संविधान के आईने में असम
अठाईस जनवरी 2026 को असम के तिनसुकिया जिले के डिगबोई में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने ‘मिया समुदाय’ नाम से बांग्ला-भाषी मुसलमानों को संदर्भित करते हुए लोगों से कहा कि इस समुदाय को सामाजिक रूप से परेशान किया जाए, जैसे कि यदि रिक्शे का किराया 5 रुपया है तो उन्हें 4 रुपया ही देना चाहिए ताकि उन्हें ‘थोड़ी परेशानी’ हो और वे ‘असम छोड़ दें।’ यह बयान न केवल राजनीतिक विवाद का विषय बन गया है बल्कि संविधान में निहित समानता और मानवाधिकारों के सिद्धांतों के खिलाफ व्यापक बहस का कारण भी


अठाईस जनवरी 2026 के डिगबोई भाषण में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने यह कहा कि वे और उनकी पार्टी सीधे तौर पर ‘मिया समुदाय’ के खिलाफ हैं और उन्होंने यह दावा किया कि चार से पांच लाख ‘मिया’ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने चाहिए ताकि वे असम में वोट न कर सकें, यह बयान उस संवेदनशील विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के बीच आया है जो मतदाता सूची की समीक्षा को लेकर चल रही है। यह भाषण उस सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में आया है जहां ‘मिया मुसलमान’ शब्द असम में बांग्ला-भाषी मुसलमानों के लिए उपहासजनक और विवादित पहचान के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। ‘मिया’ शब्द का प्रयोग औपचारिक पहचान के रूप में नहीं है बल्कि सामाजिक दबाव, पहचान संघर्ष और राजनीतिक ध्रुवीकरण के परिप्रेक्ष्य में यह शब्द पहचान-आधारित अलगाव और नकारात्मक भावनाओं की भाषा बन चुका है। इस शब्द को लेकर लम्बे समय से बहस रही है कि यह पहचान किस रूप में स्वीकारणीय है और कब किन परिस्थितियों में विभाजनकारी बन रही है।

 
समुदाय की पहचान और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ऐतिहासिक रूप से ‘मिया’ वे लोग हैं जिनके पूर्वज बंगाली-भाषी मुस्लिम थे, जिनका असम में बसना 19वीं एवं 20वीं सदी के दौरान ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुआ। इनकी बसावट असम की नदी-किनारे की
कृषि भूमि पर हुई और धीरे-धीरे वे असम के कई हिस्सों में बस गए। सामाजिक भिन्नता और भाषायी पहचान के कारण इस समुदाय को कई बार स्थानीय बहसों में ‘दूसरी पहचान’ के रूप में पेश किया गया है, जो स्थानीय संसाधनों, संस्कृति और राजनीतिक प्रभाव के मामलों में विशिष्ट दृष्टिकोण का विषय रहा है। आलोचक कहते हैं कि ‘मिया’ शब्द अपने राजनीतिक प्रयोग में साम्प्रदायिक विभाजन और विदेशीकरण को बढ़ावा देता है जबकि इस समुदाय के लोग इसे अपने जीवन, संस्कृति और नागरिकता की पहचान के रूप में पहचानते हैं।
 
पूर्व में दिए गए विवादित बयान

हिमंता बिस्वा सरमा के बयान का यह पहला या अकेला मामला नहीं है जहां उनकी टिप्पणियां विवादों में रहे हों। पिछले वर्षों में उन्होंने कई बार मुस्लिम आबादी और ‘मिया’ समुदाय को लेकर कड़े और विवादास्पद बयान दिए हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा कि ‘मियां’ समुदाय एकजुट होकर वोट करता है, जिससे वे राजनीतिक रूप से आगे बढ़ रहे हैं और उसके मुकाबले ‘हमारे वोट’ बिखरे हुए हैं, इसी कारण से ‘अवैध बस्तियों’ के विषय पर दबाव बनाए रखने की आवश्यकता है। इसके अलावा वह पहले बताने लगे कि अवैध नामांकन या मतदाता सूची में हिस्सेदारी के बारे में

