कालनेमि पस्त, सीएम मस्त
उत्तराखण्ड की राजनीति भीतर चल रही खामोश उठापटक अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। हालिया सम्पन्न भाजपा कोर कमेटी की बैठक ने स्पष्ट संकेत दिया है कि आगामी चुनाव मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। समय-समय पर उठते आंतरिक असंतोष के स्वर, सार्वजनिक मंचों से दिए गए बयान और शक्ति संतुलन की राजनीति के बीच धामी अब रक्षात्मक नहीं बल्कि प्रत्यक्ष और निर्णायक रणनीति के साथ आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं


भारतीय पौराणिक परम्परा में ‘कालनेमि’ का उल्लेख रामायण में मिलता है। जब लक्ष्मण मूर्छित पड़े थे और हनुमान संजीवनी लेने जा रहे थे तब कालनेमि नामक एक राक्षस ने साधु वेश धारण कर उन्हें मार्ग से भटकाने का प्रयास किया। उसका लक्ष्य सीधा युद्ध नहीं बल्कि भ्रम उत्पन्न कर गति रोकना था। अंततः उसका छल उजागर हुआ और वह परास्त हुआ।

उत्तराखण्ड की राजनीति में पिछले कुछ समय से जो घटनाक्रम सामने आए, उन्हें इसी रूपक में समझा जा सकता है, प्रत्यक्ष टकराव कम, संकेत अधिक, खुला विद्रोह नहीं, किंतु मुख्यमंत्री धामी सरकार  पर प्रश्नचिह्न लगा उन्हें हटाने की चक्रव्यूह रचना।
 
कोर कमेटी की बैठक : नेतृत्व पर अंतिम मुहर

देहरादून में गत् सप्ताह हुई भाजपा कोर कमेटी की बैठक महज संगठनात्मक औपचारिकता नहीं थी। पिछले कुछ महीनों से राजनीतिक गलियारों में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें, सम्भावित चेहरों की चर्चा और शक्ति संतुलन के समीकरणों पर फुसफुसाहटें चल रही थीं। बैठक के बाद जो संदेश बाहर आया, उसने इन अटकलों पर लगभग विराम लगा यह संकेत दे दिया है कि आगामी चुनाव मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व में ही लड़े जाएंगे। यह संदेश केवल कार्यकर्ताओं के लिए नहीं बल्कि उन सभी असंतुष्ट भाजपाइयों के लिए भी है जो बीते कुछ समय से धामी सरकार को अस्थिर करने में जुटे हैं।
 
संसद में खनन का मुद्दा और उसके निहितार्थ

ऐसे असंतुष्ट नेताओं में पहना नाम पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का है जिन्होंने हरिद्वार में कथित अवैध खनन का मुद्दा संसद में उठा धामी सरकार को बैकफुट में ला दिया था। विपक्ष ने इसे तुरंत लपक लिया और यह संदेश देने का प्रयास किया कि सरकार को अपने ही घर से प्रश्नों का सामना करना पड़ रहा है। त्रिवेंद्र रावत केवल खनन ही नहीं बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, स्थानीय निकायों की कार्यशैली और विकास योजनाओं की गति जैसे मुद्दों पर भी वक्तव्य देते रहते हैं। उनके समर्थक इसे सरकार का विरोध नहीं लोकतांत्रिक विमर्श बताते हैं जबकि विश्लेषकों का मानना है कि अपनी ही सरकार की संसद जैसे मंच पर आलोचना करना और सार्वजनिक तौर पर सरकार को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से घेरना प्रदेश भीतर चल रहे घमासान को सामने ला पार्टी और मुख्यमंत्री धामी के लिए बेहद असहज स्थिति पैदा करता है।
 
अरविंद पांडे प्रकरण : अनुशासन बनाम असहमति

रुद्रपुर से भाजपा विधायक अरविंद पांडे बीते महीनों में सरकार के प्रति सार्वजनिक रूप से आलोचनात्मक रुख अपनाते दिखे। उनके बयानों ने संगठन और सरकार, दोनों को असहज स्थिति में डाला। इसी दौरान मुख्यमंत्री धामी ने अपने ही विधायक के खिलाफ कथित जमीन कब्जे और अवैध निर्माण से जुड़े मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई कर स्पष्ट संकेत दिया। इसे राजनीतिक हलकों में ‘निष्पक्षता और दृढ़ता’ के प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। इस कार्रवाई के बाद पांडे रक्षात्मक मुद्रा में हैं। धामी का संदेश स्पष्ट है कि नेतृत्व अब सीधे आर या पार का मूड बना चुका है।
 
