पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर यह संकेत दे दिया है कि जब सत्ता पर खतरे के बादल मंडराने लगते हैं तो वे संवैधानिक मर्यादाओं से टकराने से भी नहीं हिचकतीं। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) जैसे प्रशासनिक और चुनावी सुधार को अनावश्यक रूप से एनआरसी से जोड़कर उन्होंने इस मुद्दे को राज्य की सीमाओं से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सियासत तक खींच दिया है। वो भी तब जब देश की सर्वोच्च अदालत पहले ही एसआईआर की प्रक्रिया को वैध और संवैधानिक ठहरा चुकी है। इसके बावजूद ममता बनर्जी का इस पर सियासी हंगामा जारी है। खासकर हाल के महीनों में ममता बनर्जी के राजनीतिक आचरण, बयानों और फैसलों को देखकर सवाल उठ रहे हैं कि जब न्यायालय ने स्थिति स्पष्ट कर दी है तो फिर यह विरोध क्यों? क्या यह लोकतांत्रिक चिंता है या फिर सियासी मजबूरी? क्या यह उनकी हताशा है या फिर आने वाले चुनावों में हार का डर?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में संस्थाएं किसी भी व्यक्ति या सरकार से बड़ी होती हैं। एसआईआर जैसी प्रक्रियाएं पारदर्शिता और निष्पक्ष चुनाव के लिए होती हैं न कि किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए। एनआरसी का डर दिखाकर राजनीति करना अब न तो नया है और न ही उतना असरदार जितना कभी हुआ करता था। सवाल यह नहीं रह गया है कि एसआईआर से तुष्टिकरण की राजनीति को नुकसान होगा या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करेंगी या फिर हार के डर में उन्हें लगातार कमजोर करती रहेंगी? इतिहास गवाह है कि जो नेता संविधान से टकराते हैं उन्हें अंततः जनता की अदालत में जवाब देना पड़ता है। देश में आपातकाल लगाने वाली इंदिरा गांधी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। बंगाल की जनता यह सब देख और समझ रही है आने वाले चुनावों में यही समझ टीएमसी की असली परीक्षा लेगी।
ममता बनर्जी यह भी समझ रही हैं कि भाजपा से मुकाबला इस बार पहले के मुकाबले थोड़ा कठिन है। इसकी वजह यह है कि पिछली बार उन्हें जो 49 प्रतिशत वोट मिले थे उसमें 30 प्रतिशत तो अकेले मुसलमानों के थे। भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए मुसलमानों ने कांग्रेस और वामपंथियों का मोह त्याग कर एकमुश्त टीएमसी को वोट किया था। यानी 70 प्रतिशत हिंदुओं में सिर्फ 19 प्रतिशत वोट ही उन्हें प्राप्त हुए थे। इस बार टीएमसी से निष्कासित नेता हुमायूं कबीर के अलग पार्टी बना लेने और मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति वाली मस्जिद बनाने की घोषणा और एआईएमआईएम के प्रमुख ओवैसी का हुमायूं कबीर से हाथ मिला लेना यह मुस्लिम मतों में विभाजन का स्पष्ट संकेत है। बांग्लादेश में हिन्दुओं की हत्या से बंगाल का हिंदू समाज नाराज है। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए मशहूर ममता के लिए हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण बड़ा खतरा तो है ही साथ ही ईडी और सीबीआई जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों से ममता लगातार पंगा लेती रही हैं जिससे उनकी परेशानी बढ़ सकती है। खासकर आई-पैक रेड मामले में।
गौरतलब है कि बंगाल की राजनीति अब वैसी नहीं रही जैसी 2011 या 2021 में थी। एक समय ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत थी ‘मैं बनाम दिल्ली’ की लड़ाई। भाजपा को बाहरी पार्टी बताकर उन्होंने बंगालिया अस्मिता को मजबूत किया। लेकिन अब परिस्थितियां बदली हैं। भाजपा लगातार संगठन मजबूत कर रही है, केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता ने टीएमसी को रक्षात्मक बना दिया है और अंदरूनी गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है।