आपत्तियां उठाना राष्ट्रीय कर्तव्य है और उन्होंने कहा है कि अवैध या संदिग्ध ‘बांग्लादेश मूल’ नामों पर आपत्ति उठाना और उन्हें हटाना आवश्यक है जो मतदाता सूची में निष्पक्षता और सत्यता सुनिश्चित करेगा। कुछ समय पहले भी मुख्य विपक्षी दलों ने यह आरोप लगाया कि सरकार द्वारा सामाजिक और राजनीतिक बैठकों में ‘मिया मुस्लिमों’ को निशाना बनाया जा रहा है, जिसे मुख्यमंत्री ने केवल प्रशासनिक प्रक्रिया बताया, जिसमें किसी समुदाय को विशेष रूप से लक्षित करना शामिल नहीं है। ये बयान यह दर्शाते हैं कि मुख्यमंत्री का रुख अक्सर पहचान-आधारित मतों, अवैध आव्रजन और मतदाता सूची जैसी राजनीतिक बहसों में मुस्लिम समुदाय या ‘मिया’ शब्द से जुड़े समूहों पर केंद्रित रहा है, और इसका असर सामाजिक संवेदनाओं तथा बहुसांस्कृतिक सामंजस्य पर पड़ा है।
 
संवैधानिक विश्लेषण : धारा 14, धारा 15 और मानवाधिकार

इन विवादास्पद बयानों और नीतिगत पहलों की पृष्ठभूमि में भारतीय संविधान के मूल प्रावधान विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। भारतीय संविधान की धारा 14 समानता के अधिकार की बात करती है जो कहती है कि कानून के सामने सभी नागरिक समान हैं और राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समान सुरक्षा से वंचित नहीं कर सकता। इसका स्पष्ट आशय यह है कि सरकार की नीतियां या बयान किसी भी व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ मनमानी भेदभाव नहीं कर सकते। यदि किसी समुदाय को लक्षित कर उसे सामाजिक कठिनाइयों का सामना करने के निर्देश दिए जाते हैं तो यह राज्य की निष्पक्षता और समानता की मूल आत्मा से टकराता है।

इसी प्रकार धारा 15 भेदभाव निषेध का प्रावधान है, जिसमें राज्य को यह निषिद्ध किया गया है कि वह धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान या किसी भी पहचान के आधार पर नागरिकों के बीच भेदभाव करे। जब सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति ‘मिया समुदाय’ जैसी पहचान को विभाजनकारी भाषा के साथ सम्बोधित करते हैं तो यह न केवल नैतिक रूप से बल्कि संवैधानिक रूप से भी सवाल उठाता है। संविधान इन धाराओं के जरिए यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी नागरिक भेदभाव या उत्पीड़न का शिकार न हो और सभी को समान संरक्षण तथा सम्मान मिले।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों पर भी हस्ताक्षर किए हैं जिनमें मानव गरिमा, भेदभाव से मुक्ति और कानून के समक्ष समान सुरक्षा जैसे सिद्धांत शामिल हैं। किसी समुदाय को लोकतांत्रिक अभ्यासों से दूर करने या उसे सामाजिक कठिनाइयों का सामना कराना, न केवल राष्ट्रीय संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है बल्कि वैश्विक मानवाधिकार मानकों के खिलाफ भी माना जाता है।

राजनीति की भाषा और नेतृत्व की जिम्मेदारी इस परिप्रेक्ष्य में और भी महत्वपूर्ण बन जाती है। पहचान-आधारित ध्रुवीकरण अल्पकालिक राजनीतिक लाभ दे सकता है लेकिन यह दीर्घकालिक सामाजिक विश्वास, समरसता और विभाजन-रहित लोकतंत्र को खतरे में डाल सकता है। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र में, संवैधानिक नैतिकता उन कवचों में से एक है जो सभी नागरिकों को समान सुरक्षा और सम्मान प्रदान करती है।
 
निष्कर्ष : संवैधानिक लोकतंत्र पर बड़ा प्रश्न

28 जनवरी 2026 का डिगबोई भाषण केवल एक राजनीतिक बयान नहीं रह गया बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ एक व्यापक सामाजिक और कानूनी बहस का केंद्र बन गया। यह विवाद यह संकेत देता है कि लोकतांत्रिक नेतृत्व को भाषण, नीति और शासन में समानता, गरिमा और भेदभाव-रहित दृष्टिकोण को सर्वोपरि रखना चाहिए। संविधान की धारा 14 और धारा 15 हमें याद दिलाती हैं कि सभी नागरिकों को समान अधिकार और समान सुरक्षा का अधिकार है और किसी भी पहचान-आधारित समूह के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देना अस्वीकार्य है। अंततः यह मामला यह सवाल खड़ा करता है कि क्या भारतीय लोकतंत्र संवैधानिक समानता के मार्ग पर आगे बढ़ेगा या पहचान आधारित विभाजन की राजनीति को बढ़ावा देगा, एक ऐसा प्रश्न जो केवल असम ही नहीं बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए निर्णायक साबित होगा।

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