भारत की हमेशा से भावना रही है कि ’जियो और जीने दो’। इसी के चलते भारत में सब से अधिक बाघ पाए जाते हैं। दुनिया भर में पाए जाने वाले कुल बाघों में से 70 प्रतिशत जंगली बाघ हिंदुस्तान में ही हैं। जबकि भारत में पूरी दुनिया के बाघों के इलाक़े का केवल 25 फ़ीसद ही भारत में हैं। लेकिन धीरे-धीरे देश में इनकी आबादी पर संकट मंडराने लगा है। हाल ही में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 में भारत में कुल 126 बाघों की मौत हुई है, जो एक दशक में सबसे अधिक मौतें हैं। एनटीसीए के आंकड़ों के मुताबिक मरने वाले 126 बाघों में से 60 संरक्षित क्षेत्रों के बाहर शिकारियों, दुर्घटनाओं और मानव-पशु के कारण मारे गए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत वर्ष 2018 में 2 हजार 967 बाघों का घर हुआ करता था।
कहां हुई सबसे ज्यादा बाघों की मौत ?
वर्ष 2012 से एनटीसीए द्वारा सार्वजनिक रूप से बाघों के मौत के आंकड़ों को रखना शुरू किया। इससे पहले वर्ष 2016 में बाघों के मौतों की संख्या लगभग 121 थी। वहीं 2020 में 106 बाघों की मौत की तुलना में 2021 में 126 बाघों की मौत से लगभग 20 फीसदी की वृद्धि हुई है। इस साल के आंकड़ों ने बाघों के सरंक्षण की चिंता को बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों ने मौजूदा हालात के मद्देनजर कठोर संरक्षण के लिए उचित कदम और वन रिजर्व जैसे स्थानों को और अधिक सुरक्षित बनाने की मांग की है।
दरअसल, 526 बाघों का घर मध्य प्रदेश था, यहां सबसे अधिक 42 मौतें हुई है। दूसरे नंबर पर बाघ की मौतों में महाराष्ट्र है। जहां 312 बाघ थे और उसमें से 26 बाघों की जान चली गई है और कर्नाटक, जो कि 524 बाघों का निवास स्थान है यहां 15 बाघों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उत्तर प्रदेश, जहां लगभग 173 बाघ थे, उनमें से 9 मौतें दर्ज की गई हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि मरने वाले बाघों की संख्या और ज्यादा हो सकती है, क्योंकि जंगलों के अंदर प्राकृतिक मौतों की एक बड़ी संख्या के बारे में अक्सर रिपोर्ट नहीं हो पाती है।
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वर्ष 2006 में, एनटीसीए की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करने के लिए 1972 के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम में संशोधन किया गया, अब इसे और अधिक मजबूत बनाने के प्रयास किए गए हैं। टाइगर रिजर्व राज्यों को अवैध शिकार विरोधी दस्तों को तैनात करने के लिए धन मुहैया कराकर गैरकानूनी गतिविधियों को रोकना। सरकार की रणनीति के अनुसार, बाघ अभयारण्यों के पास स्थानीय आबादी ने भी संरक्षण प्रयासों में भाग लिया। कुछ टाइगर रिजर्व राज्यों में एक विशेष बाघ सुरक्षा बल (STPF) भी स्थापित किया गया है।
देखा जा रहा है कि सरकार द्वारा बाघों के सरंक्षण के प्रयास शुरू कर दिए हैं। सरिस्का और पन्ना जैसे अभयारण्यों में बाघों को फिर से लाने का प्रयास किया जा रहा है। क्योंकि प्रजाति स्थानीय रूप से विलुप्त हो गई थी। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा संसद में यह बताया गया कि पन्ना में बाघों का सफल पुनरुत्पादन हो रहा है जो दुनिया में अपनी तरह का एक सराहनीय उदाहरण है। इसी तरह का एक प्रयास उत्तराखंड में राजाजी टाइगर रिजर्व के पश्चिमी भाग में भी किया गया यहां बाघों को फिर से लाया गया है।
बढ़ती तकनीक और घटते जंगलों के कारण एक डर सबको लगता है कि अगर आदमख़ोर बाघों को न मारा गया तो वो इंसान के अस्तित्व के लिए ही संकट बन जाएंगे। बहुत सी जगहों पर बाघों के प्रति सहिष्णुता का भाव समाप्त होने की कगार पर हैं। मानव-जानवर संघर्ष में बाघों को चुन-चुनकर मौत की घाट उतार दिया जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मानव-पशु संघर्ष से हो रही बाघों की मौतों को रोकना बेहद जरुरी है और जल्द ही इसके लिए सरकारों को सख्त कदम उठाने होंगे। वन्यजीवों के आवासों के घटते दर भी चिंता का विषय है।


