अजित पवार के निधन बाद महाराष्ट्र की राजनीति इस समय ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां हर मुलाकात नए सियासी समीकरणों को जन्म दे रही है। गत दिनों पहले शरद पवार और उनके बड़े पोते पार्थ की मुलाकात और फिर शरद पवार, पार्थ और जय पवार के बीच बंद कमरे में हुई बैठक के बाद शरद पवार ने प्रेस वार्ता में साफ किया कि फिलहाल उनका ध्यान परिवार को दुख से उबारने पर है और विलय या राजनीतिक फैसलों पर कोई चर्चा नहीं हुई है। उन्होंने सुनेत्रा पवार के उपमुख्यमंत्री बनने पर खुशी जताते हुए कहा कि ‘हमारा परिवार एक साथ है।’ लेकिन इस बैठक का मकसद चाहे जो भी हो सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल और गहरा गया है कि क्या अब एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की जमीन तैयार हो रही है या फिर यह सिर्फ एक पारिवारिक संवेदना की मुलाकात थी। क्या शरद पवार अपनी राजनीतिक विरासत पार्थ को सौंपने के लिए तैयार हैं? राजनीतिक विश्लेषक इसे तूफान से पहले की शांति मान रहे हैं। ऐसे में यदि विलय की अटकलें सच साबित होती हैं तो यह महाराष्ट्र की राजनीति का अब तक का सबसे बड़ा यू-टर्न हो सकता है। जानकार कहते हैं कि पार्थ पवार की बढ़ती सक्रियता, शरद पवार की चुप्पी और सत्ता पक्ष की मजबूत गणितीय स्थिति महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। सवाल बस इतना है कि यह बदलाव
पारिवारिक एकजुटता के नाम पर होगा या फिर राजनीतिक पुनर्गठन के रूप में। सबसे ज्यादा चर्चा पार्थ पवार की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को लेकर है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्थ की नजर अपनी मां सुनेत्रा पवार की मौजूदा राज्यसभा सीट पर नहीं है क्योंकि उनका कार्यकाल 2028 तक सीमित है। असल लक्ष्य अप्रैल 2026 में खाली होने वाली 7 राज्यसभा सीटें हैं, जिनका कार्यकाल पूरे छह साल का होगा। इनमें से एक सीट खुद शरद पवार की है। महाराष्ट्र से राज्यसभा पहुंचने के लिए किसी उम्मीदवार को कम से कम 37 विधायकों के वोट चाहिए। फिलहाल एनसीपी (अजित गुट) के पास 41 विधायक हैं जो पार्थ पवार को आसानी से संसद भेजने के लिए पर्याप्त हैं। ऐसे में कुछ तो सियासी खिचड़ी पक रही है जो कुछ ही दिनों में सबके सामने होगी।
उत्तर प्रदेश के निलम्बित पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री के हालिया बयानों ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। सबसे अहम संकेत यह बयान कि सामान्य वर्ग और ओबीसी की दुर्दशा को लेकर एक विकल्प तैयार किया जा रहा है। यह वही सामाजिक आधार है जो लम्बे समय से खुद को राजनीतिक रूप से असहज महसूस करता रहा है कि न पूरी तरह सत्ता में, न ही निर्णायक विपक्ष में। सियासी गलियों में चर्चा जोरों पर है कि क्या अलंकार अग्निहोत्री सियासत में हाथ आजमाना चाहते हैं? राजनीतिक पंडितों की मानें तो प्रशासनिक सेवा छोड़ने के बाद जिस तेवर में वे सामने आए हैं, उससे साफ संकेत मिलते हैं कि यह सिर्फ विरोध नहीं बल्कि राजनीतिक विकल्प की जमीन तैयार करने की कोशिश है। अगर यह वर्गीकरण संगठित रूप लेता है तो यह मौजूदा जातीय और ध्रुवीकरण आधारित राजनीति को चुनौती दे सकता है। हालांकि, अलंकार अग्निहोत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि प्रशासनिक असंतोष को राजनीतिक संगठन में कैसे बदला जाए। बयान और तेवर से चर्चा जरूर बनती है, लेकिन जमीन पर संगठन, नेतृत्व और स्पष्ट एजेंडा के बिना यह प्रयास सीमित रह सकता है। इतना तय है कि अलंकार अब केवल पूर्व अफसर नहीं रहे। उनके शब्द यह संकेत दे रहे हैं कि वे खुद को व्यवस्था के भीतर से निकले एक विकल्प के रूप में पेश करना चाहते हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह तेवर एक आंदोलन बनता है या महज असंतोष की आवाज बनकर रह जाता है। गौरतलब है कि यूजीसी के नए नियमों को लेकर अलंकार अग्निहोत्री ने जिस तरह जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल उठाए वह सीधे तौर पर सत्तारूढ़ राजनीति पर हमला है। उनका आरोप है कि आज की राजनीति व्यक्तिगत जनाधार नहीं बल्कि चेहरे और ध्रुवीकरण पर टिकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव जीतने और बाद में हिंदू-मुस्लिम राजनीति करने का आरोप इसी रणनीति की ओर इशारा करता है। ब्रजभूषण शरण सिंह और राजा भैया का उदाहरण देकर उन्होंने यह स्पष्ट किया कि स्वतंत्र जनाधार वाले नेता ही सिस्टम के खिलाफ बोलने का साहस कर पाते हैं। यह बयान परोक्ष रूप से भाजपा नेतृत्व और उसके भीतर के ब्राह्मण चेहरों पर भी दबाव बनाता है।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी के साथ ही सियासी हलचल तेज हो गई है। सत्तारूढ़ भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति बना रही है वहीं समाजवादी पार्टी सरकार में लौटने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। इसी बीच प्रदेश की राजनीति में तीसरे मोर्चे की सम्भावनाओं ने नए समीकरणों को जन्म दे दिया है। मुस्लिम वोट बैंक पर लम्बे समय से निर्भर रही सपा के सामने अब एआईएमआईएम, आजाद समाज पार्टी और अन्य छोटे दलों के एकजुट होने की चुनौती उभरती दिख रही है। बिहार में चुनावी सफलता और महाराष्ट्र के बीएमसी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद एआईएमआईएम का आत्मविश्वास बढ़ा है और पार्टी अब उत्तर प्रदेश में आक्रामक विस्तार की तैयारी में है। एआईएमआईएम के यूपी अध्यक्ष शौकत अली के मुताबिक पार्टी आगामी चुनाव में करीब 200 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर चुकी है। पश्चिमी यूपी के साथ-साथ बहराइच, गोंडा, आजमगढ़, जौनपुर और पूर्वांचल के कई इलाकों में पार्टी सक्रिय है। शौकत अली ने सपा पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी मुसलमानों से वोट तो लेती है लेकिन उन्हें राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं देती। इधर कांग्रेस से इस्तीफा दे चुके नसीमुद्दीन सिद्दीकी को लेकर भी सियासी चर्चाएं तेज हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि वे आजाद समाज पार्टी या एआईएमआईएम से जुड़ सकते हैं या फिर अपनी अलग पार्टी बनाकर तीसरे मोर्चे को और मजबूती दे सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यूपी की 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। ऐसे में यदि तीसरा मोर्चा मजबूती से उभरता है तो इसका सीधा असर सपा के चुनावी गणित पर पड़ सकता है। हालांकि यह भी सवाल है कि विपक्षी वोटों का बिखराव अंततः भाजपा के लिए फायदेमंद साबित होगा या नहीं इसका जवाब चुनाव परिणाम ही देंगे।

