राजस्व अभिलेखों के अनुसार दमुवाढूंगा क्षेत्र में नाले की चैड़ाई 9 से 12 मीटर, हरिपुर कर्नल वार्ड क्षेत्र में 6 से 8 मीटर तथा हल्द्वानी खास क्षेत्र में 5 से 9 मीटर और कुछ स्थानों पर 9 से 10 मीटर तक प्रदर्शित है। नाले की लम्बाई, चैड़ाई एवं डूब क्षेत्र का निर्धारण इन्हीं राजस्व मानचित्रों के आधार पर किया गया है।
वर्ष 2024 में देवखड़ी नाले क्षेत्र में बादल फटने की आपदा के उपरांत एक समिति का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य नाले में अतिक्रमण की स्थिति का आकलन एवं चिन्हीकरण करना था। वर्ष 2024 से 2025 के मध्य मौके की स्थिति के आधार पर किए गए प्रारम्भिक सर्वेक्षण में कुल 203 अतिक्रमण चिन्हित किए गए। इसके पश्चात सम्बंधित व्यक्तियों को नोटिस निर्गत किए गए, जिनके माध्यम से यह आपत्ति प्राप्त हुई कि अतिक्रमण का चिन्हीकरण राजस्व नक्शों के स्थान पर केवल मौके की स्थिति के आधार पर किया गया है। प्राप्त आपत्तियों के क्रम में राजस्व अभिलेखों के अनुसार स्थायी बिंदुओं को फिक्स करते हुए पुनः सर्वे कराया गया। इस सर्वेक्षण में अब तक 140 अतिक्रमण ‘एज-पर रेवेन्यू रिकाॅर्ड’ चिन्हित किए जा चुके हैं, जबकि लगभग डेढ़ किलोमीटर का एक हिस्सा अभी चिन्हीकरण की प्रक्रिया में शेष है। प्रारम्भिक सर्वे में दर्शायी गई संख्या 203 अतिक्रमणों की थी, जिसमें किसी भी पक्के निर्माण को नहीं हटाया गया था। कुछ स्थानों पर व्यक्तियों द्वारा स्वयं अतिक्रमण हटाया गया है, किंतु वर्तमान में नाले से अतिक्रमण पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ है। यह विषय वर्तमान में माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।
देवखड़ी नाला जिन तीनों राजस्व गांवों से होकर गुजरता है, वहां नाले की भूमि का चिन्हीकरण राजस्व रिकाॅर्ड के अनुसार किया गया है। नाले की चैड़ाई प्रत्येक स्थान पर समान नहीं होने के कारण, सम्बंधित गांवों में राजस्व अभिलेखों में दर्ज चैड़ाई और लम्बाई के अनुसार ही डिमार्केशन किया गया है। जहां-जहां राजस्व रिकाॅर्ड में नाले की भूमि दर्ज है, वहीं अतिक्रमण चिन्हित किया गया है, चाहे वर्तमान में उस स्थान पर जल प्रवाह हो या न हो।
संयुक्त निरीक्षण के दौरान यह तथ्य सामने आया कि नाले के कई हिस्सों में उसकी प्राकृतिक धारा को ढक दिया गया है अथवा उसका मार्ग परिवर्तित किया गया है। कुछ क्षेत्रों में नाला मौके पर विद्यमान नहीं पाया गया, विशेष रूप से हरिपुर कर्नल वार्ड क्षेत्र में, जहां राजस्व रिकाॅर्ड में नाला दर्ज होने के बावजूद मौके पर उसका अस्तित्व नहीं है। इसी प्रकार कुछ स्थानों पर पक्की दीवारें बनाकर नाले को शिफ्ट किया गया है, जिससे प्राकृतिक जलधारा में छेड़छाड़ पाई गई है।
राजस्व अभिलेखों के अनुसार नाले की भूमि कैटेगरी 6(1), अर्थात डूब क्षेत्र वाली नाला भूमि के रूप में दर्ज है। नाले की भूमि पर किसी भी प्रकार का स्थायी निर्माण अनुमन्य नहीं है। कुछ स्थानों पर, विशेषकर बंदोबस्ती के ऊपर के क्षेत्रों में, भूमि भूमिधरी श्रेणी में दर्ज पाई गई है। जहां भूमिधरी भूमि दर्ज है, वहां अतिक्रमण सम्बंधी नोटिस निर्गत नहीं किए गए हैं। नोटिसों में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि नाले की भूमि पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं है तथा लम्बे समय से कब्जा होने, बिजली-पानी के बिल जमा करने अथवा कर भुगतान के आधार पर नाले की भूमि पर कोई अधिकार परिपक्व नहीं होता। नाले की भूमि से तत्काल कब्जा हटाने के सम्बंध में माननीय न्यायालय के निर्देश भी विद्यमान हैं।
