माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।
                                                                                         -कबीर दास

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की दूर दृष्टि का ही परिणाम है कि आज हम वैश्विक स्तर पर एक वैज्ञानिक सोच रखने वाले राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर पाए हैं। आधुनिक भारत के निर्माण को लेकर नेहरू दूर दृष्टि रखते थे। उन्होंने भांप लिया था कि भविष्य का भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सहारे ही आगे बढ़ पाएगा, न कि केवल परम्परागत मान्यताओं पर। उनकी इस दूर दृष्टि का प्रमाण हैं भारतीय विज्ञान संस्थान, टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, परमाणु ऊर्जा आयोग, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, इंडियन स्पेस रिसर्च  ऑर्गेनाइजेशन, आईआईटी, नेशनल केमिकल लेबोरेटरी, नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी, नेशनल एयरोनाॅटिक्स लेबोरेटरी, एम्स, नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ वायरोलाॅजी, सेंटर ड्रग रिसर्च इंस्टीच्यूट, इंडियन काउंसिल फाॅर एग्रीकल्चरल रिसर्च, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीच्यूट इत्यादि- इत्यादि। उनका कहना था- ‘विज्ञान ही भविष्य का रास्ता है और हमें अपने समाज को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित करना होगा।’
महाकुम्भ का भव्य आयोजन पर खर्च किए जा रहे कई सौ करोड़ की भारी-भरकम धनराशि और इस महा आयोजन के दौरान कुव्यवस्थाओं के चलते काल-कवलित आमजन, सरकारी तंत्र का पूरी तरह हिंदूमय हो जाने चलते मुझे नेहरू की, उनके विजन की और धर्म के प्रति उनके प्रगतिशील सोच की याद हो आई। बीते 77 बरसों में हम, हमारा समाज, हमारी सोच कितनी बदल गई, कितनी संकीर्ण सोच का देश बनकर हम रह गए हैं। अपनी आत्मकथा ‘An Autobiography’ (1936) में कुम्भ मेले का जिक्र करते हुए नेहरू ने लिखा है कि ‘कुम्भ मेला भारतीय जनमानस की एक अद्भुत शक्ति को दर्शाता है, जहां लाखों लोग एक साथ एकत्र होते हैं, लेकिन यह आयोजन अंधविश्वास और अव्यवस्था का भी प्रतीक है।’
नेहरू मानते थे कि कुम्भ जैसे पर्व केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय जनमानस को एक साथ जोड़ने का माध्यम भी हैं। नेहरू ने कुम्भ को भारत के सांस्कृतिक पर्यटन से जोड़ते हुए इसे देश की छवि को विश्व के सामने प्रस्तुत करने का माध्यम बताया था। उनका कहना था कि ‘यदि कुम्भ सरीखे आयोजन बेहतर ढंग से आयोजित किए जाएं तो वे भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर अधिक सकारात्मक रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।’ इस सोच के साथ आजादी की यात्रा शुरू करने वाला देश मात्र 77 बरसों में कितना बदल गया है इसे उत्तर प्रदेश के  प्रयागराज में इन दिनों चल रहे महाकुम्भ आयोजन से समझा जा सकता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की विशाल सोच और संस्कृति वाला भारत अब ‘बटेंगे तो कटेंगे’ वाला भारत बन चुका है और कुम्भ सरीखे आयोजनों से आध्यात्मिमकता गायब है। इसका गहरा सम्बंध पूंजीवाद, राजनीति और व्यवसायिक हितों से जुड़ चुका है। आमजन ‘फोमो’ (Fear of Missing Out) की जकड़ में आ नाना प्रकार की बाधाओं, असुविधाओं का सामने करने को तैयार है क्योंकि उसे हर कीमत पर कुम्भ जाना ही जाना है। दूसरी तरफ प्रमुख उद्योगपतियों, व्यापारियों, राजनीतिज्ञों आदि के लिए विशेष व्यवस्थाएं हैं, निजी स्नान घाट हैं, वातानुकूलित टेंट है। स्वामी विवेकानंद ऐसे में मुझे याद आ रहे हैं। उनका मनना था कि ‘धर्म का उद्देश्य आत्मकल्याण और मानवता की सेवा है, न कि व्यापार और व्यक्तिगत लाभ।’ कबीर ने तो धार्मिक पाखंड और व्यापारिक प्रवृत्तियों पर अपने दोहों के जरिए  जमकर कठोर प्रहार किए। कबीर का कहा वर्तमान में कुम्भ मेले जैसे पवित्र आयोजन को ‘इवेंट’ बनाने वालों और वहां पहुंच स्नान कर सोशल मीडिया में उसे प्रसारित करने वाले आम और खास जन पर सटीक बैठता है। कबीर कहते हैं- ‘माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर’ अर्थात सिर्फ बाहरी दिखावे के लिए माला जपने से कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं होता। जब तक मन की शुद्धि नहीं होगी, तब तक असली आस्था सम्भव नहीं। हमारी आस्था हमें बताती है कि अमृत को पाने के लिए देवताओं और असुरों ने क्षीर सागर में मंदराचल नामक पर्वत को मथनी और शेष नाग को रस्सी बना, समुद्र मंथन किया। इस मंथन से जो मिला उसमें एक अमृत कलश भी था जिसको लेकर देव-असुर संग्राम हुआ। इस संग्राम के दौरान जिन चार स्थानों पर अमृत की बूंदे गिरी वहीं कुम्भ का आयोजन किया जाता है। प्रयागराज इन चार स्थानों में से एक है जहां वर्तमान कुम्भ चल रहा है। इस पवित्र मेले को लेकिन बाजारवाद ने, राजनीति ने अमृत के बजाय विष मंथन का अखाड़ा बना रख दिया। इस महाकुम्भ में सत्ता मंथनी बनी और मीडिया रस्सी। मंथन से अमृत कलश के बजाय विष कलश निकला। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की संस्कृति को इस विष ने समाप्त कर डाला। कबीर ने कहा है कि ‘पंडित होए के झूठ बोले, सो कबिना न सुहाए। गली-गली बह डोलता, हरि मंदिर बताए।’ अर्थात जो पंडित होकर भी झूठ बोलता है, वह सच्चा धार्मिक नहीं हो सकता। जो हर जगह धर्म का व्यापार करता, वह सच्चा संत नहीं है। इस कुम्भ में ऐसे-ऐसे संत देखने को मिले जिन्हें संत कहना संतई परम्परा का अपमन होगा। स्मरण रहे चरम पर पहुंचा पूंजीवाद धर्म को हथियार बनाता है, जन उन्माद पैदा करने की कोशिश करता है। यही कुछ इस महाकुम्भ में देखने को मिला है। ‘फोमो’ मानसिकता इसी पूंजीवाद ने गजब की पैदा की। इसी पूंजीवाद ने इस आयोजन की पवित्रता को तार-तार करने, साधु-संत, नागा, जंगम, नाथ योगियों आदि सभी को बाजार में बिकने वाला समान बना डाला। सोचिए, हम और हमारा समाज, हमारा राष्ट्र किस अद्योगति का शिकार बीते 77 बरसों के दौरान हो गया है? कुम्भ मेले का इतिहास हमारे स्वतंत्रता संग्राम से भी जुड़ता है। 1857 की क्रांति से ठीक पहले आयोजित कुम्भ में अंग्रेज सत्ता के खिलाफ रणनीति बनाने के लिए क्रांतिकारियों ने कुम्भ में गुप्त बैठकें की थी। 1921 के प्रयागराज कुम्भ मेले के दौरान महात्मा गांधी ने ‘असयोग आंदोलन’ में शामिल होने के लिए आम जनता को सम्बोधित किया था। उनके आह्वान के बाद संन्यासियों और नागा साधुओं तक ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था।
जवाहरलाल नेहरू और स्वतंत्रता संग्राम के अन्य नेताओं ने ब्रिटिश सरकार द्वारा इलाहाबाद में कुम्भ मेले के दौरान गंगा स्नान पर लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन किया था। यह घटना 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान हुई थी।1930 के दशक में, जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था, ब्रिटिश सरकार को डर था कि कुम्भ मेले का इस्तेमाल स्वतंत्रता संग्राम को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है। इलाहाबाद (प्रयागराज) के कुम्भ मेले में ब्रिटिश सरकार ने लोगों के गंगा में सामूहिक स्नान पर प्रतिबंध लगा दिया।
