बाबरी मस्जिद को लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू पर सरकारी पैसे से ‘पुनर्निर्माण’ कराने का आरोप, मनुबेन की डायरी के नाम पर इतिहास के तथ्यों में संदिग्ध और मनमानी हेर-फेर, ‘दैनिक जागरण’ जैसे बड़े अखबार के जरिए इस कहानी को स्थापित करने की कोशिश की गई। फिर उसे देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सार्वजनिक मंच से दोहरा न सिर्फ नेहरू की ऐतिहासिक भूमिका को विवादों में खड़ा किया बल्कि यह भी साफ कर दिया कि अटल परम्परा के संतुलित, संवादप्रिय और अपेक्षाकृत सौम्य माने जाने वाले राजनाथ अब उसी वैचारिक धारा में खड़े दिखाई दे रहे हैं जहां राजनीति के लिए इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना भी स्वीकार्य हो चुका है


भारतीय राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिनकी पहचान शोर, उत्तेजना और टकराव से नहीं बल्कि संयम, संवाद और संतुलन से बनती है। राजनाथ सिंह लंबे समय तक ऐसे ही नेता माने जाते रहे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, केंद्र में कई बड़े मंत्रालय सम्भाले, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे, लेकिन कभी उन्हें उग्र भाषा, आक्रामक सांप्रदायिक राजनीति या इतिहास के साथ खुली मनमानी छेड़खानी के लिए नहीं जाना गया। उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी की परम्परा का नेता माना जाता रहा, जहां राजनीतिक विरोध भी शालीनता में व्यक्त होता था और असहमति भी मर्यादा नहीं तोड़ती थी। लेकिन बाबरी मस्जिद और पंडित जवाहरलाल नेहरू को लेकर दिया गया उनका ताजा बयान इस पूरी छवि को ध्वस्त करने का काम करता है।

राजनाथ सिंह ने यह कहकर कि पंडित नेहरू सरकारी पैसे से बाबरी मस्जिद का पुनर्निर्माण कराना चाहते थे केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं की बल्कि स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री की नीयत, उनकी
धर्मनिरपेक्ष सोच और उनके ऐतिहासिक निर्णयों पर सीधा आरोप लगाया। इस बयान के समर्थन में उन्होंने सरदार पटेल की पुत्री मणि बहन की डायरी का हवाला दिया। बयान सामने आते ही कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मणि बहन की गुजराती में लिखी गई मूल डायरी के अंश सार्वजनिक कर दिए और यह साफ कर दिया कि उसमें कहीं भी नेहरू द्वारा मस्जिद के पुनर्निर्माण या सरकारी खर्च की कोई बात दर्ज नहीं है।

इसके बाद ‘दैनिक जागरण’ में एक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें एक कथित अंग्रेजी डायरी का हवाला देते हुए यह दावा किया गया कि 20 सितम्बर 1950 को नेहरू और पटेल के बीच बातचीत हुई थी और पटेल ने नेहरू को सरकारी पैसे से मस्जिद बनवाने से रोक दिया था। इसी लेख का शीर्षक था ‘नेहरू का बाबर पर प्रेम।’ यह शीर्षक अपने आप में इस पूरी कवायद की मानसिकता को उजागर कर देता है। यहीं से साफ हो गया कि यह विवाद अब तथ्य का नहीं बल्कि एक गढ़े हुए राजनीतिक नैरेटिव को स्थापित करने का प्रयास है।

असलियत इससे बिल्कुल अलग है। दिसम्बर 1949 में जब अयोध्या की बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखी गईं, तब देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे, गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल थे, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत थे और प्रदेश के गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे। यह वह दौर था जब देश विभाजन, शरणार्थियों और सांप्रदायिक तनाव के घाव अभी भी गहरे थे। नेहरू ने साफ निर्देश दिया था कि मस्जिद में रखी गई मूर्तियां हटाई जाएं और यथास्थिति बहाल की जाए। लेकिन अयोध्या के जिलाधिकारी नायर ने मूर्तियां हटाने से इनकार कर दिया और उत्तर प्रदेश सरकार ने कानून-व्यवस्था के बिगड़ने की आशंका दिखाकर इस निर्देश पर अमल नहीं किया। यानी नेहरू की मंशा यथास्थिति बनाए रखने की नहीं, बल्कि उसे बहाल करने की थी।
इसी दौर में फैजाबाद जिला कांग्रेस के मंत्री अक्षय ब्रह्माचारी का नाम पूरे उत्तर भारत में चर्चा में आया। वे कट्टर गांधीवादी थे, साम्प्रदायिक सौहार्द में गहरी आस्था रखते थे और उन्होंने साफ कहा कि मस्जिद का ‘रीस्टोरेशन’ होना चाहिए यानी मूर्तियां हटाकर 1949 से पहले जैसी स्थिति बहाल की जाए। यही ‘रीस्टोरेशन’ शब्द बाद में कथित अंग्रेजी डायरी में ‘रिकंस्ट्रक्शन’ यानी पुनर्निर्माण में बदल दिया गया, जबकि वास्तविकता यह थी कि मस्जिद पहले से मौजूद थी, उसके पुनर्निर्माण का प्रश्न ही नहीं था।

जनवरी 1950 में अक्षय ब्रह्माचारी ने आमरण अनशन शुरू किया। उत्तर प्रदेश के गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के आश्वासन पर उन्होंने दो दिन बाद अनशन तोड़ा लेकिन जब महीनों तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो वे जुलाई 1950 में दिल्ली पहुंचे और नेहरू से सीधे मुलाकात की। नेहरू ने इस पूरे प्रकरण पर पंत और शास्त्री को लम्बा पत्र लिखा। गांधीजी के सहयोगी के.जी. मशरूवाला इस दौरान लगातार ‘नवजीवन’ में लेख लिखकर सरकार पर नैतिक दबाव बनाते रहे। इस बीच अयोध्या में अक्षय ब्रह्माचारी के घर पर हमले हुए, उनके साथ बदसलूकी हुई और उन्हें शहर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