तीरथ सिंह रावत के वक्तव्य और राजनीतिक व्याख्या

पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत भी समय-समय पर संगठनात्मक समन्वय और परम्परागत मूल्यों पर अपने विचार रखते रहते हैं। उनके वक्तव्यों को लेकर विभिन्न राजनीतिक अर्थ निकाले गए। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से पार्टी अनुशासन की बात दोहराई लेकिन उत्तराखण्ड की राजनीति में हर वक्तव्य का प्रभाव व्यापक होता है।
 
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और राज्य की महत्वाकांक्षाएं

गढ़वाल से सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी की सक्रियता को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चाएं रहीं। राष्ट्रीय मीडिया में उनकी पकड़ और रणनीतिक भूमिका उन्हें प्रभावशाली बनाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य की राजनीति में उनकी स्वाभाविक रुचि और समर्थकों की अपेक्षाएं समय-समय पर चर्चा को जन्म देती हैं। सार्वजनिक रूप से उन्होंने कभी कोई दावा नहीं किया किंतु राजनीति में सम्भावनाओं की व्याख्या संकेतों से भी होती है। बलूनी के बारे में कहा जाता है कि वे अब राष्ट्रीय राजनीति का मोह त्याग उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं।

कुछ पर्यवेक्षक यह भी मानते हैं कि राष्ट्रीय विमर्श में प्रभाव रखने वाले नेता और राज्य नेतृत्व के बीच संतुलन साधना हमेशा सरल प्रक्रिया नहीं होती। गौरतलब है कि बलूनी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेहद करीबी हैं। भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख होने का भी उन्हें रणनीतिक लाभ है। सत्ता गलियारों में चर्चा बनी रहती है कि धामी सरकार के खिलाफ कई बार बेवजह खबरोें की यकायक बाढ़ आने के पीछे सुनियोजित राजनीतिक दांव-पेंच होता है।
 
याचना से रण की ओर

मुख्यमंत्री धामी की राजनीतिक शैली में अब स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है। प्रारम्भिक चरण में उन्होंने संवाद, संतुलन और सामंजस्य की रणनीति अपनाई। किंतु हालिया घटनाक्रमों के बाद उनका रुख अधिक निर्णायक और प्रत्यक्ष प्रतीत होता है। राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध पंक्ति ‘अब याचना नहीं, रण होगा’ के राजनीतिक रूपांतरण के रूप में देखते हैं। अरविंद पांडे के खिलाफ कार्रवाई और कोर कमेटी की बैठक इस बात के संकेत हैं कि धामी अब प्रतिरोध का सामना सीधे करने की नीति पर आगे बढ़ रहे हैं।
 
उपलब्धियां, चुनौतियां और चुनावी रणनीति

धामी सरकार ने समान नागरिक संहिता विधेयक, सख्त नकल-विरोधी कानून, निवेश नीति और धार्मिक पर्यटन के विस्तार को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया है। युवा मतदाताओं और पहली बार वोट देने वाली पीढ़ी में उनकी छवि एक ऊर्जावान और निर्णायक नेता की है। भाजपा की रणनीति इस छवि को चुनावी लाभ में बदलने की है। हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। रोजगार, पलायन, आपदा प्रबंधन और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे मुद्दे अब भी राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं।
 
संगठन और नेतृत्व का संतुलन

उत्तराखण्ड जैसे राज्य में संगठनात्मक संतुलन साधना किसी भी मुख्यमंत्री के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। भाजपा के भीतर विभिन्न धाराएं और वरिष्ठ नेतृत्व की उपस्थिति इसे और जटिल बनाती है। हालिया घटनाक्रमों से यह संकेत मिलता है कि धामी ने केंद्रीय नेतृत्व का विश्वास बनाए रखा है और संगठनात्मक संतुलन साधने में सफलता पाई है।
 
चक्रव्यूह के पार

उत्तराखण्ड भाजपा में समय-समय पर उठते सरकार विरोधी स्वर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा कहे जा सकते हैं किंतु हालिया कोर कमेटी बैठक ने स्पष्ट कर दिया है कि नेतृत्व स्थिर है और चुनावी रण की कमान धामी के हाथों में ही रहेगी।

