उत्तराखण्ड सरकार के सूचना विभाग ने गत् पखवाड़े प्रेस नोट जारी कर कहा था कि अंकिता भंडारी मामले में ‘कोई वीआईपी शामिल नहीं’ और वीआईपी एंगल की बातें भ्रामक हैं। मगर अदालत में दर्ज गवाहियों, चैट रिकाॅर्ड और मेडिकल क्राइम सीन रिपोर्ट में ‘वीआईपी गेस्ट’, ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ का दबाव, लड़की की असुरक्षा और सबसे अहम ‘गलती से फिसलना नहीं, जोर से धक्का’ जैसी बातें सामने आती हैं जिससे यह केस केवल दुर्घटना नहीं बल्कि हत्या की ओर इशारा करता है। अब सीबीआई जांच के ऐलान के बाद सवाल है कि वीआईपी तो है लेकिन कौन? अगर नहीं था तो फिर ‘वीआईपी गेस्ट’ का जिक्र आखिर आया कैसे?


उत्तराखण्ड सरकार के सूचना विभाग द्वारा गत् दिनों अंकिता भंडारी प्रकरण को लेकर जारी प्रेस नोट जारी किया था। सरकार ने अपने आधिकारिक बयान में साफतौर पर कहा कि इस मामले में ‘कोई वीआईपी शामिल नहीं है’ और सोशल मीडिया व कुछ माध्यमों में जो बातें फैलाई जा रही हैं वे भ्रामक, आधे-अधूरे तथ्य और निराधार आरोप हैं। सरकार का यह भी कहना है कि रिसाॅर्ट में आने-जाने वाले लोगों की जांच की गई, कर्मचारियों से एसआईटी ने पूछताछ की, बयान न्यायालय में प्रस्तुत किए गए, ‘वीआईपी एंगल’ सम्बंधी अफवाहें जांच में पुष्ट नहीं हुईं और न्यायालय ने प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर तीनों आरोपियों को दोषी ठहराकर सजा सुनाई।
ऐसे में सवाल यह है कि अगर ‘वीआईपी कोई नहीं’ था तो फिर अपर सत्र न्यायाधीश, कोटद्वार, पौड़ी गढ़वाल की कोर्ट में यह प्रकरण बार-बार उस दिशा में क्यों जाता है जहां ‘वीआईपी गेस्ट’ और ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ जैसे शब्द सामने आते हैं? सम्भवतः जन दबाव को कम करने अथवा सीबीआई जांच से बचने की नीयत चलते राज्य सरकार ने यह प्रेस नोट जारी किया हो, कारण जो भी रहा हो आखिरकार जन दबाव जीता और राज्य सरकार को सीबीआई जांच के आदेश देने पड़े हैं।


दरअसल यह केस सिर्फ इतना नहीं है कि किसी लड़की की मौत हो गई और तीन आरोपियों को सजा मिल गई। अदालत में जो पूरी कहानी दर्ज है उसका केंद्रीय बिंदु यह है कि घटना से पहले अंकिता की हालत क्या थी? उसका डर क्या था, वह किन दबावों से गुजर रही थी और घटना के बाद आरोपियों का व्यवहार क्या रहा? यही वह ‘चेन’ है जिस पर यह सवाल टिकता है कि वीआईपी था या नहीं और अगर था तो कौन? और अगर नहीं था तो रिसाॅर्ट के भीतर ‘वीआईपी गेस्ट’ तथा ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ का जिक्र किस संदर्भ में सामने आया?