निरीक्षण के दौरान यह भी पाया गया कि कुछ स्थानों पर नाले को ढककर मार्ग अथवा ‘राइट आॅफ वे’ विकसित किए गए हैं। नाले को ढकने की स्थिति में उसकी चैड़ाई एवं लम्बाई में किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए, ताकि नाले का प्राकृतिक प्रवाह बाधित न हो। नाले के ऊपर पुल अथवा ब्रिज का निर्माण स्वीकार्य हो सकता है, किंतु नाले को पूर्णतः ढक देना आपत्तिजनक है क्योंकि इससे जल प्रवाह में संकुचन उत्पन्न होता है और प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होता है।
देवखड़ी नाले से सम्बंधित अतिक्रमणों के सम्बंध में जल विभाग, सिंचाई विभाग अथवा पर्यावरण से सम्बंधित किसी भी विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लिए जाने के कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। कुछ व्यक्तियों द्वारा मानचित्र प्रस्तुत किए गए हैं, जिनमें नाले का उल्लेख है, किंतु उनमें दर्शायी गई नाले की चैड़ाई राजस्व अभिलेखों के अनुरूप नहीं पाई गई। निरीक्षण में यह भी सामने आया कि कुछ क्षेत्रों में लोग लम्बे समय से नाले के आस-पास निवास कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह जानकारी प्राप्त हुई कि पूर्व में इन क्षेत्रों में नाला बहता था। अधिकांश अतिक्रमण पिछले 20 से 25 वर्षों के बीच किए गए हैं। कुछ स्थानों पर अतिक्रमण पुराने हो सकते हैं, किंतु उस समय भी नाला विद्यमान था।
देवखड़ी नाले से सम्बंधित सभी अतिक्रमणों के सम्बंध में समान प्रक्रिया अपनाई गई है। सभी सम्बंधित व्यक्तियों को नोटिस निर्गत किए गए हैं तथा सभी को सुनवाई एवं आपत्ति प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया गया है। आपत्तियां प्राप्त करने हेतु मौके पर कैम्प भी आयोजित किए गए हैं और चिन्हीकरण की प्रक्रिया मौके पर सम्बंधित व्यक्तियों को अवगत कराते हुए की गई है। देवखड़ी नाला एक प्राकृतिक नाला है जो फुटहिल क्षेत्र का अधिकांश पानी वहन करता है। नाले में अतिक्रमण एवं प्रवाह में अवरोध के कारण हल्द्वानी शहर के विभिन्न क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति उत्पन्न होती है। इस समस्या के समाधान हेतु वर्तमान में यूयूएसडीए के माध्यम से ड्रेनेज योजना तैयार की जा रही है, जिसके अंतर्गत नाले के पानी को विभिन्न स्थानों से मूल नदी गोला में प्रवाहित किए जाने का प्रयास किया जा रहा है।
राहुल शाह, उप जिलाधिकारी हल्द्वानी
बात अपनी-अपनी
हमारी तरफ से कोई अतिक्रमण नहीं किया गया है। बंदोबस्ती के नक्शे में जितना नाला दर्शाया गया है वह अभी भी उतना ही है। मैं यहां पर 70 साल से रह रहा हूं, इससे मैनिपुलेट करके गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।
