पांच दशकों से अमिताभ बच्चन हिंदी सिनेमा के महानायक बन करोड़ों भारतीयों के दिलों पर राज कर रहे हैं। सत्तर के दशक से लेकर आज तक अमिताभ बच्चन को ‘शहंशाह’, ‘सदी महानायक’, ‘बिग बी’, ‘स्टार ऑफ मिलेनियम’ जैसे ढेरांे नाम और खिताब दिए जाते रहे हैं। हिंदी सिनेमा के दूसरे सुपर स्टार बनने से लेकर स्टार ऑफ मिलेनियम बनने के बीच अमिताभ का संघर्ष बड़े ही उतार-चढ़ाव का रहा है। एक ऐसा दौर भी आया था जब अमिताभ को कई कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा था। वे एक-एक पैसे के लिए मोहताज हो गए थे। लोग कर्ज वापसी के लिए उनके घर तक पहुंच गए थे। यहां तक कहा जाने लगा था कि अमिताभ का दौर खत्म हो गया है लेकिन अमिताभ तो अमिताभ हैं वे उस परिस्थिति से उबर बुलंदी के उच्च शिखर पर हैं। 82 बरस के हो चुके बच्चन हालांकि पूरी तरह से सक्रिय हैं लेकिन फिल्म समीक्षकों का मानना है कि हिंदी फिल्म निर्माताआंे ने उन्हें दमदार भूमिका देनी बंद कर दी। वो उनको सिर्फ ‘दादा’ जैसे भूमिकाओं में दिखाना पसंद करते हैं जबकि दक्षिण सिनेमा ने अमिताभ को फिल्म ‘कल्कि’ में अश्वत्थामा जैसा प्रमुख रोल देकर यह साबित कर दिया कि यदि वे दक्षिण सिनेमा में होते तो रजनीकांत की तरह कई फिल्मों की मुख्य भूमिका अभी भी निभा रहे होते

ग्यारह अक्टूबर 1942 को जन्में अमिताभ बच्चन का सिने जन्म सत्तर के दशक में हुआ। फिल्म ‘जंजीर’ से एंग्री यंग मैन बने अमिताभ को आज की सदी का महानायक कहा जाता है। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री को 55 साल दिए हैं। ‘दीवार’, ‘शोले’, ‘लावारिस’, ‘चुपके-चुपके’, ‘नमक हलाल’ जैसी इनकी ब्लॉबस्टर फिल्म रही हैं। अब वो 82 वर्ष के हो गए हैं। उम्र के इस पड़ाव में भी कई हिट फिल्मंे दे चुके हैं। ‘ब्रह्माास्त्र’ और ‘कल्कि’ उनकी लास्ट हिट फिल्मांे में से है। पिछले कुछ समय से हिंदी सिनेमा और दक्षिण सिनेमा में कंटेट को लेकर बहस चल रही थी। अब अमिताभ बच्चन के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। दक्षिण सिनेमा उद्योग जगत के लोग उनकी सिनेमा यात्रा पर विचार कर रहे हैं। उनका मानना है कि बॉलीवुड के लोग अमिताभ को सिर्फ एक अभिनेता के रूप में देखते हैं। उन्हें ज्यादातर ‘दादा’ की भूमिकाओं तक ही सीमित रखा जाता है जबकि हमारे यहां उनके ही सह-कलाकार और दोस्त रजनीकांत की भूमिका इससे उलट हैं। दक्षिण में रजनीकांत आज भी मेगास्टार हैं। उनकी फिल्मों में भूमिका रोमांचक होती है। बॉलीवुड अमिताभ की प्रतिभा का उपयोग करने में विफल रहा है। दक्षिण भारत उन्हें एक मेगास्टार के रूप में देखता है। उदाहरण के तौर पर फिल्म ‘कल्कि’ को देख सकते हैं जिसमें उन्हें विशाल अश्वत्थामा के रूप में दिखाया गया था। इस फिल्म के कुछ रोमांचक एक्शन दृश्यों में कम उम्र के युवा बच्चन को भी विशाल व्यक्तित्व के रूप में दिखाया गया है। पूरी फिल्म में बच्चन एंग्री ओल्ड मैन थे और उनका किरदार फिल्म को लीड कर रहा था। फिल्म में उनके किरदार को वैसा ही पसंद किया गया जैसा उनको 90 की दशक की फिल्मो में पसंद करते थे।

फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर राज बंसल ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बातचीत में कहा कि ‘ज्यादातर हिंदी फिल्म निर्माता नहीं जानते कि बच्चन के स्टारडम का क्या करें और उन्हें बड़ी फिल्मों में दिखाने का नजरिया भी नहीं रखते। इसलिए, वे उन्हें ‘माइलेज’ के लिए कास्ट करते हैं। वे फिल्मों में अमिताभ के चेहरे को प्रोजेक्ट कर उनके नाम को भुनाना जानते हैं। बंसल ने कहा, ‘हिंदी फिल्म निर्माताओं ने उन्हें दमदार भूमिकाएं देनी बंद कर दी हैं।
नाग अश्विन ने फिल्म ‘कल्कि’ में एंग्री मैन छवि का सही इस्तेमाल किया और उन्हें इसका फायदा भी मिला। उनको लगा कि अमिताभ इस उम्र में भी अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्होंने इसका फायदा उठाया और अमिताभ को विशालकाय भूमिका का अवसर दिया जिसको दर्शकों ने खूब पसंद किया क्योंकि दर्शक उन्हें इसी रूप में जानते हैं, वह कुछ भी कर सकते हैं।’

अमिताभ बच्चन भले ही फिल्म में लीड रोल में न रहे हों लेकिन उनके काम का प्रभाव आज भी अभिनेताओं को एक दिशा देता है। फिल्म ‘केजीएफ’ के अभिनेता यश ने अपना किरदार अमिताभ के एंग्री यंग मैन से लिया है और यहां तक कि फिल्म ‘जवान’ का सीटी बजाने वाले इंटरवल ब्लॉक हो या पिता के रोल में शाहरुख खान सिगार पीते हुए दरवाजे से अंदर आने वाला दर्शाया गया अमिताभ की फिल्म ‘शहंशाह’ से प्रेरित है। इसलिए दक्षिण सिनेमा के फिल्म निर्माताओं का कहना है कि ‘अगर बच्चन साउथ इंडस्ट्री में होते तो वे अभी भी रजनीकांत की तरह हिट फिल्में दे रहे होते। हिंदी सिनेमा ने बच्चन को ‘चरित्र’ अभिनेता बनने पर मजबूर किया है, वो उनकी प्रतिभा और गम्भीरता का उपयोग करने में विफल रहा है।’

विशेक चौहान ने कहा, ‘मैं यह नहीं कह रहा कि इसमें मुख्य भूमिका होनी चाहिए, लेकिन मिस्टर बच्चन के स्टारडम का उपयोग करने के लिए आपको कुछ ऐसे दृश्यों की आवश्यकता है जिसमें उस गुस्सैल व्यक्ति को दिखाया जा सके जो अब बूढ़ा हो चुका है। एक बार जब आप ऐसा कर लेंगे तो लोग फिर से ताली बजाना और सीटियां बजाना शुरू कर देंगे।’ उन्होंने कहा कि बच्चन एक ‘असीम’ अभिनेता हैं जो ‘चीनी कम’, ‘पा’ और ‘पीकू’ जैसी फिल्मों में ‘बड़े’ क्षणों के साथ-साथ दिल को छू लेने वाले अभिनय के बीच स्विच कर सकते हैं।

