कब मिलेगा भाजपा को अध्यक्ष?

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को लेकर अटकलें एक बार फिर तेज हो गई हैं। बीते दिनों संसद परिसर में भाजपा के शीर्ष नेताओं की लगातार बैठकों ने नई चर्चा को जन्म दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसद कार्यालय में हुई बैठक में गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष मौजूद थे। चारों नेताओं की यह बैठक एक घंटे से अधिक चली। हालांकि भाजपा नेतृत्व ने बातचीत के एजेंडे पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन इन बैठकों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। बैठक से पहले बी.एल. संतोष ने प्रधानमंत्री से अलग मुलाकात की थी जिसके बाद चारों नेताओं की बैठक और फिर शाह, नड्डा व संतोष के बीच एक और बैठक हुई। संतोष की मौजूदगी को इस संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि पार्टी किसी भी समय नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की घोषणा कर सकती है। इससे पहले शाह, नड्डा और संतोष ने गृह मंत्री के संसद कार्यालय में भी एक संक्षिप्त बैठक की थी। पार्टी सूत्रों का कहना है कि भले ही बातचीत का विवरण सामने नहीं आया है, लेकिन लगातार बैठकों से यह उम्मीद बढ़ी है कि नए राष्ट्रीय अध्यक्ष का फैसला जल्द हो सकता है। पार्टी नियमों के मुताबिक राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव से पहले कम से कम 19 राज्यों में संगठनात्मक चुनाव आवश्यक हैं जबकि अब तक 29 राज्यों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्षों के चुनाव पूरे हो चुके हैं। ऐसे में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव 2026 जनवरी मध्य में होने की सम्भावना जताई जा रही है।

 
महागठबंधन में टूट की आहट

हाल ही में निर्वाचित हुई बिहार सरकार के पास बम्पर बहुमत है और उसे विपक्षी दलों में सेंधमारी की कोई जरूरत नहीं है, फिर भी विपक्षी महागठबंधन में टूट की आहट सुनाई देने लगी है। प्रदेश की राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या विधायकों पर वास्तव में डोरे डाले जा रहे हैं या वे स्वयं अपने लिए अधिक लाभ और स्थिरता वाला दांव खोज रहे हैं। इस चर्चा को बल दिया लोजपा सुप्रीमो चिराग पासवान के बयान ने। उन्होंने दावा किया कि महागठबंधन के कई विधायक उनके सम्पर्क में हैं। इसके जवाब में राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने चिराग की हैसियत पर सवाल उठाया तो चिराग ने पलटवार करते हुए कहा कि उनकी हैसियत इतनी है कि उन्होंने आपके मुख्यमंत्री चेहरे को ‘वेटिंग फाॅर सीएम’ बनाकर रखा है। यह तंज तेजस्वी यादव पर था, जिन्हें महागठबंधन को एकजुट रखने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ रही है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इस चर्चा का एक पहलू यह भी है कि कई नेता बहुमत वाले पक्ष में स्वयं को अधिक प्रभावशाली बनाना चाहते हैं। भाजपा 89 विधायकों के साथ पहली बार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी है। 2020 में वह राजद से एक विधायक कम होने के कारण इस उपलब्धि से चूक गई थी। उस समय जदयू संख्या बल में तीसरे स्थान पर खिसक गया था जबकि इस बार वह 85 विधायकों के साथ दूसरे स्थान पर है। 2005 और 2010 में जदयू बड़े भाई की भूमिका में रहा था और उसी दौर की कसक को लेकर जोर आजमाइश जारी है। अन्य दलों के महत्वाकांक्षी विधायकों को भी उम्मीदें बंधी हुई हैं। बिहार की राजनीति में सत्तापक्ष से हाथ मिला लेने का इतिहास रखने वाली बसपा का इस बार केवल एक विधायक है तो पांच विधायकों वाली एआईएमआईएम के लिए यह संतोष की बात है कि पिछली बार उनके चार साथियों को राजद ने तोड़ लिया था, जिनमें से कोई भी दोबारा विधानसभा नहीं पहुंच सका। लेकिन कांग्रेस को ऐसा संतोष नहीं है क्योंकि उसके यहां कई दिशाओं से टूट-फूट की ऐतिहासिक प्रवृत्ति रही है और कांग्रेस को लेकर भी अटकलें तेज हैं जिसके सिर्फ छह विधायक हैं। ऐसी स्थिति में महागठबंधन के नेताओं को आपसी सामंजस्य की जरूरत है नहीं तो इसका अंजाम उसे भुगतना पड़ेगा।
 
यूपी में ‘महिला कार्ड’ खेलेगी बीजेपी?