वाॅकवे माॅल पर जिस नाले की बात कही जा रही है वो यथावत है उसके बाद तो नाले का पता ही नहीं है। यह कहना कि माल का बेसमेंट नाले को कवर करके बनाया गया है पूरी तरह गलत है वह हमारी अपनी जमीन पर है। ‘वाॅकवे माॅल’ के बाहर कुछ दुकानें हैं जिन्हें अगर अतिक्रमण की श्रेणी में रखा जा रहा है तो मैं बताना चाहूंगा कि वह माॅल का हिस्सा नहीं हैं। बंदोबस्ती नक्शे में नाले की चैड़ाई 5 मीटर है जो की यथावत है। सरकार ने देवखड़ी नाले के पानी की निकासी के लिए व्यवस्था की है। जिससे इसे दो भागों में निकासी की व्यवस्था की है। निर्मला कान्वेंट के पास से नाले को गौला नदी में मिलने के लिए टेंडर भी हो चुके हैं।
नीरज शारदा, वॉकवे मॉल के कर्ताधर्ता
देवखड़ी नाले के विषय में माननीय उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लिया है, जिसमें उन्होंने देवखड़ी नाले को इस वाटर बाॅडी कर देते हुए कहा है कि इसमें से अतिक्रमण हटाया जाए। लेकिन इसमें दिक्कतें यह हैं कि कई ऐसे मकान हैं जिनकी रजिस्ट्री है वह फ्रीहोल्ड भी हैं। ये निर्माण आवास विकास या प्राधिकरण द्वारा या प्रशासन द्वारा जिनके मानचित्र स्वीकृत है, फ्री होल्ड हैं और सरकार के द्वारा हैं। इसमें सरकार को एक पक्ष बनना चाहिए और सरकार को पैरवी भी करनी चाहिए। सुभाष नगर, आवास विकास के लोग मेरे पास आए थे। 75 पक्षकारों के लिए वकील भी मैंने करवाए हैं। 80 के दशक में आवास विकास द्वारा आवास निर्मित हैं। सुभाष नगर के मकान भी रजिस्ट्री और फ्रीहोल्ड वाले हैं। इसमें आवास विकास को भी पार्टी बनाया जाना चाहिए क्योंकि उनके द्वारा स्वीकृत मानचित्र पर ही उसके द्वारा निर्माण करवाए गए हैं। हमें विश्वास है कि माननीय उच्च न्यायालय में पीड़ितों के साथ न्याय होगा।
सुमित हृदयेश, विधायक, हल्द्वानी
देवखड़ी का नाले का मामला माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन है तो इस सम्बंध में मेरा कोई भी टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।
दीपक रावत, कुमाऊं कमिश्नर
मेरे फादर ने जब प्रॉपर्टी खरीदी और उन्हें जितनी जानकारी थी जमीन खरीदने से पहले व्यक्ति सेल डीड, खतौनी और राजस्व नक्शा देखता है। हमने भी वही किया। रेवेन्यू मैप में गूल दर्ज थी, नाला शब्द कहीं नहीं था। अगर नाला दर्शाया गया होता तो हम शायद वह प्रोपर्टी खरीदते ही नहीं। गूल की चैड़ाई सामान्यतः ढाई से तीन फिट होती है। हमने जमीन को 143 कराया, दाखिल खारिज में कहीं भी नाले की समस्या नहीं बताई गई और मेरे अनुसार यहां पर नाला नहीं था। 1955-56 का जो रेवेन्यू मैप हमारे पास है उसमें भी नाला कहीं दर्ज नहीं है। सरकार जनता को सपोर्ट करती है और कर भी रही है और फिर हम गैर कानूनी काम क्यों करेंगे? अच्छे नागरिक होने के नाते मेरी भी ड्यूटी है कि मैं गलत तरीके से काम ना करूं। हमें नियमों के अंतर्गत ही काम करना चाहिए। अगर रेवेन्यू मैप और बंदोबस्ती नक्शे में कहीं नाला है तो हम छोड़ेंगे, अगर नाला नहीं है तो हम आपत्ति करेंगे। जब हमने जमीन खरीदी तो यह इससे पहले आवास विकास के पजेशन में थी, वह हमें समतल भूमि मिली थी। तब आप नाले की बात छोड़िए गूल भी अस्तित्व में नहीं थी। बाद में जो भी कारण रहे हो वह जमीन मूल मलिक को वापस हो गई और उनसे ही हमने जमीन खरीदी। जमीन खरीदने से पहले हर नागरिक का कर्तव्य है कि पूरे रिकाॅर्ड चेक करे और हमने भी वही किया। हम सरकार के साथ हैं और सरकार को भी नियम के अनुसार ही कार्य करना चाहिए।