हिंदी सिनेमा में महानायक का सफर
अमिताभ का बॉलीवुड में आगमन वर्ष 1969 में आई फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से हुआ था। इस फिल्म से अमिताभ को कोई सफलता तो नहीं मिली लेकिन बॉलीवुड में एंट्री मिल गई। फिर ‘आनंद’ फिल्म ने 1971 में देशभर के सिनेमाघरों में दस्तक दी। इस फिल्म में ‘बाबू मोशाय’, ‘आनंद बाबू’ के साथ सबके चहेते बन गए। इनकी ‘बक-बक’ सुनने के लिए लोग थिएटर्स में खींचे चले आते हैं। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफयेर अवार्ड भी मिला। इसके बाद उनकी झोली में कई फिल्में आईं लेकिन ज्यादातर फ्लॉप साबित हुई जिसके बाद अमिताभ बच्चन ने मुम्बई छोड़कर अपने माता-पिता के पास दिल्ली वापस आने का मन बना लिया था। तब मनोज कुमार ने अमिताभ को रोका था और अपनी फिल्म ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ में अभिनय का मौका दिया। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही। इसके बाद 1973 में प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘जंजीर में काम करने का मौका मिला। फिल्म जंजीर’ ब्लॉक बस्टर ही नहीं रही, बल्कि अमिताभ को हिंदी सिनेमा का एंग्री यंग मैन भी बना दिया। इसके बाद उन्होंने ‘सौदागर’, ‘दीवार’, ‘शोले’, ‘लावारिस’, ‘चुपके-चुपके’, ‘नमक हलाल’, ‘नमक हराम’, ‘नास्तिक’, ‘कालिया’, ‘खुद्दार’, ‘शराबी’, ‘डॉन’ जैसी फिल्मों के जरिए इंडस्ट्री में अपना सिक्का जमा दिया। जब उनका करियर शिखर पर था तब उन्हें 1982 में फिल्म ‘कुली’ की शूटिंग के दौरान एक दर्दनाक घटना से गुजरना पड़ा। यह घटना इतनी भयानक थी कि उन्होंने लगभग दो महीने अस्पताल में ‘जिंदगी और मौत’ के बीच जंग लड़ी।

राजनीति में प्रवेश
‘कुली’ की घटना से उबरने के बाद अमिताभ ने कुछ दिनों के लिए फिल्मों से दूरी बना ली थी, दर्शक उनकी वापसी का इंतजार कर रहे थे। इसी दौरान उनके मित्र पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें राजनीति के क्षेत्र में आमंत्रित किया जिसे वो मना नहीं कर सके। अमिताभ को 8वीं लोकसभा के लिए इलाहबाद लोकसभा सीट से खड़ा किया गया। जिसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगणा को भारी मतों के अंतर से हरा दिया। हालांकि इस ऐतिहासिक जीत के बाद अमिताभ ने राजनीति से त्रस्त होकर 3 साल बाद ही सांसद के पद से इस्तीफा दे दिया और फिल्मों में वापसी कर ली थी।

नब्बे के दशक में फिल्म निर्माण क्षेत्र
नब्बे के दशक में अमिताभ के करियर में उतार- चढ़ाव होना शुरू हो गया था। इससे उबरने के लिए उन्होंने अपना एक प्रोडक्शन हाउस खोला था जिसका नाम था अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड (एबीसीएल)। इस प्रोडक्शन हाउस में अमिताभ को बहुत भारी नुकसान झेलना पड़ा था। अमिताभ कर्ज में पूरी तरह डूब चुके थे उनके ऊपर लगभग नब्बे करोड़ का कर्जा हो चुका था। कर्जदार पैसा मांगने के लिए उनके घर तक जा पहुंचे थे। इससे उबरने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। इसी दौरान उन्हें टीवी शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ को होस्ट करने का मौका मिला जिसने उनकी तकदीर बदल डाली। इसके बाद उन्होंने फिर से अभिनय करने की ठानी तो फिल्म निर्माता यश चोपड़ा ने उन्हें आगामी फिल्म ‘मोहब्बतें’ के लिए साइन कर लिया। ‘मोहब्बते’ं वर्ष 2000 की ब्लॉक बस्टर फिल्म रही थी जिसने बॉक्स ऑफिस पर नब्बे करोड़ की कमाई की थी इस फिल्म से अमिताभ को एक नई पहचान मिली। इसके बाद टीवी प्रोग्राम ‘.कौन बनेगा करोड़पति’ में भी अमिताभ को काम करने का मौका मिला। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की कामयाबी बाद अमिताभ एक बार फिर से दर्शकांे के चहेते कलाकार बन गए और धीरे-धीरे कर्ज से मुक्त हो गए। आज वे 3100 करोड़ की सम्पत्ति के मालिक हैं।

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