झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर जून में चुनाव होना है। शिबू सोरेन के निधन और दीपक प्रकाश का कार्यकाल खत्म होने से दोनों सीटें खाली होंगी। विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक सत्ताधारी महागठबंधन के पास 56 विधायक हैं और एक सीट के लिए 28 वोट चाहिए। ऐसे में गठबंधन यदि एकजुट रहता है तो दोनों सीटें आसानी से जीत सकता है। झामुमो नेताओं का मानना है कि राज्यसभा में झारखंड की आवाज को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए झामुमो के प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। पार्टी नेताओं का कहना है कि अतीत में कई बार उन्होंने राज्यसभा सीटों को लेकर त्याग किया है इसलिए इस बार एक सीट पर उनका स्वाभाविक अधिकार बनता है। इसके बाद से सियासी गलियारों में सुगबुगाहट है कि राज्य के मुखिया हेमंत सोरेन की पत्नी और गांडेय की विधायक कल्पना सोरेन का अगला ठिकाना राज्यसभा हो सकता है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो कल्पना का राज्यसभा जाना केवल एक व्यक्तिगत राजनीतिक उन्नयन नहीं होगा बल्कि झामुमो और राज्य की राजनीति पर इसके कई व्यापक प्रभाव पड़ सकते हैं। कल्पना सोरेन को राज्यसभा भेजना पार्टी के भीतर एक नई नेतृत्व पंक्ति को स्थापित करने का संकेत होगा। इससे दिल्ली में पार्टी मजबूत होगी। हेमंत सोरेन के साथ उनका उभरता राजनीतिक कद संगठनात्मक स्थिरता और भविष्य की रणनीति को मजबूती दे सकता है। यह कदम पार्टी में परिवार और संगठन के संतुलन को भी साधेगा। राज्यसभा के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माण में सीधी भागीदारी मिलती है। कल्पना सोरेन यदि उच्च सदन में जाती हैं तो झारखंड से जुड़े आदिवासी, भूमि, खनिज और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर अधिक प्रभावी ढंग से उठाया जा सकता है। इसके अलावा उनका राज्यसभा पहुंचना महिला सशक्तिकरण और आदिवासी नेतृत्व दोनों दृष्टिकोण से एक मजबूत राजनीतिक संदेश होगा। इससे झामुमो को सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की राजनीति में बढ़त मिल सकती है। अगर सब कुछ ठीक रहा तो कल्पना सोरेन का राज्यसभा जाना लगभग तय है।
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और उनके चाचा पशुपति कुमार पारस के बीच हालिया मुलाकात ने बिहार की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है। लम्बे समय से चले आ रहे पारिवारिक और राजनीतिक मतभेदों के बीच यह मुलाकात खास मानी जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। यह मुलाकात इसलिए भी अहम है क्योंकि लोक जनशक्ति पार्टी में कुछ साल पहले बड़ी टूट देखने को मिली थी। चिराग पासवान और पशुपति पारस अलग-अलग धड़ों में बंट गए थे जिससे न सिर्फ पार्टी बल्कि पासवान परिवार में भी दरार साफ नजर आई थी लेकिन इस मुलाकात के बाद सियासी हलकों में चर्चा है कि क्या फिर से चाचा-भतीजा एक होंगे? क्या यह सिर्फ एक पारिवारिक औपचारिकता थी या फिर इसके पीछे सियासी समीकरण बदलने के संकेत छिपे हैं? यह सवाल अब चर्चा का केंद्र बन चुका है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस तरह की मुलाकातों को सीधे राजनीतिक एकता के संकेत के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। भारतीय राजनीति में पारिवारिक सम्बंध और राजनीतिक हित अक्सर अलग-अलग दिशा में चलते हैं। ऐसे में पैर छूने और औपचारिक बातचीत को सुलह का ठोस संकेत मानना उचित नहीं माना जा सकता। हालांकि इसे साॅफ्ट सिग्नल जरूर माना जा सकता है लेकिन इतना जरूर है कि इस छोटे से घटनाक्रम ने कार्यकर्ताओं के बीच नई उम्मीद जगा दी है कि रिश्तों पर जमी बर्फ अब पिघलने लगी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या आने वाले दिनों में चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस किसी साझा मंच पर नजर आते हैं या कोई बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हैं क्योंकि असली संकेत वहीं से मिलेगा।
