भारतीय संगीत जगत में अपनी भावुक आवाज से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले अरिजीत सिंह ने हाल ही में फिल्मों के लिए प्लेबैक सिंगिंग छोड़ने का ऐलान कर अपने प्रशंसकों को चौंका दिया है। इस फैसले के बाद उनके भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं और अब उनके राजनीति में आने की अटकलें भी सामने आ रही हैं। सूत्रों के मुताबिक अरिजीत राजनीति में कदम रखने की तैयारी कर सकते हैं और इसके लिए एक नए राजनीतिक दल की योजना पर काम चल रहा है। हालांकि उनकी विचारधारा या एजेंडे को लेकर अभी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अरिजीत सिंह की पहचान हमेशा एक बेहद सादगी पसंद कलाकार के रूप में रही है। वो आज भी पश्चिम बंगाल के मुशिज़्दाबाद जिले के जियागंज में रहते हैं। दिखावे से दूर रहना उनकी पहचान रही है। यही कारण है कि जब उनके राजनीति में आने की चर्चा शुरू हुई तो लोगों ने इसे आम सिलेब्रिटी का कदम नहीं बल्कि एक सोच-समझकर लिया गया निर्णय माना। गौरतलब है कि अरिजीत सिंह ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि वह फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग नहीं करेंगे लेकिन स्वतंत्र संगीत और निजी प्रोजेक्ट्स जारी रखेंगे। उन्होंने अपने फैसले के पीछे कई वजहों का जिक्र कर कहा कि वो लम्बे समय से एक जैसे ढर्रे से ऊब चुके थे और कुछ नया करना चाहते हैं। संगीत के प्रति उनका प्यार कम नहीं हुआ है लेकिन वह अब खुद को नए रूप में तलाशना चाहते हैं। यही तलाश शायद उन्हें राजनीति की ओर ले जा रही है। पिछले एक दशक से बॉलीवुड में प्रेम और भावनाओं की आवाज रहे अरिजीत ने हर बड़े सितारे के साथ अपनी छाप छोड़ी है। अब सवाल यही है कि क्या वह राजनीति में भी उतनी ही गहरी छाप छोड़ पाएंगे या नहीं। फिलहाल सभी की नजरें उनके अगले कदम पर टिकी हैं।
हिमाचल प्रदेश में भले ही विधानसभा चुनाव अगले साल के अंत में प्रस्तावित हैं लेकिन सियासी सरगमिज़्यां अभी से तेज हो चुकी हैं। सरकार और विपक्ष, दोनों खेमों में बयानबाजी और संकेतों की राजनीति का दौर शुरू हो गया है। इसी कड़ी में लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह की एक सोशल मीडिया पर बिना किसी का नाम लिए लिखा कि ”नेतृत्व वह नहीं होता जो सिर्फ सत्ता में नजर आए बल्कि असली हिमाचली नेता वह है जो संकट के समय ढाल बनकर खड़ा हो, विकास में साझेदार बने और हर परिस्थिति में अपने लोगों के साथ मौजूद रहे।” इस पोस्ट ने राजनीतिक गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है। मंत्री की इस टिप्पणी के मायने निकाले जाने लगे हैं। माना जा रहा है कि यह पोस्ट विपक्ष पर परोक्ष हमला है, खासकर ऐसे समय में जब प्रदेश प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है। हाल के महीनों में भारी बारिश, भूस्खलन, जगह-जगह बंद सड़कें, क्षतिग्रस्त पुल और कमजोर हुई बुनियादी संरचनाएं प्रदेश के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभरी हैं। इसी पृष्ठभूमि में विक्रमादित्य सिंह के बयान को अहम माना जा रहा है। उन्होंने सीधे तौर पर किसी दल या नेता का नाम नहीं लिया लेकिन उनके शब्द जमीन पर सक्रिय नेतृत्व और सिर्फ बयानबाजी तक सीमित राजनीति के बीच फर्क को उजागर करते हैं। संदेश साफ है कि संकट के समय जनता के बीच मौजूद रहना ही असली नेतृत्व की कसौटी है। इस पोस्ट को लोक निर्माण विभाग के कामकाज से भी जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि विक्रमादित्य सिंह की यह सोशल मीडिया पोस्ट सिर्फ एक व्यक्तिगत विचार नहीं बल्कि इसे आने वाले चुनावी माहौल की आहट के रूप में देखा जा रहा है। हिमाचल की राजनीति में नेतृत्व, सक्रियता और जमीन से जुड़ाव जैसे मुद्दे अब धीरे-धीरे केंद्र में आते नजर आ रहे हैं और यह सियासी हलचल आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीनों का समय शेष है लेकिन चुनाव से पहले प्रदेश की राजनीति में बड़ी हलचल दिख रही है। एक ओर जहां टीएमसी से निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर मुस्लिमों को एक करने की योजना बना रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस के मजबूत वोट बैंक माने जाने वाले मुस्लिम समुदाय में