अदालत के सामने आए साक्ष्य और बयान यह संकेत देते हैं कि अंकिता रिसाॅर्ट में बेहद असुरक्षित थी। वह परेशान थी। वह नौकरी और कार्यस्थल को लेकर दबाव में थी। कोर्ट रिकाॅर्ड और गवाहियों से जो पहला और सबसे निर्णायक संकेत मिलता है, वह यह कि अंकिता घटना से पहले सामान्य नहीं थी, वह असुरक्षित, भयभीत और मानसिक दबाव में थी। यही कारण है कि अदालत के सामने ‘वह डिप्रेशन में थी इसलिए घुमाने ले गए’ जैसी दलीलों को भी संदिग्ध परिस्थितियों में देखा गया। कोर्ट ने जिन गवाहों के बयान दर्ज किए, उनमें एक नहीं, कई लोगों ने बताया कि अंकिता रो रही थी, परेशान थी और वह रिसाॅर्ट छोड़कर निकलने की कोशिश कर रही थी।
अदालत में बयान देने वाले रिसाॅर्ट स्टाफ के अनुसार, शाम के समय अंकिता बालकनी में 18 सितम्बर 2022 को फोन पर रोते हुए दिखाई दी और कह रही थी कि उसे यहां से ले जाया जाए। इसी दौरान यह बात सामने आई कि पुलकित आर्य ने अंकिता के हाथ से फोन छीना और उसे खींचकर कमरे के भीतर ले गया। यह तथ्य अदालत की नजर में इसलिए भारी बन गया क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि अंकिता पर नियंत्रण और दबाव बनाया जा रहा था, बाहरी सम्पर्क रोकने की कोशिश की जा रही थी। इसी क्रम में यह भी सामने आया कि अंकिता ने अपने परिचितों से बैग सड़क तक पहुंचाने की मदद मांगी थी जिसका सीधा अर्थ यही है कि वह वहां से निकलना चाहती थी।

यहां से केस उस मोड़ पर पहुंचा जो आगे चलकर दोषसिद्धि की रीढ़ बना यानी अंतिम बार साथ (Last Seen Together)। गवाहों के अनुसार शाम के बाद अंकिता को सौरभ भास्कर के साथ बाइक पर रिसाॅर्ट से बाहर ले जाते हुए देखा गया जबकि पुलकित आर्य और अंकित गुप्ता पीछे अन्य वाहन से गए। कोर्ट ने इस घटनाक्रम को महज घूमने-फिरने वाली बात नहीं माना बल्कि यह स्थापित करने में इस्तेमाल किया कि अंकिता अंतिम बार जीवित अवस्था में इन्हीं तीनों के साथ देखी गई थी। यही वह बिंदु है जहां से संशय गहराता है कि अगर वह तीनों के साथ गई तो वह वापस कैसे नहीं लौटी?

मामले में सबसे खतरनाक हिस्सा वह है जो देर रात का है। गवाहों के अनुसार रात करीब 11 से 11ः30 के बीच पुलकित, सौरभ और अंकित रिसाॅर्ट में लौटे, लेकिन अंकिता उनके साथ नहीं थी। अदालत की नजर में यह पाॅइंट निर्णायक इसलिए बन गया क्योंकि इसके बाद आरोपी और रिसाॅर्ट के भीतर की गतिविधियां एक संदिग्ध ‘कवर-अप’ की ओर जाती दिखाई देती हैं। रात में ही किचन/भोजन से जुड़ी बातचीत और ‘चार लोगों का खाना’ जैसी स्थिति ने भी अदालत को यह सोचने पर मजबूर किया कि जब आरोपी खुद कह रहे थे कि सब ठीक है, तब भी घटनाक्रम असामान्य क्यों चल रहा था?

इस पूरे क्रम में अदालत ने आरोपी पक्ष की उस दलील को विशेष संदेह से देखा जिसमें कहा गया कि अंकिता वापस आ गई थी या वह रिसाॅर्ट में, कमरे में होगी। कोर्ट के सामने रिकाॅर्ड में यह आया कि भोजन/काॅल/बातचीत के समय कहा गया कि ‘‘मृतका हमारे साथ नहीं है वहीं (रिसाॅर्ट) होगी।’’ अदालत ने इसे सामान्य वाक्य नहीं माना बल्कि इसे झूठा स्पष्टीकरण (False explanation) मानने की दिशा में पढ़ा क्योंकि उसी समय-सीमा में आरोपियों का घटनाक्रम और गवाहियों का मेल इस कथन को कमजोर करता है। कोर्ट ने इस पर यह भी सवाल उठाया कि यदि वह वास्तव में ‘वहीं’ थी तो फिर उस तरह की बातचीत/प्रबंध और कहानी गढ़ने की जरूरत ही क्या थी।