उत्तर प्रदेश भाजपा जल्द ही नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करने वाली है। चर्चा है कि इस बार पार्टी किसी महिला नेता को कमान सौंप सकती है और सबसे प्रमुख नाम साध्वी निरंजन ज्योति का उभर रहा है। फतेहपुर से पूर्व सांसद और मोदी सरकार में मंत्री रह चुकीं निरंजन ज्योति ने हाल ही में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से मुलाकात की जिसकी तस्वीर उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा की। इसके बाद अटकलें तेज हो गई हैं कि जल्द ही नया प्रदेश अध्यक्ष घोषित हो सकता है। साध्वी निरंजन ज्योति के अलावा दावेदारों में केशव प्रसाद मौर्य, धर्मपाल सिंह, बाबूराम निषाद, रामशंकर कठेरिया, दिनेश शर्मा और स्वतंत्र देव सिंह जैसे नाम भी शामिल हैं। दलित वर्ग से रामशंकर कठेरिया और विद्यासागर सोनकर जबकि महिला नेताओं में बेबी रानी मौर्य और प्रियंका रावत का नाम भी चर्चा में है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विधानसभा चुनाव करीब हैं और भाजपा अक्सर चौंकाने वाले फैसले लेती है। ऐसे में मजबूत ओबीसी महिला नेता होने के कारण साध्वी निरंजन ज्योति को प्रदेश अध्यक्ष बनाना पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से लाभकारी दांव हो सकता है। गौरतलब है कि भाजपा की स्थापना के बाद से यूपी में कभी महिला प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनी है। बिहार चुनाव में महिला वोटरों की बड़ी भूमिका को देखते हुए माना जा रहा है कि पार्टी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले ‘महिला कार्ड’ खेल सकती है। वर्तमान में पूरे हिंदी भाषी क्षेत्र में केवल मणिपुर की शारदा देवी ही महिला प्रदेश अध्यक्ष हैं। भाजपा का संगठनात्मक निर्णय सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं माना जा रहा। पड़ोसी राज्यों हरियाणा,उत्तराखण्ड, राजस्थान, दिल्ली, बिहार और मध्य प्रदेश में किस जाति के नेता प्रदेश अध्यक्ष हैं इसे भी ध्यान में रखा जा रहा है। यूपी में निर्णय सामान्य बनाम पिछड़ा वर्ग संतुलन पर अटका है। कुछ नेता मानते हैं कि योगी आदित्यनाथ सामान्य वर्ग से हैं इसलिए अध्यक्ष किसी पिछड़े वर्ग से होना चाहिए। वहीं कुछ इस बार भी सामान्य वर्ग को प्राथमिकता देने की वकालत कर रहे हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि पार्टी नेतृत्व निर्णय लेते समय शुभ तिथि जैसे पहलुओं पर भी विचार करता है। अगर 14 दिसम्बर तक घोषणा नहीं हुई तो फिर जनवरी के मध्य या अंत तक होने की सम्भावना है।

मोदी सरकार का एक और यू-टर्न

देश की सबसे बड़ी पंचायत में इन दिनों शीतकालीन सत्र चल रहा है। इस दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष में एक ओर जहां तीखी बहस देखने को मिल रही है, वहीं मोदी सरकार ने ‘संचार साथी’ ऐप को सभी स्मार्टफोनों में प्री-इंस्टाॅल करने के फैसले से यू-टर्न ले लिया है। यह यू-टर्न अचानक नहीं, बल्कि किस्तों में आया। पहले ऐप को अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टाॅल करने का आदेश जारी हुआ फिर विरोध बढ़ने पर कहा गया कि यूजर इसे डिलीट कर सकेंगे। लेकिन जब आलोचना थमी नहीं तो सरकार ने अंततः पूरा आदेश वापस ले लिया। गौरतलब है कि दूरसंचार विभाग ने निर्देश दिया था कि अगले 90 दिनों में हर नए स्मार्टफोन में ‘संचार साथी’ ऐप पहले से मौजूद होना चाहिए। सरकार का दावा था कि यह ऐप मोबाइल नम्बर, सिम कार्ड और फोन सुरक्षा जैसी जानकारियां उपलब्ध कराकर धोखाधड़ी से बचाने में मदद करेगा। लेकिन घोषणा होते ही विपक्ष ने नागरिक समाज, प्राइवेसी एक्टिविस्टों और यहां तक कि सरकार समर्थक समूहों ने भी इसे निजता और डेटा निगरानी से जोड़ते हुए कड़ा विरोध शुरू कर दिया। इसके बाद पहला संशोधन सरकार ने सफाई दी कि ऐप तो प्री-इंस्टाॅल रहेगा, लेकिन यूजर चाहें तो इसे हटा सकते हैं। लेकिन लगातार विरोध के बाद सरकार ने घोषणा की कि अब यह ऐप किसी भी स्मार्टफोन में प्री-इंस्टाॅल नहीं किया जाएगा। हालांकि यू-टर्न वाली कहानी पहली बार नहीं है जब केंद्र सरकार ने विरोध के चलते बड़ा फैसला वापस लिया हो। इससे पहले 2020 में आरोग्य सेतु ऐप को लगभग अनिवार्य बनाया गया था, लेकिन प्राइवेसी चिंताओं के बाद नियम ढीले किए गए। ब्राॅडकास्टिंग सर्विसेज बिल 2023 मीडिया जगत के विरोध के बाद ड्राफ्ट वापस हुआ। 2021 में तीन कृषि कानून लंबे आंदोलन के बाद खुद प्रधानमंत्री ने इन्हें वापस लेने की घोषणा की। यही नहीं 2015 में भूमि अधिग्रहण बिल भारी विरोध के कारण मोदी सरकार ने बिल वापस लिया यह पहला बड़ा यू-टर्न था। विश्लेषकों का कहना है कि ‘संचार साथी’ को लेकर केंद्र सरकार का कदम उसके एक और बड़े यू-टर्न का उदाहरण है। यह स्पष्ट संकेत है कि नागरिक अब डिजिटल अधिकारों, डेटा सुरक्षा और निजता को लेकर पहले से ज्यादा सजग हैं और सरकार को भी नीतियों में इन संवेदनशीलताओं का ध्यान रखना पड़ रहा है। सभी नागरिकों के फोन में जबरन ऐप डालना निजता अधिकार के खिलाफ है। डेटा सुरक्षा कानून के बावजूद सरकारी ऐप्स की पारदर्शिता संदिग्ध मानी जाती है। प्री-इंस्टाॅल ऐप्स अक्सर हटाना मुश्किल होते हैं जिससे सुरक्षा खतरे बढ़ते हैं। कई लोगों ने इसे बैकडोर सर्विलांस की आशंका से जोड़ा जिसके चलते सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा है।

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