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सुलगता अलगाववाद, झुलसता पाकिस्तान

बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे समृद्ध क्षेत्र है, यहां गैस, खनिज और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की भरमार है। लेकिन पाकिस्तान सरकार बलूचिस्तान के संसाधनों का शोषण कर रही है, जबकि वहां की जनता को बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं। यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत भी है, लेकिन इसे विकास और बुनियादी सुविधाओं के मामले में सबसे अधिक उपेक्षित किया गया है। यहां शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे की भारी कमी है। बलूचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ बढ़ता गुस्सा और विद्रोह इस संकेत की ओर इशारा करता है कि यह क्षेत्र निकट भविष्य में और अधिक उथल-पुथल का गवाह बन सकता है। पाकिस्तानी सरकार अगर बलूच जनता के साथ न्याय नहीं करती तो अलगाव की मांग और तेज होगी

ग्यारह मार्च 2025 को पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में एक बड़ी घटना घटी। बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने जाफर एक्सप्रेस ट्रेन का अपहरण कर लिया। यह ट्रेन क्वेटा से पेशावर जा रही थी और इसमें लगभग 500 यात्री सवार थे। घटना बलूचिस्तान के गुदलार और पीरू कोनेरी इलाकों के बीच हुई, जब ट्रेन एक सुरंग से गुजर रही थी। बलूच लिबरेशन आर्मी के आतंकवादियों ने पहले रेलवे ट्रैक को विस्फोटक से उड़ाया, जिससे ट्रेन रूक गई। इसके बाद उन्होंने ट्रेन पर गोलीबारी की, जिससे कई यात्री घायल हो गए और ट्रेन चालक गम्भीर रूप से घायल हुआ। बीएलए ने दावा किया कि उन्होंने 214 यात्रियों को बंधक बनाया है, जिनमें से कई पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा बलों के सदस्य हैं।

बीएलए ने पाकिस्तान सरकार से बलूच राजनीतिक कैदियों और राष्ट्रीय प्रतिरोध कार्यकर्ताओं की बिना शर्त रिहाई की मांग करते हुए इसके लिए 48 घंटे की समय सीमा दी थी। बीएलए ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं तो वे हर घंटे 5 बंधकों को मार देंगे। पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने तुरंत बचाव अभियान शुरू कर लगभग सभी बंधकों को छुड़ा जरूर लिया लेकिन कई बंधक और बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैन्यकर्मी भी मारे गए। बीएलए ने दावा किया है कि उन्होंने पाकिस्तानी सेना के 30 से अधिक सैनिकों को मार दिया है।

बलूचिस्तान संघर्ष की पृष्ठभूमि

बलूचिस्तान लम्बे समय से पाकिस्तान से स्वतंत्रता की मांग कर रहा है। बीएलए जैसे समूह पाकिस्तान सरकार पर बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों के शोषण और स्थानीय लोगों के साथ भेदभाव का आरोप लगाते हैं। इससे पहले भी बीएलए ने सरकारी और चीनी परियोजनाओं पर हमले किए हैं। यह घटना बलूचिस्तान में जारी संघर्ष और असंतोष को दर्शाती है। बलूचिस्तान में लगातार बढ़ती हिंसा, अलगाववादी आंदोलन और पाकिस्तान के खिलाफ बढ़ते आक्रोश ने इस क्षेत्र को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है। बीएलए द्वारा एक यात्री ट्रेन के अपहरण जैसी घटनाओं ने पाकिस्तान सरकार के लिए गम्भीर सुरक्षा चिंताएं खड़ी कर दी हैं।

ब्रिटिश राज के दौरान बलूचिस्तान मुख्य रूप से खान ऑफ कलात के अधीन था। 19वीं सदी में ब्रिटिशों ने इसे रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र मानते हुए अपने नियंत्रण में रखा। जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ तो बलूचिस्तान के शासक (खान ऑफ कलात) ने स्वतंत्रता बनाए रखने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन मार्च 1948 में पाकिस्तानी सेना ने बलपूर्वक बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया और इसे पाकिस्तान में मिला दिया। इस जबरन विलय के बाद से ही बलूचिस्तान में असंतोष और विद्रोह की चिंगारी जल उठी।

बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे समृद्ध क्षेत्र है, यहां गैस, खनिज और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की भरमार है। लेकिन पाकिस्तान सरकार बलूचिस्तान के संसाधनों का शोषण कर रही है, जबकि वहां की जनता को बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं। बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन इसे विकास और बुनियादी सुविधाओं के मामले में सबसे अधिक उपेक्षित किया गया है। बलूचिस्तान में शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे की भारी कमी है।

मानवाधिकारों का हनन

पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई ने बलूच नेताओं, कार्यकर्ताओं और आम जनता के खिलाफ हिंसक कार्रवाई की है। कई बलूच कार्यकर्ताओं का अपहरण, हत्या, और मानवाधिकार हनन हुआ है। सीपीईसी प्रोजेक्ट के तहत चीन ने ग्वादर पोर्ट पर भारी निवेश किया है। लेकिन स्थानीय लोगों को इसका कोई फायदा नहीं हो रहा, जिससे बलूच अलगाववादी नाराज हैं। हाल ही में बीएलए ने पाकिस्तानी सेना के ठिकानों और चीनी परियोजनाओं पर हमले तेज कर दिए हैं। पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई से हिंसा और बढ़ने की आशंका है। पश्चिमी देश, विशेषकर अमेरिका और यूरोप, बलूचिस्तान के मानवाधिकार हनन को लेकर पाकिस्तान की आलोचना कर रहे हैं। अफगानिस्तान और ईरान में भी बलूच आबादी रहती है, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ सकता है।

बलूच अलगाववाद और विद्रोह की प्रमुख घटनाएं

बलूच राष्ट्रवादियों ने कई बार पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विद्रोह किया।

1958-59 का पहला विद्रोह : पाकिस्तानी सेना ने बलूच राष्ट्रवादियों के विद्रोह को कुचलने के लिए सैन्य कार्रवाई की। इस दौरान बलूच नेता नवाब नौरोज खान को गिरफ्तार किया गया और बाद में उन्हें फांसी दे दी गई।

1973-77 का दूसरा बड़ा विद्रोह : प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के शासनकाल में, बलूचिस्तान में विद्रोह बढ़ा। पाकिस्तानी सेना ने बड़ी संख्या में बलूच राष्ट्रवादियों को मारा।

2000 के बाद का विद्रोह : पाकिस्तान की सेना ने बलूच राष्ट्रवादी नेता नवाब अकबर बुगती को 2006 में मार गिराया, जिसके बाद आंदोलन और तेज हो गया। बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए), बलूचिस्तान रिपब्लिकन आर्मी (बीआरए) जैसे अलगाववादी संगठन सक्रिय हो गए।

भारत पर आरोप

पाकिस्तान आरोप लगाता है कि भारत, अफगानिस्तान और कुछ पश्चिमी देश इस संगठन का समर्थन कर रहे हैं। पाकिस्तान का दावा है कि भारतीय खुफिया एजेंसी (राॅ) बलूच राष्ट्रवादियों को सहायता देती है, लेकिन भारत ने इन आरोपों से इनकार किया है। कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में कहा गया है कि बलूच विद्रोही समूहों को पश्चिमी देशों से भी गुप्त रूप से समर्थन मिल सकता है।

बलूचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ बढ़ता गुस्सा और विद्रोह इस संकेत की ओर इशारा करता है कि यह क्षेत्र निकट भविष्य में और अधिक उथल-पुथल का गवाह बन सकता है। पाकिस्तानी सरकार अगर बलूच जनता के साथ न्याय नहीं करती, तो अलगाव की मांग और तेज होगी। भौगोलिक स्थिति और पाकिस्तानी सेना की पकड़ के कारण निकट भविष्य में स्वतंत्रता कठिन दिखती है। लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय समर्थन बढ़ता है और पाकिस्तानी सरकार बलूच समस्या का समाधान नहीं करती तो यह आंदोलन और तेज हो सकता है। बलूचिस्तान आज एक ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान इसे कैसे सम्भालता है- दमन के जरिए या समझौते के जरिए।

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