गहरी बेचैनी है। साथ ही उनका आरोप है कि ममता बनर्जी अब मुस्लिमों के साथ दिखाई नहीं देती हैं। उनका मुस्लिमों से मोहभंग हो चुका है। ममता के मुस्लिम वोट बैंक को तोड़ने के लिए हुमायूं कबीर की नई पार्टी ‘जनता उन्नयन पार्टी’, इंडियन सेक्युलर फ्रंट और कुछ अन्य छोटे संगठनों ने सम्भावित गठबंधन के संकेत दिए हैं वहीं दूसरी तरफ टीएमसी विधायक मनोरंजन बापरी के एक सोशल मीडिया पोस्ट में भाजपा और सीपीआई (एम) दोनों के कायज़्कताओज़्ं की खुले तौर पर तारीफ कर ममता की मुश्किलें बढ़ा दी है। गौरतलब है कि हुगली जिले के बालागढ़ से विधायक मनोरंजन बापरी ने अपने पोस्ट में दो निजी अनुभव साझा किए। पहली घटना सेंट्रल कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की एक बैठक से लौटते समय की है जब डंकुनी टोल प्लाजा पर भाजपा कार्यकर्ताओं के विरोध के दौरान पहचान होने पर उन्होंने न सिर्फ बापरी से नरमी से बात की बल्कि आगे बढ़ने की अनुमति भी दी। बापरी ने इसे विपक्षी कार्यकर्ताओं से मिला सम्मान बताया। दूसरी घटना हाल ही की है जब वह कोलकाता इंटरनेशनल बुक फेयर से सार्वजनिक वाहन में लौट रहे थे। घुटने की सर्जरी के कारण खड़े होने में परेशानी देखकर सीपीआई (एम) के युवा कार्यकर्ता ने अपनी सीट उन्हें देने की पेशकश की। बातचीत के दौरान राजनीतिक मतभेदों के बावजूद आपसी सम्मान और सहमति के क्षण सामने आए। बापरी ने दावा किया कि एक विधायक के तौर पर उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि जनता से मिला सम्मान है, चाहे उनकी राजनीतिक विचारधारा कुछ भी हो। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल की राजनीति में वैचारिक मतभेदों के बावजूद आपसी सम्मान और दोस्ती की परंपरा रही है, जिसकी मिसाल सिद्धार्थ शंकर रॉय, ज्योति बसु, बुद्धदेव भट्टाचार्य और एलके आडवाणी जैसे नेताओं के रिश्ते हैं। हालांकि मौजूदा सियासी माहौल में टीएमसी विधायक की यह पोस्ट पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा करती दिख रही है और ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ा सकती है।
कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच रस्साकशी लम्बे समय से चली आ रही है। कई बार यह विवाद दिल्ली तक पहुंचता रहा है लेकिन सिद्धारमैया सीएम की कुर्सी पर बने हुए हैं। इस बीच मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी मामले में विशेष अदालत द्वारा क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने से उन्हें बड़ी राहत मिली है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब कांग्रेस के भीतर राज्य के नेतृत्व को लेकर चचाएज़्ं तेज हैं। क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के कई राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि क्या यह क्लोजर रिपोर्ट कांग्रेस नेतृत्व और सरकार दोनों के लिए राहत लेकर आई है? सवाल यह भी है कि क्या यह फैसला केवल कानूनी राहत है या आने वाले दिनों में इसका राजनीतिक असर भी दिखेगा? क्या क्लोजर रिपोर्ट ने सिद्धारमैया को संजीवनी देने का काम किया है? सर्वविदित है कि कनार्टक कांग्रेस में काफी समय से दो गुटों के बीच तनातनी चल रही है। एक तरफ सरकार के भीतर नेतृत्व को लेकर चर्चाएं हैं तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ चल रहे मामलों पर भी सबकी नजर रही है। ऐसे माहौल में मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी केस में अदालत द्वारा लोकायुक्त पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किया जाना सिद्धारमैया के लिए बड़ी राहत है। गौरतलब है कि मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी मामला लम्बे समय से विपक्ष का बड़ा हथियार बना हुआ था। आरोप थे कि मुख्यमंत्री के परिवार को नियमों के खिलाफ साइटें आवंटित कर करोड़ों का फायदा पहुंचाया गया। जांच, ईडी की एंट्री, कोर्ट की सुनवाई और लगातार उठते सवालों के बीच सिद्धारमैया की राजनीतिक स्थिति पर दबाव बना हुआ था। ठीक इसी दौर में जब उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के साथ नेतृत्व को लेकर खींचतान की चर्चाएं तेज हैं, तब अदालत का यह फैसला कांग्रेस नेतृत्व और सरकार दोनों के लिए राहत लेकर आया है।