यही नहीं, अदालत में यह भी सामने आया कि कुछ गवाहों पर दबाव बनाकर बयान बदलवाने या किसी विशेष तरीके से बात कहने की कोशिश की गई। कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि एक गवाह ने बताया कि उससे कहा गया कि अगर कोई पूछे तो वैसा ही बताना और न बताने पर नौकरी, वेतन आदि को लेकर धमकी की बात भी सामने आई। अदालत ने इसे केस की प्रकृति को और गम्भीर बनाता संकेत माना क्योंकि यह दर्शाता है कि घटना के बाद ‘मैनेजमेंट’ और ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोशिशें चल रही थीं। अब इसी पूरी चेन का दूसरा बड़ा स्तम्भ है अंकिता का खुद का डर और रिसाॅर्ट के भीतर कथित गलत सिस्टम। अदालत में पेश वाट्सएप चैट/कागजात में यह रिकाॅर्ड आया कि अंकिता ने अपने करीबी से कहा था कि ‘‘मैं यहां बहुत असुरक्षित महसूस कर रही हूं…।’’
और साथ में ‘वीआईपी गेस्ट’ तथा ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ जैसी बातों का संदर्भ भी सामने आया। अदालत के समक्ष सामग्री में ‘वीआईपी गेस्ट’ आने, ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ की मांग तथा ‘कोई और लड़की ढूंढने’ और ‘दस हजार रुपए’ जैसी बातों का संदर्भ आया जिसे कोर्ट ने मोटिव (हेतु) से जोड़कर देखा। मतलब अदालत की दृष्टि में यह केवल ‘गेस्ट सर्विस’ वाला मामला नहीं बल्कि ऐसा संकेत था जो रिसाॅर्ट के भीतर किसी गलत गतिविधि/ दबाव तंत्र की सम्भावना को बल देता है।

इसी परिप्रेक्ष्य में अभियोजन के अनुसार अंकिता ने यह भी कहा था कि पुलकित आर्य ने उसके साथ अनुचित शारीरिक व्यवहार किया/किस किया। यह आरोप यदि ‘वीआईपी’ और ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ जैसे संदर्भों के साथ रखकर देखा जाए तो यह केस केवल हत्या नहीं रह जाता, यह ताकत, शोषण और यौन उत्पीड़न की ओर जाता है।

इस केस की सबसे निर्णायक, सबसे वैज्ञानिक और सबसे असंदिग्ध कड़ी है पोस्टमार्टम और क्राइम सीन रिपोर्ट। पोस्टमार्टम करने वाले डाॅक्टरों/विशेषज्ञों ने अदालत में बयान देते हुए यह स्पष्ट किया कि मौत का कारण डूबना था लेकिन शरीर पर पाई गई चोटें और उनके पैटर्न को केवल ‘गलती से फिसलना’ कहकर नहीं समझाया जा सकता। अदालत के रिकाॅर्ड में यह बात दर्ज है कि चोटें ‘एक्सीडेंट व गलती से फिसलने की वजह से आना सम्भव नहीं’ हैं। यही लाइन पूरे केस में असावधानी से गिरने (accidental slip) की दलील को कमजोर करती है।