ऐसे में ममता बनर्जी का तीखा और आक्रामक रवैया कई बार आत्मविश्वास से ज्यादा बेचैनी का संकेत देता है।
ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग की कार्रवाइयों को लेकर ममता बनर्जी का गुस्सा नया नहीं है। लेकिन अब यह गुस्सा सड़कों से लेकर विधानसभा और सार्वजनिक मंचों तक खुलकर दिखता है। हर कार्रवाई को राजनीतिक बदले के तौर पर पेश करना उनकी पुरानी रणनीति रही है। सवाल यह है कि क्या जनता अब भी इसे उसी तरह स्वीकार कर रही है? कई मामलों में आरोप सीधे पार्टी नेताओं और करीबी सहयोगियों पर हैं। बार-बार एजेंसियों को दोषी ठहराने से यह संदेश भी जाता है कि पार्टी के पास ठोस जवाब नहीं है। यह स्थिति हताशा की ओर इशारा करती है।
एक समय ममता बनर्जी का संगठन पर पूर्ण नियंत्रण था। लेकिन आज टीएमसी के भीतर असंतोष के स्वर सुनाई देते हैं। नेताओं के बीच खींचतान, भ्रष्टाचार के आरोप और खुलेआम एक-दूसरे पर बयानबाजी पार्टी की कमजोरी उजागर करती है। ममता बनर्जी का हर मुद्दे पर खुद आगे आकर सफाई देना यह बताता है कि दूसरी पंक्ति का नेतृत्व या तो कमजोर है या फिर भरोसे के लायक नहीं बचा। मजबूत नेता वही होता है जो संगठन को खुद बोलने दे। हर बार खुद ढाल बनना डर का संकेत भी हो सकता है।
भाजपा भले ही बंगाल में सत्ता से दूर हो लेकिन उसका वोट प्रतिशत और राजनीतिक उपस्थिति लगातार बढ़ी है।
लोकसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन टीएमसी के लिए चेतावनी रहा है। ग्रामीण इलाकों में पैठ, हिंदुत्व के साथ-साथ भ्रष्टाचार का मुद्दा और केंद्र की योजनाओं का प्रभाव टीएमसी के लिए चुनौती बने हुए हैं। ममता बनर्जी इन चुनौतियों का जवाब आक्रामक भाषणों और भावनात्मक अपील से देती दिखती हैं। लेकिन यह रणनीति कब तक काम करेगी यह सवाल अब आम मतदाता भी पूछ रहा है।
राष्ट्रीय राजनीति में ममता बनर्जी खुद को विपक्ष की प्रमुख नेता के तौर पर पेश करना चाहती हैं। भाजपा विरोध में उनकी सक्रियता और कांग्रेस पर तंज यह दर्शाता है कि वे खुद को राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प मानती हैं। लेकिन बंगाल की जमीन पर जब अपनी पकड़ ढीली पड़ती दिखती है तो राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता कहीं न कहीं हार के डर से ध्यान भटकाने की कोशिश भी लगती है।
यह कहना गलत होगा कि ममता बनर्जी पूरी तरह हताश हैं। वह अब भी एक मजबूत और अनुभवी नेता हैं। लेकिन उनके हालिया तेवर, लगातार आक्रामक बयान और हर आलोचना को साजिश बताने की आदत यह संकेत देती है कि आत्मविश्वास में दरार आई है। सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद एंटी-इनकम्बेंसी, भ्रष्टाचार के आरोप और विपक्ष का दबाव किसी भी नेता को असहज कर देता है।
कुल मिलाकर ममता बनर्जी की राजनीति इस मोड़ पर खड़ी है जहां हताशा और रणनीति के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। उनके व्यवहार में हार का डर भी दिखता है और सत्ता बचाने की जिद भी। आने वाले चुनाव तय करेंगे कि यह आक्रामकता उनकी ताकत बनती है या कमजोरी। अगर ममता बनर्जी जनता के वास्तविक मुद्दों पर फोकस लौटाने में सफल रहीं तो यह डर महज रणनीति साबित हो सकता है। लेकिन अगर यही रुख जारी रहा तो हताशा का ठप्पा और गहरा हो सकता है।