पश्चिम बंगाल चुनाव में भवानीपुर सीट सबसे हाॅट मुकाबलों में से एक बन गई है। यहां ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी आमने-सामने हैं जिससे सियासी पारा चढ़ा हुआ है। एक ओर जहां सुवेंदु ने दावा किया है कि भवानीपुर में ‘कमल खिलेगा’ और जनता बदलाव के मूड में है। वहीं दूसरी तरफ टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ‘खेला होबे’ के नारे के साथ पूरी ताकत झोंक जीत का दावा कर रही हैं। टीएमसी मजबूत संगठन और स्थानीय पकड़ के भरोसे है तो वहीं भाजपा इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर पूरी ताकत झोंक रही है। ऐसे में मीडिया, सोशल मीडिया से लेकर आम जन सवाल उठा रहे हैं कि भवानीपुर में भाजपा का ‘कमल खिलेगा’ या फिर दीदी का ‘खेला होबे’ ही चलेगा? सियासी जानकार कहते हैं कि भवानीपुर सीट एक चुनाव नहीं बल्कि यह बंगाल की राजनीतिक दिशा तय करने वाली जंग बन चुकी है। इस सीट को टीएमसी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। ममता बनर्जी का इस क्षेत्र से गहरा राजनीतिक और भावनात्मक जुड़ाव है। ऐसे में यहां उनकी मौजूदगी टीएमसी कार्यकर्ताओं के लिए मनोबल बढ़ाने वाली है। दूसरी ओर सुवेंदु अधिकारी वही नेता हैं जिन्होंने पिछले चुनाव में नंदीग्राम में ममता बनर्जी को कड़ी चुनौती दी थी। उनका दावा है कि भवानीपुर में भी ‘कमल खिलेगा’ और जनता बदलाव चाहती है। भाजपा इस सीट को अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए बेहद अहम मान रही है। भाजपा का नारा ‘कमल खिलेगा’ जहां बदलाव और सत्ता परिवर्तन का संकेत देता है, वहीं ममता बनर्जी का ‘खेला होबे’ नारा बंगाल की राजनीति में जोश और जमीनी कनेक्ट का प्रतीक बन चुका है। यह नारा सिर्फ चुनावी स्लोगन नहीं बल्कि टीएमसी के कैडर को ऊर्जा देने का माध्यम है। दोनों के जनाधार की बात करें तो टीएमसी का मजबूत संगठन और बूथ स्तर तक पकड़, ममता बनर्जी की व्यक्तिगत छवि, स्थानीय मुद्दों और योजनाओं का भारी असर देखने को मिलता है। वहीं भाजपा बदलाव की लहर का दावा, हिंदुत्व और ध्रुवीकरण की राजनीति, सुवेंदु अधिकारी की आक्रामक प्रचार शैली के दम पर जीत का दावा कर रही है। कुल मिलाकर भवानीपुर की लड़ाई ‘इमोशन बनाम चैलेंज’ की लड़ाई है। टीएमसी भावनात्मक जुड़ाव और संगठन के दम पर आगे दिखती है तो भाजपा इस सीट को प्रतीकात्मक जीत में बदलकर बड़ा राजनीतिक संदेश देना चाहती है।
एक जमाने में सिनेमा की दुनिया में अपने अभिनय के बल पर शोहरत हासिल कर चुकीं पूर्व अभिनेत्री जयाप्रदा वेस्ट यूपी की राजनीति में बुलंदी पर भी पहुंचीं थी लेकिन आजम खां से अदावत के चलते उन्हें 2010 में सपा से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद राष्ट्रीय लोकमंच में रहीं और फिर आरएलडी का हिस्सा बनीं। आरएलडी के टिकट पर जयाप्रदा ने बिजनौर से लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन वह हार गईं। बाद में वह बीजेपी में शामिल हो गईं। साल 2019 में बीजेपी ने उन्हें रामपुर से टिकट दिया, यहां भी जयाप्रदा को हार मिली। इसके बाद से ही जयाप्रदा सियासी मैदान में एकदम शांत थी या यूं कहें कि हाशिए पर चली गई थीं लेकिन बीते 22 मार्च को एकाएक जयाप्रदा ने यूपी की राजधानी लखनऊ में दस्तक दी और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चैधरी और राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव से मिलीं। जयाप्रदा की हालिया सक्रियता ने उनकी सम्भावित सियासी वापसी को लेकर चर्चाएं बढ़ा दी हैं। उनके यूपी की सियासत में फिर से सक्रिय होने के कयास लगाए जाने लगे हैं। कोई उनकी राजनीतिक वापसी की बात कर रहा है तो कोई चुनावी पिच पर फिर से उतरने की। यहां तक कहा जा रहा है कि जयाप्रदा अपनी कर्मभूमि रामपुर में फिर से चुनावी किस्मत आजमाएंगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में आजम खां का प्रभाव पहले जैसा मजबूत नहीं रहा है। ऐसे में जयाप्रदा बीजेपी के लिए रामपुर में एक मजबूत और पहचाना हुआ चेहरा बन सकती हैं। हालांकि उनकी उम्मीदवारी को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगा कि वह 2027 में चुनाव लड़ेंगी या नहीं लेकिन उनकी सक्रियता ने रामपुर की सियासत को जरूर गरमा दिया है।