अमेरिका से आई एक जानकारी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बैक फुट में ला खड़ा किया है। एक अमेरिकी कम्पनी द्वारा सरकार को जमा कराए गए दस्तावेजों से निकली इस जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अमेरिकी प्रशासन को प्रभावित करने के लिए इस कम्पनी को काम दिया था जिसकी एवज में 3.30 लाख डाॅलर का भुगतान इस कम्पनी को किया गया। इस खुलासे ने भारत में हलचल मचा दी है। वरिष्ठ नौकरशाह और केंद्र सरकार में सचिव रह चुके ई.ए.एस. शर्मा ने इनकम टैक्स विभाग और ईडी को पत्र लिखकर पूरे मामले की जांच करने को कहा है। शर्मा का कहना है कि भारत में गैर पंजीकृत संगठन आरएसएस ‘गुरु-दक्षिणा’ से चलने वाला संगठन है इसलिए उसने कैसे इतनी भारी भरकम विदेशी मुद्रा अमेरिकी फर्म को दी है इसकी जांच जरूरी है, वहीं बैकफुट में आया आरएसएस किसी भी प्रकार की विदेशी लाॅबिंग से साफ इनकार कर रहा है
अमेरिका में लाॅबिंग से जुड़े कानूनों के तहत वहां की हर लाॅबिंग फर्म को यह बताना अनिवार्य होता है कि उसे किसने कितना पैसा दिया और उसने किसके लिए क्या काम किया, इसी व्यवस्था के तहत 2025 की तिमाही रिपोर्टिंग में एक अमेरिकी फर्म स्क्वायर पैटन बोग्स द्वारा वार्षिक वित्तीय लेनदेन के जो दस्तावेज जमा किए गए, उसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का नाम और उसके सामने 3.30 लाख अमेरिकी डाॅलर की भुगतान राशि दर्ज है। फर्म ने यह रकम भारत-अमेरिका द्विपक्षीय सम्बंधों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत और सम्पर्क बनाने के काम के लिए यानी संघ के पक्ष में अमेरिकी प्रशासन से लाॅबिंग करने के लिए प्राप्त की। बस यही छोटा-सा उल्लेख भारत में बड़ा विवाद बन गया है। आरएसएस पंजीकृत संस्था नहीं है और वर्षों से यही कहा जाता रहा है कि यह संगठन स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली ‘गुरु-दक्षिणा’ से चलता है। ऐसे में अमेरिकी रिकाॅर्ड में उसके द्वारा लाखों डाॅलर का भुगतान अपने आप में सवाल उठाता है। भारत सरकार के पूर्व सचिव ई.ए.एस. शर्मा ने राजस्व सचिव के साथ-साथ सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर टैक्सेस (इनकमटैक्स) और ईडी को एक विस्तृत पत्र भेजा है जिसमें उन्होंने पूछा कि सबसे पहले तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या वास्तव में इस तरह का कोई भुगतान आरएसएस या उससे जुड़े किसी व्यक्ति, किसी संस्था या किसी विदेशी इकाई की ओर से किया गया है? यदि किया गया तो यह भारत से कैसे गया? किस बैंक के माध्यम से गया? क्या इसके लिए रिजर्व बैंक तथा विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (एफईएमए) के नियमों का पालन किया गया क्योंकि भारत से विदेश में इतनी बड़ी रकम भेजने के लिए वैधानिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। शर्मा ने यह भी कहा है कि यदि ‘गुरु-दक्षिणा’ की राशि का उपयोग विदेशी सरकार संग लाॅबिंग के लिए किया गया है तो इसकी प्रकृति भी बदल जाती है क्योंकि ‘गुरु-दक्षिणा’ को आयकर विभाग ने कई मौकों पर सांस्कृतिक और धार्मिक परम्परा मानते हुए कर छूट की श्रेणी में रखा है। लेकिन यदि इसे विदेश में किसी लाॅबिंग फर्म को भुगतान करने में खर्च कर दिया जाए तो यह साधारण दान नहीं रह जाता और उसकी कर स्थिति पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। शर्मा ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि जब आरएसएस पंजीकृत संगठन नहीं है तब अमेरिकी फर्म ने फाॅर्म में ‘आरएसएस-इंडिया’ क्यों लिखा? क्या अमेरिका में इस नाम से कोई शाखा पंजीकृत है, क्या भारत में उसकी कोई जानकारी दी गई है? यदि ऐसा कुछ नहीं है तो अमेरिकी दस्तावेज में यह नाम किस आधार पर दर्ज किया गया? इतना ही नहीं उन्होंने यह भी पूछा है कि यदि आरएसएस का कहना है कि उसने किसी फर्म को लाॅबिंग के लिए नहीं रखा तो फिर फर्म के डिस्क्लोजर में यह नाम क्यों दिख रहा है? यदि कोई मध्यस्थ संस्था थी जिसने आरएसएस के नाम से काम कराया तो वह कौन है? वह भारत में या अमेरिका में कहां पंजीकृत है? किसके निर्देश पर उसने भुगतान किया? इस पूरे विवाद के बीच आरएसएस ने आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और कहा है कि आरएसएस भारत में काम करने वाला सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, उसने अमेरिका में किसी