Uttarakhand

दावोस से हिमालय तकविनाश की कीमत पर विकास

दावोस में विश्व इकोनाॅमिक फोरम के मंच से हार्वर्ड की प्रोफेसर और आईएमएफ की पूर्व चीफ इकोनाॅमिस्ट गीता गोपीनाथ ने भारत की ‘ग्रोथ स्टोरी’ पर ऐसा सवाल उठा दिया है, जिसे नारेबाजी और चमकदार दावों से दबाया नहीं जा सकता। गोपीनाथ ने कहा कि भारत के लिए सबसे बड़ा आर्थिक खतरा टैरिफ नहीं बल्कि बढ़ता प्रदूषण और पर्यावरणीय गिरावट है जो धीरे-धीरे देश की वर्कफोर्स, उत्पादकता और निवेश क्षमता को खा रही है। विदेशी निवेशक भी अब केवल बाजार और लाभ नहीं देखते, वे पर्यावरणीय जोखिम और जीवन स्तर को भी निवेश के पैमाने में शामिल करते हैं। वहीं ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार चारधाम परियोजना के तहत 2017 से 2020 के बीच 17,625 पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई। यानी जिस पर्यावरणीय संकट को भारत की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती कहा गया, उसी संकट को देश के भीतर विकास के नाम पर और गहरा किया जा रहा है


विश्व इकोनॉमिक फोरम का दावोस सम्मेलन दुनिया के सबसे प्रभावशाली मंचों में गिना जाता है। यह कोई चुनावी रैली नहीं, कोई घरेलू बहस नहीं और न ही किसी सरकार की प्रेस काॅन्फ्रेंस है, जहां सवालों से बचकर नारा उछाल दिया जाए। दावोस में सत्ता, पूंजी और नीति का वैश्विक तंत्र एक ही जगह जुटता है। वहां राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री, केंद्रीय बैंकर्स, बड़े उद्योगपति, निवेशक, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमुख, दुनियाभर के नीति-निर्माता एक साथ बैठकर वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा पर विचार करते हैं। कई बार यह मंच आलोचना का भी विषय बनता है क्योंकि इसे ‘एलीट क्लब’ कहा जाता है लेकिन दुनिया की आर्थिक धारा में इसका प्रभाव इतना बड़ा है कि यहां कही गई बातें या यहां बना माहौल देशों की साख, निवेश और कूटनीति तक को प्रभावित कर देती हैं। भारत भी वर्षों से इस मंच का इस्तेमाल दुनिया को अपनी ‘ग्रोथ स्टोरी’ सुनाने, बड़े निवेश को आकर्षित करने और खुद को उभरती वैश्विक शक्ति की तरह प्रस्तुत करने के लिए करता रहा है। भारत की ओर से केंद्र सरकार के मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, राज्य सरकारों के मुख्यमंत्री या प्रतिनिधिमंडल और बड़े काॅरपोरेट समूह दावोस में पहुंचते हैं। किसी का मकसद नए एमओयू और नई फैक्ट्रियां लाना होता है, कोई अपने राज्य को ‘बेस्ट इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन’ बताता है तो कोई भारत के बाजार की विशालता को बेचता है। यही वजह है कि दावोस का मंच भारत के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम नहीं बल्कि एक बड़ा मार्केटिंग मंच भी बन चुका है।

इसी दावोस में और इसी ‘इन्वेस्ट इंडिया’ की चमक के बीच हार्वर्ड की प्रोफेसर और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पूर्व चीफ इकोनाॅमिस्ट गीता गोपीनाथ ने भारत को लेकर जो कहा, उसने सरकारी प्रचार की चमक पर पानी फेर दिया। गोपीनाथ ने सीधे कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा टैरिफ नहीं है बल्कि बढ़ता प्रदूषण है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रदूषण अब धीरे-धीरे भारत की ग्रोथ के लिए एक गम्भीर, दीर्घकालिक और खतरनाक चुनौती बन चुका है क्योंकि इसका असर केवल हवा और पानी पर नहीं बल्कि मानव जीवन, जनस्वास्थ्य, आर्थिक लागत और श्रमशक्ति पर पड़ता है। गोपीनाथ का संकेत था कि कोई भी अर्थव्यवस्था तब तक मजबूत नहीं रह सकती, जब तक उसकी बड़ी आबादी बीमार हवा में सांस ले रही हो, जब तक इलाज का खर्च बढ़ता जा रहा हो और जब तक बच्चों की सेहत तथा नागरिकों की औसत उम्र प्रदूषण की भेंट चढ़ रही हो। इस बयान में असल ‘खबर’ यह नहीं थी कि प्रदूषण समस्या है, यह तो हर कोई जानता है, खबर यह थी कि एक शीर्ष आर्थिक विशेषज्ञ ने दावोस जैसे मंच पर भारत की ‘विकास-नीति’ के मूल आधार को चुनौती दे दी। यानी यह बात उन निवेशकों के सामने कही गई, जिनको भारत बुलाने के लिए सरकार बड़े-बड़े रोड-शो करती है।