सरकार को यह डर था कि कुम्भ मेले में लाखों लोगों की उपस्थिति का फायदा उठाकर स्वतंत्रता सेनानी ब्रिटिश विरोधी प्रदर्शन और सभाएं कर सकते हैं। इसके अलावा, कुम्भ मेले में सत्याग्रह और स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष में जनजागृति से अंग्रेजों की सत्ता कमजोर हो सकती थी। जब ब्रिटिश सरकार ने गंगा स्नान पर प्रतिबंध लगाया तो जवाहरलाल नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन और अन्य नेताओं ने इसका विरोध किया। नेहरू ने हजारों सत्याग्रहियों के साथ गंगा में स्नान करने का आह्वान किया। ब्रिटिश सरकार ने कुम्भ क्षेत्र में धारा 144 लागू कर दी, जिससे लोगों को एकत्र होने से रोका जा सके। लेकिन नेहरू और उनके अनुयायियों ने सैकड़ों लोगों के साथ संगम पर पहुंचकर गंगा स्नान किया और इस प्रतिबंध को तोड़ा। यह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक बड़ा विरोध प्रदर्शन बना और एक प्रतीकात्मक विद्रोह के रूप में देखा गया। आंदोलन के बाद ब्रिटिश सरकार ने नेहरू सहित कई सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया और कई लोगों को जेल में डाल दिया।
नेहरू के इस साहसिक कार्य से पूरे देश में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आक्रोश फैल गया। लोगों ने ब्रिटिश सरकार की नीतियों का खुलकर विरोध किया और सविनय अवज्ञा आंदोलन को और अधिक ताकत मिली। ब्रिटिश सरकार को अंततः इस प्रतिबंध को हटाना पड़ा था। यह घटना स्वतंत्रता संग्राम में धार्मिक और राष्ट्रीय चेतना के मिलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण थी। इससे साबित हुआ कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक अधिकारों की रक्षा भी शामिल थी। नेहरू ने इस आंदोलन के माध्यम से दिखाया कि ब्रिटिश सरकार के दमनकारी कानूनों का अहिंसात्मक तरीके से विरोध किया जा सकता है और सत्याग्रह की शक्ति से इन्हें तोड़ा जा सकता है। नेहरू का यह आंदोलन ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एक बड़े जनांदोलन में बदल गया। इसने स्वतंत्रता संग्राम को और अधिक गति दी और कुंभ मेला एक बड़े राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बन गया। यह घटना भारतीय जनता की धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकारों और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गई। इसलिए कुंभ मेला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित हुआ।
1941 के हरिद्वार में कुम्भ के दौरान क्रांतिकारियों ने गुप्त बैठकों का आयोजन किया था। इन बैठकों में नागा साधुओं और हरिद्वार स्थित अखाड़ों ने जमकर हिस्सेदारी की थी। इससे पहले 1770 से 1802 के मध्य बंगाल और बिहार में अंग्रेज प्रभुत्व के खिलाफ पहला सशस्त्र विद्रोह जिसे ‘संन्यासी विद्रोह’ कह पुकारा जाता है, इसका केंद्र बिंदु भी कुम्भ मेला ही था। अब लेकिन यह आयोजन पूंजीवाद और सत्ता तंत्र के महिमामंडन तक सीमित होकर रह गया है। स्वामी विवेकानंद, जिन्हें वर्तमान सत्ता बेहद ‘आदर’ भाव से याद करती है, का कहना था कि ‘यदि धर्म में व्यवसायिकता हावी हो गई तो यह उसकी मूल भावना को नष्ट कर देगा।’
कुम्भ-महाकुम्भ का वर्तमान स्वरूप हम सबके सामने है। विचार करें कि क्या इसका आध्यात्मिक स्वरूप और सांस्कृतिक विरासत बना हुआ, बचा हुआ है? या फिर मात्र एक बाजार बनकर रह गया है? इस चिंतन को करते हुए कबीर का कहा भी याद कर लें कि-

‘पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहाड़।
ता से तो चक्की भली, पीस खाए संसार।’

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