डाॅक्टर/क्राइम सीन टीम की राय के मुताबिक, यदि शरीर को ‘जोर से धक्का’ दिया जाए तो गिरते समय स्लोप से टकराकर कुछ चोटें आ सकती हैं। अदालत के रिकाॅर्ड में यह बिंदु इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि यह घटना एक सामान्य फिसलकर गिरने (slip-and-fall) जैसी नहीं थी बल्कि इसमें धक्का देकर गिराने (force/push) का तत्व मौजूद हो सकता है। यही कारण है कि कोर्ट ने फाॅरेंसिक/मेडिकल दृष्टि से यह माना कि case theory केवल “accident” पर टिक नहीं सकती।

इसके अलावा घटनास्थल की भौगोलिक स्थिति जैसे चारदिवारी, गिरने का एंगल, पथरीली जमीन और चोटों के प्रकार को जोड़कर यह संकेत उभरता है कि यदि कोई व्यक्ति ढलान पर स्लाइड होता तो शरीर पर विशिष्ट घर्षण चोटें होतीं लेकिन अंकिता के शरीर में ऐसा कुछ नहीं पाया गया था जिस कारण अदालत ने झगड़ा और जबरन धकेले जाने की सम्भावना को मजबूत माना।

इस समूचे घटनाक्रम में एक और बड़ी कड़ी है सीसीटीवी और इलेक्ट्राॅनिक साक्ष्य। अदालत में यह बात सामने आई कि घटना के समय आस-पास इलेक्ट्राॅनिक रिकाॅर्डिंग, डीवीआर परिवर्तन, कैमरा इंस्टालेशन आदि गतिविधियां हुईं जिससे यह संदेह बना कि क्या सबूत मिटाने की कोशिश हुई। कोर्ट ने ऐसे आचरण को भी अपराध के बाद का संदिग्ध आवरण माना। मोबाइल फोन, काॅल रिकाॅर्डिंग, लोकेशन, नया फोन खरीदने जैसे बिंदु भी इसी श्रृंखला में आए और अदालत ने इन्हें सामान्य आचरण नहीं माना।

इन सभी कड़ियों को जोड़कर कोर्ट के सामने जो केस उभरा, उसमें सबसे भारी प्रश्न यही रहा कि अंकिता को अंतिम बार जिन आरोपियों के साथ देखा गया, उसके बाद वह वापस क्यों नहीं लौटी? और फिर ‘वापस आ गई/कमरे में होगी’ जैसे दावे अदालत के सामने क्यों टिक नहीं पाए?

अब सीबीआई जांच की घोषणा के बाद यह उम्मीद की जानी चाहिए कि एजेंसी इस पूरे घटनाक्रम को दोबारा तकनीकी और कानूनी तरीके से उठाएगी। वाट्सऐप चैट, काॅल रिकाॅर्डिंग, सीसीटीवी, डीवीआर, फाॅरेंसिक ऑडिट, मोबाइल टावर डम्प रिकाॅर्ड लाॅग और ‘वीआईपी गेस्ट’ से जुड़े पहलुओं को फिर से खोलेगी। जनता की निगाहें अब इस पर हैं कि क्या सीबीआई जांच में यह स्पष्ट हो सकेगा कि ‘वीआईपी’ कौन था? ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ का दबाव किसके लिए था? और रिसाॅर्ट के भीतर चल रहे कथित गलत सिस्टम का मकड़जाल कहां तक फैला है।
अंततः यह केस अब केवल एक अदालत का फैसला नहीं बल्कि उत्तराखण्ड में ‘वीआईपी संस्कृति बनाम न्याय’ का ऐसा प्रतीक बन गया है जिसमें लड़की का डर, उसकी असुरक्षा, रिसाॅर्ट से उसका निकलना और वापस न आना, आरोपियों का संदिग्ध आचरण, गवाहों को प्रभावित करने की कोशिशें और पोस्टमार्टम की राय, सब एक साथ खड़े हैं। अब सीबीआई जांच से ही यह उम्मीद की जा रही है कि यह केस ‘शंका’ से बाहर निकलकर पूरे सच तक पहुंचेगा और तभी अंकिता को वास्तविक न्याय मिलेगा।

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