गीता गोपीनाथ ने प्रदूषण से जुड़ी मौतों और आर्थिक नुकसान का संदर्भ देते हुए यह भी कहा कि भारत में हर साल करीब 17 लाख लोगों की मौत प्रदूषण से जुड़ी वजहों से होती है। यह आंकड़ा जितना भयावह है, उतना ही निर्णायक भी है। 17 लाख मौतें यानी एक ऐसा अदृश्य युद्ध जिसमें हर साल एक बड़े शहर की आबादी के बराबर लोग मर जाते हैं लेकिन यह मौतें किसी युद्ध, किसी धमाके या किसी प्राकृतिक आपदा के एक दिन के दृश्य में नहीं दिखतीं। ये मौतें धीरे-धीरे होती हैं, अस्थमा, स्ट्रोक, हार्ट अटैक, फेफड़ों की बीमारी, किडनी और कैंसर जैसी बीमारियों के जरिए। इन मौतों का कोई ‘ब्रेकिंग न्यूज’ वाला ड्रामा नहीं बनता, इसलिए सरकारें अक्सर इस पर उतना फोकस नहीं करतीं जितना एक नई सड़क या एक नए पुल एक शिलान्यास या लोकार्पण पर करती हैं। गोपीनाथ ने इसी अदृश्य संकट को भारत की अर्थव्यवस्था के केंद्र में रखकर कहा कि प्रदूषण को अड्रेस करना भारत का सबसे बड़ा मिशन होना चाहिए। उनका तर्क साफ था, पहले हवा बचाइए, लोगों की सेहत बचाइए, फिर निवेशक भी आएंगे और अर्थव्यवस्था भी टिकेगी। यह सिर्फ नैतिकता का सवाल नहीं बल्कि एक आर्थिक अनिवार्यता है।

यहां गोपीनाथ का दूसरा संदेश भी समझना जरूरी है। उन्होंने संकेत दिया कि विदेशी निवेशक अब ‘पर्यावरणीय जोखिम’ को पहले से ज्यादा गम्भीरता से लेते हैं। आज की दुनिया में पूंजी केवल सस्ता श्रम और बड़ा बाजार देखकर नहीं आती। पूंजी देखती है कि किसी देश में पर्यावरणीय स्थिरता कैसी है, नियामक व्यवस्था कितनी मजबूत है, जलवायु जोखिम कितना है और कामगारों के लिए रहने-सांस लेने की स्थितियां कैसी हैं। यदि कोई निवेशक भारत में अरबों डाॅलर लगाकर फैक्ट्री या टेक हब बनाना चाहता है तो वह यह भी पूछेगा कि क्या इस शहर में उसके कर्मचारियों के बच्चे सुरक्षित रह पाएंगे, क्या वहां पानी मिलेगा, क्या वहां हर साल धुंध और जहरीली हवा से काम ठप पड़ जाएगा। गोपीनाथ मूलतः यह कह रही थीं कि प्रदूषण केवल भारतीयों की सेहत नहीं बिगाड़ रहा, यह भारत की आर्थिक साख और निवेश आकर्षण की क्षमता पर भी हमला कर रहा है। लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा उसी समय भारत के भीतर सामने आया, जिसने गोपीनाथ की बात को और वजनकारी बना दिया। 22 जनवरी को ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को जानकारी दी है कि चारधाम परियोजना के तहत 13 सड़क खंडों के लिए 2017 से 2020 के बीच 17,625 पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई थी। यह खबर सिर्फ ‘पेड़ काट दिए गए’ की नहीं है। यह खबर उस विकास माॅडल का पोस्टमार्टम है जिसमें सड़कें चैड़ी करने, सुरंगें बनाने और ‘कनेक्टिविटी’ के नाम पर हिमालय जैसे नाजुक क्षेत्र की धमनियां काट दी जाती हैं। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब वैज्ञानिक और पर्यावरणविद लगातार चेताते रहे हैं कि हिमालय अस्थिर है, वहां भूगर्भीय संरचना कमजोर है और उस पर बढ़ता मानव हस्तक्षेप आपदाओं को निमंत्रण दे सकता है।

‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि सिलक्यारा टनल के लिए भी 500 से अधिक पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई थी। यह वही सुरंग है जिसके निर्माण का एक हिस्सा नवम्बर 2023 में ढह गया था। सिल्क्यारा हादसा केवल एक इंजीनियरिंग दुर्घटना नहीं था बल्कि यह उस सोच का प्रतीक था जिसमें ‘प्रोजेक्ट टाइमलाइन’ और ‘फोटो-आॅप’ जीवन से ज्यादा अहम हो जाते हैं। जब सुरंग ढहती है, मजदूर भीतर फंसते हैं और देश सत्रह दिनों तक सांस रोककर बैठता है तब सवाल उठते हैं कि परियोजना की गुणवत्ता, पर्यावरणीय आकलन और सुरक्षा मानकों का क्या हुआ। चारधाम परियोजना को लेकर पहले भी अनेक चेतावनियां आई हैं। पहाड़ काटने, चैड़ीकरण, डम्पिंग, नदी किनारों पर निर्माण, ये सब ऐसे विषय रहे हैं जिन पर अदालतें और ट्रिब्यूनल तक सवाल उठाते रहे हैं। एनजीटी का संज्ञान लेना इसी का संकेत है कि हिमालयी इकोलाॅजी और पर्यावरणीय मानकों को लेकर गम्भीर चिंताएं मौजूद हैं। लेकिन विकास की मौजूदा राजनीति में पर्यावरणीय चेतावनी को अक्सर ‘विरोध’, ‘अड़ंगा’ या ‘देशद्रोह’ कहकर दफना दिया जाता है।

एक ओर सरकार दुनियाभर में निवेश के लिए ‘ग्रीन ग्रोथ’, ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ और ‘क्लाइमेट एक्शन’ की बातें करती है, दूसरी तरफ चारधाम जैसी परियोजनाओं में जंगल की कटाई को व्यापक मंजूरी दी जाती है। हिमालय के जंगल केवल हरियाली नहीं हैं, वे एक प्राकृतिक कवच हैं जो बाढ़, भूस्खलन और जलवायु संकट के बीच इंसानी बस्तियों की रक्षा करते हैं। जब इस कवच को विकास की मशीन काटकर गिरा देती है तो सिर्फ पेड़ नहीं गिरते, पूरा इकोसिस्टम डगमगाता है। यही इकोसिस्टम डगमगाएगा तो उसका असर प्रदूषण, धूल, पार्टिकुलेट मैटर, जल संकट और स्वास्थ्य पर पड़ेगा। इस तरह दावोस में गोपीनाथ ने जिस संकट की बात की, उसका एक बड़ा कारण देश के भीतर चल रही वही नीतियां बन जाती हैं जिन्हें ‘राष्ट्रीय विकास’ का नाम दिया जाता है।

इस बहस का तीसरा और सबसे कड़वा पहलू राजनीतिक है। भारत में वर्षों से विकास की राजनीति ‘सड़क बनाम विरोध’ में बदल दी गई है। जो सवाल पूछे, उसे विकास विरोधी, जो पर्यावरण की बात करे उसे देशद्रोही, जो प्रदूषण पर बोले, उसे एजेंडा वाला। यह वही मानसिकता है जिसने दिल्ली की जहरीली हवा को ‘मौसम’ बना दिया और देश के कई शहरों के प्रदूषण को ‘धुंध’ कहकर सामान्य कर दिया। इसी मानसिकता के कारण जब कोई विशेषज्ञ कहता है कि भारत में प्रदूषण से हर साल लाखों मौतें होती हैं तो कुछ लोग संवेदना के बजाय हमला करने लगते हैं। वे विशेषज्ञ की योग्यता नहीं देखते, वे अपना राजनीतिक गुस्सा देखते हैं। गीता गोपीनाथ पर भी ऐसे हमले होने की आशंका स्वाभाविक है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि गीता गोपीनाथ कोई सोशल मीडिया की ‘मतदाता-प्रचारक’ नहीं हैं। उन्होंने लेडी श्रीराम कॉलेज से शिक्षा ली, दिल्ली स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स और यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन से उच्च शिक्षा प्राप्त की, प्रिंसटन से अर्थशास्त्र में पीएचडी की और आईएमएफ की चीफ इकोनॉमिस्ट रह चुकी हैं। उनका बयान किसी पार्टी की रैली नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था की चेतावनी है, एक ऐसी चेतावनी जो अगर अनसुनी की गई तो इसकी कीमत सरकार नहीं, आम भारतीय चुकाएंगे।