लाॅबिंग फर्म को न तो कोई काम दिया और न ही कोई भुगतान किया। आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख के बयान के बाद विवाद और गहरा गया है क्योंकि अब दो तस्वीरें आमने-सामने खड़ी हैं, एक तरफ अमेरिकी सरकार के पास जमा आधिकारिक दस्तावेज जिसमें ‘आरएसएस-इंडिया’ का नाम साफ लिखा है और दूसरी ओर संगठन का साफ इनकार। इन दोनों को कैसे एक साथ समझा जाए, यही इस मामले की सबसे बड़ी समस्या बन गई है। इस विवाद को राजनीतिक रूप तब मिला जब कुछ रिपोर्टों में यह बात आई कि हिंदी नाम स्क्वायर पैटन बोग्स वही फर्म है जिसने पाकिस्तान के लिए भी बड़े पैमाने पर लाॅबिंग का काम किया था और उसके बाद अमेरिका में पाकिस्तान के पक्ष में कुछ नीतिगत फैसले भी लिए गए थे। यह जानकारी मुद्दे को और संवेदनशील बना देती है क्योंकि यह स्वाभाविक है कि जब कोई फर्म दो प्रतिद्वंदी देशों के लिए समान या समान जैसे काम करती है तो संदेह और विवाद बढ़ जाता है। विपक्ष ने इसे तुरंत लपक लियाा है। उसका कहना है कि यदि अमेरिकी दस्तावेज में आरएसएस का नाम आया है तो सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर भुगतान किसकी ओर से हुआ? किस उद्देश्य से हुआ? और क्या इसके बारे में सरकार को जानकारी थी? कई राजनीतिक दलों ने आरोप लगाए हैं कि यदि कोई वैचारिक संगठन विदेशों में लाॅबिंग करा रहा है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विदेश नीति के मामलों में सरकार और संगठन की राय अलग-अलग है? या फिर संगठन विदेशों में भारतीय नीतियों और विचारों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है? इस विवाद के बीच एक बड़ी प्रशासनिक चिंता भी सामने आती है। भारत में विदेशी भुगतान को नियंत्रित करने वाले नियम बेहद सख्त हैं, हर लेन-देन का हिसाब रखना पड़ता है और यदि किसी ने नियमों का उल्लंघन किया है तो ईडी और इन्कम टैक्स, दोनों को कार्रवाई करनी पड़ सकती है। इसी कारण शर्मा ने दोनों संस्थाओं से यह समझने की मांग की है कि अमेरिकी रिकाॅर्ड में आरएसएस का नाम दर्ज होने की वजह क्या है और क्या किसी भारतीय इकाई ने वास्तव में पैसा भेजा? यदि भेजा तो उसने किन नियमों का पालन किया? इस विवाद का एक और पहलू है। अमेरिका में विदेशी संस्थाओं के प्रभाव और राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रखने के लिए दो कानून लाॅबिंग डिस्क्लोजर (एसडीए) और फाॅरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन (एफएआरए)। यदि कोई विदेशी संस्था अमेरिकी राजनीति या नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करने के लिए लाॅबिंग करती है तो उसे ‘फारा’ के तहत दर्ज होना चाहिए, लेकिन स्क्वायर पैटन बोग्स ने यह प्रविष्टि ‘एलडीए’ के तहत दर्ज की, जिससे कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला कुछ अस्पष्ट हो जाता है क्योंकि ‘एलडीए’ कम पारदर्शी व्यवस्था है और कई बार इससे यह पूरी जानकारी नहीं मिल पाती कि किसका उद्देश्य क्या है और भुगतान की असल प्रवृति क्या थी? इस विवाद के बाद यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि भारत में बड़े सामाजिक संगठनों और वैचारिक समूहों को अपनी आय, खर्च और विदेशी सम्बंधों के बारे में अधिक पारदर्शी होना चाहिए ताकि ऐसी स्थितियां न पैदा हों जहां किसी विदेशी दस्तावेज में उनके नाम पर लाखों डाॅलर लिखे हों और देश में कोई भी यह न बता सके कि पैसा आया कहां से? और गया कहां? अभी तक केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में कोई औपचारिक बयान नहीं आया है लेकिन यह माना जा रहा है कि जल्द ही सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर
टैक्सेस और ईडी इस मामले पर शुरुआती कार्रवाई कर सकती है। यह मामला आगे चलकर भारत में दान व्यवस्था, विदेशी गतिविधियों, वैचारिक संगठनों की भूमिका और सरकारी एजेंसियों की पारदर्शिता से जुड़ी बड़ी बहस को जन्म दे सकता है क्योंकि जब किसी संगठन का नाम विदेश के सरकारी दस्तावेजों में लाखों डाॅलर के साथ दिखता है और संगठन खुद कहता है कि उसने ऐसा कुछ नहीं किया तो यह विरोधाभास अपने आप में जांच का विषय बन जाता है और इसी वजह से यह मामला अब सिर्फ राजनीतिक विवाद नहीं बल्कि प्रशासनिक और कानूनी प्रश्न का रूप ले चुका है। सच क्या है, यह आगे की जांच से ही साफ होगा, लेकिन इतना तय है कि यह मुद्दा जल्द खत्म होने वाला नहीं है।

