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कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना

भारतीय सिनेमा की फिल्म ‘सीआईडी’ का एक गीत है ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’। ये बोल इन दिनों भाजपा आलाकमान पर फिट बैठते नजर आ रहे हैं। असल में उत्तर प्रदेश में मिली चुनावी हार को बीजेपी के लिए गले से नीचे उतारना मुश्किल होता जा रहा है। हार के बाद समीक्षा बैठकें भी हुई हैं। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिलकर उन्हें हार की रिपोर्ट भी सौंप दी है। हार के बाद अयोध्या में महंत राजू दास और डीएम नीतीश कुमार के बीच भिड़ंत भी हो गई है। हालांकि, राजनीतिक पंडितों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में मिली हार के जरिए सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हटाने की तैयारी हो रही है। योगी आदित्यनाथ को हटाने की बात करें तो इसका जिक्र सबसे पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने किया था। पिछले महीने जब अदालत से केजरीवाल को चुनाव प्रचार के लिए 21 दिनों की जमानत मिली तब उन्होंने बाहर निकलते ही बीजेपी पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा कि यूपी के सीएम को हटाने की तैयारी हो रही है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन साल बाद 75 साल के हो जाएंगे और फिर बीजेपी के नियमों के तहत अमित शाह को पीएम बना दिया जाएगा। वहीं अब कई वरिष्ठ पत्रकारों ने केजरीवाल की बातों से सहमति जताने लगे हैं। इन पत्रकारों का मानना है कि अरविंद केजरीवाल ने जेल से निकलने के बाद जो बातें कही थी ठीक वैसा ही देखने को मिल रहा है। उनका कहना है कि जैसे-जैसे घटनाक्रम होता रहेगा, वैसे-वैसे मालूम चलेगा कि अरविंद केजरीवाल ने जो कहा था, वो सही साबित हो रहा है या नहीं। राजनीतिक पंडित कहते हैं कि यूपी की तरह महाराष्ट्र, झारखंड, राजस्थान जैसे राज्यों में भी बीजेपी के बीच अंतर्कलह देखने को मिल रही है। बीजेपी ने पिछले 10 सालों में जिस तरह से सरकार चलाई है, उसका कोई न कोई दुष्परिणाम तो निकलना ही था। इस चुनाव में नहीं तो अगले चुनाव में ऐसा होना ही था। उत्तर प्रदेश में जो समीक्षा चल रही है, उसमें से लखनऊ और वाराणसी की सीटों को बाहर क्यों रखा गया? चर्चा है कि इन दोनों सीटों पर टॉप सीक्रेट समीक्षा होगी। विश्लेषक कहते हैं कि ये जो समीक्षा चल रही है, या तो ये योगी को साफ करने के लिए हो रही है या फिर लीपा-पोती करने के लिए चल रही है। कोशिश हो रही है कि जितना योगी पर आंच आ सके आ जाए। अगर ऐसा नहीं होता है तो पूरे मामले की लीपा-पोती कर दी जाए। उसके बाद जब विधानसभा चुनाव आएगा तो नए सिरे से शक्ति संतुलन को देखेंगे। अगर योगी को अभी नहीं हटा पाएंगे तो आगे चुनाव के समय हटाएंगे। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा आलाकमान की यह समीक्षा कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना जैसी है। गौरतलब है कि योगी इकलौते ऐसे सीएम हैं, जो पीएमओ के निर्देशों का अपने मनमुताबिक पालन करते हैं। हाल ही में योगी और संघ प्रमुख मोहन भागवत की पर्दे के पीछे मुलाकात का समाचार भी नाना प्रकार की चर्चाओं को जन्म दे रहा है।

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