20 अगस्त 1950 को वे लखनऊ में कांग्रेस कार्यालय के बाहर दोबारा आमरण अनशन पर बैठ गए। यह अनशन पूरे 32 दिन चला। उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस पर बार-बार चर्चा हुई। अंततः 22 सितम्बर 1950 को मशरूवाला और विनोबा भावे ने उनका अनशन तुड़वाया। बाद में अक्षय ब्रह्माचारी ने स्पष्ट कहा कि उन्हें यह आश्वासन लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था कि मस्जिद का ‘रीस्टोरेशन’ कराया जाएगा। यानी यह वादा शास्त्री का था, नेहरू का नहीं और वह भी पुनर्निर्माण का नहीं बल्कि यथास्थिति बहाली का था।

20 सितम्बर 1950 को नासिक में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन चल रहा था, वहीं सरदार पटेल और गोविंद बल्लभ पंत के बीच बातचीत हुई। गुजराती डायरी में यही दर्ज है कि पटेल ने पंत से कहा कि विधानसभा में आपने जो वक्तव्य दिया है, उसे पर्चा छपवाकर जनता तक भी पहुंचाइए ताकि भ्रम न फैले। लेकिन अंग्रेजी संस्करण में इस बातचीत के पात्र बदल दिए गए, पंत की जगह नेहरू को बैठा दिया गया और ‘रीस्टोरेशन’ को ‘रिकंस्ट्रक्शन’ बना दिया गया। यहीं से इतिहास की बुनियाद से छेड़छाड़ शुरू हुई।

अब यहीं से सवाल राजनाथ सिंह पर लौटता है। जब इतने स्पष्ट दस्तावेजी तथ्य मौजूद हैं, जब मूल गुजराती डायरी सामने है, जब अक्षय ब्रह्माचारी का सार्वजनिक बयान मौजूद है, तब एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री का इस तरह का बयान देना केवल भूल नहीं लगता। यह या तो गम्भीर राजनीतिक लापरवाही है या फिर जानबूझकर गढ़े गए नैरेटिव का हिस्सा बन जाना।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी राजनाथ सिंह की छवि संतुलन से ही बनी थी। बाबरी विध्वंस के बाद कट्टर हिंदुत्व की पहचान बन चुके कल्याण सिंह को भाजपा ने नवम्बर 1999 में मुख्यमंत्री पद से हटाया। इसके बाद नवम्बर 1999 से अक्टूबर 2000 तक प्रदेश की कमान राम प्रकाश गुप्ता के हाथों में रही, लेकिन यह सरकार आंतरिक गुटबाजी, सत्ता संघर्ष और प्रशासनिक अस्थिरता का शिकार हो गई। अंततः भाजपा ने 28 अक्टूबर 2000 को राम प्रकाश गुप्ता को हटाकर राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था बल्कि राजनीतिक संदेश भी था। एक घनघोर हिंदूवादी छवि वाले मुख्यमंत्री और फिर गुप्ता की असफल सरकार के बाद राजनाथ सिंह को अपेक्षाकृत संतुलन, संवाद और प्रशासनिक स्थिरता का चेहरा मानकर आगे लाया गया। उस दौर में अल्पसंख्यक समाज ने भी इसे ध्रुवीकरण से कुछ राहत की दिशा में एक कदम मानते हुए उम्मीद की सांस ली थी।

राजनाथ सिंह का मुख्यमंत्री काल अपेक्षाकृत शांत और गैरविवादास्पद रहा। वे खुलकर किसी उग्र हिंदुत्ववादी एजेंडे के प्रतीक नहीं बने। यही वजह थी कि उन्हें भाजपा की उस पीढ़ी से जोड़ा जाता है जो अटल और आडवाणी की दो धाराओं के बीच संतुलन साधती थी। लेकिन आज वही राजनाथ सिंह जब बाबरी मस्जिद और नेहरू को लेकर उस विवादित नैरेटिव का हिस्सा बनते दिखाई देते हैं जिसे दस्तावेजी प्रमाण झूठा साबित कर चुके हैं तो यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं, वैचारिक भी लगता है और स्वयं के हित साधने की कवायद भी।
आज की भाजपा में सबसे सुरक्षित राजनीति नेहरू-विरोध बन चुकी है। हर ऐतिहासिक विवाद की जड़ में नेहरू को खड़ा कर देना एक स्थापित रणनीति बन गई है। लेकिन जब यह काम ऐसे नेता के जरिए होता है जिसकी पहचान कभी मर्यादा, संतुलन और संवाद थी तब निराशा और गहरी हो जाती है। ‘दैनिक जागरण’ जैसे बड़े अखबार द्वारा ‘नेहरू का बाबर पर प्रेम’ जैसे शीर्षक देना और फिर उस पूरे नैरेटिव को सत्ता के शीर्ष पर बैठे मंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच से दोहराना यह दिखाता है कि पत्रकारिता और राजनीति दोनों अब सच के साथ नहीं, सुविधा के साथ खड़ी दिखाई दे रही हैं।

बाबरी मस्जिद भारत के लोकतंत्र की सबसे संवेदनशील, दर्दनाक और जटिल घटनाओं में से एक है। उस पर झूठा इतिहास गढ़ना केवल अतीत से धोखा नहीं है, यह वर्तमान और भविष्य, दोनों से छल है। राजनाथ सिंह का यह बयान इसी छल की राजनीति की कड़ी बनता दिखाई देता है।

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