चारधाम परियोजना और 17,625 पेड़ों की कटाई की खबर इसी लड़ाई में एक गम्भीर सवाल जोड़ती है कि क्या भारत का विकास माॅडल पर्यावरण के साथ युद्ध कर रहा है? हिमालय में पेड़ों की कटाई केवल वहां के प्रदूषण को नहीं बढ़ाती बल्कि देश की जल सुरक्षा को भी प्रभावित करती है। हिमालय एशिया का वाटर टावर है। उसी से नदियां निकलती हैं, वही मैदानों को पानी देता है, वही कृषि और ऊर्जा को जीवन देता है। यदि हिमालय की पारिस्थितिकी कमजोर होती है तो उसका असर केवल उत्तराखण्ड तक सीमित नहीं रहेगा, वह उत्तर भारत की कृषि और जल आपूर्ति तक को हिला सकता है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यह बनता है कि सरकार की प्राथमिकता क्या है? यदि प्राथमिकता केवल चुनावी तस्वीरें और उद्घाटन हैं तो पर्यावरणीय नुकसान चलता रहेगा, प्रदूषण बढ़ता रहेगा और बीमारी संकट गहराता रहेगा। लेकिन अगर प्राथमिकता सचमुच राष्ट्र निर्माण है तो गोपीनाथ की चेतावनी को सुनना होगा। दावोस में दुनिया के सामने चमक दिखाने से पहले देश के भीतर वास्तविकता सुधारनी होगी। निवेश का मतलब केवल कम्पनी का आना नहीं, स्थिरता है। जब कोई देश अपने नागरिकों की हवा, पानी और पहाड़ों को सुरक्षित नहीं रख पाता तो वह स्थिरता खो देता है और स्थिरता ही निवेश की असली शर्त है।

यह बहस केवल ‘पेड़ बनाम सड़क’ नहीं है। यह बहस ‘स्मार्ट विकास बनाम विनाशकारी विकास’ की है। सड़कें बननी चाहिए, कनेक्टिविटी होनी चाहिए, तीर्थयात्रियों की सुविधा होनी चाहिए, इसमें किसी को आपत्ति नहीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब वैज्ञानिक और पर्यावरणीय समझ के साथ हो रहा है या केवल राजनीतिक हड़बड़ी में? क्या पहाड़ों की क्षमता, भूस्खलन जोखिम और जलवायु वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर डिजाइन बन रहा है? क्या पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया पारदर्शी है? क्या प्रतिपूरक वनीकरण केवल कागजों पर है या वास्तव में जमीन पर? क्या कटे हुए पेड़ों का पारिस्थितिकी नुकसान किसी प्रकार से पूरा हो सकता है? सबसे बड़ी बात, क्या इन परियोजनाओं की लागत में स्वास्थ्य और पर्यावरणीय क्षति की कीमत जोड़ी जाती है? क्योंकि यदि पेड़ों की कटाई से प्रदूषण बढ़ता है, बीमारियां बढ़ती हैं, आपदाएं बढ़ती हैं तो इसकी कीमत भी अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ती है। यही गोपीनाथ का बुनियादी आर्थिक तर्क है कि पर्यावरण की कीमत चुकाए बिना कोई विकास ‘सस्ता’ नहीं हो सकता, वह आगे चलकर बहुत महंगा पड़ता है।

दावोस का संदेश और ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ की खबर, दोनों मिलकर एक ही चेतावनी दे रही हैं। भारत के सामने विकास का विकल्प नहीं है, विकास अनिवार्य है लेकिन विकास का रास्ता पर्यावरण को कुचलकर नहीं निकल सकता। आज यदि प्रदूषण और पर्यावरणीय गिरावट को भारत की ग्रोथ का सबसे बड़ा खतरा कहा जा रहा है तो इसका मतलब यह है कि सरकार को नीति की दिशा बदलनी होगी। किसी भी देश का विकास केवल जीडीपी के आंकड़े नहीं होते, विकास नागरिकों की उम्र, बच्चों की सांस, नदियों की शुद्धता और पहाड़ों की स्थिरता भी होता है।

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