हाल ही में राज्यसभा की 37 सीटों के लिए हुए चुनाव में 26 सीटों पर निर्विरोध चुनाव हुआ तो 11 पर वोटिंग कराई गई। जिनमें एनडीए ने बिहार की सभी पांच, असम की सभी तीन, उड़ीसा की चार में से तीन, तमिलनाडु की पांच में से दो, पश्चिम बंगाल की पांच में से एक, हरियाणा और छत्तीसगढ़ की दो में से एक सीट जीत जबर्दस्त कामयाबी हासिल की तो वहीं क्रास वोटिंग ने कांग्रेस की आंतरिक स्थिति को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
एक ओर जहां हरियाणा में मामूली अंतर से जीत दर्ज करने के बावजूद पार्टी क्राॅस वोटिंग के कारण असहज स्थिति में नजर आई। कांग्रेस उम्मीदवार कर्मवीर बौद्ध ने मात्र एक वोट से जीत हासिल की लेकिन इस जीत की चमक उस वक्त फीकी पड़ गई जब पार्टी के पांच विधायकों द्वारा क्राॅस वोटिंग की बात सामने आई। वहीं हरियाणा घटनाक्रम के समानांतर उड़ीसा और बिहार में भी कांग्रेस को झटका लगा जहां पार्टी के विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर मतदान किया। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े किए बल्कि नेतृत्व के सामने अनुशासन बनाए रखने की चुनौती भी रख दी। सवाल है कि आखिर क्यों पार्टी अपने ही विधायकों को एकजुट रखने में विफल हो रही है? सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कांग्रेस इस स्थिति से कैसे उबरेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय राजनीति में क्राॅस वोटिंग कोई नई घटना नहीं है लेकिन जब यह किसी बड़े और ऐतिहासिक दल को सीधे प्रभावित करती है तो इसके दूरगामी असर दिखाई देते हैं। हाल के घटनाक्रमों में कांग्रेस को जिस तरह क्राॅस वोटिंग का सामना करना पड़ा है उसने पार्टी की आंतरिक एकजुटता और नेतृत्व क्षमता पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्राॅस वोटिंग का सीधा अर्थ है कि विधायक या सांसद अपने आधिकारिक उम्मीदवार के बजाय किसी अन्य दल या उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करते हैं। यह स्थिति आमतौर पर राज्यसभा चुनाव या विधान परिषद के चुनावों में देखने को मिलती है, जहां वोट गुप्त होता है और पार्टी व्हिप का प्रभाव सीमित हो जाता है। हाल ही में हुए चुनावों में कांग्रेस के कई विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर मतदान किया जिससे पार्टी को अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए।
इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस के भीतर असंतोष और गुटबाजी अभी भी गहराई तक मौजूद है। कई राज्यों में पार्टी नेतृत्व और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल की कमी खुलकर सामने आई है। यह समस्या नई नहीं है लेकिन क्राॅस वोटिंग ने इसे सार्वजनिक रूप से उजागर कर दिया है। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला, नेतृत्व को लेकर असमंजस। लम्बे समय से कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन और स्पष्ट दिशा की कमी की बात कही जाती रही है। हालांकि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में पार्टी ने खुद को पुनर्गठित करने की कोशिश की है लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर सीमित नजर आता है। कई नेताओं को लगता है कि उनकी बातों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा जिससे असंतोष पनपता है।
दूसरा बड़ा कारण है क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं। कई राज्यों में कांग्रेस के विधायक अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। उन्हें लगता है कि पार्टी के कमजोर होते आधार के कारण उनके पुनर्निर्वाचन की सम्भावनाएं कम हो रही हैं। ऐसे में वे अवसरवादिता का रास्ता अपनाते हुए दूसरे दलों के सम्पर्क में आ जाते हैं या क्राॅस वोटिंग के जरिए अपने हित साधने की कोशिश करते हैं। तीसरा पहलू है संगठनात्मक ढांचे की कमजोरी। एक समय देशभर में मजबूत पकड़ रखने वाली कांग्रेस आज कई राज्यों में सीमित होती जा रही है। संगठन का ढांचा कमजोर होने से पार्टी अपने विधायकों पर नियंत्रण खोती जा रही है। यही कारण है कि पार्टी व्हिप का उल्लंघन करना अब पहले जितना कठिन नहीं रह गया है।
क्राॅस वोटिंग का असर केवल चुनावी हार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पार्टी की छवि को भी नुकसान पहुंचाता है। जनता के बीच यह संदेश जाता है कि पार्टी अपने ही नेताओं को नियंत्रित नहीं कर पा रही है जिससे उसकी विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। विपक्षी दल इस स्थिति का राजनीतिक लाभ उठाने में देर नहीं लगाते और कांग्रेस को अस्थिर और बिखरी हुई पार्टी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह स्थिति कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का अवसर भी है। अगर पार्टी इस संकेत को गंभीरता से ले और संगठनात्मक सुधार, नेतृत्व में स्पष्टता तथा जमीनी स्तर पर संवाद बढ़ाने पर ध्यान दे तो वह इस संकट से उबर सकती है। पार्टी को यह समझना होगा कि केवल शीर्ष स्तर पर बदलाव पर्याप्त नहीं है बल्कि निचले स्तर तक मजबूत नेटवर्क और विश्वास कायम करना जरूरी है।
बहरहाल क्रॉस वोटिंग केवल एक चुनावी समस्या नहीं है बल्कि यह पार्टी के भीतर विश्वास और अनुशासन की कमी को दर्शाती है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में यह संकट और गहरा सकता है। यह घटना पार्टी के लिए चेतावनी है कि केवल चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं है बल्कि संगठन को मजबूत और एकजुट रखना भी उतना ही जरूरी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस चुनौती से कैसे निपटती है और क्या वह अपने भीतर की दरारों को भर पाती है या नहीं।