‘कालनेमि पस्त, मुख्यमंत्री मस्त’ उस परिस्थिति का संकेत है जिसमें सम्भावित चक्रव्यूहों को भेदते हुए मुख्यमंत्री धामी ने अपनी स्थिति मजबूत की है। अब संकेत साफ है कि यदि चुनौती आएगी तो उसका उत्तर प्रत्यक्ष और निर्णायक होगा। उत्तराखण्ड की आगामी चुनावी कहानी इसी बदले हुए तेवर की कसौटी पर लिखी जाएगी लेकिन इस निष्कर्ष को केवल एक क्षणिक राजनीतिक विजय के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

उत्तराखण्ड की राजनीति की प्रवृति ही ऐसी है, जहां क्षेत्रीय संतुलन, संगठनात्मक वरिष्ठता, वैचारिक पृष्ठभूमि और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं एक साथ काम करती हैं। ऐसे में किसी भी मुख्यमंत्री के लिए केवल प्रशासन चलाना ही नहीं बल्कि विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच संतुलन साधना भी अनिवार्य हो जाता है। धामी के सामने यही सबसे बड़ी कसौटी रही है और आगे भी रहेगी लेकिन पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नेतृत्व अब परिस्थितियों के दबाव में प्रतिक्रिया देने की शैली से आगे बढ़ चुका है। पहले जहां संवाद और समन्वय को
प्राथमिकता दी जाती थी, वहीं अब आवश्यकता पड़ने पर कठोर प्रशासनिक कदम उठाने से भी परहेज नहीं किया जा रहा है। अपने ही विधायक के खिलाफ कार्रवाई इसका उदाहरण है। यह संदेश केवल व्यक्ति विशेष के लिए नहीं बल्कि संगठन के भीतर और बाहर सभी के लिए था कि शासन की रेखा स्पष्ट है और उसे लांघने पर कठोर परिणाम भुगतने होंगे।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह बदलाव आगामी चुनावों की तैयारी का हिस्सा भी है। भाजपा एक स्थिर और निर्णायक नेतृत्व की छवि के साथ मैदान में उतरना चाहती है। ऐसे समय में आंतरिक असंतोष की सार्वजनिक अभिव्यक्ति विपक्ष के लिए अवसर बन सकती थी। कोर कमेटी की बैठक से निकला संदेश इस सम्भावना पर विराम लगाने का प्रयास है। साथ ही यह भी सच है कि उत्तराखण्ड जैसे राज्य में व्यक्तिगत समीकरण पूरी तरह समाप्त नहीं होते, वे केवल नए संतुलन में ढलते हैं। वरिष्ठ नेताओं की भूमिका, संगठन की अपेक्षाएं और केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताएं आदि सभी कारक आगे भी सक्रिय रहेंगे। धामी के लिए चुनौती यह होगी कि वे निर्णायकता और समावेशिता के बीच संतुलन बनाए रखें। यदि वे विकास, रोजगार, निवेश और क्षेत्रीय संतुलन जैसे मुद्दों पर ठोस परिणाम दिखाने में सफल रहते हैं तो आंतरिक असंतोषी स्वर स्वतः पृष्ठभूमि में चले जाएंगे लेकिन यदि प्रशासनिक गति धीमी पड़ी तो वही स्वर फिर मुखर हो सकते हैं। राजनीति में चक्रव्यूह एक बार टूटने से समाप्त नहीं होते, वे समय-समय पर नए रूप में सामने आते हैं।

फिलहाल तस्वीर यही है कि नेतृत्व ने अपने विरोधियों को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब याचना नहीं, प्रत्यक्ष मुकाबला होगा। उत्तराखण्ड की राजनीति का आगामी अध्याय इसी दृढ़ता, संतुलन और रणनीतिक कौशल की परीक्षा लेने वाला है। मुख्यमंत्री धामी के लिए यह केवल पद की रक्षा का प्रश्न नहीं बल्कि राजनीतिक परिपक्वता और दीर्घकालिक नेतृत्व स्थापित करने की चुनौती भी है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि ‘कालनेमि पस्त’ की यह कथा स्थायी राजनीतिक स्थिरता में बदलती है या फिर नए चक्रव्यूहों की प्रस्तावना बनती है।

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